दुविधा में बहुजन मतदाता : वे नहीं, हम

बहुजन मतदाता की दुविधा समझी जा सकती है। देश के इतिहास में पहली बार किसी अत्यंत पिछड़ी जाति के व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने की संभावना उत्पन्न हुई है और वह भी एक ऐसे एमबीसी की, जो अपने ब्राह्मणवादी विरोधियों को परास्त करने में सक्षम है। परंतु क्या वह केवल नाममात्र का बहुजन प्रधानमंत्री होगा? यद्यपि उसकी पहचान बहुजन के रूप में है, परंतु क्या उसकी विचारधारा ब्राह्मणवादी नहीं है

मैं शिक्षा और स्वतंत्रता पाना चाहता हूं। परंतु सत्ताधारी चोर मुझे नींद की दवाएं दे रहे हैं। वे यह कहते हैं कि वे मेरी ओर से सोचने, देखने, बात करने और काम करने को तैयार हैं। शब्दों का हेर-फेर कर वे गुण को अवगुण और अवगुण को गुण बना देते हैं। मैं कुछ समझ नहीं पाता और बार-बार बेवकूफ  बनता हूं।

ईश्वर, उनके भाषणों, उनके वक्तव्यों और उनके कथनों-जो मुझे चारों ओर से घेरे हुए हैं, में तनिक भी संजीदगी नहीं है। वे धूर्त संविधान को उद्वृत करते हैं और धनिकों द्वारा हमारे खिलाफ हिंसा से इंकार करते हैं। वे विकास की बात करते हैं परंतु चाहते हैं कि मेरे बच्चे अशिक्षित और कमजोर बने रहें ताकि वे उनसे अपनी गुलामी करवा सकें। हे ईश्वर उन्हें सजा दो…और मुझे यह क्षमता दो कि मैं लोग जैसे दिखते हैं उन्हें वैसा न मानूं। मैं सही और गलत में भेद कर सकूं। बदमाश और शरीफ  में अंतर कर सकूं। केवल उन लोगों को सत्ता में आने दूं जो पूरी श्रद्धा से यह मानते हैं कि जो दूसरों को अपमानित करते हैं वे पूरे देश और पूरी मानवता को अपमानित करते हैं और बाकियों को-कारपोरेट लुटेरों और दुष्ट सत्ताधारियों, चाहे वे भारत के हों या कहीं और के, को जेल या नर्क यह जहां तुम चाहो वहां भेज दो।

मैं अभिशप्त भारतीय मतदाता हूं हे ईश्वर, मेरा मोहभंग हो चुका है और मैं पूरी दीनता से तुम्हारे सामने उपस्थित हूं। इस दुखियारे पर दया कीजिए-कनफेशन ऑफ द इंडियन वोटर, ब्रजरंजन मणि, Countercurrents.org (19 January 2014, http://www.countercurrents.org/mani190114.htm)

बहस-मुबाहिसों, प्रतिभा प्रदर्शनों, फैन्सी ड्रेस प्रतियोगिताओं (मुख्यत: स्थानीय पगडिय़ों की), आंकड़ों की ‘सौन्दर्य प्रतियोगिताओं’, जिनमें जितना जाहिर किया गया, उससे ज्यादा छुपा लिया गया और नाजुक मुद्दों के चारों ओर नृत्य करने की प्रतियोगिताओं के बाद, अब, अंतत:, धरती के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक तमाशे का फोकस, मंच के कलाकारों से हटकर एक व्यक्ति पर हो गया है। नहीं-नहीं, वह व्यक्ति न तो नमो हैं, न राहुल और ना ही केजरीवाल, न तो अम्मा हैं, न दीदी और ना ही बहन जी। वह व्यक्ति है मतदान बूथ के सामने धैर्यपूर्वक लाइन में खड़े रहने वाला आदमी, जो अपना नंबर आने पर एकांत में वह निर्णय लेता है, जो अगले पांच बरस तक 120 करोड़ भारतीयों के भविष्य का निर्धारण करेगा। वह भविष्य बेहतर होगा या बदतर-यह कहना मुश्किल है।

एनडीटीवी का पूर्वानुमान   
कुल सीटें : 543, बहुमत के लिए : 272
भाजपा 195कांग्रेस 106वामपंथी - 18तृकां – 32
शिसे - 13राजद - 8बीजद - 17आईअद्रमुक – 27
तेदेपा - 9राकंपा - 5सपा - 13बसपा - 16
शिअद - 4रालोद - 3जद्यू - 5वाईएसआर – 15
लोजपा - 3जकनेकां - 3जदसे - 2टीआरएस - 11
रालोसपा - 1अयूडेफ्रं - 1द्रमुक - 10
हजकां - 1अन्य - 3आप – 4
नापीफ्रं - 1झामुमो - 2
अन्य - 2निर्दलीय - 2
मईमु – 1
मनसे – 1
सिप्रमो - 1
अन्य - 8
एनडीए - 229यूपीए -   129वैक. फ्रंट - 55अन्य - 130

हां, वह व्यक्ति आप हैं-2014 के आम चुनाव के मतदाता। अगर फारवर्ड प्रेस तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया का हिस्सा होती तो हम 81.40 करोड़ मतदाताओं की बात करते, जो इस साल अप्रैल और मई में वोट डालने का हक रखते हैं।

यह संख्या यूरोप की कुल जनंसख्या से अधिक है। परंतु फारवर्ड प्रेस में हम मतदाताओं के उस 85 प्रतिशत हिस्से की बात करेंगे, जो कि बहुजन हैं-ओबीसी, एससी, एसटी व अल्पसंख्यकों में बहुसंख्यक मुसलमान, ईसाई, सिख और बौद्ध।

