फॉरवर्ड प्रेस

डंके की चोट पर की बहुजन पत्रकारिता

फारवर्ड प्रेस से मेरा जुड़ाव शुरूआती समय से रहा। उसके अंदर-बाहर की गतिविधियों से अवगत भी रहा। प्रमोद रंजन के आग्रह पर कई बार मैंने इसके लिए लिखा भी। और भी जो कर सकता था किया। इतने कम समय में कोई पत्रिका इस तरह से सामाजिक आंदोलन का रूप ले लेगी या नए आंदोलन का सूत्रधार बनेगी यह मेरे लिए ही नहीं हर किसी के लिए आश्चर्यजनक है। .

मैं चाहता रहा कि यह पत्रिका मासिक होने के बजाय पाक्षिक या साप्ताहिक हो। लेकिन प्रबंधन का अपना फैसला था इसलिए यह नहीं हो पाया। मैं अब भी मानता हूं कि इस पत्रिका को पत्रिका के रूप में निकालना चाहिए। लेकिन प्रबंधन का फैसला इसे नेट संस्करण बनाने का है। मुझको इससे दुख हुआ और इसे मैंने प्रकट भी किया।

यह वह पत्रिका थी जिसने सबकुछ डंके की चोट पर किया अपने क्लीयर कांसेप्ट के साथ। पत्रिका की साफगोई ही पाठकों को प्रभावित करती रही। बाकी पत्रिकाओं की तरह डेंगा-पानी का खेल पत्रिका ने नहीं खेला। जिस बात को पत्रिका ने छेड़ा उस पर अंत तक अडिग रही। छोटी टीम के साथ यह बड़ी कोशिश थी। राष्ट्रीय स्तर पर। मुझे याद नहीं इस पत्रिका ने कोई स्टिंग किया या किसी घोटाले का पर्दाफाश किया,  जिसे आमतौर पर पत्रकार या बड़े मीडिया घरानों के संपादक-मालिक सबसे बड़ी पत्रकारिता मानते हैं। बावजूद इसके जैसा साहस बड़े घराने आज तक नहीं दिखा पाए वह साहस फारवर्ड प्रेस ने दिखाया। बल्कि पत्रकारिता में जिस अंधेरगर्दी को कई बड़े मीडिया घराने और कई दिग्गज पत्रकार बढ़ाने में लगे हैं उनको तमाचा मारते हुए इस पत्रिका ने बताया कि सच को सच की तरह रखना ही पत्रकारिता है। रूटीन खबरों से अलग और रूटीन खबरों में से उस पक्ष को हमेशा फारवर्ड ने आगे किया जिसे जानबूझ कर बड़े अखबारों ने हाशिए पर डाला।

फारवर्ड प्रेस की यह यात्रा निरंतर चलती रहनी चाहिए। प्रिंट न सही नेट पर ही सही। मुझे लगता है पत्रिका की धार और ताकतवार होगी और उन शक्तियों को बहाकर और किनारे लगाएगी जो बहुजन को ढ़केलकर किनारे करने में लगे हैं।