फॉरवर्ड प्रेस

गणना नहीं, नीतियों का कार्यान्वयन महत्वपूर्ण है

जातिवार जनगणना की मांग लंबे समय से की जाती रही है। वर्ष 2011 की जनगणना के समय बहुजन तबकों की ओर से यह मांग एक बार फिर जोर-शोर से उठी। उस समय तत्कालीन यूपीए सरकार ने संसद को आश्वासन दिया था कि जातिवार गणना करवायी जाएगी। लेकिन बाद में सरकार मुकर गयी तथा 2011 की जगणना में जाति का कॉलम नहीं जोडा गया। आप इसे कैसे देखते हैं?

जनगणना की शुरुआत अंग्रेजों के शासनकाल में 1861 में हुई। इसके साथ जातिवार गणना भी होती थी। देश में कितने और किस प्रकार के लोग हैं, यही जानना इसका मकसद रहा होगा। 1861 से कुछ समय पहले 1857 का ग़दर हुआ था और नतीजतन भारत में (ईस्ट इंडिया) कंपनी की जगह इंग्लैण्ड के सम्राट का राज कायम हुआ था। अफवाहों का जमाना था। एक अफवाह यह भी फैली थी कि इस जाति गणना में जो अनुक्रम होगा, उसी के अनुरूप सरकार उस जाति के लोगों से व्यवहार करेगी। अर्थात जो उंचे क्रम में होगा, उससे बेहतर और जो नीचे क्रम में होगा उससे कमतर व्यवहार होगा। समाज में इससे उथल-पुथल मच गई। बिहार के समाज के अध्ययन के क्रम में मैंने पाया कि इसी से जाति सभाएं बनने लगी। इनके द्वारा सरकारी हाकीमों को प्रतिवेदन दिए जाने लगे कि हमारी जाति दरअसल कितनी श्रेष्ठ है। इस दौरान कुछ अच्छाइयां भी हुईं, कुछ बुराइयां भी। लेकिन स्वतंत्र भारत के द्विज विद्वानों के इस निष्कर्ष में कोई दम नहीं है कि इससे जातिवाद बढ़ा। जाति तो हमारे समाज में पहले से थी, सरकार ने तो उसके आंकड़े भर इकट्ठे करवाए थे। सरकार के पास सभी तरह के अद्यतन आंकड़े होने भी चाहिए।

जनगणना हर दस साल में होती थी। 1931 तक जाति-आधारित जनगणना हुई। 1941 में विश्वयुद्ध के कारण यह नहीं हो सकी। 1951 में भारत में नई सरकार थी, जिसने जाति आधारित जनगणना करवाने से इंकार कर दिया। यह नेहरुवादी दृष्टिकोण था।

2011 में एक बार फिर जाति आधारित जनगणना करवाने का निर्णय लिया गया। बहुजन तबकों द्वारा इसकी लगातार मांग की जा रही थी। 1990 में ओबीसी के लिए मंडल आयोग की आरक्षण संबंधी सिफारिशें लागू करने की घोषणा के साथ यह और भी जरूरी हो गयी थी। अगर किसी तबके को कोई लाभ देना है, तो सरकार के पास अद्यतन आंकड़े तो होने ही चाहिए। दरअसल, यूपीए सरकार के पास स्पष्ट समझ का अभाव रहा। इसी के कारण सारी गड़बडियां हुईं। एक तो देर से निर्णय हुआ और फिर इस विषय पर स्पष्ट नीति अब तक नहीं बन सकी है। एससी, एसटी, ओबीसी और अदर्स (अन्य) – यही चार सरकारी सामाजिक वर्ग हैं। एससी, एसटी की जानकारी सरकार के पास है। ओबीसी की वास्तविक संख्या का भी पता होना चाहिए। इससे यह भी पता चल जाएगा कि दरअसल अदर्स, जो हमारा प्रभु वर्ग है, कितने हैं। मैं नहीं समझता कि इस जानकारी से किसी का कोई नुकसान होगा।

 

क्या आप जातिवार गणना को देश हित में मानते हैं? आपकी नजर में इससे देश का क्या भला होने वाला है?

