फॉरवर्ड प्रेस

“पवित्र गाय” से जुड़े कुछ “अपवित्र” सवाल

गोरक्षकों दलितों को पीटते रहे, पुलिस नजरअंदाज करती रही

बीजेपी शासित गुजरात में पिछले दिनों दलितों पर हुए हमले के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आखिरकर अपनी चुप्पी तोड़ी और गौरक्षा संस्था पर करवाई करने का भरोसा दिलाया। मगर क्या हिंदुत्व की सरकार वाकई इन गौर रक्षा के “गोरखधंधा” करने वाले इन फासीवादियों पर कार्यवाही करेगी, यह यकीन के साथ नहीं कहा जा सकता।

ज्ञात रहे की गिर सोमनाथ जिले के उना टाउन के दलितों को इन्हीं फसादी तत्वों ने  गाय की खाल निकालने के आरोप में सरेआम पीटा था। इस जालिमाना हमला के द्वारा भगवा ब्रिगेड ने  देश भर में एक बार फिर से चेतावनी भेजी कि “गाय माता की रक्षा’’ के लिए वे किसी भी अपराधिक क़दम को उठाने से बाज़ नहीं आयेंगे जैसे  दलित और मुसलमानों को पीटना, उन्हें जबरन उनके मुंह में गोबर ठूसना, या फिर जान से मारना। मुझे नहीं लगता की यह सब कुछ बगैर सरकार और पुलिस की जानकारी के इतने लम्बे अरसे से चला रहा होगा। हद तो तब हो गई जब ऊना में विशाल ‘दलित अस्मिता रैली’ से लौट रहे दलितों पर आतताइयों ने हमले किये और पुलिस कुछ नहीं कर सकी।

दूर दराज के इलाकों को कौन कहे, दिल्ली भी गाय रक्षा के आतंकियों से मुक्त नहीं हैं। देश की राजधानी की कई दीवारों पर बड़ी-बड़ी इवारतों में इन हिंदू फसादियों ने अपना आतंकी मेनिफेस्टो लिखा है कि गाय के “हत्यारों’’ को फांसी की सजा मिलनी चाहिए। जब गाय के हत्यारों के लिए फांसी की सजा मांगी जाती है तो भारत की बहुजन आबादी (जिसमें दलित, पिछड़ा, आदिवासी, मुसलमान और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के लोग शामिल हैं) के दिलों में ख़ौफ भर जाता है।

इतिहास के पन्ने इस बात की गवाही देते हैं कि गाय के नाम पर धार्मिक जज्बात को भड़काने के सिलसिले ने उपनिवेशिक काल में तेज़ी पकड़ा, जिसके पीछे मकसद यह था कि हिंदुओं को राजनीतिक और समाजिक तौर पर लामबंद किया जाये और ब्राह्मणवादी व्यस्था को और मजबूती प्रदान की जाये ।

जैसा कि ब्रह्मणवादी नेतृत्व ने 19 वीं सदी से ही भांप लिया था कि गाय हिंदुओं को गैर-हिंदुओं के खिलाफ इकट्ठा करने का एक आसान तरीका है क्योंकि हिंदू समाज जाति समूहों और इलाका के आधार पर पूरी तरह से बंटा हुआ है।

“पवित्र गाय” के नाम पर बड़े हमले की शुरूआत 1870 से सामने आने लगे, जिसमें ख़ासकर मुसलमानों का बड़ा ख़ास नुकसान हुआ। 1882 में गौरक्षा संस्था की स्थापना आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती की कयादत में हुआ। दयानंद सरस्वती ने इस मुद्दे से जहां एक तरफ हिन्दू-एकता बनाने की कोशिश की वहीं दूसरी तरफ मुसलमानों के खिलाफ सियासत को हवा दी। समय बीतने के साथ ही गौरक्षा के कई संगठन सामने आए और 1893 में आजमगढ़ में एक बड़ा दंगा हुआ, जिसमें 100 से अधिक लोग देश के विभिन्न हिस्सों में मारे गए। 1912-13 में “पवित्र गाय” के नाम पर अयोध्या की जमीन लाल हुई, वहीं 1917 में बिहार के शहाबादा में बड़ा दंगा हुआ, जिसमें फिर मुस्लमानों को जान-माल का बड़ा नुकसान हुआ। मगर अफसोस की बात यह है कि सेक्युलरवाद और हिंदू-मुस्लिम एकता की राग जपने वाली कांग्रेस के कई नेता दंगे में शरीक हुए। कांग्रेस के भीतर एक बड़ा तबका हिंदू महासभा जैसी दंगाई संगठन के साथ मिलकर दंगे में शरीक होता था। अलीगढ के इतिहासकार मो0 सज्जाद ने अपनी किताब “मुस्लिम पॉलिटिक्स इन बिहार” में कहा है कि इस दंगे के बाद बड़ी संख्या मे मुसलमानों ने कांग्रेस से पलायन करना शुरू कर दिया। इस तरह यह दलील पेश की जा सकती है कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान हिन्दू-मुस्लिम एकता को कमज़ोर करने में गाय के नाम पर हुए दंगों की अहम भूमिका रही।

