फॉरवर्ड प्रेस

बहुजन लड़की ने ओलंपिक में रचा इतिहास

रियो ओलंपिक में दीपा करमाकर

ब्राजील में रियो के मशहूर मरकाना स्टेडियम में ‘सांबा’ नृत्य के साथ खेलों के महाकुम्भ ओलंपिक की शुरुआत हो चुकी है। इसमें हिस्सा ले रहे 209 देशों के 11,000 से अधिक खिलाड़ियों ने अपना जौहर दिखाना शुरू कर दिया है। अमेरिका की युवा निशानेबाज वर्जिनिया थ्रेसर ने रियो ओलम्पिक का पहला गोल्ड जीत कर गोल्ड मैडल जीतने की होड़ की शुरुआत कर दी है। ओलंपिक के शुरुआती दो दिनों के मध्य ही अमेरिका के तैराक माइकल फेल्प्स ने तैराकी की चार गुणा 100 मीटर की फ्रीस्टाइल रिले में नया रिकार्ड कायम करते हुए अपने गोल्ड मेडलों की संख्या 19 पर पहुंचाने के साथ कुल 23 पदक जीत कर खुद को ऐसी बुलंदी पर पहुंचा दिया है, जिस पर पहुचने का सपना देखने का दुस्साहस भविष्य में शायद ही कोई और खिलाड़ी करे। इस बीच नोवाक जोकोविक और महिला टेनिस स्टार वीनस अपने एकल मुकाबले से बाहर हो चुके हैं। जहां तक भारत का सवाल है लगता है ओलंपिक में फिस्सडी साबित होने की परम्परा में बदलाव नहीं होने जा रहा है। टेनिस सनसनी सानिया मिर्जा और रिकार्ड सातवीं बार ओलंपिक में भाग ले रहे चिरयुवा लिएंडर पेस पहले ही राउंड में अपने-अपने डबल्स मुकाबले हार चुके है। पिस्टल किंग जीतू राइ, जिनसे काफी उम्मीदें थी, भी दस मीटर की एयर पिस्टल मुकाबले से बाहर हो चुके हैं। 2004 में दक्षिण कोरिया को 5-2 से हराने के 12 साल बाद रियो ओलम्पिक में आयरलैंड के खिलाफ 3-2 से जीत दर्ज करने के बाद भारत की पुरुष हॉकी टीम जिस तरह दूसरे मुकाबले में जर्मनी के खिलाफ खेल समाप्त होने के महज 3 सेकेण्ड पूर्व एक और गोल खाकर हार गयी, उससे नहीं लगता कि 36 साल बाद यह गोल्ड जीत कर भारतीयों को मुस्कुराने का अवसर प्रदान करेगी। भारतीय खेल प्रेमियों की उम्मीदों को 2008 के बीजिंग ओलंपिक गोल्ड विजेता अभिनव बिंद्रा से भी पुरुषों की दस मीटर की एयर राइफल में स्पर्धा से बड़ा धक्का लगा है। लोग उनसे एक और मैडल की उम्मीद लगाये हुए थे, पर वे चौथे स्थान पर रहे। बहरहाल 31वें ओलम्पिक में भारी निराशा के बीच दीपा कर्मकार एक बड़ी उम्मीद बनकर उभरी हैं। उन्होंने जिम्नास्टिक के फाइनल में जगह बनाकर एक इतिहास रचने के साथ ही भारतीयों को निराशा से उबरने का एक बड़ा आधार सुलभ करा दिया है।

जहां तक इतिहास रचने का सवाल है 9 अगस्त,1993 को अगरतला के एक बहुजन परिवार में जन्मीं दीपा ने इसी अप्रैल में 31वें ओलम्पिक खेलों की कलात्मक(आर्टिस्टिक) जिम्नास्टिक्स में जगह बनाकर पहले ही एक बड़ा इतिहास रच दिया था। इतिहास रचने के बाद उम्मीदों का पहाड़ सर लिए दीपा रियो पहुंची थीं। दीपा ने उम्मीदों के बोझ को दरकिनार कर अपना स्वाभाविक खेल दिखाया और 14 अगस्त को होने वाले फाइनल में जगह बना ली। अब पूरा देश सांसे रोके 14 अगस्त का इंतजार करने लगा है। उधर दीपा के कोच बीएस नंदी तनाव में घिर गए हैं। वह इसलिए कि अप्रैल में ही दीपा ने रियो में आयोजित टेस्ट इवेंट वॉल्ट में स्वर्ण पदक जीता था, इसलिए पूरा देश सोच रहा है कि वह स्वर्ण लेकर ही देश लौटेगी’। बहरहाल दीपा पदक जीत कर एक और नया इतिहास बना पाती हैं या नहीं, इसका पता तो 14 अगस्त को ही चल पायेगा। यदि वह पदक नहीं भी जीत पातीं हैं तो भी जिस तरह उन्होंने ओलम्पिक में फाइनल तक सफ़र तय किया है, उससे प्रेरणा लेकर चाहें तो देश के खेल अधिकारी भारतीय खेलों की शक्ल बदल सकते हैं।

