फॉरवर्ड प्रेस

अंग्रेजों को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति की जड़

प्रिय दादू,

मैं काफी दुविधा में हूं।

श्री शशि थरूर ने हाल में आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भाषण देते हुए कहा कि अंग्रेजों ने हमें लूटा है और इसलिए उन्हें हमें कम से कम प्रतीकात्मक मुआवजा देना चाहिए। कई लोगों ने मुझे इस बारे में वेबलिंक और ईमेल भेजे हैं। स्पष्टत: वे लोग यह मानते हैं कि श्री थरूर ठीक कह रहे हैं।

दूसरी ओर कई लोग कहते हैं कि अंग्रेजों ने भले ही हमें लूटा हो – जैसा कि हर औपनिवेशिक शक्ति करती है (और ठीक यही हम भारत में अपने लोगों के साथ भी कर रहे हैं) – परंतु अंग्रेज़ कम से कम अपने पीछे आधुनिक शिक्षा, अंग्रेज़ी भाषा, कानून का राज, स्वच्छ प्रशासनिक प्रणाली, सड़कों और रेल लाईनों का जाल, आधुनिक उद्योग और हमारा संविधान छोड़ गए, जिसके कारण हम अब तक प्रजातंत्र के रूप में जीवित हैं।

दादू जी आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

सप्रेम,

प्रांज

 

प्रिय प्रांज,

अन्य अधिकांश मुद्दों की तरह, इस मसले में भी दोनों दृष्टिकोणों में आंशिक सत्यता है। परंतु अगर हमें इस मसले को ठीक से समझना है तो हमें थोड़ी गहराई में जाना होगा।

सबसे पहले तो मेरे लिए यह समझना मुश्किल है कि अगर ब्रिटेन, भारत सरकार को एक ब्रिटिश पाउंड प्रतिवर्ष का प्रतीकात्मक मुआवज़ा देना शुरू भी कर दे – जैसी कि श्री थरूर ने मांग की है – तो उससे हमें क्या लाभ होगा? क्या हम कुछ बेहतर महसूस करने लगेंगे? हो सकता है कि अगर ऐसा हो जाए तो कुछ व्यक्तियों को यह लगने लगे कि वे अंग्रेजों से श्रेष्ठ हैं।

परंतु सवाल यह है कि अगर आज की विनिमय दर के अनुसार, हमें प्रतिवर्ष रूपये 99 प्राप्त भी होने लगें, तो इससे हमारे देश का क्या भला होगा?

सच यह है कि पिछले कुछ वर्षों से ब्रिटिश सरकार हमारे देश को 20 करोड़ पाउंड (रूपए 1980 करोड़) प्रतिवर्ष की मदद देता आ रहा है।

दूसरे, हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि ब्रिटेन, जिसकी सन् 1600 में आबादी केवल 60 लाख थी, ने पूरे दक्षिण एशिया, जिसमें उस समय 13.5 करोड़ लोग रहते थे, पर कब्जा कैसे जमा लिया। क्या जिस लड़ाई में छह लोग एक तरफ हों और 135 दूसरी तरफ, वह लड़ाई छह लोगों द्वारा जीती जा सकती है? निश्चित तौर पर ऐसा अत्यंत अपवादात्मक परिस्थितियों में ही संभव हो सकता है। विशेषकर तब, जबकि 135 के पास बेहतर हथियार हों और वे अपनी ही भूमि पर अपने देश को बचाने के लिए केवल छह आक्रांताओं से युद्ध कर रहे हों और ये आक्रांता, हज़ारों मील दूर समुद्र पार से आए हों।

तथ्य यह है कि भारतीय और ब्रिटिश सेनाओं में सीधी लड़ाईयां कम ही हुईं और जब भी ऐसी लड़ाई हुई, उसमें अंग्रेज जीत नहीं सके। हर लड़ाई में अंग्रेजों की जीत इसलिए हुई क्योंकि हमारे लोगों ने हमारे साथ विश्वासघात किया।

इतिहास के उस दौर में शायद अंग्रेज बहुत नैतिक नहीं थे परंतु हम तो शायद उनसे भी कम नैतिक थे-आखिर उन्होंने कभी अपने पक्ष के साथ तो विश्वासघात नहीं किया!

