फॉरवर्ड प्रेस

इकबाल खो चुकी सरकार बौराई बिहार पुलिस

DJH ÂéçÜâ ·¤è »ôÜè âð ×ÚUè ·¤ÜæßÌè

जुलाई माह में बिहार में घटी दो घटनाएं, दलित-बहुजन के खिलाफ बिहार पुलिस की बर्बरता का प्रतीक बन गई हैं। रोहतास जिले के अकबरपुर में 8 जुलाई को पुलिस की गोली से चेनारी के टेकारी का उपेन्द्र कुशवाहा और सुन्दरगंज का प्रदीप पासवान मारा गया। औरंगाबाद के मदनपुर में 19 जुलाई को पुलिस की गोली से महादलित कलावती देवी और बारह वर्षीय रामध्यान रिकियासन (भुइयां जाति) मारे गए। इसके पहले, दो मई 2012 को औरंगाबाद में पुलिस बर्बरता के शिकार बने थे पिछड़ी जाति के नेता कोईरी राजाराम सिंह, उर्मिला शरण और यादव किरण यादवेन्दु। तीनों ने मानवाधिकार आयोग में शिकायत की और आयोग ने उनकी शिकायत को सही ठहराया। बिहार में गैर-सवर्णों की यह बड़ी जीत थी, खासकर उस पुलिस व्यवस्था के खिलाफ जो रणवीर सेना प्रमुख ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड के बाद पटना में हुई गुंडागर्दी की मूकदर्शक बनी रही थी। तभी से यह सवाल उठाया जाता रहा है कि पुलिस का यह दोहरा व्यवहार आखिर कब तक जारी रहेगा। पुलिस का व्यवहार भीड़ के जातिगत चरित्र पर निर्भर करता है।

औरंगाबाद की घटना ने पुलिस का पुराना बर्बर चेहरा ही उद्घाटित किया है। अस्सी के दशक में यहां एसपी रहे विमल किशोर सिन्हा ने जिला स्मारिका ‘कादंबरी’ में लिखा था कि-‘थानों से दूर, उनके नियंत्रण से बाहर, पुलिस पिकेटों पर नजर आए मस्ती से खाते-पीते जिंदगी जीते पुलिस के जवान।’ जिनका उद्देश्य पिकेट की रक्षा करना था, वे ग्रामीणों को पकड़ते, उनका दोहन करते और उन्हें उग्रवादी की संज्ञा दे देते। ठीक यही आज भी हो रहा है। ऐसा क्यों है कि पुलिस जब कमजोर जाति के खिलाफ खड़ी होती है तो उसका एक्शन अलग होता है? क्या वह आरोपी, जिसने दो हत्याएं की थीं और जहानाबाद में सवर्ण महिला संगीता देवी को डीएसपी एसएम वकील अहमद और टाउन इंस्पेक्टर नागेन्द्र सिंह के सामने निर्वस्त्र कर दिया था, वह पीएमसीएच से पुलिस अभिरक्षा से तब भी भाग सकता था जब वह कमजोर जाति का होता? क्या पुलिस का रवैया इतना बड़ा अपराध करने वाले व्यक्ति के प्रति यही रहता, यदि वह पीडि़ता की ही जाति का न होता? दरअसल, बिहार पुलिस का चरित्र आजादी के बाद भी नहीं बदला। गुलाम भारत में जो इसे सिखाया गया था, वही वह आज भी कर रही है। इस कारण जनता में पुलिस के प्रति संदेह, डर और अविश्वास आज भी बना हुआ है। अंग्रेजों के जाने के बाद पुलिस जमींदारों और रईसों की चाकरी करती रही और आम आदमी के प्रति उसका रवैया नकारात्मक ही बना रहा। पुलिस को जनता का मित्र बनाने का हर प्रयास विफल होता रहा। औरंगाबाद की घटना के मूल में यही है। पुलिस जवान आम आदमी को नक्सली बताकर उससे गाली-गलौज कर रहे थे और उसका मुर्गा भी खा रहे थे। छाली दोहर, कनौदी, सहियारी, निमीडीह के महादलित परिवारों की ओर से जब इसका विरोध शुरू हुआ तो आला अधिकारियों ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया, समस्या के समाधान की पहल नहीं की।

