दुर्गा और महिषासुर का मिथक : एक वस्तुनिष्ठ

दुर्गा व अन्य देवियों की कथा के पीछे की मूल भावना सिर्फ सृजन शक्ति की आराधना नहीं है, बल्कि इसके कहीं अधिक गंभीर निहितार्थ हैं, जिन्हें ब्राह्मणग्रंथों का सम्यक पाठ कर समझा जा सकता है।

मिथक इतिहास नहीं होते लेकिन वे अतीत हो चुके समाज और उसकी संस्कृति का इतिहास जरूर कहते हैं। देवियों के मिथक पूरे देश में अलग-अलग रूपों में अपना प्रभाव रखते हैं और वर्षों से लगभग सर्वमान्य रूप से स्वीकार्य रहे हैं। माना जाता है कि ये मिथक देवियों के मातृत्व की प्रतिष्ठा करते हैं व उनकी सृजन शक्ति की आराधना करते हैं। कामरूप कामख्या (असम) में स्त्री की योनि की पूजा होती है, जिसके लिए ब्राहमण कर्मकांडियों ने 5 दिनों की मासिक ‘रजस्वला’ अवधि भी तय कर रखी है। बिहार के गया जिले में मंगलागौरी में देवी के स्तन की पूजा होती है। लेकिन क्या सचमुच ये मिथक सिर्फ सृजन शक्ति की अराधना तक सीमित हैं या इनके पीछे सामाजिक संघर्ष की एक लंबी गाथा भी छुपी है?

कामरूप कामख्या

वस्तुत: कथित आधुनिक सोच के आगमन के बावजूद, देवियों के मिथक पर लिखना आज भी काफी जोखिम भरा है, खासकर जिस पृष्ठभूमि में यहां लिखने का प्रसंग है। हालांकि महात्मा फुले, डा आम्बेडकर, पेरियार आदि हमारे प्रेरणा नायकों ने इन मिथकों पर करारा प्रहार किया है, लेकिन स्थितियाँ आज भी बहुत बदली नहीं हैं।

दरअसल, हिंदू धर्म में देवियों के अनेक मिथकीय अस्तित्व हैं, जिनमें दुर्गा एक हैं। दुर्गा की कथा 250 ईस्वी से लेकर 500 ईस्वी के बीच लिखे गए मार्कंडेय पुराण में है, जिसका ‘दुर्गा सप्तशती’ के रूप में ब्राह्मणों द्वारा पाठ किया जाता है। ‘दुर्गा सप्तशती’ के अनुसार, दुर्गा के अलग-अलग नाम और रूप हैं। वह ‘जगद्जननी’ है लेकिन उसकी उत्पत्ति देवताओं (पुरुषों) के तेज से हुई है और उससे से ही वह इतनी शक्तिशाली भी बनी कि देवों की पराजय का बदला ले सके।

दुर्गा अनेक असुरों की हत्या करती है, जिनमें महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ आदि शामिल हैं। आर्यों और मूलनिवासियों के आपसी संघर्ष और मूलनिवासियों के लिए आर्यों द्वारा किये जाने वाले संबोधनों के इतिहास पर काफी कुछ लिखा गया है। देश के अलग-अलग भागों में असुरों की पूजा होती है। इस प्रकार दुर्गा का मिथक और उसके पराशक्ति संपन्न युद्धों की कथा आर्यों और मूलनिवासियों के बीच संघर्ष की कथा है, जिसे ब्राह्मण चारणों ने अतिवादी बना दिया।

मंगलागौरी

महाराष्ट्र के बहुजन परम्परा के विद्वान तथा मराठा सेवा संघ के सक्रिय आंदोलक आ.ह. सालुंखे और नीरज सालुंखे दुर्गा, उर्वशी, अम्ब आदि को बहुजन परम्परा से जोड़ते हुए उन्हें ‘गणनायिका’ बताते हैं। यदि यह सिद्धांत सही है तो फिर इन गणनायिकाओं का युद्ध या तो कबीलाई युद्ध था या फिर आर्यों के उकसावे या नियंत्रण में हुआ था। इसी देश से होने के कारण ये ‘गण’ एक-दूसरे के कौशल-कमियों से वाकिफ होंगे, जो इन्हें एक दूसरे को हराने में सहायक रहा होगा और इसी कारण से आर्यों ने अपने विस्तार के लिए इनका इस्तेमाल किया होगा और इनका महिमामंडन हुआ होगा।

दुर्गा सप्तशती में वर्णन है कि युद्ध के मैदान में दुर्गा ‘सुरापान’ करने लगती है और उसके बाद वह महिषासुर का वध करती है। इस कथा की ‘बिटवीन द लाइंस’ व्याख्या करने वाले लोग महिषासुर की हत्या धोखे से की गई मानते हैं, यानी स्त्री होने का फ़ायदा लेकर दुर्गा ने उनकी हत्या कर दी। बाद के दिनों में असुर शुम्भ-निशुम्भ दुर्गा को अपने पास आने का प्रस्ताव भी देते हैं। यहाँ भी कथा के भीतर उपकथा की संभावना है। इन उपकथाओं को आधार दे जाता है दुर्गा का अविवाहित होना यानी किसी देवता के द्वारा उसे पत्नी के रूप में न स्वीकारा जाना, यानी वह उर्वशी, मेनका की तरह देवों की अप्साराओं में गिनी जा सकती है।

 

कथा में प्रयुक्त शब्दावली का भाषावैज्ञानिक अध्ययन भी कुछ अतिरिक्त तथ्योंं को सामने लाता है। महिषासुर की हत्या को ‘महिषासुर मर्दन’ कहा जाता है। इस भाषा के जरिये व्याख्या की दो संभावनाएं बनती हैं, एक तो यह कि दुर्गा मर्दाना ताकत से लैस थी, यानी देवताओं के तेज से, (दुर्गा सप्तशती के अनुसार) इसलिए उसने मर्दन किया। दूसरी व्याख्या के लिए मर्दन के प्रचलित अर्थ शामिल किये जा सकते हैं। यह सेक्स के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द है, जो ‘मान-मर्दन’ तक विस्तार पाता है। इस शब्दावली के आधार पर भी युद्ध के मैदान में सुरापान और उसके बाद महिषासुर की हत्या के भीतर उपकथाएं तलाशी जा सकती हैं।

जाहिर है, दुर्गा व अन्य देवियों की कथा के पीछे की मूल भावना सिर्फ सृजन शक्ति की आराधना नहीं है, बल्कि इसके कहीं अधिक गंभीर निहितार्थ हैं, जिन्हें ब्राह्मणग्रंथों का सम्यक पाठ कर समझा जा सकता है।

(फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर 2014 अंक में प्रकाशित)


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