हां, आप बहुजन मतदाता वह शक्ति रखते हैं कि आप ईवीएम का एक बटन दबाकर भारत के भविष्य का निर्धारण करने वाली सरकार को सत्ता में ला सकते हैं। नहीं, व्यक्तिगत रूप से नहीं, परंतु सामूहिक रूप से आप बहुसंख्यक ‘मूल निवासी’ हैं, जिन्हें बुद्ध ने ‘बहुजन’ कहा और फुले ने ‘बलिजन’। परंतु सच्चा स्वराज, जो कि बहुजन के लिए और बहुजन के द्वारा हो, इस देश में बहुत कम समय तक रहा। अधिकांश समय बहुजन पर दूसरों ने राज किया-ब्राह्मणवादियों, मुसलमानों, अंग्रेजों और अब फिर ब्राह्मणवादियों ने। कम से कम केन्द्रीय स्तर पर तो ऐसा ही हुआ है।

आश्चर्य नहीं कि लेखक व चिंतक ब्रजरंजन मणि के हाल में लिखे एक लेख, जिसका शीर्षक है ‘भारतीय मतदाता की स्वीकारोक्ति’, में मतदाता पछताता है कि उसे सन् 1952 से बेवकूफ बनाया जा रहा है। अपनी दुख भरी कहानी के अंत में वह ईश्वर को धन्यवाद देता है कि अंतत: उसका सत्य से साक्षात्कार हो गया है और यह प्रार्थना करता है कि ईश्वर उसे शक्ति दे ताकि वह सही निर्णय ले सके। नहीं, मैं ईश्वर नहीं हूं, परंतु इस लेख के जरिए मैं विनम्रतापूर्वक उस प्रार्थना का उत्तर देने में मदद करने की कोशिश कर रहा हूं।

16 मई के नतीजों का पूर्वावलोकन

अमेरिका में एक कहावत है जिसका अर्थ है कि कोई चीज तब तक खत्म नहीं होती, जब तक कि वह खत्म न हो जाए। यह खेलों के बारे में तो सच है ही, चुनावों के बारे में भी सच है, विशेषकर भारत जैसे विशाल देश के जटिल आम चुनाव के बारे में। हमें यह कहावत भी नहीं भूलनी चाहिए कि ‘राजनीति में एक सप्ताह एक लंबा समय होता है।’ जब मैं यह लिख रहा हूं, तब मतदान शुरू होने में दो हफ्ते बकाया हैं और परिणाम, दो महीने दूर हैं।

अनेक भारतीय एजेंसियां चुनाव परिणामों की भविष्यवाणी कर चुकी हैं परन्तु इन भविष्यवाणियों पर आंख मूंद कर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। विशेषकर, इस तथ्य के प्रकाश में कि सन् 2004 व 2009 में भी, भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के प्रदर्शन के बारे में जो भविष्यवाणियां की गई थीं, वे सही नहीं निकलीं। एनडीए को चुनाव सर्वेक्षण एजेंसियों की भविष्यवाणियों की तुलना में कहीं कम सीटें मिलीं थीं। क्या यह मीडिया के ब्राह्मणवादी चरित्र का द्योतक है? परंतु हमें यह भी याद रखना चाहिए कि चुनाव परिणामों की भविष्यवाणी करने वाली संस्थाओं में जहां कुछ काली भेड़ें हैं वहीं कुछ ऐसी एजेंसियां भी हैं जो इस काम में दक्ष होती जा रही हैं। वरना हम सीएसडीएस के सर्वेक्षण पर आधारित ओबीसी मतदाताओं की राजनीतिक पसंद संबंधी आलेख को अपने मार्च अंक की आवरण कथा नहीं बनाते।

जिस समय मैं यह लिख रहा हूं कुछ प्रमुख टीवी समाचार चैनल, शुद्ध व्यावसायिक तरीके से किए गए चुनाव सर्वेक्षणों के परिणाम प्रसारित कर रहे हैं। एक के बाद एक सर्वे लगभग एक सी बातें कह रहे हैं और वे हैं : कांग्रेस अपने अब तक के सबसे खराब प्रदर्शन की ओर बढ़ रही है। कुछ सर्वेक्षण कहते हैं कि उसकी सीटों की संख्या दो अंकों में भी सिमट सकती है। यूपीए के गठबंधन साथियों की हालत भी पतली है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस रसातल में पहुंच चुकी है और अब वह एक ही दिशा में बढ़ सकती है-ऊपर की ओर। परंतु यह होगा या नहीं और यदि हां तो किस हद तक, यह अंदाज लगाना मुश्किल है।

