फारवर्ड विचार, अक्टूबर 2014

हमारी यह मान्यता है कि बहुसंख्यक बहुजन इस पौराणिक नशे से तब तक बाहर नहीं आ सकते जब तक कि वे अपनी असली जड़ों और पहचान से वाकिफ ना हो जाएँ। फारवर्ड प्रेस द्वारा अक्तूबर 2011 में शुरू किया गया यह विमर्श अब एक नए, ऊँचे स्तर पर पहुँच गया है

इस बार मैं बहुजन संस्कृति के संदर्भ में क्लीवेज के बारे में बात करना चाहता हूँ। नहीं! दीपिका पादुकोण के क्लीवेज के बारे में नहीं, ट्विटर पर बहुत कुछ कहा जा चुका है बल्कि भारतीय समाज के क्लीवेज के बारे में, जहाँ सदियों पुरानी सांस्कृतिक दरार के बावजूद एक असहज एकता कायम है। क्लीव (क्रिया के रूप में) अंग्रेजी भाषा के सबसे दिलचस्प शब्दों में से एक है। इसके दो एकदम विरोधाभासी अर्थ हैं : धारदार यन्त्र से किसी चीज़ की दो फांक कर देना और किसी चीज़ या व्यक्ति से गोंद की तरह चिपक जाना। इन दोनों अर्थों में इस शब्द के एकसाथ प्रयोग का सबसे बढिय़ा उदाहरण नए दूल्हे को ईश्वर का आदेश है, ‘इसके लिए एक व्यक्ति अपने माता-पिता से अलग हो जायेगा और अपनी पत्नी से ऐसे जुड़ जायेगा कि दोनों एक हो जायें ‘।

भारत के ‘सांस्कृतिक’ विवाह में क्लीवेज कहाँ है? सबसे पहले तो, दूर-दराज क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों को छोड़ कर, भारत के बहुसंख्य निवासियों को बलपूर्वक सांस्कृतिक दृष्टि से एक कर दिया गया है। यह निश्चित रूप से प्रेम विवाह नहीं है और केवल नाम के लिए तय किया गया विवाह है। ऐसा लगता है मानो बहुजन दुल्हन को ब्राह्मणवादी दूल्हा, बलपूर्वक उसके पिता के घर से खींच कर अपने साथ ले आया हो। इसलिए एकदम भिन्न जीवनसाथियों के बीच क्लीवेज बना हुआ है।

अन्य संस्कृतियों के विपरीत, भारत में द्वैतवाद की भरमार है : वैदिक अद्वैत से लेकर सांख्य (पुरुष-प्रकृति) तक, भारतीय दर्शन में हमें द्वैतवाद के भरपूर दर्शन होते हैं। धर्म और यहाँ तक कि भक्त, दो विभिन्न धाराओं में आस्था रखते हैं। कुछ के लिए ईश्वर सगुण है तो कुछ के लिए निर्गुण। समाजशास्त्र के मोर्चे पर, द्विज-शूद्र द्वैतवाद हम सबके सामने है। जैसा कि प्रेमकुमार मणि लिखते हैं, भारत में केवल दो परम्पराएं या संस्कृतियाँ हैं – ब्राह्मण और श्रमण। ब्राह्मणवादियों ने उपमहाद्वीप के सभी आख्यानों को देव विरुद्ध असुर कथाओं में ढाल दिया है।

हमारी यह मान्यता है कि बहुसंख्यक बहुजन इस पौराणिक नशे से तब तक बाहर नहीं आ सकते जब तक कि वे अपनी असली जड़ों और पहचान से वाकिफ ना हो जाएँ। फारवर्ड प्रेस द्वारा अक्तूबर 2011 में शुरू किया गया यह विमर्श अब एक नए, ऊँचे स्तर पर पहुँच गया है। डाक्टर पॉल ई लार्सन, जो कि नियमित तौर पर भारत आते रहते हैं, ने असुरों के सम्बन्ध में एक नयी, दिलचस्प पड़ताल शुरू की। मैंने उसे आगे बढ़ाते हुए और गहराई से खोजबीन की और इसमें कुछ ऐसे विचारोत्तेजक सत्य सामने आये जिनसे बहुजनों को अपनी पहचान और फिर नियति को समझने में मदद मिलेगी।

जब मैं आवरण कथा के लिए अनुसन्धान कर रहा था तब मुझे एक बार फिर यह महसूस हुआ कि बहुजन शोधार्थियों और शिक्षाविदों को इस काम, इस मिशन के लिए स्वयं को समर्पित करना चाहिए। आखिर अगर यह काम हम नहीं करेंगें, तो कौन करेगा? कहने की आवश्यकता नहीं कि आज अधिकांश शोध व अकादमिक विश्लेषण अंग्रेजी भाषा में होता है। बहुजन विषयों पर भी अंग्रेजी में शोध के लिए कहीं अधिक सामग्री उपलब्ध है। अत: फारवर्ड प्रेस, बहुजन शिक्षाविदों का आह्वान करता है कि वे अंग्रेजी पर अधिकार प्राप्त करें और भारत की समृद्ध दलितबहुजन विरासत की खोज, उसका दस्तावेजीकरण और विश्लेषण करें। जब आप ब्राह्मणवादियों द्वारा अनुमोदित शोध विषयों से आगे बढेेंगे तब आपको विरोध का सामना भी करना पड़ेगा। यही कारण है कि ब्राह्मणवादियों ने दलितबहुजनों को अंग्रेजी शिक्षा से दूर रखने की भरसक कोशश की। जैसा कि सावित्रीबाई ने लिखा था ..’अंग्रेजी मां सच्चा विवेक देती है/प्रेम से दमित को पुनर्जीवित करती है/अंग्रेजी मां पददलितों को गले लगाती है/जो गिरे हुए हैं, उन्हें उठाती ऑर दुलारती है..’

जहाँ हम राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पाठकों के लिए अंग्रेजी में अनुसन्धान करें और उसका प्रकाशन भी करें वहीं हम लोकप्रिय हिंदी पत्रिकाओं को भी ना भूलें। तभी हमारी संस्कृति में बदलाव आ सकेगा। द्विभाषी बहुजन पत्रिका बतौर, फारवर्ड प्रेस, अंग्रेजी में उपलब्ध शोधों को हिंदी पाठकों को उपलब्ध करवाने में अपनी भूमिका अदा कर रही है। हमारा लक्ष्य शिक्षा जगत और आमजन के बीच की खाई को पाटना है। अंग्रेजी और हिंदी का यह मिलन, बुद्ध के शब्दों में सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय होगा।

अगले माह तक सत्य में आपका

(फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर 2014 अंक में प्रकाशित)


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