फॉरवर्ड प्रेस

श्यामल और सुंदर

आज से कुछ महीनों पहले, ऑस्कर से सम्मानित फिल्म ’12 इयर्स ए स्लेव’ देखने का मौका मिला। उस फिल्म में एक कृशकाय अश्वेत लड़की के साथ उसका गोरा मालिक बलात्कार करता है और बाद में उसे उसके समुदाय के ही काले युवक से कोड़ों से पिटवाता है। उस वक्त, उस लड़की की भूमिका अदा कर रही लुपिता नियांग जब दर्द से रोती है, तो उसकी आंखों से टपके आंसू दर्शकों के दिल को भी कहीं भिगोते चले जाते हैं। लुपिता को उस फिल्म के लिए सहायक नायिका का ऑस्कर पुरस्कार मिला। जब एक पत्रिका ‘पीपुल’ ने उसे सुंदरतम महिला करार दिया तो हीरे की तरह दमकता उसका चेहरा और ‘हंसी हंस माला मंडराई’ जैसी उसकी हंसी दुनियाभर में मशहूर हो गई। इसे देखकर एकबारगी विषाद में डूबा एक ख्याल आया कि क्या हमारे अपने देश में इस बात की गुंजाईश है कि कोई भारतीय आदिवासी लड़की इस ऊंचाई तक पहुंचे?

लुपिता नियांग

हमें अपने लोकतंत्र पर बहुत गर्व है, लेकिन इस लोकतंत्र और हमारे देश की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था में क्या यह संभव है कि कोई आदिवासी लड़की इस मुकाम तक पहुंचे? अमेरिका में भी अफ्रीकी-अमेरिकियों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं, लेकिन वहां के राष्ट्रपति बराक ओबामा उनमें से एक हैं। हॉलीवुड की कल्पना आप उसमें सक्रिय काले अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के बिना कर ही नहीं सकते। जबकि अपने देश में बॉलीवुड में कोई आदिवासी लड़की कभी नायिका बनेगी, यह फिलहाल तो कल्पनातीत ही है। एक जमाने में दक्षिण की अपेक्षाकृत श्यामवर्णा नायिकाओं ने मुंबईया फिल्मों में मुख्य भूमिकाएं निभाईं जैसे वहीदा रहमान, रेखा आदि। लेकिन अब तो दक्षिण की फिल्मों में भी एक खास ब्रीड की अभिनेत्रियों का राज है-गोरी-चिट्टी, दुबली-पतली, तन्वंगी कन्याओं का। फिल्मों की बात जाने दें, खेल के मैदान में कभी आदिवासी लड़कियों का बोलबाला था। तीरंदाजी के क्षेत्र में दीपिका का अपना महत्व है। हॉकी और फुटबॉल खेलते भी काले लड़के व लड़कियां दिख जाते हैं। लेकिन हमारे यहां का सबसे बड़ा खेल तो क्रिकेट है, जो आभिजात्यों का खेल है। इतना बड़ा खेल कि रांची के नाम से धोनी की नहीं, बल्कि धोनी के नाम से रांची की पहचान बन रही है। लेकिन भारतीय क्रिकेट टीम में अब तक तो कोई आदिवासी खिलाड़ी नजर नहीं आया है, जबकि गोरों की विदेशी टीमों में भी काले दिख जाते हैं। टेनिस की दुनिया में तो विलियम्स बहनों ने इतिहास ही रच दिया। हालांकि वहां भी उन्हें अपने रूप और रंग की वजह से बहुत कुछ झेलना पड़ा है।

श्याम वर्ण के प्रति भारतीय पूर्वाग्रह

दरअसल, भारतीय समाज में काले रंग के प्रति एक अजीब-सी विरक्ति का भाव है। एक तो लड़की का पैदा होना ही मुसीबत माना जाता है और अगर वह काली हो तो माएं तक रो पड़ती हैं, यह सोचकर कि उसका ब्याह कैसे होगा। वैसी स्थिति में, आदिवासी समाज, जिसके सदस्य अमूमन काले ही होते हैं, की कोई लड़की लूपिता की ऊंचाई तक पहुंच पाए, यह दुरूह है। वैसे, काले रंग की होने के बावजूद आदिवासी लड़कियां अपने तरीके से खूबसूरत होती हैं। धनुष की प्रत्यंचा की तरह तनी उनकी काया, गर्व से भरी उनकी ग्रीवा, चलते वक्त एक गैर-आदिवासी समाज की लड़की की संकुचित काया की जगह उनकी सीधी देहयष्टि, उन्हें बला की सुंदर बनाती है। लेकिन यह मेहनतकश समाज का सौंदर्य है। हमारे मानस में तो सिया-सुकुमारी जैसा सौंदर्य ही बसा हुआ है। संभलकर उठते कदम, भरसक झुकी नजर, गौर वर्ण, कोमलकांत काया, जो अपने ही यौवन के भार से तनिक झुकी हुई हो।

वहीदा रहमान

हमारे लिए ‘मेघदूतम्’की प्रेयसी, पत्नी या ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ की प्रेमाकुल शकुंतला सौंदर्य की मानक हैं। इस तरह की सौंदर्यदृष्टि में आदिवासी युवती भला कहां फिट हो पाएगी? फिर भी, एक संथाल युवती कितनी सुंदर हो सकती है, इसकी नजीर बन गई है 60 के दशक में मैथन डैम के उद्घाटन के वक्त जवाहरलाल नेहरु की बगल में खड़ी वह संथाल युवती बुधनी, जिसकी तस्वीर दिल्ली के नेहरु स्मृति संग्रहालय में अब भी मौजूद है। कानों में लटकते कर्णफूल, कलाईयों तक का चूड़ा, गले में गिलट के आभूषण और सबसे बढकर उसका गांभीर्य।