  • गैर-यूपीए और गैर-एनडीए पार्टियां अब दो समूहों (मोर्चे बनाने के प्रयास कामयाब नहीं हो सके) में बंट गई हैं : (1) वे जिन्हें मोदी को छोड़कर कोई भी चलेगा। ये वो लोग हैं जो बरबाद हो चुके वामपंथी दलों के नेतृत्व में बनने वाले साम्प्रदायिकता विरोधी ‘तीसरे मोर्चे’ के बचे-खुचे तत्व हैं। इस समूह में नवीन पटनायक की बीजेडी, मुलायम सिंह यादव की एसपी, नीतीश कुमार की जेडी यू व देवेगौड़ा की जेडीएस शामिल हैं। (2) ऐसे दल जिनका नेतृत्व क्षेत्रीय क्षत्रपों के हाथों में है जैसे अम्मा जयललिता (एआईएडीएमके), दीदी ममता बनर्जी (टीएमसी), बहन जी मायावती (बीएसपी), बेटा जगन रेड्डी (वाईएसआरसी), नए तेलगांना राज्य की टीआरएस पार्टी, केजरीवाल की आप आदि। अगर ये दोनों समूह एक होते तो यह संभावना थी कि कांग्रेस के बाहरी समर्थन से, कम से कम मध्यावधि चुनाव तक, तीसरे मोर्चे की एक सरकार चल सकती थी। परंतु अब इसकी कोई संभावना नहीं है क्योंकि इन दोनों समूहों के कुछ बड़े खिलाडिय़ों ने अपने प्रभाव क्षेत्र की रक्षा करने के लिए या अपनी विचारधारा के कारण एक मंच पर आने से इनकार कर दिया है। अत: यदि इन दोनों समूहों के सांसदों की कुल संख्या पर्याप्त भी हो जाए तब भी उनकी सरकार बनने की कोई संभावना नहीं है।
  • चुनाव अनुमानों के अनुसार, मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को अकेले 200 से कुछ ही कम से लेकर 220 तक सीटें मिलने की संभावना व्यक्त की जा रही है। उसके पुराने गठबंधन साथी (शिवेसना, शिरोमणि अकाली दल) व नए साथियों (टीडीपी, एलजेपी) के साथ मिलकर एनडीए 229 के आंकड़े तक पहुंच सकती है। ऐसा सबसे ताजा और सबसे बड़े चुनावी सर्वेक्षण के नतीजे कहते हैं। इसका कारण है वह ‘दक्षिण-पश्चिम’ आंधी, जो गुजरात से उठकर उत्तरप्रदेश और बिहार तक पहुंचेगी। परंतु आरएसएस द्वारा धकाए जा रहे भाजपा के इस लवाजमे को फिर भी सत्ता आसानी से हासिल नहीं हो सकेगी।

यदि आंकड़ों की बात करें तो एनडीए को तब भी बहुमत के लिए 44 सीटों की जरूरत होगी। इसका मतलब यह है कि उसे ऊपर बताए गए दूसरे समूह के कम से कम एक ऐसे क्षेत्रीय दल को अपने साथ लेना पड़ेगा, जो कि एनडीए को कम से कम 25 सीटें दे सके। यह क्षेत्रीय दल या तो टीएमसी हो सकता है या एआईएडीएमके। इन दोनों दलों का नेतृत्व अपनी मर्जी की मालिक महिलाओं के हाथों में है और वे इस समर्थन के बदले अपने राज्य व पार्टी के लिए बहुत कुछ चाहेंगी। यद्यपि ममता (टीएमसी) पश्चिम बंगाल पर चढ़ चुके भारी कर्ज की वसूली पर रोक लगवाने के लिए बेचैन हैं तथापि वे राज्य की 28 प्रतिशत मुस्लिम आबादी के कारण, खुलकर कुछ कर नहीं पा रही हैं। इस मुस्लिम आबादी में से 85 प्रतिशत ओबीसी हैं।

मोदी की आंधी या केवल हवाबाजी?

पार्टी के भीतर की ब्राह्मणवादी लॉबी के विरोध के बावजूद, भाजपा ने यह घोषणा कर दी है कि मोदी वाराणसी से चुनाव लड़ेंगे। यह मोदी को एक ऐसे ‘राष्ट्रीय नेता’ के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है, जो अपने गृह राज्य से दूर, देश के सबसे बड़े राज्य और वहां की भी एक ‘पवित्र नगरी’ से चुनाव जीत सकता है। मोदी के लिए दिल्ली का रास्ता, उत्तरप्रदेश से होकर जाता है, जहां 80 लोकसभा सीटें हैं। उन्हें इनमें से कम से कम आधी जीतनी होंगी। 2004 और 2009 में भाजपा ने उत्तरप्रदेश में केवल 10 सीटें जीती थीं। इस बार कई कारकों के चलते, जिनमें शामिल हैं साहिब के गुजराती सिपहसालार अमित शाह के प्रयास, आरएसएस-समन्वित समर्थन जुटाने के अभियान और मुजफ्फ रनगर दंगे के कारण हुआ ध्रुवीकरण, भाजपा का उत्तरप्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में प्रदर्शन पहले से अच्छा रहने वाला है। परंतु पूर्वांचल या पूर्वी उत्तरप्रदेश में भाजपा की उतनी पैठ नहीं बन पा रही थी और इसलिए अमित शाह ने मोदी को वाराणसी से चुनाव लड़वाने का निर्णय लिया ताकि उस क्षेत्र के अलावा, पड़ोसी बिहार के पश्चिमी जिलों में भी भाजपा का प्रभाव बढ़ सके। स्पष्टत: ‘मोदी की आंधी’ गंगा के तट तक नहीं पहुंच सकी है।

मोदी के इस निर्णय की त्वरित प्रतिक्रिया हुई। बेंगलुरु में चुनाव प्रचार कर रहे आप के केजरीवाल ने कहा कि मोदी को गुजरात की एक और सुरक्षित सीट से चुनाव लडऩे की क्या आवश्यकता है। भाजपा ने बिहार में अपने स्थानीय नेताओं को नाराज करने की कीमत पर भी पासवान की एलजेपी जैसी कमजोर दलित पार्टी से समझौता किया। इससे यह जाहिर होता है कि भाजपा को बिहार में दलितों के समर्थन की जरूरत है। निष्पक्ष राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि इस समझौते और भाजपा के कुछ अन्य कदमों से यह जाहिर है कि मोदी की आंधी का सबसे प्रभावी दौर गुजर चुका है। या कहीं ऐसा तो नहीं कि वह केवल हवाबाजी है?