तो, जैसा कि गांधीजी ने कहा था, अंतत: अंग्रेज़ हमारे शासक इसलिए नहीं बने क्योंकि वे शक्तिशली थे बल्कि वे हम पर शासन इसलिए कर सके क्योंकि हम कमज़ोर थे।

इस कमज़ोरी का सतही कारण यह प्रतीत होता है कि हम आपस में बंटे हुए थे (जैसे की हम अब भी हैं) परंतु इस आंतरिक विभाजन का कारण, जो कि हमारी कमज़ोरी की जड़ में था, वह सांस्कृतिक और नैतिक था। आज भी, एक राष्ट्र के बतौर हम अपनी कमजोरियों और आपसी विभाजन के असली कारणों से मुकाबला करने के लिए तैयार नहीं हैं।

हम ब्रिटिश उपनिवेशवाद को अपनी समस्याओं के लिए दोषी ठहराना चाहते हैं जबकि तथ्य यह है कि हमें आज़ाद हुए लगभग 70 साल होने वाले हैं और यह अवधि, अंग्रेजों की नीतियों से हुए किसी भी नुकसान की भरपाई करने के लिए काफी थी। और क्या यह भी सच नहीं है कि स्वाधीनता के बाद हमारे ही कुछ शासकों ने हमें अंग्रेजों से ज़्यादा नहीं तो कम से कम उनके बराबर तो लूटा ही।

सांस्कृतिक रोग

आज ऐसे लोग भी हैं, जो किन्हीं कारणों से हमारी समस्याओं के लिए ब्रिटिश उपनिवेशवाद को नहीं बल्कि पूंजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दोषी ठहराते हैं। और अगर हम समाज के उच्च वर्ग से संबंधित हैं (अर्थात या तो हमारे पास पूंजी है या हम प्रबंधन संवर्ग में हैं) तो हम श्रमिकों की यूनियनों और श्रम कानूनों को समस्याओं के लिए जिम्मेदार बताते हैं।

दूसरे शब्दों में, राष्ट्र के स्तर पर, समूह के स्तर पर और व्यक्तिगत तौर पर, हमारी कोशिश यही रहती है कि हम अपनी समस्याओं के लिए दूसरों को दोषी ठहराने का कोई न कोई तरीका ढूंढ लें। हम अपने गिरेबां में झांकना ही नहीं चाहते। हम इस पर विचार भी नहीं करना चाहते कि क्या हम में कोई कमी है, क्या हम कुछ गलत कर रहे हैं। और ना ही हम इस पर विचार करना चाहते हैं कि अपने आप को बेहतर और शक्तिशाली बनाने के लिए हम क्या कर सकते हैं।

यह एक सांस्कृतिक रोग है, जिसने हमारे राष्ट्र को जकड़ा हुआ है। चूंकि यह बीमारी राष्ट्रव्यापी, गहरी और बहुत पुरानी है इसलिए उससे मुक्ति पाने के लिए मुझे और तुम्हें बहुत कठिन संघर्ष करना होगा।

हम यह कैसे कर सकते हैं? तुमने वह कहावत तो सुनी ही होगी कि ”जब तुम किसी की ओर एक उंगली उठाते हो तो तीन उंगलियां तुम्हारी ओर होती हैं।” यह ईसा मसीह के 2000 साल पुराने उद्धरण का आधुनिक रूपांतरण है। ईसा मसीह ने कहा था, ”तुम्हे अपने भाई की आंख का कंकड़ तो दिखता है, परंतु अपनी आंख के लठ्ठे को तुम नजऱअंदाज करते हो।” जब हम किसी और के दोषों या कमियों पर फोकस करते हैं तो दरअसल हम उन चीज़ों पर से ध्यान हटा रहे होते हैं, जो हमें अपने बारे में अच्छी नहीं लगतीं। दूसरों को दोषी ठहराकर, उन्हें नीचा दिखाकर, हम बेहतर महसूस करते हैं। जब हमें स्वयं में कमियां नजऱ आती हैं तो हम अपनी इन कमियों के दर्द से मुक्ति पाने के लिए उन कमियों को किसी और में देखने लगते हैं। दूसरों की बुराई (चाहे वह सही हो या गलत) कर हम यह उम्मीद करते हैं कि लोग हमारी बुराईयों, पर ध्यान नहीं देंगे। परंतु बेहतर यह है कि हम एक उंगली की बजाए तीन उंगलियों की दिशा में देखें और हमारी अपनी कमियों पर निरपेक्ष नजऱ डालें।

तो, जब अगली बार तुम्हारा कोई मित्र तुमसे ब्रिटिश उपनिवेशवाद के लाभों और हानियों या पूंजीवाद या समाजवाद की बुराईयों पर बहस करना शुरू करे तो तुम हमेशा उससे यह कह सकते हो कि क्यों न हम इस प्रश्न पर विचार करें कि अपने दश को मज़बूत बनाने के लिए हम क्या पहल कर सकते हैं। जिन संस्थानों व समूहों से हम जुड़े हुए हैं, उन्हें हम कैसे बेहतर बना सकते हैं? कुल मिलाकर, हम इस देश के बेहतर नागरिक और बेहतर मनुष्य कैसे बन सकते हैं।

सप्रेम

दादू

फारवर्ड प्रेस के सितंबर, 2015 अंक में प्रकाशित