गोरक्षक

अफ़सोस की बात है कि आजादी के बाद भी गायरक्षा के नाम पर सियासत ख़त्म नहीं हुई। यह उसी ब्रह्मणवादी सोच का परिणाम है कि संविधान के नीति निर्देशक तत्व  में गाय जैसे जानवर की हत्या पर रोक लगाने की बात कही गई है। मुझे इसमें कोई हिचक नहीं है कि इस तरह की ब्रह्मणवादी नीतियों के पीछे गांधीवादी विचार का बड़ा रोल था, जो गायरक्षा को हिंदू धर्म का कर्तव्य मानते थे।

धीरे-धीरे आजाद भारत के ज़्यादातर राज्यों की सरकारों ने गाय सुरक्षा के नाम पर गैर-जनवादी कानून बनाये और इस तरह पुलिस और प्रशासन को जनता को सताने का संस्थागत ठोस हथकंडा मिल गया है, जिसका सहारा लेकर देश की बहुजन आबादी को इसका शिकार बनाया जा रहा है।

मगर आरएसएस और उसे जुडी हुई संस्थायें गाय के नाम पर गुंडागर्दी करने में सबसे आगे रही हैं, और इससे जुड़े हुए हजारों गाय रक्षा संगठन देश भर में चलाये जा रहे हैं। अगर सही तौर से जांच हो तो यह बात खुलकर सामने आ जायेगी की दलितों के उपर गुजरात के हमलावर भी संघ परिवार से किसी न किसी तरह जुड़े हुए हैं।

इस सब के पीछे आरएसएस का उदेश्य है कि हिंदुओं में अपनी पहुंच बनाई जाये और  दूसरी तरफ मुसलमानों के खिलाफ पूरे देश में फ़िजा खराब किया जाये। संघ की यह थोथी दलील रही है कि हिंदुस्तान में गाय जबह की शुरूआत मुसलमानों की आमद से जुड़ा हुआ है।

हालांकि इतिहासकार इस तरह की सांप्रदायिक सोच को पूरी तरह से खारिज करते हैं। प्रख्यात इतिहासकार डीएन झा ने अपनी मशहूर किताब “द मिथ आफ द होली काउ’’ में कहा है कि वैदिक दौर और उसके बाद के जमाने में गाय का मांस खाने का रिवाज था और गाय हमेशा से हिंदुओं के नजदीक एक पवित्र चीज नहीं रही है। यह वैदिक और बाद के ब्राह्मणवादी दौर में भी नहीं थी, जिसकी वजह से प्राचीन भारत में गाय का गोश्त अक्सर भोजों में लजीज खाने के तौर पर परोसा जाता था।

इसी तरह महान इतिहासकार डीडी कौशांबी अपने एक अहम लेख “कास्ट ऑर रेस” में कहते हैं कि जिस तरह एक तरफ वैदिक दौर के ब्राह्मण गाय का गोश्त खाते थे उसी तरह कश्मीर बंगाल और सारस्वत ब्राह्मण अगर मांस खा भी ले तो वह अपनी जात से बाहर नहीं होंगे।

इतिहासकारों की सहमति है कि बाद के दौर में गौ मांस खाने के खिलाफ धार्मिक ग्रंथ और पोथियां लिखी गईं। जिसे लागू करने की ब्राह्मणों ने पूरी कोशिश की। मगर समाज ने इन कानूनों को कभी भी पूरी तरह से नहीं अपनाया। समाजशास्त्रियों का कहना ठीक ही है कि कोई भी समाज पूरी तरह से धार्मिक ग्रंथों के द्वारा संचालित नहीं होता। भारत जैसे विविधता वाले देश में जहाँ धर्म, जाति, सम्प्रदाय की बहुलता थी, वहां कभी भी ब्राह्मणवादी साहित्य को पूरी तरह से कबुल नहीं किया गया।