सन् 2012 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों का गहराई से विश्लेषण करते हुए पत्रकार शिवम विज लिखते हैं कि ‘परिणामों की भविष्यवाणी करने…से बड़ा लाभ होता है। इससे केवल राजनीतिक हवा की दिशा पहचानी नहीं जाती बल्कि इससे हवा बनाई भी जाती है।’ फि र, पेड न्यूज से आगे बढ़कर ‘बिके हुए मीडिया’ पर केजरीवाल के हमले और कांग्रेस द्वारा जनमत सर्वेक्षणों को दी गई चुनौती (निस्संदेह इसका एक कारण यह है कि शायद ही कोई सर्वेक्षण उसके पक्ष में होता हो) में कुछ सच्चाई हो सकती है, विशेषकर इस बार।

जो भी हो-चाहे आंधी हो या न हो, हवा हो या न हो-अगर चुनाव परिणाम इससे निर्धारित होते कि कोई पार्टी कितनी मेहनत और कितना धन खर्च कर रही है, तो मोदी के नेतृत्व में भाजपा की जीत सुनिश्चित होती। अगर वे जीतते हैं तो कोई यह नहीं कह सकेगा कि उन्हें यह जीत आसानी से हासिल हुई है। उन्होंने 9 महीनों से भी अधिक लंबे समय तक कड़ी मेहनत से चुनाव प्रचार किया है। निस्संदेह, अगर वे जीते तो उसका श्रेय ‘हार्ड वर्क’ को होगा ‘हार्वड’ को नहीं।

कठपुतली नचाने वालों की खाकी चड्डियां दिख रही हैं

भाजपा की जीत जितनी बड़ी होगी उतनी ही जोर-शोर से आरएसएस यह कहेगा कि यह जीत उसके कारण हासिल हुई है। नागपुर के खाकी हॉफ-पेण्ट धारी बूढ़े, लूट में अपना हिस्सा हासिल करने में सिद्धहस्त हैं। उन्हें यह काम चेन्नई और कोलकाता की दोनों महिलाओं से भी बेहतर आता है। याद करिए, किस तरह, जब सन्  2012 में अन्ना हजारे की रामलीला मैदान में होने वाली रैलियों में भारी भीड़ उमड़ रही थी तब अन्ना के खंडन के बावजूद, सरसंघचालक मोहन भागवत ने सार्वजनिक रूप से यह दावा किया था कि अन्ना को मिल रहे जन समर्थन के पीछे आरएसएस है-निस्संदेह यह काम संघ, राष्ट्रीय हित में कर रहा था।

आरएसएस पर लगा प्रतिबंध उसके द्वारा एक लिखित संविधान प्रस्तुत करने और यह वायदा करने कि वह ‘सांस्कृतिक संस्था’ बने रहने के प्रति प्रतिबद्ध है, के बाद सन् 1949 में उठाया गया था। तब से शायद यह पहली बार है कि आरएसएस भाजपा के चुनाव अभियान में सक्रिय और सार्वजनिक रूप से पूरे देश में और विशेषकर उत्तरप्रदेश में भागीदारी कर रहा है। दिल्ली में भी भाजपा उम्मीदवारों के संबंध में अंतिम फैसला आरएसएस ने लिया और दलित नेता उदित राज सहित आठों उम्मीदवारों को झंडेवालान स्थित आरएसएस मुख्यालय में ले जाया गया और उनका ‘परिचय’ आरएसएस के नेतृत्व से करवाया गया। उसके बाद, संघ के दो प्रचारकों को हर उम्मीदवार के साथ संबद्ध कर दिया गया। वे उम्मीदवारों के प्रचार अभियान का समन्वय करेंगे। ‘आरएसएस हम पर कड़ी निगाह रख रहा है और इस हद तक राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हो गया है कि वह चुनाव प्रचार के मुद्दे भी तय कर रहा है। इससे उम्मीदवारों को आगे चलकर परेशानी हो सकती है’, एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा।

लगातार तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने मोदी, जो कि जीवनपर्यन्त आरएसएस के स्वयंसेवक रहे हैं, को भी नागपुर में बैठे ब्राह्मण सज्जनों के आगे नतमस्तक होना पड़ा। उसके बाद ही मोदी को उनका समर्थन मिला और उन्हें भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया। इसके बाद ही आरएसएस ने मोदी की महत्वाकांक्षाओं के आंतरिक (मुख्यत: ब्राह्मणवादी) विरोध को शांत किया। इस तरह, मोदी के सिर पर पहले से ही आरएसएस का भारी कर्ज चढ़ा हुआ है। यह किसी भी तरह सत्ता में आने की आरएसएस की उत्कट इच्छा का सबूत है कि उसने अंतत: ब्राह्मण प्रधानमंत्री की अपनी प्राथमिकता को त्याग कर एक शूद्र ओबीसी को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में अपना समर्थन दिया। शायद मोदी की जीत की संभावना ने संघ के नेतृत्व को ऐसा करने के लिए प्रेरित किया हो। परंतु गुजरात के अपने अनुभव से संघ यह जानता है कि मोदी की चुनाव जीतने की क्षमता दुधारी तलवार की तरह है। उससे आरएसएस का एजेण्डा राष्ट्रीय स्तर पर छा सकता है। परंतु यह भी हो सकता है कि प्रधानमंत्री की गद्दी पर चढऩे के बाद मोदी, आरएसएस की सीढ़ी को लात मार दें, जैसा कि उन्होंने गुजरात में किया।

