फॉरवर्ड प्रेस

बिहार में सृजनात्मक गद्य लेखन की विडंबनाए

संदर्भ : मंडल आंदोलन का धवल और स्याह पक्ष

समाजिक न्याय और उस भाव-भूमि से आनेवाले सभी तरह के विचारों व व्यक्तियों के प्रति हिंदी लेखन की मुख्यधारा और इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया सभी के सभी अपादमस्तक जातीय दुराग्रह से पीडि़त रहे हैं। यह आश्चर्यजनक है कि जिस आरक्षण पर लगभग सभी राजनीतिक दलों में स्वाभाविक सर्वानुमति है, वहीं साहित्य में एक हिकारत का भाव है। इस अंदाज में कि यह सीधे-सीधे दूसरे की हकमारी ही है उनकी नजर में। इससे यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि शाश्वत कहे जाने की दुहाई दिया जाने वाला हमारा साहित्य कहां खड़ा है? और उसकी बागडोर अंतत: किस तरह की संकीर्ण शक्तियों के हाथों में है।

बिहार के लेखन की कुछ बानगियों के सहारे मंडल के प्रति उनके नजरिए क्या रहे हैं, इस विषय में आपसे कुछ कहना चाहूंगा। चूंकि मंडल भारतीय इतिहास का ऐसा कालखंड रहा है जिसने भारतीय जनमानस को कई रूपों में उद्वेलित करने का काम किया इसलिए भारतीय मीडिया ने उसे देश को जोडऩे वाली नहीं बल्कि तोडऩे वाली घटना के रूप में चित्रित किया। इतिहास के उस कालखंड को बिहार के उपन्यासकारों और नवजागरणकारों ने भी अपने लेखन का हिस्सा बनाया और उस मीडिया के स्टैंड का ही मुखर समर्थन किया। यह एक ऐसा काल था जिसने बहुजन समाज को पहली बार अपने अधिकारों के प्रति गोलबंद किया। समाज के विभिन्न क्षेत्रों में द्विज जातियों की जो अघोषित किलेबंदी थी वह इस काल में ध्वस्त होनी शुरू हुई। कमंडल की भगवाधारी शक्तियों की रीढ़ इसी मंडल ने तोड़ी। लेकिन बिहार के लेखकों को पढ़ें तो हमें मंडल के बारे में सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक बातें ही देखने को मिलती हैं। यह महज संयोग है या इसके पीछे कोई गहरे निहितार्थ हैं? इसके कारणों को संबंधित लेखकों के उद्धरण के साथ ही जानें तो तस्वीर ज्यादा स्पष्ट होगी।

