फॉरवर्ड प्रेस

आंबेडकर भवन तोड़ा, अब उनकी वैचारिकी को विकृत करने की तैयारी

विदित हो कि मोदी जी ने सत्ता में आते ही बाबा साहेब डा.आंबेडकर की 125वीं वर्ष गांठ मनाने का फरमान जारी कर दिया था। किंतु मोदी सरकार की करनी और कथनी में जमीन और आसमान का अंतर है। बाबा साहेब के नाम पर कोई जमीनी काम नहीं किया जा रहा है। नरेंद्र मोदी केवल और केवल बयानी जमा-खर्च कर रहे हैं। जमीन पर कुछ भी होता नहीं दिख रहा है। खेद तो इस बात का है कि मोदी सरकार के रहते महाराष्ट्र  की सरकार ने 25.06.2016 को मुम्बई के दादर इलाके में स्थित डा.आंबेडकर  के भवन और नकी प्रिटिंग प्रेस को जमींदोज कर दिया है। इस शर्मनाक और आंबेडकर  विरोधी घटना के बाद देशभर में नानाप्रकार से विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं, महाराष्ट्र की सरकार ने कायरों की तरह इस घटना को रात में अंजाम दिया। क्या इस घटना के पीछे ब्राह्मणवादियों का डर नहीं छुपा हुआ है? क्योकि इस स्थान से बाबा साहेब के अनेक आन्दोलनों की यादें जुड़ी हुई हैं। यहाँ यह सवाल भी उठता है कि क्या किसी गैर दलित नेता से जुड़े भवनों को कभी इस प्रकार तोड़ा गया है। ज्ञात हो कि डा.आंबेडकर  के भवन में बाबा साहेब के कितने ही दस्तावेज और सामाजिक विषयों को समेटे अनेक पाण्डुलिपियां जमा थीं, जो मलवे में दबकर रह गईं। बाबा साहेब के नाम पर वोट के लिए भाजपा सरकारें उनकी 125वीं वर्षगाँठ पर अनेक प्रकार लुभावनी घोषणाएं करने के अलावा और रचनात्मक कार्य क्या कर रही है? सरकारी नौकरियों में अनुसूचित/जन जाति और पिछड़े वर्ग को प्रदत्त आरक्षण को धीरे-धीरे समाप्त किया जा रहा है।

यह भी सुनने में आया है कि महाराष्ट्र सरकार/केन्द्र सरकार ने डा.आंबेडकर के साहित्य को व्यापक परिप्रेक्ष्य में प्रकाशित करने का मन बना चुकी है, जो घातक सिद्ध हो सकता है, क्योंकि प्रकाश्य साहित्य को व्यापक रूप से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने की पूरी-पूरी शंका है। संघ परिवार पहले भी ऐसे कार्य कर चुका है। संघ के झन्डेवालान द्वारा प्रकाशित डा. कृष्ण गोपाल द्वारा लिखित पुस्तक “राष्ट्र पुरूष: बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर ”में अनेक ऐसे झूठे प्रसंग है। इन प्रसंगों के जरिए डा.आंबेडकर को सनातनी नेता, गीता का संरक्षक, यज्ञोपवीत कर्त्ता, महारों को जनेऊ धारण कराने वाले के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो उनके प्रारंम्भिक जीवन काल के उद्धरण हैं। दुख तो यह है कि संदर्भित पुस्तक के रचियता ने 1929 और 1949 के बीच के वर्षों पर कोई चर्चा नहीं की है, जबकि डा.आंबेडकर का मुख्य कार्यकारी दौर वही था। पुस्तक के लेखक ने सबसे ज्यादा जोर डा.आंबेडकर को मुस्लिम विरोधी सिद्ध करने पर लगाया है, जो दुरग्रह पूर्ण कार्य है। गौरतलब है कि बाबा साहेब ने 1935 में ही यह घोषणा कर दी थी कि मैं हिन्दू धर्म की जाति में अवश्य पैदा हुआ हूँ, किन्तु हिन्दू जाति में रहकर नहीं मरूँगा। ऐसे में संदर्भित पुस्तक के रचियता के अनुसार उन्हें सनातनी हिन्दू व रामायणी करार देने का काम ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ नामक संस्था का एक घृणित कार्य है। इतना ही नहीं, पुस्तक के पृष्ठ – 54 पर छपी यह टिप्पणी कि सरकार संसद भवन के केन्द्रीय कक्ष में डा. आंबेडकर के चित्र को लगाने की माँग को टालती रही और आखिरकार लालकृष्ण आडवाणी की माँग पर प्रधानमंत्री श्री चन्द्रशेखर ने उनका चित्र संसद भवन में लगाने को तैयार हुए, भी पूरी तरह झूठ है। जबकि सच यह है कि केंन्द्र में वी. पी. सिंह की सरकार ने ‘आंबेडकर विचार मंच’ एवं अन्य सहयोगी संस्थाओं के अभियान से प्रभावित होकर डा. आंबेडकर का आदमकद तैल चित्र संसद भवन के केन्द्रीय कक्ष में 12 अप्रैल, 1990 को लागाया गया था। तैलचित्र भी ‘आंबेडकर विचार मंच’ एवं अन्य सहयोगी संस्थाओं द्वार भेंट किया था। चन्द्रशेखर तो वी. पी. सिंह सरकार के पतन के बाद प्रधान मंत्री बने थे और तब लालकृष्ण आडवाणी विपक्ष में थे। (पढ़ें : आम्‍बेडकर के बहाने मोदी का प्रचार कर रही सरकार)

इतना ही नहीं, डा.कृष्ण गोपाल के मन का मैल पृष्ठ 5 पर उल्लिखित इन शब्दों में स्पष्ट झलकता है– “एक अस्पृश्य परिवार में जन्मा बालक सम्पूर्ण भारतीय समाज का विधि-विधाता बन गया। धरती की धूल उड़कर आकाश और मस्तक तक जा पहुँची। इस पंक्ति का लिखना-भर बाबा साहेब का अपमान करना है। इन पंक्तियों में पूरा का पूरा मनुवाद भरा पड़ा है।

और न जाने क्या-क्या! किंतु दलित समाज है कि राजनीतिक दलों की इस चतुराई को समझ नहीं पाती और उलटे उनकी चालों में उलझते जाती है। इधर दलित-नेता भी कुर्सी के समझौते के तहत दलित विरोधी राजनीतिक दलों के साथ खड़े हैं।