यह विडंबना ही है कि आरएसएस सोचता है कि वह मोदी के सुशासन के मुखौटे का इस्तेमाल, अपने ‘सांस्कृतिक’ हिन्दुत्ववादी एजेण्डे को छुपाने के लिए कर सकता है। संघ को उम्मीद है कि यही मोदी का असली एजेण्डा भी है। जानकार सूत्र बताते हैं कि अगर भाजपा 200 सीटों से कम पर सिमट गई तब आरएसएस के समर्थन से मोदी की जगह ऐसे नेता को लाया जा सकता है, जिसे मोदी की तुलना में आसानी से दबाया जा सके, जो संघ पर अधिक निर्भर हो और जो दूसरे राजनीतिक दलों को अधिक स्वीकार्य हो, ताकि एनडीए का विस्तार हो सके। दिल्ली की गद्दी के एक से अधिक दावेदार हैं और वे सभी उच्च जातियों के हिन्दू हैं।

यह भी कहा जा रहा है कि आरएसएस, मोदी को वाराणसी में हरवाकर उनके ’56 इंच’ के सीने को पिचका भी सकता है। क्या यह मात्र संयोग है कि तृणमूल कांग्रेस ने वाराणसी से कांग्रेस के वरिष्ठतम नेताओं में से एक, कमलापति त्रिपाठी की नातिन इंदिरा तिवारी को चुनाव में खड़ा कर दिया है। वे वाराणसी की निवासी हैं और अखिल भारत हिन्दू सभा की महासचिव के बतौर, उच्चतम न्यायालय में चल रहे रामजन्मभूमि मामले से जुड़ी हुई हैं। क्या वाराणसी ‘राम’ विरुद्ध द्वारका, गुजरात के ‘कृष्ण’ की रणभूमि बन सकता है?

आरएसएस को यह भी चिंता है कि अगर अपने वर्तमान एनडीए गठबंधन साथियों के साथ मिलकर भी भाजपा की सीटों का आंकड़ा 220-230 से ऊपर नहीं पहुंचा तो ‘गठबंधन धर्म’ के कारण, हिन्दुत्ववादी एजेण्डा लागू कर पाना असंभव हो जाएगा, जैसा कि वाजपेयी की एनडीए सरकार के समय हुआ था।

आश्चर्य नहीं कि मीडिया में इतना प्रचार-जिसके वे आदी नहीं हैं-पाने के बाद, आरएसएस सरसंघचालक भागवत ने सार्वजनिक रूप से घोषित किया कि आरएसएस की राजनीति में दखल देने की सीमाएं हैं। ‘हम राजनीति में नहीं हैं। हमारा काम ‘नमो नमो’ करना नहीं हैं। हमें अपने लक्ष्य के लिए काम करना है’, उन्होंने बेंगलुरु में 9 मार्च को आरएसएस की प्रतिनिधि सभा को संबोधित करते हुए कहा। वहां भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह और आरएसएस प्रचारक रामलाल, जिन्हें भाजपा में महासचिव (संगठन) के पद पर डेपुटेशन पर भेजा गया है, उपस्थित थे।

आडवाणी और मोदी के बीच के सबसे ताजा नाटक (19-20 मार्च), जिसके बाद आडवाणी को गांधीनगर से चुनाव लडऩे पर ‘मजबूर’ होना पड़ा, में भी आरएसएस ने हस्तक्षेप किया। परंतु इस बार आरएसएस खुलकर सामने नहीं आया। संघ यह जानता है कि जितना खुलकर वह भाजपा को अपने इशारों पर नचाएगा, उतनी ही भाजपा के नेतृत्व की विश्वसनीयता कम होती जाएगी। इसलिए आरएसएस नेतृत्व ने आडवाणी की इज्जत बचाने के लिए पटकथा लिखी, किसको क्या कहना है, यह संबंधितों को बताया और उसके बाद नागपुर में जाकर गद्दी जमा ली। यह भागवत के पिछले हस्तक्षेप से एकदम अलग था, जब जून में आडवाणी ने मोदी को भाजपा का मुख्य चुनाव प्रचारक नियुक्त किए जाने के विरोध में पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था।

मोदी की मानसिकता

जहां अधिकांश मीडिया और टिप्पणीकारों ने सतही बातें कही हैं वहीं हम मोदी लहर के नीचे छुपी विद्रूप वास्तविकता पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहेंगे। मोदी, आरएसएस की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। अब यह महत्वपूर्ण है कि हम मोदी के मनो-मस्तिष्क का ध्यान से अध्ययन करें। नहीं, हम 2002 पर नहीं जा रहे हैं। हम उसके भी पीछे जा रहे हैं, कम से कम एक दशक पीछे। यह वह दौर था जब राजनीतिक मनोवैज्ञानिक आशीष नंदी के अनुसार मोदी ‘कुछ नहीं थे। वे केवल एक छोटे-मोटे आरएसएस प्रचारक थे और भाजपा में कोई छोटा-मोटा पद पाने के लिए प्रयासरत थे।’ नंदी, जिन्होंने अहमदाबाद विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में पीएचडी की उपाधि हासिल की है, को मोदी का लंबा साक्षात्कार लेने का ‘सौभाग्य’ मिला था। सन्  2002 के दंगों के बाद उन्होंने इस साक्षात्कार का जो वर्णन किया है, उसको पढ़कर दिल कांप उठता है। उन्होंने लिखा, ‘मुझे कोई संदेह नहीं रह गया था कि वह एक विशुद्ध फासिस्ट है…मोदी..एकाधिकारवादी मनुष्य के उन सभी मानकों पर खरे उतरते हैं, जिनका निर्धारण मनोचिकित्सकों, मनोविश्लेषकों और मनोवैज्ञानिकों ने सालों तक प्रयोग कर परिभाषित किया है…मेरी मुलाकात एक ऐसे फासीवादी से हुई थी, जिसका वर्णन मैंने उसके पहले तक केवल पाठ्यपुस्तकों में पढ़ा था। वह संभावित हत्यारा था। बल्कि वह भविष्य में कत्लेआम भी कर सकता था (सेमिनार 2002)।’