कर्मेन्दु शिशिर खुद को रामविलास शर्मा स्कूल के नवजागरण अध्येता मानते हैं। मतवाला मंडल से लेकर ‘सारसुधानिधि’ का संपादन, राधामोहन गोकुल व सत्यभक्त की जीवनी के अतिरिक्त दो कहानी संकलन, एक उपन्यास, चार-पांच लेख संकलन व विदेश यात्राओं का भारी-भरकम प्रोफाइल है इनका। पेशे से प्राध्यापक हैं। मंडल दौर को पहले भी कई जगहों पर उन्होंने ‘जंगलराज’ का पर्याय बतलाया। अपने एक लेख ‘बिहार में नवजागरण की विडंबनाएं’ में वे लिखते हैं : ‘वस्तुत: त्रिवेणी संघ एक नई किसान संस्कृति को मूर्त करने वाला एक अभिनव उपक्रम था। सवर्ण स्वार्थ के वशीभूत ताकतों ने उसे जिस अनैतिक और अविचारित तरीके से रौंदा उसी का कुफ ल आगे चलकर कबिलाई सत्ता के अभिशाप के रूप में बिहार को भुगतना पड़ा।’ अपने समय में त्रिवेणी संघ को देवव्रत शास्त्री ने देश को तोडऩे वाला संकीर्ण अवसरवादी संघ कहा था। लेकिन जब उस संघ के बारे में रिसर्च सामने आए तो उन्हीं की आधुनिक जमातें उसकी प्रशंसा में कसीदे काढ़ते नहीं अघाईं। लेकिन अपने वर्तमान में मंडल का 1990 का काल जिन कारणों से महत्व का अधिकारी होता उसकी अनदेखी कर उसे ‘कबिलाई सत्ता के अभिशाप’ के रूप में व्याख्यायित करना बतलाता है कि सवर्णों के श्रेष्ठठताबोध ने मंडल शासन के इस उभार को कभी बर्दाश्त नहीं किया। कर्मेन्दु शिशिर के इस उद्धरण का अर्थ स्पष्ट है। मतलब साफ है कि इनके इस नवजागरण में अतीत के त्रिवेणी संघ जैसे संगठनों के लिए तो बहुत आदर है, लेकिन वर्तमान मंडल जहां से देश और खासकर बिहार की राजनीति में पहली बार बहुजन आबादी की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित हुई वह उन्हें कतई बर्दाश्त नहीं। मंडल उभार के इस काल को ‘कबिलाई सत्ता के अभिशाप’ के रूप में देखने की वकालत करने वाले शिशिर इसके कारणों में नहीं जाते। ले-देकर इनके पास भी ऐसा कहने के लिए भ्रष्टाचार, अपराध की बढ़ती हुई दर जैसे ही तर्क हैं, जो आम सवर्ण मीडिया का रहा है। शिशिर अपने लेख में यह नहीं बतलाते कि मंडल के जिस काल में अपराध का इतना बोलबाला था वह भारत के दूसरे राज्यों से कैसे ज्यादा था या परवर्ती शासन के आंकड़े कहां उससे भिन्न रहे हैं?

शिशिर के इस लेख से बहुजन आबादी के साथ ही स्त्री विरोध की कुंठित मानसिकता का भी पता चलता है। जाहिर है जो बहुसंख्यक विरोधी होगा वह स्त्री विरोधी भी होगा ही। देखें इसकी एक बानगी-‘वाह मेरे यार! हिटलर के शहर में प्रेम रोपने का अद्भुत सत्कर्म कर तुमने सच्ची भारतीयता का परिचय दिया…..’; लो, हम भी घूम आए।’ यह उद्धरण स्त्री विरोधी सामंती कुत्सा का चरम है। ‘प्रेम रोपने’ शब्द में ब्लंठ सामंती पुरुषवादी कुत्सा का चरम है। शंभुनाथ ने लिखा है, ‘यौन तृप्ति सेक्स पाप नहीं है और जीवन में इसकी पूर्ति ठीक ढंग से नहीं होगी, तो विकृतियां पैदा होंगी। शिशिर अपने इस उद्धरण में इस विकृति में आकंठ डूबे हुए हैं। प्रगतिशीलता और पिछड़ावाद की वे जितनी दुहाई दें लेकिन यह सच है कि उनके अंदर से पुरुषवाद और जातीय श्रेष्ठताबोध अभी गया नहीं है।

