फॉरवर्ड प्रेस

‘हिन्दीस्तान’ के चुनाव नतीजों के निहितार्थ

8 दिसंबर, 2013 को पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव परिणाम आए और इसने पूरे मुल्क के राजनीतिक मिजाज में छोटा सा ही सही, एक भूचाल ला दिया। गुजरात के मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की हवा अब तक हवा में थी, इन चुनाव नतीजों ने उसे जमीन पर उतार दिया, यानी कि इस हवा का दबाव राजनीतिक दुनिया ने स्पष्टत: महसूस किया। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ-जो तेरह साल पहले एक ही राज्य थे -ने एक बार फि र भाजपा को अगले पांच साल तक राज चलाने का आदेश दिया। राजस्थान की कांग्रेसी गहलोत सरकार बुरी तरह पिट गई और यही हाल दिल्ली की शीला सरकार का भी हुआ। मिजोरम में कांग्रेस सरकार बनाने में सफल हुई, लेकिन यह जीत कांग्रेस को हास्यास्पद होने से नहीं बचा सकी। दरअसल, देश के राजनीतिक मनोविज्ञान ने उत्तर-पूर्व के राज्यों को अपनी चौहद्दी में शामिल ही नहीं किया है, यह दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है।

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली के चुनाव नतीजों के राजनीतिक मायने भी हो सकते हैं। इन चुनावों को एक झलक अथवा सेमीफाइनल के रूप में देखा जाना कहीं से भी गलत नहीं है। इन चार राज्यों में भारतीय जनता पार्टी को कुल 407 सीटें हासिल हुईं। वहीं कांग्रेस को महज 125। इन राज्यों में विधान सभा की कुल 590 सीटें हैं और लोकसभा की 72। ये सभी हिंदी भाषी राज्य हैं। इनका प्रभाव अन्य हिंदी भाषी राज्यों मसलन, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा झारखंड, उत्तराखंड आदि पर पडऩा लाजिमी है। महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा व पंजाब जैसे राज्यों को जोड़ लें-जहां भाजपा ओर उसके एक घटक शिवसेना का प्रभाव असंदिग्ध रूप से गहरा है तब इस पूरे प्रक्षेत्र की लोकसभा सीटों की संख्या होती है 314। इन सबमें इसी दर से यानी चार राज्यों के विधान सभा चुनाव नतीजों की दर से, यदि लोकसभा चुनाव परिणाम आए, तब भाजपा को लगभग सवा दो सौ सीटें लोकसभा के 2014 वाले चुनाव में मिल सकती हैं। 314 में 225। इसमें आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडू जैसे राज्य शामिल नहीं हैं। यह तब है जब दिल्ली के चुनाव में ‘आम आदमी पार्टी’ की ओर से भाजपा को तथाकथित जबरदस्त चुनौती मिली है। यह भी देखने की बात होनी चाहिए कि चारों राज्यों में ‘अन्य’ कोटि की राजनीतिक पार्टियां काफी कमजोर हो गई हैं। इसलिए इस विश्लेशण में दम होने की संभावना है कि बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यू) जैसी पार्टियों की अपील लोकसभा चुनावों में कमजोर हो सकती है, और ये हमेशा के लिए नहीं भी तो, कम से कम कुछ समय के लिए निश्चित ही हाशिए पर जाएंगी। बसपा प्रमुख मायावती ने इन चुनाव परिणामों में अपनी पार्टी के खराब प्रदर्शन पर निराशा का इजहार किया है। मैं बहुत पहले से कह रहा हूं कि नरेंद्र मोदी की चुनौती को हलके में नहीं लिया जा सकता। इन विधान सभा चुनावों के बाद इस चुनौती की लहर में परिवर्तित होने की प्रकिया शुरू हो गई है, इसे स्वीकार न करना मूर्खता ही कही जाएगी।

दिल्ली में कुछ अलग

इस पूरे चुनाव में दिल्ली के चुनाव नतीजे कुछ नया ही अर्थ देते हैं। 70 सीटों वाली विधान सभा में सत्तापक्ष कांग्रेस को कुल 8 सीटें मिलीं, भारतीय जनता पार्टी को 31 और बिल्कुल नई पार्टी-जो 6 महीने पहले एक एनजीओ आंदोलन के गर्भ से निकली है-ने 28 सीटें हासिल की हैं। यह एक चमत्कार की तरह है। ऐसा नहीं है कि कभी किसी पार्टी ने अपने पहले ही दखल में बेजोड़ सफ लता हासिल नहीं की है। राष्ट्रीय स्तर पर 1977 में जनता पार्टी और प्रांतीय स्तर पर 1983 में आंध्र में तेलगू देशम पार्टी ने शानदार सफ लताएं हासिल की थीं। लेकिन उनके साथ जयप्रकाश नारायण और एनटीआर जैसे करिश्मायी नेतृत्व थे, जिनका जनता पर जबर्दस्त प्रभाव था। ‘आम आदमी पार्टी’ की शानदार सफ लता का विश्लेषण अभी होना है। ‘आआपा’ की सफ लता हमें इसलिए भी आश्चर्यचकित करती है कि इसके पीछे न कोई करिश्मायी व्यक्तित्व था, न कोई सिद्ध-प्रसिद्ध विचारधारा या इससे मिलता-जुलता कुछ और। दरअसल यह महामानवों से लघु मानवों की टक्कर थी। एक नया राजनीतिक प्रयोग, जो जेपी से भी नहीं हो सका था। सरकारी नौकरी करने वाले एक अरविंद केजरीवाल उठते हैं और अनजान से दिखने वाले कुछ साथियों के साथ एक पार्टी बना डालते हैं। पिछले कुछ सालों में उभरे एक करिश्मायी व्यक्ति अन्ना हजारे की भी नाराजगी उन्हें झेलनी पड़ती है। उन्होंने अपने नाम के इस्तेमाल पर भी नाराजगी जतायी। लोगों ने यही समझा केजरीवाल का कुनबा बिखर गया। पूरे चुनाव में उनके अपने सर्वेक्षण के अलावा सारे सर्वेक्षणों ने उन्हें नजरंदाज किया। लेकिन उनकी सफ लता ने सबको चौंका दिया। मुझे भी, (शायद अन्ना को भी)।