फरवरी, 2014 की ‘कारवां’ की आवरण कथा 2007 के समझौता एक्सप्रेस धमाकों और अन्य आतंकी हमलों के मुख्य आरोपी स्वामी असीमानंद से लिए गए लंबे साक्षात्कारों पर आधारित थी। उसे पढऩे से ऐसा लगता है कि गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर, अपने शुरुआती दिनों में मोदी, डांग जिले के आदिवासियों के बीच आरएसएस के इस स्वामी के कार्यकलापों के प्रमुख संरक्षक थे। सन् 1998 में, जब केन्द्र में एनडीए की पहली सरकार बनी, तब असीमानंद की उपलब्धि यह थी कि उन्होंने संघ परिवार के विभिन्न संगठनों के साथ समन्वय स्थापित कर यह सुनिश्चित किया कि ईसाईयों, उनके स्कूलों और चर्चों पर क्रिसमस के आसपास जोरदार हमले हों।

डांग जिला, आदिवासियों और पिछड़े हुए इलाकों के विकास के बारे में मोदी की सोच को प्रतिबिम्बित करता है। सागौन के पेड़ों से आच्छादित इस इलाके के 90 प्रतिशत रहवासी आदिवासी हैं। तीन-चौथाई आदिवासी, जिनकी संख्या लगभग 2 लाख है, गरीबी की रेखा से नीचे जी रहे हैं। एक सदी से भी लंबे समय से ईसाई, स्थानीय रहवासियों की मदद के लिए स्कूल व अन्य परियोजनाएं चला रहे हैं। असीमानंद से प्रेरित होकर मोदी की गुजरात सरकार ने जिले में ‘रामपथ’ परियोजना शुरू की, जिसका उद्देश्य रामायण के चरित्रों द्वारा की गई यात्रा के पथ को खोजना था। इस परियोजना पर 13 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इस रामपथ को आज तक ‘धार्मिक पर्यटन’ से खास आमदनी नहीं हुई है। इसके विपरीत, मोदी सरकार ने, अब तक भारत सरकार द्वारा पिछड़ा क्षेत्र अनुदान योजना के अंतर्गत डांग जिले के विकास के लिए दी गई 11.6 करोड़ रुपये की राशि के इस्तेमाल की योजना तक तैयार नहीं की है। इसके साथ ही, स्थानीय ईसाई संस्थाओं को डांग से बाहर कर दिया गया है। यह तो हुई सुशासन की बात-ऐसे सुशासन की, जिसके केन्द्र में सबसे ज्यादा जरूरतमंद की मदद की सदिच्छा हो।

मोदी दलितों के बीच बोलते हुए हमेशा यह दावा करते हैं कि उनके साथ भी ‘अछूतों’ जैसा व्यवहार हुआ है परंतु वे यह स्पष्ट नहीं करते कि उनका मतलब सन् 2002 के बाद उनके राजनीतिक अछूत बन जाने से है। वे अपने पिछड़े, बल्कि अति पिछड़े समुदाय से होने की बात दोहराते रहते हैं। मार्च की शुरुआत में बिहार के मुजफ्फरपुर में अपने नए दलित साथी रामविलास पासवान की मौजूदगी में एक रैली को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा, ‘मुझे विश्वास है कि आने वाला दशक दलितों, पिछड़ों, अनुसूचित जनजातियों और समाज के अन्य पिछड़े वर्गों का है।’

यद्यपि वे अब अपने जाति कार्ड का नियमित रूप से इस्तेमाल करते हैं और इससे, शायद कथित रूप से जाति-विरोधी परंतु ब्राह्मणों से भरे हुए, आरएसएस के नेतृत्व को नाराजगी भी होती होगी परंतु प्रश्न यह है कि जाति या वर्णाश्रम धर्म के बारे में मोदी के असली विचार क्या हैं। इसके लिए हमें ज्यादा दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। गुजरात सरकार द्वारा आईएएस अधिकारियों के समक्ष मोदी द्वारा दिए गए भाषणों का संग्रह ‘कर्मयोग’ शीर्षक से सन्  2007 में प्रकाशित किया गया था। इसे पढऩे से जाति के पिरामिड के सबसे निचले पायदान पर खड़ी जातियों के बारे में मोदी के विचार पता लगते हैं। चूंकि उस समय राज्य में विधानसभा चुनाव चल रहे थे इसलिए इस किताब की जो लगभग 5000 प्रतियां छापी गई थीं, उनमें से एक भी बाहर नहीं आई। परंतु वरिष्ठ पत्रकार राजीव शाह ने कहीं से एक प्रति हासिल कर ली और पुस्तक के पृष्ठ 48-49 पर प्रकाशित मोदी के अत्यंत विवादास्पद कथनों को लीक कर दिया। वाल्मीकि समाज की चर्चा करते हुए मोदी ने कहा था, ‘मैं यह विश्वास नहीं कर सकता कि वे यह काम केवल अपनी आजीविका चलाने के लिए करते आ रहे हैं। अगर ऐसा होता तो वे पीढ़ी दर पीढ़ी यह काम नहीं करते…किसी न किसी समय, किसी न किसी ने उन्हें यह ईश्वरीय ज्ञान दिया होगा कि समाज और ईश्वर की प्रसन्नता के लिए, यह काम करना उनका (वाल्मीकि) कर्तव्य है, और यह कि उन्हें यह काम इसलिए करना है क्योंकि ईश्वर ने यह काम उन्हें सौंपा है। सफाई का यह काम एक आंतरिक आध्यात्मिक गतिविधि बतौर सदियों तक चलना चाहिए। यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलना चाहिए। यह मानना असंभव है कि उनके पूर्वज न तो कोई दूसरा काम कर सकते थे और ना ही नया व्यवसाय शुरू कर सकते थे।’

