हत्यारे की हत्या पर दुख कैसा?

जिस व्यक्ति ने दलित मजदूरों के दमन के लिए रणवीर सेना बनाई हो, उनकी बस्ती पर धावा बोल कर उन्हें गोलियों से भून दिया हो, दूधमुही बच्ची को हवा में उछाल कर उसे बन्दूक से उड़ा दिया हो और गर्भवती स्त्री का पेट फाड़ कर भ्रुण  शिशु को तलवार से काट डाला हो, उस दरिन्दे की हत्या पर कोई दरिंदा ही शोक मना सकता है, दलित क्यों शोक मनाएंगे?

ब्रह्मेश्वर की हत्या पर लोगों की जिज्ञासा इस बात को लेकर ज्यादा थी कि इस पर दलितों की क्या प्रतिक्रिया है? जिन लोगों ने फोन करके मुझे पूछा, उसका यही मतलब था। मैंने कहा कि मुखिया दलितों का हत्यारा था और हत्यारे की हत्या पर दलितों को कोई दु:ख नहीं है। जिस व्यक्ति ने दलित मजदूरों के दमन के लिए रणवीर सेना बनाई हो, उनकी बस्ती पर धावा बोल कर उन्हें गोलियों से भून दिया हो, दूधमुही बच्ची को हवा में उछाल कर उसे बन्दूक से उड़ा दिया हो और गर्भवती स्त्री का पेट फाड़ कर भ्रुण  शिशु को तलवार से काट डाला हो, उस दरिन्दे की हत्या पर कोई दरिंदा ही शोक मना सकता है, दलित क्यों शोक मनाएंगे? दलित तो बहुत खुश हैं। वे खुश भी क्यों न हों, उनके सबसे बड़े दुश्मन का अंत जो हो गया।

पर, बिहार के भूमिहार खुश नहीं हैं। वे अपने नेता कि हत्या पर ग़मज़दा हैं। इसलिए प्रतिक्रिया में उन्होंने वह गुंडागर्दी दिखाई कि बिहार के इतिहास में अमर हो गयी। भूमिहारों की इस एकता से दलित मजदूर आतंकित हैं। वे इसमें रणवीर सेना की वापसी की सम्भावना देख रहे हैं। दलितों की आशंका गलत नहीं है। मुखिया.समर्थकों के उपद्रव की जो तस्वीरें अखबारों में आई हैं, उससे यह निष्कर्ष क्यों न निकाल लिया जाये कि बिहार में सामंतवाद अभी भी जिन्दा है। ब्रह्मेश्वर की हत्या के तुरंत बाद भूमिहारों की उपद्रवी सेना ने आरा में एक दलित छात्रावास पर हमला किया, जो बताता है कि उनके निशाने पर दलित सबसे पहले हैं। आरा में शुक्रवार यानि एक जून को मुखिया समर्थकों ने जो बवाल किया, उसे हम एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया मान सकते हैं, पर जो 2 जून को (शनिवार के दिन) पूरे बिहार , खास तौर से राजधानी पटना में हुआ, उसे स्वाभाविक प्रतिक्रिया नहीं कहा जा सकता। 3 जून के अखबार बताते हैं कि 2 जून की गुंडागर्दी को राज्य सरकर का मौन समर्थन प्राप्त था, क्योंकि यदि राज्य सरकार चाहती तो मुखिया की हत्या के बाद जो आरा में हुआ, उसे दूसरी जगहों पर होने से रोका जा सकता था। लेकिन राज्य सरकार ने इतनी ढील दी कि सारा उपद्रव बे-रोक टोक आसानी से होता रहा। इसका क्या मतलब है?

बथानी टोला नरसंहार को रणवीर सेना ने 11 जुलाई 1996 को अंजाम दिया था, जिसके मुखिया ब्रह्मेश्वर थे। यह केस 14 साल तक आरा की निचली अदालत में चला, जिसके फैसले में तीन अभियुक्तों को सजाये मौत और बाकी को उम्र क़ैद की सजा हुई थी। इसके विरुद्ध अभियुक्तों ने पटना हाईकोर्ट में अपील की, जिसने इसी वर्ष 2012 में अपना फैसला अभियुक्तों के पक्ष में दिया। पटना हाईकोर्ट ने सभी 23 अभियुक्तों को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने चश्मदीद गवाह पर भी सवाल उठाये। उसने उनकी गवाही को यह कह कर अमान्य कर दिया कि वे पीड़ितों के परिवारों से सम्बन्ध रखते हैं। हाईकोर्ट ने घटना के 12 घंटे बाद लिखी गई एफआइआर  पर भी आपत्ति की। मौके के गवाह पहले ही मर चुके थे। इसलिए हाईकोर्ट ने भरोसेमंद गवाहों और साक्ष्यों के अभाव में अभियुक्तों को निरपराधी मान कर बरी कर दिया। ब्रह्मेश्वर, जो 20 आपराधिक मामलों में दोषी था, पहले ही जमानत पर छूट चूका था।

2 जून 2012 : मुखिया के समर्थकों ने दिल्ली के इंडिया गेट पर भी प्रदर्शन किया

अदालत के फैसलों पर सवाल उठाना अवमानना का विषय माना जाता है। लेकिन इस सवाल का जवाब कौन देगा कि जब बरी किये गए सभी लोग निरपराधी थे, तो बथानी टोला काण्ड किसने अंजाम दिया था? नौ महीने की बच्ची समेत 22 दलितों की हत्या करने वाले कौन लोग थे?

