बलात्कार की जड़ें हिन्दू संस्कृति में

महिला अत्याचार भारतीय समाज की रोजमर्रा की सच्चाई है। यह भारतीय समाज का अभिन्न हिस्सा है जो बेखौफ होकर निरंतर जारी है। दिल्ली गैंगरेप कोई अपवाद घटना नहीं है

निश्चित तौर पर जिस युवती ने अपने मासिक धर्म के बाद वस्त्र बदल लिए हैं वह पवित्र है। अत: जब युवती अपने मासिक धर्म के बाद वस्त्र बदल ले तब उस उत्कृष्ट महिला को सहवास के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए। अगर वह राजी न हो तो उसे प्रलोभन दो। अगर वह फिर भी न माने तो लाठी से उसकी पिटाई लगाओ या उसे घूूंसे मारो और यह कहते हुए उसे काबू में कर लो कि-मैं अपने पौरुष और तेज से तुम्हारी सुषमा ले रहा हूं। (बृहदारण्यकपनिषद् 6.4.9.21)

गत 16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की शिकार की लड़की का मामला सड़क से संसद तक जोर-शोर से गूंजा ओर पूरी दुनिया में अखबारों की सुर्खियां बना।। विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, अभिनेत्री व सांसद जया बच्चन से लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा तक अनेकानेक लोगों ने आंसू बहाए। गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बेटी के पिता होने का हवाला दिया। मीडिया, कारपोरेट समूहों और फिल्मी दुनिया ने भारी संवेदनशीलता जताई। बलात्कार पर संवेदनशीलता, दुख व रोष भी जताया जाना चाहिए। किन्तु आखिर सारी संवेदनशीलता एक ही बलात्कार तक सीमित क्यों?

विगत वर्ष भ्रष्टाचार के विरुद्ध जंतर-मंतर व राजघाट पर विशाल प्रदर्शन हुए, जिन्हें मीडिया ने और बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया। एक भीड़ इकट्ठी हुई कि भ्रष्टाचार को समाप्त होना चाहिए। बस जमावड़ा लग गया। इस बात पर विचार किए बिना कि भ्रष्टाचार क्या है, कौन करता है और कैसे समाप्त होगा? बिना इस पर विचार किए भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक जंग शुरू हो गई और इसे पवित्र मुद्दे के रूप में पेश किया गया। यह प्रश्न गायब थे कि वह व्यक्ति कौन है जो भ्रष्टाचार कर रहा है और किस तरह से भ्रष्टाचार को समर्थन मिल रहा है। और जो इन प्रश्नों को उठाए तो उसे उस फासीवादी वातावरण में भ्रष्टाचार के विरुद्ध पवित्र जंग में बाधा डालने वाला कहा गया।

इस बार भी स्वत: स्फूर्त भीड़ इकट्ठी हुई कि बलात्कार पीडि़त को न्याय मिलना चाहिए। हां, बिल्कुल मिलना चाहिए। किन्तु केवल इसी को क्यों, बाकी को क्यों नहीं? साम्प्रदायिक दंगों में जिन महिलाओं के पेट में तलवार भोंकी गई हैं, वे आज भी न्याय के लिए प्रतीक्षा कर रही हैं। जाति के आधार पर  अत्याचार-खैरलांजी, महाराष्ट्र (2006) से लेकर हाल में हरियाणा के बलात्कार की लम्बी शृंखला-क्या बलात्कार
की परिभाषा में नहीं आते?

महिला अत्याचार भारतीय समाज की रोजमर्रा की सच्चाई है। यह भारतीय समाज का अभिन्न हिस्सा है जो बेखौफ होकर निरंतर जारी है। यह कभी-कभी प्रकट होकर सामने आता है और अक्सर दबा दिया जाता है। दिल्ली गैंगरेप कोई अपवाद घटना नहीं है। भारतीय समाज में जो रेप की घटनाएं होती हैं, उनमें से अधिकांशत: न तो बलात्कारी पुरुष की विकृत मानसिकता का परिणाम है और न ही सैक्सुअल इच्छा को पूरा करने को होते हैं। बल्कि भारत में रेप किसी वर्ग विशेष की आवाज दबाने और खौफ पैदा करने का एक यंत्र रहा है।

क्या कारण है कि सोनी शौरी के मसले पर जिस अंकित गर्ग को जेल की सलाखों में होना चाहिए वो राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया है। क्या ऐसा नहीं है कि जो रेप प्रभु वर्ग और उसका साथ देने वाली व्यवस्था की मर्जी के बिना होता है, चिल्लपो उन्हीं पर होती है बाकी पर नहीं। जिस रेप की आवाज को प्रभु वर्ग और उसका साथ देने वाली व्यवस्था उठाना चाहती है, उठा लेती है और जिस आवाज को दबाना चाहती है, दबा देती है।