तो यह है मोदी की ब्राह्मणवादी विश्वदृष्टि और वर्णाश्रम धर्म पर उनके विचार। यह उनके द्वारा स्वयं को भाजपा के स्व-घोषित कृष्णावतार के रूप में प्रचारित करने के अनुरूप भी है। कृष्ण ने भगवद्गीता में कहा है कि वे ही वर्णों के निर्माता हैं। जब गुजरात जैसे ‘आदर्श राज्य’ का मुख्यमंत्री इस तरह के विचार रखता हो और इस तरह के विचारों व मूल्यों से अपने राज्य के प्रशासकों को भी लैस करना चाहता हो, तब कहने के लिए क्या बचता है। मानव गरिमा जैसे कुछ एनजीओ का कहना है कि सन्  2013 में अहमदाबाद जैसे बड़े शहर में भी, नगर निगम ने शुष्क शौचालयों से मैला साफ  करने के लिए वाल्मीकियों को वेतन पर रखा हुआ है। इनमें से कुछ शुष्क शौचालयों का निर्माण नगर निगम ने ही किया है। शुष्क शौचालयों के निर्माण और हाथ से मैला साफ करवाने पर कानूनी प्रतिबंध है परंतु गुजरात में ये दोनों अबाध रूप से जारी हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में, अलबत्ता गुजरात सरकार ने राज्य में हाथ से मैला साफ  करने की प्रथा के अस्तित्व से साफ  इंकार किया।

मोदी ने कभी बहुजन की महत्वाकांक्षाओं की चर्चा नहीं की। उन्होंने बहुजन के लिए शिक्षा, रोजगार और उद्यमिता के क्षेत्र में उपलब्ध अवसरों के बारे में कभी कुछ नहीं कहा और ना ही उन्होंने आरक्षण पर अपने विचार कभी सार्वजनिक किए। हम सब जानते हैं कि भाजपा ने मंडल का विरोध किया था और देश का ध्यान उस पर से हटाने के लिए कमंडल की राजनीति शुरू की थी। परंतु बाद में उसने मंडल आयोग की सिफारिशों को यह कहकर स्वीकार कर लिया कि उनसे हिन्दुओं को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत कोटा उपलब्ध होगा।

बहुजन मतदाता की दुविधा

दलित-बहुजन इन दिनों किस मानसिक अवस्था से गुजर रहे हैं, उसे मैं एक सच्ची घटना का वर्णन करके समझाना चाहूंगा। एक बहुजन बुद्धिजीवी, जो काफी सम्मानित हैं और राजनीति से भी जुड़े हुए हैं, ने व्यक्तिगत बातचीत में यह स्वीकार किया कि कुछ महीने पहले तक वे एक वफादार पति की तरह थे। लेकिन फि र, एक दिन, उन्होंने किसी ऐसे व्यक्ति को देखा जिसे देखकर उनका मन फि सल गया। ऐसा लगा जैसे उन्होंने मन ही मन व्यभिचार कर लिया हो। इसके बाद, अचानक उन्हें इस दूसरे व्यक्ति के असली चरित्र का भान हुआ और उन्होंने घृणा से अपना मुंह दूसरी ओर फेर लिया। और इन शब्दों में उन्होंने मोदी को प्रधानमंत्री के पद पर देखने की अपनी क्षणिक इच्छा का वर्णन किया।

बहुजन मतदाता की दुविधा समझी जा सकती है। देश के इतिहास में पहली बार किसी अत्यंत पिछड़ी जाति के व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने की संभावना उत्पन्न हुई है और वह भी एक ऐसे एमबीसी की, जो अपने ब्राह्मणवादी विरोधियों को परास्त करने में सक्षम है। परंतु क्या वह केवल नाममात्र का बहुजन प्रधानमंत्री होगा? यद्यपि उसकी पहचान बहुजन के रूप में है, परंतु क्या उसकी विचारधारा ब्राह्मणवादी नहीं है?

मोदी ने खुद को कृष्ण बताकर, यादवों को लुभाने की कोशिश की। परंतु यादव उन अनेक ‘गोपियों’ में से केवल एक हैं, जिन्हें मोदी रिझाने का प्रयास कर रहे हैं। दक्षिण में उन्होंने नारायण गुरु को अपने श्रद्धासुमन अर्पित किए। परंतु क्या वे फु ले और आम्बेडकर की सोच से सहमत हैं? बिहार में उन्होंने कहा कि आने वाला युग पिछड़ों का होगा परंतु हमने देखा है कि उनके स्वयं के राज्य गुजरात में उन्होंने अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के लिए शायद ही कुछ किया है।