बथानी टोला में जो दलित मजदूर मारे गए थे, वे मार्क्सवादी-लेनिनवादी कम्युनिष्ट पार्टी (माले) के समर्थक थे। यह पार्टी उनके हकों के लिए लड़ती थी और भूस्वामियों द्वारा हो रहे उनके शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाती थी। बथानी टोला काण्ड इसी आवाज़ की सजा थी, जिसे भूस्वामियों की रणवीर सेना ने अंजाम दिया था। अभियुक्तों के पक्ष में हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद यह सवाल उठाना स्वाभाविक है कि पूरे मामले में माले की क्या भूमिका रही? यह जानने का कोई अधिकृत रिकॉर्ड मेरे पास नहीं है। किन्तु, गुंजन कुमार की एक रिपोर्ट, जो 13 जून 2012 के ‘अमर उजाला’ में छपी है, कुछ तस्वीर हमारे सामने लाती है। रिपोर्ट इस बात को रेखांकित करती है कि ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ मुखिया की हत्या में रणवीर सेना के धुर विरोधी रहे नक्सली संगठन ‘माले’ का कोई हाथ नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि बिहार पुलिस की जांच और ख़ुफिय़ा विभाग द्वारा हासिल जानकारियों के अनुसार नक्सली संगठनों की, जिसमें माले भी शामिल है, उस दौरान ही मुखिया से सुलह हो गयी थी, जब वह जेल में था। रिपोर्ट कहती है कि सूत्रों के मुताबिक़ मुखिया और माले आदि के बीच हुई सुलह के तहत ही दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ गवाही नहीं दी थी। नतीजतन ब्रह्मेश्वर मुखिया और कई नक्सली ज्यादातर हत्याकांडों के मुकदमों से बरी हो गए थे।

मुखिया के पैतृक गांव खोपिरा में लगा बैनर

यही है मजदूरों के लिए रोने वाली वाम पार्टियों का वर्ग चरित्र! चूंकि इन पार्टियों का नेतृत्व उच्च जातियों के हाथों में है, इसलिए उनके लिए अपने स्वजातीय के हितों की रक्षा करना जरा भी अस्वाभाविक नहीं है। समाजवादियों के इस वर्ग चरित्र को डा‍ॅ. आंबेडकर ने अपने समय में ही अच्छी तरह समझ लिया था। आज के दलित बुद्धिजीवी भी कम्युनिष्टों के साथ काम करके यही अनुभव रखते हैं। वे ब्राह्मण, ठाकुर पहले रहते हैं, कम्युनिस्ट बाद में होते है। वे न वर्ग विहीन हुए और न जाति विहीन। यदि आज भारत में ब्राह्मणवाद, सामंतवाद और जातिवाद की जड़ें मजबूत हैं, तो उसका एक कारण वामपंथ का ब्राह्मण नेतृत्व भी है। दलित-मजदूरों के हितों की यह कैसी वाम राजनीति है कि वह मजदूरों की लड़ाई भी ठीक से नहीं लड़ सकी। आज भी बथानी टोला में पंचायत की 90 बीघा ज़मीन पर भूमिहार ज़मीदारों का कब्ज़ा है। मुखिया ने जो बोया, वही काटा। कहते हैं कि अत्याचारी को भी उसी तरह मरना होता है, जिस तरह वो दूसरों को मारता है। मुखिया को क्या पता था कि कोई गोली उसका भी इंतज़ार कर रही थी और खून से लथ-पथ उसकी लाश भी बीच सड़क पर पड़ी होगी। उसकी हत्या का मातम मनाने वाले भूमिहारों को बनी टोला में बे-रहमी से मारे गए निरीह-गरीब-दलित मजदूरों की चीत्कारें याद नहीं आतीं। बिहार के तमाम शहरों में आगजनी और तोडफ़ोड़ करने उच्च जात्याभिमानियों ने जरा भी नहीं सोचा कि मुखिया हत्यारा था, न सिर्फ गरीब दलितों का, बल्कि लोकतंत्र का भी। उनकी आखों में शर्म नाम की कोई चीज़ नहीं थी। बेशर्मी की हद तो तब हो गयी, जब बिहार सरकार के एक मंत्री गिरिराज सिंह ने ब्रह्मेश्वर मुखिया को गांधीवादी करार दे दिया। यह कहते हुए इस मंत्री को जरा भी लज्जा नहीं आई कि एक हत्यारा गांधीवादी कैसे हो सकता है? क्या गांधी ने गरीबों की हत्याएं कराने के लिए कोई सेना बनाई थी? क्या गांधी ने बन्दूक हाथ में लेकर हिंसा का रास्ता अपनाया था? कोई भी इन सवालों का जवाब हाँ में नहीं दे सकता। फिर बिहार सरकार ने इस सिरफिरे मंत्री के खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं की? किसी गांधीवादी ने उसके विरुद्ध आवाज़ क्यों नहीं उठाई? सत्ता पक्ष के और भी कई विधायकों ने मुखिया की हत्या की निंदा की है। क्या यह बथानी टोला के पीडि़तों के प्रति अन्याय नहीं है?

(फारवर्ड प्रेस, जुलाई, 2012 अंक में प्रकाशित )


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