आखिर ‘आम आदमी पार्टी’ (आआपा) की सफ लता का रहस्य क्या है? मैं नहीं कहता कि मैं सही हूं। लेकिन मैंने जो आकलन किया है, उसे आपको बतलाना चाहता हूं। ‘आआपा’ को दिल्ली में सफ लता मिली है, वह एक महानगर है, जहां भारत भर के लोग आकर बसे हैं। गांव-कस्बों के सामंत-पुरोहित परिवारों की पढ़ी-लिखी पीढ़ी मध्यवर्ग के रूप में रूपांतरित होकर यहां निवास करती है, जिनके लिए जातिजनित ओछी हरकतें कोई मायने नहीं रखतीं। यहां जाति है-लेकिन एक परिवर्तित रूप में। उनका वर्गीकरण हो गया है। सभी ऊंची जातियां मिलकर ‘अपर कास्ट’ बन गई हैं, तो सभी पिछड़ी जातियां ‘ओबीसी’। अनुसूचित जातियों के अलग-अलग जाति समूह अब दलित के रूप में यहां हैं। इन सबका चरित्र और सबकी आकांक्षाएं परिवर्तित हुई हैं। लेकिन एक चीज जो पूरे महानगरीय जीवन में उभरी है वह है विचारहीनता। इसका सबस्टिट्यूट (विकल्प) संवेदना के रूप में यहां जरूर उभरा है (हालांकि इस पर अनेक मित्रों को ऐतराज हो सकता है)। इस संवेदना का संबंध उनके स्वार्थ से भी है। जैसे पिछले साल निर्भया मामले में पूरी दिल्ली की संवेदना एक आंदोलन के रूप में उभरकर आई। इसका कारण यह भी था कि हर घर में लड़की थी।

ऐसे महानगर के लिए धर्मनिरपेक्षता जैसी झूठी और कुटिल विचारधारा के कोई मायने नहीं थे। दिल्ली के लोग जानते हैं कि भाजपा को कम्युनल कहने वाली कांग्रेस ने ही 1984 में सांप्रदायिक आधार पर हजारों सिखों का कत्लेआम किया था और उसके नेता संत के अंदाज में पेड़ उखडऩे का प्रतीक रख रहे थे। वास्तविक रूप से सेकुलर तो आम आदमी होता है, जो महंगाई, राशन कार्ड और गैस-पेट्रोल की चिंता में डूबा होता है। उसे कानून व्यवस्था की चिंता होती है और गुंडाराज व आतंकवाद से वह मानसिक स्तर पर भयभीत होता है। सरकारें बस इतना कर ले, बाकी वह अपना जीवनयापन कर लेगा। आम आदमी जान रहा है कि राजनीति से कैसे लोग जुड़े हुए हैं। ऐसी राजनीति से उसकी विरक्ति स्वाभाविक है। ऐसे ही विरक्त, ऊबे और चिंताओं में डूबे आम आदमी ने ‘आआपा’ का साथ दिया। इसका एक हिस्सा वह तबका भी था, जो 1990 में मंडल आंदोलन के दौरान आरक्षण के खिलाफ  जूता पालिश कर रहा था। बीस बाईस साल के अनुभव ने उसे कुछ सिखलाया। अब उसे ‘झाड़ू’ उठाने में कोई शर्म नहीं थी। ‘आम आदमी पार्टी’ ने मध्यवर्ग और निम्नवर्ग के अंतर को पाटने की हरसंभव कोशिश की। यह कोशिश किसी पारंपरिक विचारधारा के आधार पर नहीं, संवेदना के आधार पर हुई और यही केजरीवाल की ताकत बन गई।

मेरा मानना है कि यदि दिल्ली में मोदी की लहर न होती तो ‘आआपा’ को चालीस के इर्द-गिर्द सीटें मिल जातीं। इसे आप इस रूप में भी कह सकते हैं कि केजरीवाल के अभाव में मोदी दिल्ली में भी कांग्रेस को धूल चटा देता। दिल्ली में कांग्रेस से ‘आआपा’ संघर्ष कर रही थी ओर ‘आआपा’ से मोदी। पुरानी भाजपा को ‘आआपा’ कांग्रेस की तरह ही छठी का दूध याद करा देती। तो हमें मानना पड़ेगा कि मोदी की लहर दिल्ली में भी चली, और उसने भाजपा को हास्यास्पद होने से बचा लिया। ‘आआपा’ ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को नैतिक होने के लिए मजबूर किया। दोनों ने इसे किसी न किसी रूप में स्वीकार भी किया है। यह अच्छी बात है। राजनीति में यह ताजा हवा के झोंके की तरह है, लेकिन आगे क्या होगा ? ‘आआपा’ के सर्वेक्षण में ही यह बात आई कि ‘आआपा’ के वोटरों में से तकरीबन 35 प्रतिशत ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में पसंद किया है। इसका मतलब है ‘आआपा’ के वोटरों और भाजपा के वोटरों के बीच एक पुल है। इस पुल के अर्थ उभरकर लोकसभा चुनाव में सामने आ सकते हैं।


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