दीपा करमाकर और कोच बी. एस. नंदी

काबिले गौर है कि किसी जमाने में राष्ट्र के शौर्य का प्रतिबिम्बन युद्ध के मैदान में होता था, पर अब यह खेलों के मैदानों में होने लगा है। 21वीं सदी में विश्व आर्थिक महाशक्ति के रूप में गिने जाने के पहले चीन ने अपना लोहा खेल के क्षेत्र में ही मनवाया था। लेकिन युद्ध हो या खेल, दोनों में ही जिस्मानी दमखम की जरुरत होती है। विशेषकर खेलों में उचित प्रशिक्षण और सुविधाओं से बढ़कर,सबसे आवश्यक दम-ख़म ही होता है। माइकल फेल्प्स, सर्गई बुबका, कार्ल लुईस, माइकल जॉनसन, मोहम्मद अली, माइक टायसन, मेरियन जोन्स, जैकी जयनार, इयान थोर्पे, सेरेना विलियम्स जैसे सर्वकालीन महान  खिलाडियों की गगनचुम्बी सफलता के मूल में अन्यान्य सहायक कारणों के साथ, प्रमुख कारण उनका जिस्मानी दम-ख़म ही रहा है। दम-ख़म के अभाव में ही हमारे खिलाड़ी ओलम्पिक, एशियाड, कॉमन वेल्थ गेम्स इत्यादि में फिसड्डी साबित होते रहे हैं।

जहां तक जिस्मानी दम-ख़म का सवाल है, हमारी भौगोलिक स्थिति इसके अनुकूल नहीं है। लेकिन इससे उत्पन्न प्रतिकूलता से जूझ कर भी कुछ जातियां अपनी असाधारण शारीरिक क्षमता का परिचय देती रही हैं। गर्मी-सर्दी-बारिश की उपेक्षा कर ये जातियां अपने जिस्मानी दम-ख़म के बूते अन्न उपजा कर राष्ट्र का पेट भरती रही हैं। जन्मसूत्र से महज कायिक श्रम करने वाली इन्ही परिश्रमी जातियों की संतानों में से खसाबा जाधव, मैरी कॉम, पीटी उषा, ज्योतिर्मय सिकदार, कर्णम मल्लेश्वरी, सुशील कुमार, विजयेन्द्र सिंह, लिएंडर पेस, सानिया मिर्जा, बाइचुंग भूटिया इत्यादि ने दम-ख़म वाले खेलों में भारत का मान बढाया है। हॉकी में भारत ने जितनी भी सफलता अर्जित की, प्रधान योगदान उत्पादक जातियों (मुख्य रूप से ओबीसी के तहत आने वाली जातियों तथा दलित जातियों) से आये खिलाडियों का रहा है। यहाँ अनुत्पादक जातियों से प्रकाश पादुकोण, अभिनव बिंद्रा, राज्यवर्द्धन सिंह राठौर, गगन नारंग, गीत सेठी, विश्वनाथ आनंद, सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, सौरभ गांगुली इत्यादि ने वैसे ही खेलों में सफलता पायी जिनमें दम-ख़म नहीं प्रधानतः तकनीकी कौशल व अभ्यास के सहारे चैंपियन हुआ जा सकता है। जहां तक क्रिकेट का सवाल है, इसमें फ़ास्ट बोलिंग ही जिस्मानी दम-ख़म की मांग करती है। किन्तु दम-ख़म के अभाव में अनुत्पादक जातियों से आये भागवत चन्द्रशेखर, प्रसन्ना,वेंकट, दिलीप दोशी, आर अश्विन इत्यादि सिर्फ स्पिन में ही महारत हासिल कर सके, जिसमें दम-ख़म कम कलाइयों की करामात ही प्रमुख होती है। दम-ख़म से जुड़े फ़ास्ट बोलिंग में भारत की स्थिति पूरी तरह शर्मसार होने से जिन्होंने बचाया, वे कपिल देव, जाहिर खान, उमेश यादव, मोहम्मद शमी इत्यादि उत्पादक जातियों की संताने हैं। आज भारत में बल्लेबाजी को विस्फोटक रूप देने का श्रेय जिन कपिल देव, विनोद काम्बली, वीरेंद्र सहवाग, युवराज सिंह, शिखर धवन इत्यादि को जाता है, वे श्रमजीवी जातियों की ही संताने हैं। ओलम्पिक के जिमनास्ट जैसे खेल के फाइनल के लिए क्वालीफाई कर दीपा कर्मकार ने यह सत्य नए सिरे से उजागर कर दिया है कि उत्पादक जातियों में जन्मे खिलाड़ी ही दम-ख़म वाले खेलों में सफल हो सकते हैं। दीपा की सफलता का यही सन्देश है कि हमारे खेल चयनकर्ता प्रतिभा तलाश के लिए पॉश कालोनियों का मोह त्याग कर अस्पृश्य, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों एवं जंगल-पहाड़ों में वास कर आदिवासियों के बीच जाएँ, यदि चीन की भांति भारत को विश्व महाशक्ति बनाना चाहते हैं तो।