मैं आपसे पूछता हूँ कि देश का इससे अहित क्या होगा। पहले ही मैंने कहा है कि योजना बनाने में आंकडों की जरूरत पड़ती है। समाज में कितने लोग किस-किस रोग से ग्रसित हैं, इसकी भी गणना होती है। बीपीएल की श्रेणी आर्थिक आधार पर बनाई गई है। इस तबके को कई तरह की सुविधाएं दी जाती हैं। यह सब तो रूटीन कार्य की तरह है। यह कोई क्रांति है क्या? आंकड़े भर ही तो हैं।

 

कुछ लोगों का मानना है कि जिस तरह मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद देश की राजनीति पूरी तरह बदल गयी थी, उसी तरह, जाति जनगणना की रिपोर्ट आने के बाद भी देश की राजनीति में व्यापक बदलाव आएगा। इस संबंध में आपका क्या विचार है?

मूर्ख है वे लोग जो ऐसा विचार रखते हैं। हम सब जानते हैं कि जो लोग पिछड़ी व दलित जातियों के हैं, वे जीवन के सभी क्षेत्रों में पिछड़े हुए हैं। यही बात इस सर्वे से पुष्ट होगी और कुछ नहीं। इससे कौन-सा तूफान आ जाएगा? मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद भी उसके विरोध में ही आंदोलन हुए थे। पक्ष में तो कोई आंदोलन तो हुआ नहीं था। अखबारों में ज्यादातर विरोध और व्यंग्य भरे लेख ही छपते थे। एसपी सिंह जैसे इक्के-दुक्के पत्रकारों को छोड़कर पक्ष में लिखने-बोलने के लिए कोई खड़ा नहीं था। इस बार जाति जनगणना को प्रकाशित करने की मांग जरूर हो रही है, उसे रोकने की मांग कोई नहीं कर रहा है। प्रकाशित करने की मांग पिछड़ों के थके और चुके नेता कर रहे हैं, जिनके पास आज न कोई दृष्टि है, न काम। अगड़ी जातियों के लोग जानते हैं कि इससे कुछ होने-जाने वाला नहीं है। इसलिए वे खामोश हैं। इसे हमें समझना चाहिए। सिर्फ गणना नहीं, नीतियों का बनाया जाना और उनका कार्यान्वयन महत्वपूर्ण है।

पिछड़े वर्ग की ओर से यह मांग आनी चाहिए कि नेशनल सेम्पल सर्वे ऑफिस के सर्वे की रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए। इसके अनुसार क्या काम हुए, यह सार्वजनिक किया जाना चाहिए। उस वक्त, किसी अखबार में सतीश देशपांडे का एक लेख छपा था, जिससे जानकारी मिली थी कि ओबीसी की हालत एससी जैसी है, न कि अदर्स (सामान्य या अन्य) जैसी। पिछड़े वर्गों में एक तबका आर्थिक रूप से कुछ संपन्न है। परन्तु सामाजिक स्तर पर इसे भी अपमानित होना पड़ता है। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को चाहिए कि पिछड़े वर्गों का आंतरिक वर्गीकरण करे। इस वर्गीकरण से यह पता चल सकता है कि वास्तविक ओबीसी की स्थिति एससी के समकक्ष है। वास्तविकता तो यह है कि कई क्षेत्रों में पिछड़े वर्ग के लोग एससी से भी कमजोर हैं। आर्थिक पिछड़ेपन के मामले में भी उनकी स्थिति कहीं-कहीं बदतर है।

 

जाति जनगणना के नाम पर जो सर्वे हुआ है, क्या। आप उसे पर्याप्त मानते हैं? क्या- वे आंकडे विश्वसनीय होंगे तथा उनसे गणना के उदेदश्यों की पूर्ति हो जाएगी?

मैंने अभी रपट को देखा ही नहीं हैं तो इस पर कोई टिप्पणी कैसे कर सकता हूं कि वह पर्याप्त है या अपर्याप्त। लेकिन मेरा अनुमान है कि उसमें कुछ खास नहीं है। और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर मै क्या करूंगा? मेरे पास कोई वैकल्पिक एजेन्सी है क्या? सरकारी दस्तावेजों और आंकड़ों के आधार पर ही मैं अपने तर्क और निष्कर्ष देता हूँ। वह चाहे अंग्रेजी राज के आंकड़ों हो या फिर आज के।

 

बिहार में इन दिनों पिछड़े वर्ग की राजनीति के दो मुख्य एजेंडे दिखते हैं। नीतीश कुमार का एजेंडा है डीएनए की जांच तथा लालू प्रसाद का एजेंडा है जातिवार जनगणना के आंकडों को जारी करने की मांग को लेकर आंदोलन करना। इस संदर्भ में बिहार की राजनीति पर आपकी टिप्पणी चाहूंगा।