दूसरे लेखक हैं रमेशचंद्र सिन्हा। अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे हैं। इनके ‘इलियड’ और ‘ओडिसी’ के हिंदी अनुवाद की बड़ी याति रही है। अपने पहले उपन्यास ‘काक द्वीप; सोमा चरित’ के लिए बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का सम्मान इन्हें मिल चुका है। इनके उपन्यास ‘अभय कथा’ में आजादी पूर्व से लेकर मंडल तक के समय का रेखांकन किया गया है। मंडल के समय के बारे में वे लिखते हैं :’…गाय थी कि इधर-उधर तेजी से भागकर पकड़ में नहीं आ रही थी बल्कि नजदीक जाने पर हुड़पेटती थी। यह देख चीफ मिनिस्टर चिल्लाकर बोला, ‘बिना अक्किल के एकदम फालतू  आदमी हो, मंगल भगत। एक गऊ को भी नहीं सरिया सकते। तुम्हारा अइसन बोका को बेकारे मंत्री बनाए हैं।’ तब उसने हांक लगाई, ‘डीजी साहेब! कहां गया साला डीजी? मर तो नहीं गया? अरे अहमदवा, तनिका लपक के देखो कि डीजी सहेबवा कहां लापता हो गया।’ तब देखा कि पुलिसवर्दी में एक मोटा-झोंटा आदमी हाथ में काली रूल लिए उस मरखंडी गाय को पकडऩे बंगले से दौड़ता हुआ निकला। उसे देखते ही गाय का पारा और चढ़ गया और वह डीजीपी साहेब को ही खदेडऩे लगी। बेचारा जान लेकर भागा। इस पर चीफ मिनिस्टर ठठकर हंसा और बोला, ‘देखा, चीफ मिनिस्टर का गऊ है कि ठठ्ठा! साले डीजी का हवा गुम कर दिया। ई ससुराली गऊ है। मेम साहब अपने कर से इसको किसमिस और मिसरीकंद खिलाती हैं। एह खातिर इसको मेरा सलवे ठीक करेगा।’ स्पष्टत: यह प्रसंग द्विज कुंठा की उस शातिराना एप्रोच की कलई खोलता है जो हमेशा श्रेष्ठताबोध में जीने का अभयासी रहा है और जिसके लिए वामपंथ की कलगी प्रगतिशीलता का सबसे बड़ा सर्टिफिकेट साबित हुई है। मंडल के दौर में लालू के सत्तासीन होने के बाद यहां का द्विज नेतृत्व यही प्रचारित करता था कि गाय-भैंस चराने वाला बिहार का शासन नहीं चला पाएगा। लेकिन लालू ने इन तमाम भविष्यवाणियों पर न सिर्फ पलीता लगाया अपितु सत्ता में दलित-पिछड़े को भागीदार बनाया। भगवतिया जैसी हाशिए की मजदूरिन भी बिहार की सत्ता में हिस्सेदार बनीं। सवाल उठता है कि जो लेखक किसी काल का धवल पक्ष नहीं देख सकता वह सही अर्थों में उसका स्याह भी वस्तुनिष्ठ होकर नहीं आंक सकता।

