h n

सांस्कृतिक वर्चस्व का नया खेल

महाभारत का नाम लेते ही हमारे दिमाग में वही आठ-दस प्रमुख चरित्र आते हैं, जिनके नाम ऊपर दिए गए हैं। परंतु सच यह है कि यह महाकाव्य, उन अनेक पात्रों के बगैर अधूरा है, जिन्हें भुलाया जा चुका है

mahabharatफेसबुक पर इन दिनों एक एप की धूम मची हुई है। इस एप का नाम है ”विच महाभारत कैरेक्टर ऑर यू?’’ एक बटन दबाने भर से यह एप बतला देता है कि आप महाभारत के चरित्रों में से कौन से हैं। सोशल मीडिया की इस क्विज़ को सभी जातियों, नस्लों और विभिन्न भाषाएं बोलने वालों द्वारा पसंद किया जा रहा है। सतही तौर पर यह एक अहानिकारक समय काटने का साधन दिखलाई देता है परंतु आप यदि उसके बाहरी आवरण को चीरें तो आपको उसके पीछे मनोवैज्ञानिक ‘सूक्ष्म राजनीति’ दिखाई देगी।

इस क्विज़ के उत्तर अधिक विश्वसनीय होते, अगर यह एप संबंधित व्यक्ति के व्यक्तित्व का संज्ञान भी लेता। उस व्यक्ति ने किसे लाईक किया, क्या कमेंट किए और क्या चीजें शेयर कीं, उनके आधार पर उसके व्यक्तित्व का आंकलन कर, उसे महाभारत के चरित्रों में से कोई एक घोषित किया जा सकता था। परंतु इससे भी बड़ा मुद्दा यह है कि महाभारत के कौन-से चरित्र इस एप का भाग हैं? जब भी आप बटन दबाते हैं, इस महाकाव्य के जानेमाने चरित्रों कृष्ण, दुर्योधन, कर्ण, युधिष्ठिर, अर्जुन, शकुनी, भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य, एकलव्य, कुंती इत्यादि में से कोई एक सामने आ जाता है।

इस एप को बनाने का उद्देश्य शायद इस मिथक को पुनस्र्थापित करना है कि केवल ये ही चरित्र महाभारत से जुड़े हैं। यह वैकल्पिक परिप्रेक्ष्य का निषेध करने का प्रयास है। यह आपका ध्यान महाभारत के उन चरित्रों की ओर नहीं जाने देता, जो कम प्रसिद्ध हैं। इस तरह, यह इस महाकाव्य के केवल चंद लोकप्रिय चरित्रों को ही मुख्यधारा की सामाजिक चेतना का भाग बनाए रखने की कोशिश है।

महाभारत का नाम लेते ही हमारे दिमाग में वही आठ-दस प्रमुख चरित्र आते हैं, जिनके नाम ऊपर दिए गए हैं। परंतु सच यह है कि यह महाकाव्य, उन अनेक पात्रों के बगैर अधूरा है, जिन्हें भुलाया जा चुका है। महाभारत के लोक संस्करणों के चरित्र अरावण और बर्बरीक के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। वही हाल आदिवासी चरित्रों हिडिम्बी, उलूपी, घटोतगज, बबरूवहन, चित्रसेना व विपरीतलिंगी अंबा, अंबिका और अंबालिका का है। समाज के हाशिए पर पड़े समुदायों से आने वाले चरित्रों जैसे शल्य व अधिरथ की चर्चा भी कम ही होती है। हम विदुर के बारे में बात नहीं करते, जो इस दुविधा में था कि वह धर्म और सत्ता में से किसे चुने। ना ही हम कृपाचार्य और बलराम के बारे में बात करते हैं और ना छोटे राज्यों के नायकों जैसे सत्यकी कृतवर्मा, जयद्रथ और भूरीश्रवास के बारे में।

यह फेसबुक एप, मुख्यधारा की सामूहिक चेतना में पहले से ही पैठी इस धारणा को मज़बूती देता है कि महाभारत का अर्थ केवल कुछ चुनिंदा चरित्र हैं। सच तो यह है कि फेसबुक के इस गेम के पीछे एक छुपा हुआ राजनैतिक एजेंडा है, जो भारत के बहुवाद और उसकी विविध कलाओं और संस्कृतियों का विरोधी है और जो रेखीय राष्ट्रवादी मानसिकता विकसित करना चाहता है।

