फॉरवर्ड प्रेस

‘मैं बहुजन साहित्‍य के विचार में यकीन रखती हूं’

नमस्कार, यह सच है कि मुझसे अभी एक या दो दिन पहले ही पूछा गया था कि क्या मैं इस (फॉरवर्ड प्रेस की बहुजन साहित्य वार्षिकी के लोकार्पण समारोह) कार्यक्रम में आना चाहूँगीं और मैंने प्रसन्नतापूर्वक अपनी सहमती दे दी।यद्यपि,सामान्यत: मैं किसी भी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनने से बचती हूं परंतु मैं ;यहाँ आने के लिएद्ध इसलिए राजी हुई क्योंकि मेरा मानना है कि यहां हम एक महत्वपूर्ण विचार पर मंथन कर रहे हैं। यही कारण था कि मैं इसमें शामिल होना चाहती थी।

यह (बहुजन साहित्य) उन लोगों का साहित्य है,जो दमन की अवधारणा को एक जटिल दृष्टिकोण से देखते हैं। मेरे विचार में समस्या यह है कि हम जातिवाद से ग्रस्त समाज से कैसे लड़ें ? जातिवाद से ग्रस्त समाज,ऐसे समाज से भी बुरा है जिसमें गुलामी का प्रचलन हो,यह रंगभेद से भी बदतर है। यह एक ऐसा समाज है,जो यह मानता है कि उसके अन्याय के पदक्रम के ढांचे को धर्मग्रंथों की स्वीकृति प्राप्त है , उससे आप कैसे लड़ेगे? और यह एक ऐसा ढांचा है जो सदियों पुराना है और आप लोगों से कह रहे हैं , या लोग सोचते हैं कि आप उनसे कह रहे हैं कि अन्याय न करने के लिए वे उस सब को नकार दें,जो वे हैं क्योंकि अन्याय हर व्यक्ति की मूल बुनावट का हिस्सा है और यह धर्म से जुड़ा हुआ है,जो उन लोगों के रोम-रोम में व्याप्त है।

अत:, जाति के खिलाफ लड़ाई एक कठिन लड़ाई है। क्योंकि एक ओर तो यह उस पहचान के खिलाफ लड़ाई है,जो लोगों पर मनमाने ढंग से थोप दी गयी है (तो दूसरी ओर) उससे लडऩे के लिए आपको उसी पहचान को स्वीकार करना पड़ता है और फिर आप उसमें कैद हो जाते है। और यही तो वे चाहते हैं।आप खुद को अलग-अलग खांचों में बाँट लेते हैं और उनमें कैद हो जाते है, फिर दलितों को मुसलमानों के खिलाफ खड़ा कर दिया जाता है,ओबीसी को दलितों के खिलाफ,ईसाईयों को आदिवासियों के खिलाफ।और उन पहचानों को ओढ़ कर,जो हम पर लादीं गयीं हैं,हम एक दूसरे से भिड जाते हैं और ठीक वही करते हैं,जिसके लिए जाति बनाई गयी है। सबसे कुटिलतापूर्ण चतुराई वाली प्रशासनिक व्यवस्था वह नहीं हैं, जिसमे ऊपर बैठे लोग नीचे वालों पर नियंत्रण करते हैं बल्कि वह है, जिसमें आप उन्हें बाँट देते हैं और सबको एक-दूसरे से लड़ा देते हैं।

तो हम इस अन्याय से कैसे इस प्रकार लड़ें कि इसके प्रति हमारे मन में रोष होते हुए भी हम न्याय के विचार को अपने मन में संजोकर रख सकें ? हममें अन्याय के प्रति रोष तो हो परंतु हमारे मन में न्याय के विचार,प्रेम के विचार,सौंदर्य के विचार,संगीत और साहित्य के लिए भी जगह हो, हम कटुता से भरे क्षुद्र व्यक्ति न बन जाएं, क्योंकि वे तो यही चाहते हैं कि हम ऐसे बन जाएँ।और इसलिए मैं साहित्य के इस विचार में,बहुजन साहित्य के विचार में,यकीन रखतीं हूँ -ऐसा साहित्य जो हर प्रकार के दमन -केवल जातिगत दमन नहीं , को अपनी विषयवस्तु बनाता है और यह केवल जातिगत दमन तक सीमित नहीं रहना चाहिए -कई तरह के दमन होते हैं – परन्तु हम समाज के ढांचे को नजऱअंदाज़ नहीं कर सकते- जो कि एक ऐसा समाज है, जिसे जाति का इंजन गतिमान रखे हुए है,एक ऐसा समाज जिसकी राजनीति का आधार जाति है,जिसका हर विचार,हर सोच जाति पर आधारित है।परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि यह समाज वर्ग के आधार पर नहीं चलता,इसका यह अर्थ नहीं है कि वह घोर पूंजीवाद के आधार पर नहीं चलता। यह समाज कैसे चलता है, इसे समझने के लिए इन सभी चीज़ों पर विचार करना होगा।