सिन्हा के साथ सबसे बड़ी कठिनाई यही रही है। सच तो यह है कि 1990 के बाद के बिहारी समाज को देखने के लिए जिस तरह की नजर और संवेदना चाहिए वह बिहार के इन कथित वाम लेखकों के पास है ही नहीं। जातीय व्यवस्था बड़ी उत्पीडऩकारी रही है। इसके पहले सत्ता और संसाधन पर कुछ खास जातियों का वर्चस्व रहा। मंडल ने इस एकाधिकार को तोड़ा। लेकिन बिहार के द्विज लेखकों ने इसे कभी भी दिल से स्वीकार नहीं किया इसीलिए 90 के उस काल को वे बिहार के सबसे अंधकारमय काल के रूप में पिरोते रहे हैं। यह जाति व्यवस्था तभी खत्म होगी जब उनका संबंध समानता और सम्मान पर आधारित हो। मंडल ने इसकी कोशिश की तो इन लेखकों का यह दायित्व था कि उसके इस धवल पक्ष को रेखांकित करते, क्योंकि मंडल इस जाति व्यवस्था के खिलाफ वर्षों से जो संघर्ष चल रहा था उन संघर्षों में मिल का पत्थर है। लेकिन बिहार के द्विज लेखकों ने इस ऐतिहासिक उभार को जैसे बदनाम करने का संकल्प ही ले लिया है। लालू के आरंभिक 5 सालों के कार्यकलापों को देखें तो वे एक बड़े विजनरी के तौर पर उभरते हैं तब आज की तरह रणचंडी पाठ, वंशवाद और सोनिया के पीछे चिपके मदारी नहीं हुए थे वे। उन्होंने तब पूरी गवर्नेंस को जाति व्यवस्था के खिलाफ लगा दिया था। 90 के पहले बिहार की बहुजन आबादी जाति व्यवस्था में घुटन महसूस कर रही थी। ऐसे में उस पर चोट इतिहास की जरूरत थी जिसका निवर्हन लालू प्रसाद ने किया। अक्सर गवर्नेंस की कसौटी पर इस शासन की विफ लता को रेखांकित किया जाता है। गवर्नेंस के लिहाज से लालू प्रसाद ही क्यों श्रीकृष्ण सिंह के जिस शासन को बिहार का स्वर्णयुग कहा जाता है वह किनके लिए था? भूमिहार जमींदारों के लिए ही न। बहुजन आबादी बेतरह पिस रही थी। गवर्नेंस के लिहाज से उससे ज्यादा जंगलराज बिहार के इतिहास में कभी नहीं रहा। राजनीतिक भागीदारी तंत्र में सवर्ण बहुलता जिस किसी कसौटी पर कसें वह बिहार की बहुजन आबादी के लिए सबसे अंधकारमय काल था। बल्कि क्या यह आवश्यक नहीं है कि लालू शासन के 15 साल और श्रीकृष्ण सिंहशासन के 15 सालों का तुलनात्मक अध्ययन हो ताकि ‘जंगलराज’ का जो मिथ लालू शासन पर मढ़ा जाता रहा है उसकी हकीकत सामने आए? सच तो यह है कि बिहार में अपराध, भ्रष्टाचार कांग्रेस शासन से ही था। कांग्रेस के चार मंत्रियों के घोटाले में संलिप्तता के कारण ही अय्यर कमेटी बनी थी जिसके कारण कई सरकारें असमय धराशाई हुईं। सच तो यह है कि श्रीकृष्ण सिंह के लंबे जंगलराज के बाद लंबे अरसे तक अस्थायी सरकारों के कारण बिहार अरसे से तबाही और यथास्थितिवाद का शिकार रहा है। यह कभी भी विकास के मैप पर रहा ही नहीं। यह मंडल के पहले शासनकाल को बदनाम करने के लिए सवर्ण पत्रकारों, अकादमिशयनों व बुद्धिजीवियों द्वारा गढ़ा गया मिथ है। जिसे बिहार के द्विज लेखकों ने और पुख्ता किया है। एक भगवाधारी नौकरशाह भगवतीशरण मिश्र ने बाजाब्ता ‘अथ मुख्यमंत्री कथा’ नाम से एक उपन्यास ही लिख दिया जिसमें यह मिथ और कमाल का गढ़ा गया है। यह जातिवाद पुराने लेखकों में ही हो ऐसा नहीं। बल्कि नई सदी और तेज हो रही आधुनिकता में अपने को शुमार करने वाली नई पीढ़ी के लेखकों में और बेशर्म व आक्रामक रूपों में नजर आता है। राकेश रंजन कवि हैं। प्रयोगधर्मी कवि। इनका एक उपन्यास ‘मल्लू मटफोड़वा’ नाम से प्रकाशन संस्थान से आया है। भाषा को बरतने की कमाल की मौलिक अदा है इनकी, लेकिन दृष्टिकोण वही सामंती। देखें यह प्रसंग : ‘बिहार में सत्ता परिवर्तन के बाद अपनी जाति का मुख्यमंत्री बनने का रोब-दाब उसमें आठों याम ऐंठता रहता था जो बात-बेबात अक्सर हिंसक रूप में प्रकट होता था। किसी की मां बहन कर देना, किसी को सरेआम मार-मार कर ‘फ्लैट कर देना उसके लिए आम बात थी। किसी की जुर्रत नहीं थी कि उसका प्रतिकार करे, उसे मना करे। गालियां बकने में वह प्रयोगवादी था और मार कुटाई में परंपरावादी। परंपरावादी इस मायने में कि जूते और लाठी-फट्ठे उसके पसंदीदा हथियार थे। चूंकि मुहल्ले में यादवों की संख्या सबसे अधिक थी और इस कारण वे दबंग थे और जाहिर है कि वार्ड आयुक्त भी हर बार उन्हीं में से कोई न कोई चुना जाता था, इसलिए हरि राय को किसी से डरने की जरूरत नहीं थी, दबंगई और नंगई का वह सक्रिय और निर्विरोध प्रदर्शक था।’