नीतीश कुमार और लालू प्रसाद दोनों की कुछ विशेषताएं हैं और कुछ कमियां। दोनो के साथ काम करने का मेरा अनुभव है। नीतीश कुमार से लंबे समय तक मित्रतापूर्ण संबंध रहे और अपनी ओर से आज भी मैं उनसे लगाव रखता हूं। लालू प्रसाद भी मित्र रहे। इन्होंने लंबे समय तक एक दूसरे के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष किया और आज फिर एक साथ हैं। यह अच्छी बात है। बहुत पहले मैने अपने एक लेख में यह कहा था कि अंतत: दोनों एक होंगे। मुझे किसी ने कुछ बताया नहीं था। यह मेरा आकलन था, जो सही साबित हुआ।

लेकिन इस मेल में अनेक विसंगतियां हैं। जैसे, नीतीश कुमार की पार्टी जदयू में सामाजिक न्याय के अवयव लगातार घटते जा रहे हैं। मैं कह सकता हूं कि आज सवर्ण सामंती ताकतों का यह सबसे सुरक्षित अभयारण्य है – भाजपा से भी ज्यादा। मैं समता पार्टी का संस्थापक सदस्य रहा हूं, जिसका वर्तमान रूप जदयू है। 2005 में सरकार बनाने के लिए हमने जीतोड़ परिश्रम किया था। हमारा मानना था कि लालू प्रसाद थक चुके हैं और नीतीश कुमार के नेतृत्व में परिवर्तन की लड़ाई सार्थक ढंग से चलेगी। 2005 में सरकार बनी तब नीतीश जी ने इस बात के संकेत भी दिए। भूमिसुधार आयोग, कॉमन स्कूल आयोग, अति पिछड़ा वर्ग आयोग और महादलित मिशन बनाने के लिए हमारा जोर था, जिसे नीतीश जी ने पूरा किया। लेकिन यह सब देर तक चला नहीं। जल्दी ही वर्चस्वशाली लोगों ने उन्हें अपने काबू में ले लिया। उनकी तरह की चापलूसी पिछड़े वर्ग के नेताओं से होती नहीं। नीतीश जी ने एक बातचीत के क्रम में एक बार मुझसे कहा था, ‘मैं वह काम करने जा रहा हूं मणि जी, जिसे कम्युनिस्ट भी नहीं कर सके। संभव है इसके बाद मुझे गोली खानी पड़े। लेकिन मैं करूंगा। मैं भूमि सुधार को कार्यरूप देने जा रहा हूं।’ मैंने स्तब्ध होकर उनकी बातें सुनीं। भावना के अतिरेक में मुझे वे दिव्य दिखने लगे। लेकिन जो हुआ वह आप सब जानते हैं। भूमि सुधार और कॉमन स्कूल सिस्टम के एजेंन्डे को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, दफन कर दिया गया। एक नया आयोग बना सवर्ण आयोग – उंची जातियों के लिए आयोग। मेरे जैसे लोग चुप कैसे रह सकते थे? मैंने विरोध किया तो मुझे पार्टी से निकाल दिया गया और मेरी विधायकी रद्द कर दी गई। जिस किसी ने सामाजिक न्याय के पक्ष में आवाज उठायी, उसका गला घोंट दिया गया। जैसे, अभी हाल ही में जीतनराम मांझी को अपमानित कर दक्षिणपंथी खेमे में जाने पर मजबूर कर दिया गया। दलित और पिछड़ों की पारंपरिक एकता को, जिसे कर्पूरी ठाकुर और कांशीराम जैसे लोगों ने पाला-पोसा था, नीतीश कुमार ने ध्वस्त कर दिया। अब डीएनए पर आंदोलन चलाकर वे भाजपा-विरोधी आंदोलन को आत्मकेंद्रित बनाना चाहते हैं। वे भाजपा से कम, लालू प्रसाद से ज्यादा लड़ रहे हैं। उनका मकसद लालू को अलग-थलग कर ठिकाने लगाने का है। वह अपने जानते दूर की कौड़ी खेल रहे हैं।