इसलिए,मैं सोचती हूँ कि हमें साहित्य को ऐसे माध्यम के रूप में देखना चाहिए जो इस जटिलता को समझने में हमारी मदद कर सकता है। यही कारण है कि साहित्य इतना महत्वपूर्ण है। बात यह नहीं है कि किसी किताब की कितनी प्रतियाँ बिकीं या किसे बुकर पुरस्कार मिला। बात यह है कि क्या साहित्य ऐसे विचारों का सृजन कर रहा है, जो समाज को बदलने के लिए उत्तेजित कर सकें,जागृत कर सकें।यही कारण है कि मुझे यह (निमंत्रण) स्वीकार करते हुए बहुत ख़ुशी हुयी, क्योंकि मुझे लगता है जो लोग यहाँ बैठे हैं,उनके पास सही विचार है। यह विचार आज की दुनिया में बहुत कीमती है।

आज हालात यह हैं कि भाजपा और आरएसएस घरवापसी करवा रहे हैं।असल में यह बहुत पहले शुरू हो गया था,20वीं सदी कि शुरुआत में ही। इसका धर्म से कोई लेनादेना नहीं है।इसका सम्बन्ध केवल जनसांख्यिकी,राजनीति और संख्या -बल से है।अब वे बाबासाहेब के आरक्षण के विचार का उपयोग उन लोगों को ललचाने के लिए कर रहे हैं,जिनने जाति प्रथा की यंत्रणा से बचने के लिए ईसाई धर्म या इस्लाम अपना लिया है,ताकि वे फिर से धर्मान्तरण कर लें। वे आंबेडकर के विचारों का उपयोग उनके ही खिलाफ कर रहे हैं। इस दौर में यह समझना बहुत ज़रूरी है कि कौन हमारा दोस्त है और कौन दुश्मन।

बल्कि,उग्र तेवरों,जिनके चलते जातिगत विभाजन और गहरे होते है और लोग और बंटते हैं,से भी दूसरे पक्ष को ही लाभ हो रहा है। तो हमें अब एकदम साफ़.साफ़ सोचना है क्योंकि हमारा सामना भयावह हिंसा से होने वाला है। सभी ईसाईयों,सभी मुसलमानों,सभी दलितों को यह समझना चाहिए कि ओबीसी समुदाय के नाम पर बड़ा खेल खेला जा रहा – वे लोग ओबीसी होने का नाटक कर रहे हैं, जो ओबीसी नहीं हैं,बनिए हैं – और वे वोटों को दूसरी ओर झुका रहे हैं और पहले जैसी स्थिति बनाना चाहते है – जो एक तरह का हिन्दू धार्मिक प्रभुत्व नहीं है बल्कि नस्ल के अर्थ में,राष्ट्रीयता के अर्थ में हिन्दू प्रभुत्व है। तो हमें जल्दी से जल्दी कुछ सोचना होगा और सोचना ही नहीं बल्कि प्रभावी और निर्णायक कदम उठाने होगें। हमें एक अत्यधिक जटिल परिस्थिति में अपने मित्रों और शत्रुओं की पहचान करनी है।मैं जानती हूँ कि इस कमरे में जो लोग हैं,उन्होंने इस बारे में बुद्धिमत्तापूर्वक और गहराई से विचार किया है और उनके साथ मंच साँझा करने में मैं बहुत गर्व का अनुभव कर रहीं हूँ। धन्यवाद।

29 अप्रैल को दिल्ली के कंस्टी ट्युशन क्लब में फॉरवर्ड प्रेस पत्रिका की छटवीं वर्षगाँठ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में अरुंधती राय के उद्घाटन भाषण का लिप्यन्तर

फारवर्ड प्रेस के जून, 2015 अंक में प्रकाशित

(बहुजन साहित्य से संबंधित विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें ‘फॉरवर्ड प्रेस बुक्स’ की किताब ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ (हिंदी संस्करण) अमेजन से घर बैठे मंगवाएं . http://www.amazon.in/dp/8193258428 किताब का अंग्रेजी संस्करण भी शीघ्र ही उपलब्ध होगा)