एक और नए लेखक हरेप्रकाश उपाध्याय की ‘बखेड़ापुर’ नाम से एक उपन्यासिका छपी है। यह लेखक मंडल के बारे में अपनी राय इस तरह रखता है : ‘वैसे यह ठीक वही समय था जब प्रदेश की कमान एक ऐसे बेबाक और सर्वहारा किस्म के नेता के हाथ में आ गई थी, जो जेपी मूवमेंट से निकला था। जिसने प्रदेश की जनता को बड़े-बड़े सपने दिखाए थे, लोगों से उनकी भदेस जुबान में ही बातें करना और उन्हें ठेठ सर्वहारा अंदाज में संबोधित करना उनकी खास अदा थी। मगर प्रदेश में शासन की बागडोर संभालते ही उसने अपने तमाम लंपट और खूंखार गुर्गों को भरपूर मनमानी करने की अनौपचारिक छूट दे दी थी। चोरी और अपहरण का कारोबार काफी तेजी से फैलने लगा था। प्रशासनिक अधिकारी चूं-चपड़ करने पर सरेआम मार खाने लगे थे। पूरे राज्य में नेताओं के अलावा सभी लोग दहशत में जीने लगे थे। प्रदेश से व्यापारी और उद्योगपति पलायन कर रहे थे।…. दबंगई को वैधता मिल गई थी।… बड़ी संख्या में अपराधी विधायक बन गए थे। मुख्यमंत्री मंच पर आला अधिकारियों से खैनी बनवाता था। प्रदेश में ऐसे साहित्यकारों की एक जमात उभर आई थी, जो मुख्यमंत्री की तारीफ में किताबें, आरती या चालीसा आदि लिख रहे थे। ऐसी किताबों को धीरे-धीरे पाठ्यक्रमों में घुसाया जा रहा था।’

लालू का खौफ द्विज जमात के लेखक-बौद्धिकों में इस कदर व्याप्त रहा है कि बिहार की सत्ता से पिछले दस सालों से बेदखल होने के बाद भी नए परिप्रेक्ष्य और परिस्थितियों के लिए जवाबदेह वे लालू को ही मानते हैं। उक्त उद्धरण इसका सबसे ज्वलंत प्रमाण इस अर्थ में है कि लेखक ने खासतौर से शिक्षा व्यवस्था की रसातल में जा रही स्थिति को इसका आधार बनाया है। 2013 में वह इस सवाल को दर्ज कर रहा है और इसके लिए जबावदेह 90 के लालू प्रसाद को दिखला रहा है। उक्त प्रसंग को पढें तो जो सवाल पैदा होता है वह यह कि क्या किसी लेखक को सीधे-सीधे अपनी ओर से इस तरह के आरोपनुमा वक्तव्य देना चाहिए ? क्या यह बेहतर नहीं होता कि इसके लिए इस तरह की कथा स्थितियां बनाई जातीं और पात्र ये बातें कहते? फिर पिछले 10 सालों के इस पूरे परिप्रेक्ष्य का आज की शिक्षा व्यवस्था से क्या रिश्ता रहा है यह लेखक को रिलेट नहीं करता। सीधे-सीधे एक आम सवर्ण मंडल के बारे में जो राय रखता है वही इस लेखक का भी है। इस छोटे से उद्धरण में लेखक ने तीन अहम सवाल उठाए हैं। पहला है कि चोरी और अपहरण कारोबार का रूप ले चुके हैं, इसी का विस्तार वह बड़ी संख्या  में अपराधियों के विधायक बनने और बिहार से उद्योगपतियों के पलायन को मानता है। दूसरा प्रशासनिक अधिकारियों की नकेल कसे जाने को और तीसरा लेखकों की एक जमात जो मुख्यमंत्री की जीवनी लिख उसे पाठ्यक्रमों में शामिल करवा रहे हैं उसको।