लालू प्रसाद का चरित्र दूसरा है। वे भूमिहीन परिवार से हैं। मां दही बेचती थीं, भाई चपरासी थे। मुख्यमंत्री बनने तक वे चपरासी क्वार्टर में ही रहे। उन्होंने गरीबी देखी है। वे जानते हैं कि अमीर-जमींदार और तथाकथित बड़े लोग किन बातों से चिढ़ते हैं। पॉश कालोनियों में उन्होंने दलित आवास गृह बनवा दिए। जिस काम से बड़े लोग चिढ़ें, उसे वह करते रहे। लेकिन उनकी कमजोरी यह रही कि बुनियादी परिवर्तन पर उन्होंने अपेक्षित जोर नहीं दिया। लेकिन कुछ कारण तो हैं कि आज भी द्विज सामंती ताकतें लालू प्रसाद को ही अपना जानी दुश्मन मानती हैं। नीतीश कुमार से उनका विरोध इतना ही है कि उन्होंने भाजपा को क्यों छोड़ दिया। केवल इस बल पर नीतीश भाजपा-विरोधी राजनीति के स्वाभाविक नेता बन सकते हैं क्या? दलितों और अतिपिछड़ों के बीच तो वह लगभग खलनायक बन चुके हैं।

 

आपकी नजर में अन्य पिछड़ा वर्ग के वास्तविक हितों की पूर्ति के लिए क्या किये जाने की आवश्यकता है?

आपका यह प्रश्न यक्षप्रश्न की तरह है। इसका जवाब ढूंढना मुश्किल होगा। इतना तो कहना ही होगा कि शिक्षा में बुनियादी परिवर्तन लाना होगा। इसे प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए। जेपी आंदोलन का मुख्य नारा था शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन। इसीलिए हमने सीएसएस (कॉमन स्कूल सिस्टम) की वकालत की थी और आज भी करते हैं। सीएसएस (छात्र संघर्ष समिति, 1974 का संगठन) से निकले दोनों नेता कॉमन स्कूल सिस्टम (सीएसएस) पर कुंडली मार कर बैठ गए। पच्चीस साल बहुत होते हैं। चौथाई सदी। इतने लंबे काल में यह नहीं हुआ। इससे बहुत नुकसान हुआ समाज का। अमीर-गरीब, जमींदार-मजदूर सब एक तरह के स्कूल में पढें। सभी प्राइवेट और मजहबी स्कूलों को बंद कर बस एक तरह का स्कूल। यह शिक्षा का समाजवाद होता। इसी से ज्ञान की आंधी उठती, जिसकी कबीर ने कल्पना की थी।

दूसरा एजेंडा नया नेतृत्व विकसित करने का होना चाहिए। पिछड़ों का वर्तमान नेतृत्व वैचारिक स्तर पर दरिद्र और अनैतिक है। सुनी सुनाई बातों से काम चलाने वाले लोग हैं। सबके सब इच्छाओं के पुतले हैं। संकल्पों का पुतला कोई नहीं है। आज कोशिश होनी चाहिए कि ओबीसी की व्याख्या अदर बैकवर्ड कास्ट के रूप में नहीं अदर बैकवर्ड क्लास के रूप में हो। जातियां जमात में तब्दील हो जाएं। इसके लिए फुले-आंबेडकरवाद के रास्ते पर चलना होगा।

दलितों और पिछड़ों के एका पर भी ध्यान देना होगा। सन 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद, यूपी में कांशीराम ने मुलायम सिंह को साथ लेकर तब की मजबूत भाजपा को राजनीतिक पटकनी दी थी। नारा था – ‘मिले मुलायम, कांशीराम – हवा हो गए यह श्रीराम।’ लेकिन मुलायम सिंह ने राजनीतिक भूल की। कांशीराम को साथ नहीं रख पाए। बिहार में ऐसा ही नीतीश कुमार ने किया। उन्होंने जीतनराम को अलग कर बड़ी राजनीतिक भूल की है। उस समय पत्र लिख कर मैंने नीतीश जी को सचेत किया था। वे नहीं माने। आज वे दलितों को विश्वास में लिए बगैर भाजपा से लडऩा चाहते हैं। इसमें वे सफल होंगे, मुझे संदेह है। दलितों के सहयोग बिना पिछड़ों की हर लड़ाई अधूरी रहेगी। यही बात दलितों के बारे में भी सही है। इसीलिए मै चाहूंगा कि नया विकल्प खड़ा करने के लिए एक बड़ा राजनीतिक सम्मेलन हो, नीतियाँ बनें, कार्यक्रम तय हों और संघर्ष की रूप रेखा बने। केवल नेताओं के जुडऩे से विकल्प नहीं बनेगा, जनता से संवाद बनाना होगा।

(प्रेमकुमार मणि हिंदी के प्रतिनिधि लेखक, चिंतक व सामाजिक न्याय के पक्षधर राजनीतिकर्मी हैं।)

फारवर्ड प्रेस के सितंबर, 2015 अंक में प्रकाशित