रामलगन भुइयां को सीआरपीएफ और कोबरा बटालियन के जवानों ने पीटा था। मोती हरुल भुईयां, अवधेश भुईयां और शंकर भुईयां को बांधकर सीआरपीएफ जवानों ने क्यों पीटा? जब भीड़ आक्रोशित होकर सड़क पर उतर आई तो उसका समर्थन भाकपा माओ ने किया। इसके सीमांत रिजनल कमेटी के प्रवक्ता मानस ने कहा है कि यह समर्थन जारी रहेगा और 2 जुलाई को बिहार बंद भी किया।
डीएम नवीनचन्द्र झा की इस चेतावनी कि ‘रोड से हट जाइए नहीं तो कार्रवाई करनी पड़ेगी’ पर जनता का जवाब था कि ‘गोली चलाएइगा, चलाइए, जला देंगे।’ यह गुस्सा बताता है कि महादलित समुदाय के लोग रोजमर्रा के पुलिसिया जुर्म से आजिज आ गए थे।

क्या ये महिलाएं, नाबालिग नक्सल हैं?

जिन्हें दो जून की रोटी नसीब नहीं, आखिर उनका अपराध क्या था? हत्या के शिकार कलावती देवी और बारह वर्षीय सातवीं का छात्र रामध्यान रिकियासन क्या नक्सली थे? क्या सातवीं का छात्र बिट्टू, पप्पू और रितेश को हथकड़ी लगाने वाली पुलिस के खिलाफ भी प्राथमिकी दर्ज की जाएगी? क्या वे नक्सली ठहराए जा सकते हैं? इनको अदालत ने बाल सुधार गृह भेजा है। सुप्रीम कोर्ट ने 2& मार्च, 1990 के उत्तरप्रदेश के अलीगंज थाने के एक मामले में दिए गए अपने फैसले में नाबालिग असलम को हथकड़ी लगाने के लिए पुलिस पर 20 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था।

वास्तव में दलित-बहुजन को नक्सली मान लिए जाने की प्रवृत्ति है। इसका सबूत है कि सभी नामजद सोलह अभियुक्तों को पुलिस ने पकड़ लिया है। क्या इस पर यकीन किया जा सकता है? दरअसल, जिनको पकड़ा गया, उन्हें ही नामजद आरोपी बना दिया गया। इसी कारण ब’चे भी अभियुक्त बनाए गए हैं।

पुलिस यह समझती है कि उसकी गोली का डर आंदोलनों को कुचल सकता है। लेकिन वह यह भूल जाती है कि आंदोलनकारी भारतीय हैं, अंग्रेज नहीं,जो देश छोड़कर चले जाएंगे। वे जितना शोषित होंगे उतने ही संगठित होंगे। पुलिस गोलीकांड को जायज ठहराने पर तुली हुई है। वह खुद कहती है कि हजारों की भीड़ अनियंत्रित थी और उसमें नक्सली शामिल थे। घटना के अगले दिन, 20 जुलाई को, मगध क्षेत्र के डीआईजी पीके श्रीवास्तव ने कहा कि भीड़ में आठ-दस नक्सलियों के शामिल होने की सूचना थी। क्या पुलिस केवल इसी आधार पर निर्दोषों पर गोली चला देगी? किसी भी भीड़ में कुछ अराजक तत्व हो सकते हैं। क्या मात्र इस कारण से भीड़ पर गोली चलाया जाना उचित है? अगर बिहार की बौराई पुलिस नहीं सुधरी तो स्थिति को बिगडऩे से कोई नहीं रोक सकता। पिछड़ी जाति के कई पुलिस अधिकारी दबी जुबान से मानते हैं कि नक्सलवाद बढाने में पुलिसिया जुल्म की बड़ी भूमिका रही है जिसे शह दिया था सवर्ण अफसरशाही ने।

 

(फारवर्ड प्रेस के सितम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +919968527911, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें :

महिषासुर : मिथक व परंपराएं

चिंतन के जन सरोकार 

महिषासुर : एक जननायक