मात्र मामला रेप का नहीं, मामला पूरे भारतीय समाज की शक्ति सिद्धांतों पर आधारित सामंतवादी जातिवादी संरचना का है। दलित आदिवासी महिला मात्र पितृसत्ता के तहत पुरुषों का ही शिकार नहीं होती, उसे महिलाओं का भी शिकार बनना पड़ता है। जब भंवरी देवी के मसले पर माननीय न्यायालय ने न्याय सुनाया था कि कोई अपर कास्ट पुरुष लोअर कास्ट की महिला से रेप नहीं कर सकता और अभियुक्तों को बरी घोषित किया था तो अपर कास्ट महिलाओं ने अभियुक्तों की जीत के पक्ष में जुलूस निकाले थे। शर्म है ऐसे माननीय न्यायाधीश पर!
लक्ष्मीओरंग का मामला कोई बहुत अलग नहीं है। लक्ष्मीओरंग ने अपने बयान में कहा था कि सरकार और मीडिया ने मुझे मात्र इसलिए नजरंदाज किया, क्योंकि मैं आदिवासी हूं। वर्तमान घटना पर भी सरकार मीडिया का रोल छिपा नहीं है। मीडिया ने दिल्ली गैंगरेप को जोर-शोर से उठाया। क्यों लड़की को बताया गया कि यह ओबीसी, कुर्मी जाति समुदाय की (द हिन्दू समाचारपत्र, 20 दिसम्बर 2012।) लड़की की मौत के बाद उसके पिता ने उजागर किया कि लड़की का नाम निर्भया पांडे है। क्या कारण था कि मीडिया ने बलात्कार पीडि़त की जाति की पड़ताल नहीं करवाई? क्या जाति भारत की एक अकाटय सच्चाई नहीं है?

मुद्दा सामाजिक व्यवस्था और मानसिकता में परिवर्तन करने का है। कोई एक नियम, कानून या सजा रेप को दूर नहीं कर सकता, वह चाहे फांसी की सजा हो या केमिकल कस्ट्रेशन। यदि कोई ऐसा कह रहा है तो वह सामाजिक सच्चाई की कटुता से परिचित नहीं है या जानबूझ कर ध्यान भटकाना चाहता है। मामला कहीं अधिक गहरा है। महिला अत्याचार और जुल्म सामाजिक व्यवस्था के केंद्र में बसा हुआ है और उसे शक्ति मिल रही है धर्म, संस्कृति और परंपराओं से। उस शक्ति संरचना और उसे पोषित करने वाले धर्म, संस्कृति पर चोट क्यों नहीं? हिन्दू पुराणों और अन्य ग्रंथों के अनुसार ब्रह्मा ने अपनी बेटी से रेप किया और उसे अपनी पत्नी बनाया। विष्णु ने अनुसूया और शिव ने मोहिनी के साथ रेप किया। इनको अपराधी घोषित नहीं किया गया, बल्कि देवता घोषित किया गया। इन्हें देवता इसलिए बनाया गया कि पितृसत्ता और बलात्कारी मानसिकता को कोई चुनौती नहीं दे सके। मनुष्य के खिलाफ तो कोई बोल सकता है, देवताओं पर प्रश्न उठाना तो अधर्म है। आखिर उस पर चुप्पी कैसी?

महिलाओं को दोयम दर्जे का मनुष्य मनुस्मृृति से लेकर रामचरितमानस तक बताया गया। वो सभी मूल्य, धारणाएं और परंपराएं ठुकराई जानी चाहिए जो पुरुष की तुलना में महिला को दोयम दर्जे का बनाते हैं। धर्मराज और सत्यवादी कहे जाने वाले युधिष्ठिर के लिए द्रोपदी तो वस्तु है जिसे उन्होंने जुए में लगा दिया। सीता को आदर्श महिला मात्र इसलिए माना जाता है, क्योंकि वह पुरुषों की, राम और लक्ष्मण की-कथित तौर पर आज्ञाकारी थी। क्या आज्ञाकारी होना ही आदर्श महिला का गुण है? नाक, कान कटवा कर सूपर्णखा न्याय के लिए भटक रही है। इन सभी मूल्यों को ठुकराए बिना महिलाओं के पक्ष में कोई परिवर्तन संभव नहीं है।

पितृसत्तात्मक और जातिगत शोषणकारी और भेदभावकारी स्वरूप पग-पग पर सामने आता है। फूलन देवी जिसके साथ अपर कास्ट के 15 लोगों ने गैंगरेप किया परंतु उसने पलटवार किया कि वह एक बहादूर महिला थी, क्यों मुंह मोड़ा जाता है फूलन देवी के नाम से? भारतीय महिलावादी आंदोलन सीमोन द बोउवार, केथ मिलेट और लुडविग फायरएस्टोन का नाम तो ले लेते हैं किन्तु फूलन देवी का क्यों नहीं? वह भी तब जब पिछले दिनों प्रतिष्ठित टाइम पत्रिका ने फूलन देवी को विश्व स्तर की विद्रोही महिला का दर्जा दिया है?