इस एकतरफा परिप्रेक्ष्य से जो मनोवैज्ञानिक राजनीति उभरती है वह देश के लिए घातक है। भारत में अनेक भाषाएं और संस्कृतियां हैं, जिनके अपने-अपने साहित्य, कलाएं और लोक गाथाएं हैं। जो भी व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए बड़ा होता है, वह ऐसी दर्जनों लोककथाओं को जानता है, जो उसके पूर्वजों की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक गईं। जब भी वह किसी मुसीबत में घिर जाता है तब वह लोकगाथाओं के इस खज़ाने में से कोई ऐसी कथा ढूंढ निकालता है, जिससे उसे सांत्वना मिलती है या उसका ध्यान बंट जाता है। उदाहरणार्थ, तमिलनाडु में जब भी किसी महिला का पति किसी और की खातिर उसे छोड़कर चला जाता है तब ऐसी महिलाओं को सांस्कृतिक नायिका कन्नकी की त्रासद कथा से प्रेरणा ग्रहण करने को कहा जाता है।

फेसबुक एप ”विच महाभारत कैरेक्टर ऑर यू’’ दरअसल आमजनों को उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से वंचित करने के लिए टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल का उदाहरण है। और यह एक खतरनाक शुरूआत है। ऐसा संदेह होना अवश्यंभावी है कि ”केवल आनंद के लिए’’ के मुखौटे के पीछे, ”सूक्ष्म राजनीति’’ है – इस मामले में क्षेत्रीय संस्कृति व कला के क्षेत्र के नायकों, विचारों व लोककला और साहित्य के स्थान पर हिंदुत्व नायकों को बिठाने का प्रयास।

तमिल भाषा का इतिहास 2000 वर्ष से ज्यादा पुराना है। परंतु अगर समकालीन साहित्य में से दिलचस्प और रंग-बिरंगी लोककथाओं को हटा दिया जाए, तो वह बहुत शुष्क और नीरस जान पड़ता है। ”सिलापथीकरम’’ को छोड़कर अन्य सभी लोककथाएं जैसे ”नलाथंगल’’ व ”मारीयथई रामन’’, समाज की सामूहिक चेतना से गायब हो गईं हैं। आधुनिक साहित्यकारों ने ऐसा वातावरण बना दिया है कि जिसमें महान संगम साहित्य के बारे में बात करना अजीब-सा लगता है। आज के साहित्यकार केवल पश्चिमी विचारधाराओं और पश्चिमी साहित्य में श्रेष्ठता ढूंढते हैं।

यह सब एक खेल का नतीजा है-केवल फेसबुक एप का खेल नहीं वरन् सूक्ष्म राजनीति का बड़ा खेल। इस खेल के तकनीकी पंजे, जो अमानवीय और अनिष्टकारी हैं, प्रत्येक भाषायी समूह की प्राचीन कलाओं और संस्कृतियों पर अपना चंगुल कसते जा रहे हैं।

फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर, 2015 अंक में प्रकाशित

 

लेखक के बारे में

गौथमा सिद्धार्थन

जानेमाने तमिल स्तंभकार गौथमा सिद्धार्थन लघुकथा लेखक व निबंधकार के रूप में भी जाने जाते हैं। वे सूक्ष्म राजनीतिक आलोचक हैं

संबंधित आलेख

मोदी के दस साल के राज में ऐसे कमजोर किया गया संविधान
भाजपा ने इस बार 400 पार का नारा दिया है, जिसे संविधान बदलने के लिए ज़रूरी संख्या बल से जोड़कर देखा जा रहा है।...
केंद्रीय शिक्षा मंत्री को एक दलित कुलपति स्वीकार नहीं
प्रोफेसर लेल्ला कारुण्यकरा के पदभार ग्रहण करने के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा में आस्था रखने वाले लोगों के पेट में...
आदिवासियों की अर्थव्यवस्था की भी खोज-खबर ले सरकार
एक तरफ तो सरकार उच्च आर्थिक वृद्धि दर का जश्न मना रही है तो दूसरी तरफ यह सवाल है कि क्या वह क्षेत्रीय आर्थिक...
विश्व के निरंकुश देशों में शुमार हो रहा भारत
गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय, स्वीडन में वी-डेम संस्थान ने ‘लोकतंत्र रिपोर्ट-2024’ में बताया है कि भारत में निरंकुशता की प्रक्रिया 2008 से स्पष्ट रूप से शुरू...
मंडल-पूर्व दौर में जी रहे कांग्रेस के आनंद शर्मा
आनंद शर्मा चाहते हैं कि राहुल गांधी भाजपा की जातिगत पहचान पर आधारित राजनीति को पराजित करें, मगर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की...