यहाँ तक कि स्वामी विवेकानंद ने, जिन्हें आरएसएस अपना नायक मानकर उनका प्रचार करती है खुद हिंदुओं को गाय का मांस खाने और फुटबॉल खेलने की सलाह दी है। इस बात का खुलासा प्रख्यात इतिहासकार ज्ञान पाण्डे ने अपने चर्चित लेख ’’ह्वीच ऑफ़ अस आर हिंदूज?’’ में किया है। हालांकि इन तथ्यों पर आरएसएस हमेशा से इंकार करता रहा है और पवित्र गाय को हिन्दू पहचान के केंद्र में रखता रहां है, और इसतरह दलितों को समय-समय पर चेताता रहती है कि वे गाय के सम्मान में कोई कोताही न करें।

गोरक्षकों के खिलाफ अहमदाबाद में दलितों का प्रतिरोध

बाबा साहेब डा0 भीमराव अंबेडकर आरएसएस की “पवित्र गाय” की राजनीति की पोल खोलते हैं बगैर किसी हिचकिचाहट के अछूत प्रथा के लिए इसी गौमांस को जिम्मेदार ठहराते हैं। जैसा कि बाबा साहेब ने कहा है कि दलित एक समुदाय के तौर पर चौथी सदी में तब सामने आये, जब ब्राह्मणवाद बौद्ध धर्म के उपर फिर से हावी होना शुरू हो गया था। ब्राह्मणों ने अपनी रणनीति बदलते हुए शाकाहार को लोगों पर थोपना शुरू किया और गौमांस खाने के खिलाफ अभियान चलाया। चूकि इन घुमंतू कबिले के लोगों की जिंदगी गाय पर काफी हद तक निर्भर थी, जो न सिर्फ मांस के लिए बल्कि उसके चमड़ी और अन्य वस्तुओं के लिए गाय पर निर्भर रहते थे, इसलिए वे गाय मांस खाने पर अड़े रहे तो सजा के तौर पर ब्राह्मणों ने उन्हें अछूत करार दिया। इस तरह से हमारे समाज में अछूत प्रथा का जन्म पंद्रह सौ साल पहले हुआ, जो आज भी पूरी तरह से खत्म नहीं हो पाई है।

स्वतंत्रता के बाद एक उम्मीद बंधी थी कि शायद गायरक्षा की खूनी राजनीति थम जाय। मगर ऐसा नहीं हुआ। स्वतन्त्र भारत में एक के बाद एक, अधिकांश राज्यों में गायरक्षा के नाम पर भयावह कानून पास हो चुका है। गाय के नाम पर जहां एक तरफ आरएसएस हिंसक राजनीति का सहारा लेता है, वहीं समाज में एक बड़ा हिस्सा, जो अपने आप को “उदारवादी” और “प्रगतिशील” कहता है, वह भी गाय को पवित्र मानकर करोड़ों लोगों को उनके आहार और रोजगार से महरूम किये जाने पर चुप्पी लगाये हुए हैं। आज पवित्र गाय के नाम पर बने काले कानून के खिलाफ बोलने का साहस “प्रगतिशील” तबके का एक बड़ा हिस्सा नहीं कर पा रहा है।

मिसाल के तौर पर यह बात 2012 की है, जब केंद्र में तथाकथित “सेकुलर” सरकार थी। उसी दौरान जेएनयू जैसे प्रगतिशील समझे जाने वाले विश्वविद्यालय के छात्रों ने पवित्र गाय  पर कुछ “अपवित्र सवाल” उठाये तो उनके ऊपर प्रशासन ने यह आरोप लगाया गया कि गाय जैसे पवित्र मुद्दे को छेड़कर वे “अशंति’’ फैला रहे हैं।

मगर इस पूरी लड़ाई में सबसे अफसोसजनक बात यह थी कि प्रगतिशील तबके के एक बड़ी टोली की ख़ामोशी। अब यही लोग हैं, जो गायरक्षा संस्था की गुंडागर्दी पर सवाल तो उठाते हैं, मगर उनकी “क्रांति” कानून-वयवस्था के फ्रेमवर्क से बाहर अक्सर नहीं निकल पाती। अगर सही मायने में पवित्र गाय के नाम पर इस खूनी खेल को खत्म करना है तो हमें इस मुद्दे को सिर्फ और सिर्फ कानून व्यवस्था के चशमे से नहीं देखना होगा ,बल्कि इस से जुड़े हुए एतेहासिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक सवाल भी उठाने होंगे।