अल्पसंख्यकों में से अधिकांश बहुजन हैं और उनकी मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के संबंध में अपनी आशंकाएं होंगी। क्या हिन्दू बहुजन इस स्थिति में होंगे कि वे अपने भाईयों और बहनों को, देश को बांटकर उसे जीतने के ब्राह्मणवादी षड्यंत्र या देश की विविधता को समाप्त कर उसे हिन्दू राष्ट्र बनाने के प्रयास, से बचा सकें? इन अल्पसंख्यकों को यह याद रखना चाहिए कि गुजरात में 2002 के दंगों से बहुत पहले, सन् 1998 में ही, दक्षिण गुजरात के डांग जिले में आदिवासी ईसाईयों का उत्पीडऩ शुरू हो गया था। संघ परिवार के कई ऐसे संगठन हैं जो उनसे सहानुभूति रखने वाली भाजपा की सरकार के सत्ता में आते ही मनमानी शुरू कर देंगे। सरकार उनकी हरकतों की अनदेखी करेगी और वे अपना हिन्दुत्ववादी एजेण्डा लागू करेंगे।

ईमानदारी की बात तो यह है कि इस बार किसी के लिए भी चुनाव में अपनी पसंद का निर्धारण करना आसान नहीं है। यह विशेषकर बहुजन मतदाता के बारे में सही है। दलित-बहुजन पार्टियां अपनी मूल दिशा से भटक गई हैं और सामाजिक न्याय के मूल्यों के साथ उनका कोई सरोकार नहीं बचा है। वे उतनी ही बुरी या अच्छी हैं, जितनी कि अन्य राजनीतिक पार्टियां। उनमें से कुछ अपना पाला बदलकर उन राजनीतिक समूहों से जुड़ गई हैं जिनसे उन्हें धन या सत्ता या दोनों प्राप्त होने की उम्मीद है।

यह आवश्यक है कि कांग्रेस, कुछ समय के लिए सत्ताच्युत हो ताकि वह पछतावा कर सके, पुनर्गठित हो सके और उसे यह एहसास हो सके कि केवल प्रतीकात्मकता से काम नहीं चलने वाला है। कांग्रेस को अपने उच्च नेतृत्व में दलित-बहुजन को उचित स्थान देना होगा और उनके हितों से संबंधित मुद्दों को अपने मूल एजेण्डे में शामिल करना होगा। चुनाव से चंद महीने पहले, केंद्रीय ओबीसी सूची में जाटों को शामिल करने जैसे निर्णयों से किसी को बेवकूफ  बनाना संभव नहीं है। बल्कि इससे कुछ वर्गों का पार्टी से मोहभंग हो जाने की संभावना अधिक है।

हां, इस बार एक नए मोहरे के रूप में, आप, देश की राजनीतिक बिसात पर मौजूद है। केजरीवाल कुछ सुर्खियां बना सकते हैं, वे राजनीति में कुछ रोमांच पैदा कर सकते हैं परंतु उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जा सकता।

तो फिर, बहुजन मतदाता को क्या करना चाहिए ? आपको किसी भी हालत में यह निर्णय नहीं करना चाहिए कि आप वोट देने जाएंगे ही नहीं। अपना वोट देना आप का पवित्र कर्तव्य व भारत के नागरिक के तौर पर आपका अधिकार है। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहां सब बराबर हैं। वोट देने तो जाएं ही, अपना वोट बरबाद भी न करें। नए नोटा विकल्प का इस्तेमाल न करें। हर वोट महत्वपूर्ण है और अंतत: बहुजन ही यह तय करेंगे कि अगली सरकार किसकी हो।

व्यवस्था में भरोसा न खोइए। केजरीवाल चाहे कुछ भी कहें, सब नेता चोर नहीं हैं, न ही पूरे मीडिया को मोदी ने खरीद लिया है और ना ही हर चुनाव में धांधली होती है। आपको स्थानीय उम्मीदवारों के बारे में हरसंभव जानकारी प्राप्त करनी चाहिए और एक रणनीति बनाकर अपना मत देना चाहिए।

प्रसिद्ध संवैधानिक विशेषज्ञ पालकीवाला की इस सलाह को हमेशा याद रखिए कि सही व्यक्ति को हमेशा वोट दो, चाहे वह गलत पार्टी में क्यों न हो। परंतु कभी गलत व्यक्ति को वोट न दो, चाहे वह सही पार्टी में ही क्यों न हो।

जहां तक अब तक हो चुके और भविष्य में होने वाले चुनावी सर्वेक्षणों का सवाल है, यह तय मानिए कि न तो चुनावी पंडित और ना ही गृह-नक्षत्र चुनाव परिणामों का निर्धारण करेंगे। चुनाव सर्वेक्षणों के क्षेत्र में काम कर रहे पुराने लोग आपको बताएंगे कि कुछ राज्यों के लोग अपनी राजनीतिक पसंद ईमानदारी से बताते हैं तो कुछ अन्य राज्यों के लोग उसे छुपाने में यकीन रखते हैं। यह सर्वज्ञात है कि चुनाव सर्वेक्षण, मतदाताओं को थोड़ा-बहुत ही प्रभावित करते हैं। कुछ लोग जीतने वाले के साथ जाना चाहते हैं तो कुछ की सहानुभूति हारने वाले के प्रति होती है और ये दोनों वर्ग एक दूसरे को बेअसर कर देते हैं। चुनाव सर्वेक्षण और राजनीतिक विश्लेषक गलत हो सकते हैं-एकदम गलत। आप क्या करेंगे, वह केवल आप ही जानते हैं और शायद इस बारे में अंतिम निर्णय आप तभी करेंगे जब आप पोलिंग बूथ में अकेले होंगे। इसलिए, अगर आप इसे उसी दिन भी पढ़ रहे हैं जिस दिन आपको अपना वोट देना है, तब भी इसे ध्यान से पढि़ए, सभी विकल्पों पर विचार कीजिए और यह भी सोचिए कि किस विकल्प को चुनने के क्या परिणाम हो सकते हैं। और फिर, अपना मत दीजिए।

 

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल 2014 अंक में प्रकाशित)


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