2013 में यह सवाल 15 साल पहले के लालू शासन पर ही क्यों? वर्तमान शासन से क्यों नहीं ? जितने सवाल लालू के संदर्भ में
दर्ज किए गए हैं क्या वर्तमान शासन उससे अलग है? क्या इस शासन में दागी विधायक नहीं हैं ? ब्यूरोक्रेसी का भ्रष्टाचार और शिक्षा में मीड-डे-मिल से लेकर कांट्रेक्ट सिस्टम के लिए भी लालू ही जबावदेह हैं? उनके समय में शिक्षा का ऐसा बंटाधार तो नहीं हुआ फिर यह भी उनके ही मत्थे क्यों? यह पूरा देश जानता है कि ब्रह्मेश्वर मुखिया जैसा आदमी जो दर्जनों हत्याओं का आरोपी रहा है और उस हत्यारे की हत्या के बाद किस तरह बिहार में खुलेआम गुंडई का तांडव मचा और ऐसे मुजरिम को सरकार में शामिल मंत्री तक ने गांधीवादी का तगमा दिया लेकिन इस तरह की घटनाओं को उपन्यास में दर्ज करना इस लेखक को जरूरी नहीं लगा क्योंकि यह उसका जातीय मामला था। लालू के बाद के नेतृत्व में 30 कैबिनेट मंत्रियों में 14 पर आपराधिक मुकदमे के आरोप भी क्या झूठे थे? जनता दल यूनाइटेड के 114 में से 58 विधायकों पर दर्ज आपराधिक मामले और 43 पर गंभीर आरोप क्या थे ? भाजपा के 90 विधायकों में 29 दागी होने की बात क्या झूठे रहे हैं ? इन सबकी अनदेखी कर कोई वर्तमान में भी अतीत के मंडल को ही आरोपी सिद्ध करता है तो यह अकारण नहीं बल्कि इसकी जड़ें रूढ़ हो चुकीं बिहार की जाति व्यवस्था में जाती हैं। इस लेखक से सवाल किया जाना चाहिए कि लालू शासन के बाद कहां बिहार में उद्योग-धंधों का संजाल लग गया और यह भी कि क्यों और किस कारण बड़े-बड़े नामधारी बिहार विकास और विकास पुरुष की थिगलियां जोड़ बिहार को रसातल में भेजते रहे?

इस काल का बिहार की राजनीति में सबसे अहम योगदान जिन वजहों से लालू का रहा वह पिछड़ों में सशक्तिकरण की उनकी कोशिशों के नाम रहा। जब उन्होंने जाति व्यवस्था और मीडिया के परंपरागत जातीय गठजोड़ पर चोट किया। इसे न तो ‘जंगलराज’ और ‘कबिलाई सत्ता’ जैसी सतही स्थापनाओं से समझा जा सकता है और न ही इन तथाकथित द्विजधारी लेखकों की जातीय अवधारणा में कैद होकर। इसके लिए उदार और व्यापक मानवीय दृष्टिकोण चाहिए जो इन आत्मग्रस्त लेखकों के पास नहीं है।

 

(फारवर्ड प्रेस, बहुजन साहित्य वार्षिक, मई, 2014 अंक में प्रकाशित )


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