रेखा

भारत में आदिवासियों की संख्या दस-बारह करोड़ के करीब है, यानी आबादी का लगभग दस फीसदी। लेकिन आदिवासी-बहुल इलाकों के बाहर किसी प्रतिष्ठित स्कूल या शिक्षा संस्थान में आपको बिरले ही आदिवासी लड़के-लड़कियां मिलेंगे। भला हो ईसाई मिशनरियों और आरक्षण का, जिनकी वजह से इस समाज के कुछ बच्चे लिख-पढ़ लेते हैं। वरना तो सर्वत्र नजर आते हैं कुपोषित बच्चे और एनीमिया की शिकार औरतें। यदि वे जीवित हैं, तो अपने अंदर की जिजीविषा की बदौलत, अपने भीतर उमड़ते उल्लास की बदौलत। इन सामाजिक आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों में हमारे देश की कोई आदिवासी लड़की लुपिता बने, यह कैसे संभव है?

पता नहीं हमारे यहां काले रंग के प्रति वितृष्णा का भाव क्यों और कब से है। ज्ञात इतिहास बताता है कि नंदों की सभा से एक दक्षिण भारतीय ब्राह्मण चाणक्य को उनके काले रंग-रूप की ही वजह से अपमानित कर बाहर कर दिया गया था और उन्होंने अपनी शिखा खोलकर नंद वंश के विनाश की सौगंध ली थी। वात्स्यायन ने अपने ‘कामसूत्र’ में काली युवतियों से संभोग की मनाही की है परंतु वे उनके साथ बलात्कार की मनाही नहीं करते शायद इसी कारण आदिवासी लड़कियों से आजाद भारत में धड़ल्ले से बलात्कार हो रहे हैं! मां यशोदा काले कृष्ण को उनके रंग की वजह से, प्यार से ही सही, ताने देती हैं-‘गोरे नंद, यशोदा गोरी, तुम कत श्याम शरीर।’ आधुनिक भारत में भी राजनीति के सफल नायक गौर वर्ण के लोग ही हैं। इतिहासकार मानते हैं कि नेहरु की सफलता उनके व्यक्तित्व की वजह से भी थी। लोहिया ने तो स्पष्ट रूप से इस बात का उल्लेख किया है कि अगर गांधी के प्रिय शिष्य वे नहीं, बल्कि नेहरु थे, तो इसकी वजह नेहरु का व्यक्तित्व भी था। यह आसक्ति ही वह मूल वजह है जिसके कारण एक बदलाववादी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी ‘आप’ के नेताओं को काले रंग में अपराधी नजर आते हैं। ‘आप’ की दिल्ली सरकार के मंत्री सोमनाथ भारती को अश्वेत लोग ड्रग व्यापारी नजर आते हैं और अश्वेत महिलाएं वेश्याएं।

वीनस विलियम्स और सेरेना विलियम्स

काले रंग के प्रति जो वितृष्णा का भाव भारतीय समाज के दिलो-दिमाग में बसा हुआ है, क्या है उसकी वजह? क्या यह कि हमारे शासकों में से अधिकतर गौर वर्ण के थे? चाहे वे मुगल हों या अंग्रेज या फिर मध्य एशिया से आने वाली अधिकतर आक्रामक जातियां? आक्रमणकारी आर्य तो गौरवर्ण के थे ही। फिर आर्य-अनार्य संघर्ष और साहचर्य से उत्पन्न मिश्रित संसृति वाली संतति का रूप-रंग भी मिश्रित हो गया। गोरे से गेहुंआ हो गया, लेकिन उत्तर भारत की जाति व्यवस्था में, शासन में तो गौर वर्ण का ही प्रभुत्व रहा। इस गौरांग प्रभुओं ने विशाल जनता के मन में हीनता का जो भाव भर दिया, क्या वही गोरे रंग के प्रति हमारी आसक्ति का एक रूप है? लोहिया कहते हैं कि जन्मना ऊंची जाति और आभिजात्य वर्ग ने अपने रंग-रूप, भाषा, जीवन मूल्यों को लेकर भारतीय समाज को हीनता से भर दिया है। इसे दूसरे शब्दों में हम कहें तो आभिजात्य और सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से संपन्न वर्ग की भाषा-भूषा और जीवनमूल्य ही व्यापक समाज का जीवन मूल्य बन जाते हैं।
फैशन जगत के व्यापारियों और कारपोरेट जगत ने गोरा बनने की इस इच्छा को और हवा दी है। भारतीय समाज के इस मानस को, गोरे रंग के प्रति इस आसक्ति को समझकर सबसे अधिक ज्यादा भुनाया है बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने। उनके तमाम सौंदर्य प्रसाधनों के मूल में है गोरा बनने की भावना। जिसे देखो वही गोरा बनने की मशक्कत में लगा हुआ है और इस व्यापार के फलने-फूलने की अनिवार्य शर्त है कि गोरे रंग की महत्ता बनी रहे। इन परिस्थितियों में आर्थिक दृष्टि से विपन्न, विस्थापन का दंश भोग रही किसी आदिवासी लड़की का ‘लूपिताÓ बनना किसी चमत्कार से कम नहीं होगा अपने देश में।

 

(फारवर्ड प्रेस के अगस्त 2014 अंक में प्रकाशित)


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