1936 के बर्लिन ओलंपिक में जेसी ओवेन्स

वंचित समाजों में जन्मी प्रतिभाओं को इसलिए भी प्रोत्साहित करना जरुरी है क्योंकि दुनिया भर में अश्वेत, महिला इत्यादि जन्मजात वंचितों में खुद को प्रमाणित करने की एक उत्कट चाह पैदा हुई है। वे खुद को प्रमाणित करने की अपनी चाह को पूरा करने के लिए खेलों को माध्यम बना रहे हैं। उनकी इस चाह का अनुमान लगा कर उन्हें दूर-दूर रखने वाले यूरोपीय देश अब अश्वेत खेल-प्रतिभाओं को नागरिकता प्रदान करने में एक दूसरे से होड़ लगा रहे हैं। इससे जर्मनी तक अछूता नहीं है। स्मरण रहे एक समय हिटलर ने घोषणा की थी-‘सिर के ऊपर शासन कर रहे हैं ईश्वर और धरती पर शासन करने की क्षमता संपन्न एकमात्र जाति है जर्मन, विशुद्ध आर्य-रक्त। उनके ही शासन काल में 1936 में बर्लिन में अनुष्ठित हुआ था ओलम्पिक। दावा था हिटलर का कि ओलम्पिक में फहराएगा परचम सिर्फ आर्य-रक्त। किन्तु आर्य-रक्त के नील गर्व को ध्वस्त कर उस ओलम्पिक में एवरेस्ट शिखर बन कर उभरे सर्वकालीन अन्यतम श्रेष्ठ क्रीड़ाविद जेसी ओवेन्स। अमेरिका के तरुण एथलीट ग्रेनाईट से भी काले जेसी ओवेन्स जब बार-बार विक्ट्री स्टैंड पर सबसे ऊपर खड़े हो कर गोल्ड मैडल ग्रहण कर रहे थे, तब श्वेतकाय लोग छोटे हो जाते थे।100 मीटर,200 मीटर,लॉन्ग जम्प,और फिर रिले रेस:ट्रैक फिल्ड से चार-चार स्वर्ण पदक ले लिए थे जेसी ओवेन्स। उनकी वह सफलता हिटलर बर्दाश्त नहीं कर सका। ओवेन्स को सम्मान देना तो दूर, अनार्य रक्त के श्रेष्ठत्व से असहिष्णु हिटलर मैदान छोड़कर भाग खडा हुआ। ब्रिटेन के लीवर पूल में जो काले कभी भेंड़-बकरियों की तरह बिकने के लिए लाये जाते थे,उन्ही में से किसी की संतान जेसी ओवेन्स ने नस्ल विशेष की श्रेष्ठता की मिथ्या अवधारणा को ध्वंस करने की जो मुहीम बर्लिन ओलम्पिक से शुरू की , बाद में खुद को प्रमाणित करने की चाह में उसे मीलों आगे बढ़ा दिया गैरी सोबर्स, फ्रैंक वारेल, माइकल होल्डिंग, माल्कॉम मार्शल, विवि रिचर्ड्स,आर्थर ऐश, टाइगर वुड, मोहम्मद अली, होलीफील्ड, कार्ल लुईस, मोरिस ग्रीन, मर्लिन ओटो, सेरेना विलियम्स इत्यादि ने। खेलों के जरिये खुद को प्रमाणित करने की वंचित नस्लों की उत्कट चाह का अनुमान लगाकर ही हिटलर के देशवासियों ने रक्त-श्रेष्ठता का भाव विसर्जित कर देशहित में अनार्य रक्त का आयात शुरू किया। आज कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि खेलों में सबसे अधिक नस्लीय-विविधता हिटलर के ही देश में है । अब हिटलर के देश में कई अश्वेत खिलाडियों को प्रतिनिधित्व करते देखना ,एक आम बात होती जा रही है।

बहरहाल देशहित में ताकतवर अश्वेतों के प्रति श्वेतों,विशेषकर आर्य जर्मनों में आये बदलाव से प्रेरणा लेकर भारत के विविध खेल संघों के प्रमुखों को भी वंचित जातियों के खिलाडियों को प्रधानता देने का मन बनाना चाहिए। हालांकि खेल संघों पर हावी प्रभु जातियों के लिए यह काम आसान नहीं है। इसके लिए उन्हें राष्ट्रहित में उस वर्णवादी मानसिकता का परित्याग करना पड़ेगा, जिसके वशीभूत होकर इस देश के द्रोणाचार्य कर्णों को रणांगन से दूर रख एवं एकलव्यों का अंगूठा काट कर, अर्जुनों को चैंपियन बनवाते रहे हैं। अगर 21वीं सदी में भी खेल संघों में छाये द्रोणाचार्यों की मानसिकता में आवश्यक परिवर्तन नहीं आता है तो भारत क्रिकेट,शतरंज,तास,कैरम बोर्ड,बिलियर्ड इत्यादि खेलों में ही इतराने के लिए अभिशप्त रहेगा; ओलंपिक मैडल देश के लिए सपना बनते जायेगा।