दलित युवा लेखिका अनिता भारती ने 3 जनवरी को जंतर-मंतर पर ही एक सभा का आयोजन कर 3 जनवरी को काला दिवस घोषित किए जाने का पुरजोर विरोध कर इस साजिश को विफल कर दिया

दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड के विरोध में अरविंद केजरीवाल व कुछ अन्य सिविल सोसायटियों ने 3 जनवरी को काला दिवस घोषित किया और दिल्ली के जंतर-मंतर पर सभा आयोजित की। 3 जनवरी को आरोपियों की कोर्ट में पहली पेशी थी। वह दिन तो स्वागतयोग्य है ताकि न्यायिक प्रणाली अपना काम करे और अपराधियों को सजा मिल सके। आखिर यह काला दिवस कैसे हो गया? अगर काला दिवस मनाना ही था तो इसे 16 दिसंबर को घोषित किया जाना चाहिए था, जिस रात को सामूहिक बलात्कार की जघन्य घटना हुई थी। वास्तव में इस घोषणा के पीछे एक काला एजेंडा छुपा था। यह एजेंडा था-बहुजन समाज के गौरवपूर्ण दिवस को काला दिवस में बदलना। याद रहे कि 3 जनवरी को देश की प्रथम शिक्षिका सावित्रीबाई फुले का जन्मदिवस है। इस दिन को भारत के कई समुदाय और विभिन्न लोग प्रतिवर्ष शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं तथा फारवर्ड प्रेस ने पिछले दो वर्ष से इस दिवस को सर्वशिक्षा दिवस के रूप में मनाने का सराहनीय आगाज किया है।
बहरहाल, दलित युवा लेखिका अनिता भारती ने 3 जनवरी को जंतर-मंतर पर ही एक सभा का आयोजन कर 3 जनवरी को
काला दिवस घोषित किए जाने का पुरजोर विरोध कर इस साजिश को विफल कर दिया।


भारतीय न्याय प्रणाली के बारे में बताया जाए कि पवित्र मानी जाने वाली संस्था सर्वाधिक अलोकतांत्रिक है। यह एक ऐसी संस्था है जिसमें वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर है। न्यायपालिका में बैठे न्यायाधीश अपर कास्ट पुरुष तो हैं ही, वे धनी वर्ग से भी हैं जो पितृसत्ता व जातिवादी मानसिकता से परिपूर्ण है। कई निर्णयों में ऐसा स्पष्ट हो चुका है। न्यायपालिका ‘न्याय’ नहीं सुनाती बल्कि ‘निर्णय’ सुनाती है। यह मात्र संयोग नहीं है कि जेल में बंद अधिकांश अभियुक्त दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। बिहार के जेल में बंद मौत की सजा पाए 36 में से 35 लोग दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग से आते हैं। (देखें, प्रभात कुमार शांडिल्य का सर्वे आधारित लेख, हंस) भारत सरकार के सचिव पद पर बैठे सभी लोग ‘अपर कास्ट’ के हैं और जेल में बंद अभियुक्त वंचित समाज के? अपराध के कारणों और उसकी व्याख्या नए सिरे से करने की जरूरत है। विवेचना करने की जरूरत है कि समाज के कमजोर तबकों की महिलओं के साथ बलात्कार करने वालों के खिलाफ प्रदर्शन क्यों नहीं होते, इन अपराधियों को क्यों सजा नहीं मिलती और कौन से कारण जिम्मेदार हैं इसके लिए?

बलात्कारियों को कड़ी से कड़ी सजा की मांग करने के बदले समाज को अपनी आत्मा को खंगालने की जरूरत है कि हमारे समाज को रुग्न करने वाली जड़ें कहां हैं। उसे यह भी देखना होगा कि हमारी महिलाओं और लड़कियों से कैसा सलूक किया जाता है। हमें समस्या की जड़ तक पहुंचना होगा, अन्यथा आशा की कोई किरण दिखाई नहीं देती।

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2013 अंक में प्रकाशित)


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