फॉरवर्ड प्रेस

महावीर सिंह, आप द्रोणाचार्य नहीं शंबूक हो!

खुला पत्र महावीर सिंह के नाम

महावीर सिंह

आदरणीय महावीर सिंह जी,
मैंं  उदय एक गाड़ी ड्राइवर हूँ। पिछले दिनों गाड़ी से दिल्ली जा रहा था। रेडियो पर खबर आई कि हरियाणा के कुश्ती कोच महावीर सिंह को भारत सरकार 2016 का द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित करेगी। खबर सुनते ही जो ख़ुशी हुई, वह मैं शब्दो में बयान नही कर सकता। इससे पहले बहुत से लोगों को ये आवार्ड मिले हैं,  लेकिन मैंने कभी ध्यान भी नही दिया। लेकिन आपके चयन होने पर एक अजीब सी ख़ुशी हुई क्‍योंकि आप वह इंसान हो,  जिसने रूढ़िवादी परम्पराओंं को तोड़ते हुए अपनी बेटियों को ही नही सभी बेटियों को एक कथित मर्दाना खेल में शामिल करके रास्‍ता दिखाया कि यह खेल सिर्फ पुरुषों के लिए ही नहींं है- महिलाएं भी इसे खेल सकती हैंं -खेल ही नही सकती अपना लौहा भी मनवा सकती हैंं। इसके लिए जो संघर्ष आपने इस रूढ़िवादी समाज से किया है वह असाधारण  है। उसी संघर्ष को हम सलाम करते हैं। उस संघर्षशील इंसान को भारत का सबसे बड़ा खेल सम्मान मिल रहा है,  इसलिए यह ख़ुशी भी असाधरण थी।

लेकिन जब मैने गम्भीरता से इस आवार्ड के बारे में सोचा तो मेरी ख़ुशी फुर्र हो गयी। मेरे मन में पहला सवाल ये था कि क्या यह आवार्ड महावीर सिंह के लायक है? अगर लायक नही है, तो क्या इस अवार्ड को महावीर सिंह को लेना चाहिए। आवार्ड लेने से और न लेने से खेल जगत और समाज पर दुर्गामी प्रभाव क्या पड़ेंगे?

पहला सवाल कि क्या यह अवार्ड महावीर सिंह के लायक है। अवार्ड महावीर सिंह के लायक नही है,  क्यों? इसको जानने के लिए हमें सबसे पहले द्रोणाचार्य, जिसके नाम से यह आवार्ड है, और महावीर सिंह की तुलना करनी चाहिए। द्रोणाचार्य महाभारत में कौरवों और पांडवों के गुरु थे। उनका एक आश्रम (स्कूल) था। उस समय जो शिक्षा प्रणाली थी, वह इन आश्रमो में इन गुरुओं द्वारा दी जाती थी। शिक्षा के रूप में विद्यार्थियों को अक्षर ज्ञान के साथ-साथ युद्ध कौशल सिखाया जाता था। लेकिन यह शिक्षा सभी ले सकें ऐसा कदापि नही था। इस शिक्षा के दरवाजे सिर्फ ब्राह्मणों और क्षत्रियों के लिए खुले होते थे। बाकि शूद्रों  (मजदूर-किसान) के लिए और महिलाओं के लिए शिक्षा के बारे में सोचना भी पाप था। अगर कोई शूद्र  जाने-अनजाने या चोरी से इन स्कूलों की शिक्षा को सुन भी ले तो उसके कानों में गर्म तरल वस्तु डाल दी जाती थी। अगर कोई स्कूल की किताब को छू ले तो उसके हाथ काट दिए जाते थे और अगर कोई उनको खोल कर देख ले तो उसकी आँख फोड़ दी जाती थी। ये सब अमानवीय काम शूद्रों के साथ होता था। अब सवाल उठता है कि शूद्र कौन थे!

महावीर सिंह की पत्‍नी व स्‍त्री-पहलवान, जिन्‍हें उन्‍होंने ट्रेनिंग दी। वीनेश (भतीजी, बाए) व बबीता व गीता (बेटियां)

आर्यों  के अंदर भारत में आने से पहले तीन वर्ण होते थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, पशुपालक (वैश्य) आर्यों का मुख्य पेशा पशुपालन और शिकार करना था। आर्यों को भारत में आने से पहले खेती के बारे कोई जानकारी नही थी। जब आर्यों  ने भारत पर आक्रमण किया तो यहाँ के मूलनिवासी जो धन-धान्य से परिपूर्ण थे, जो खेती करते थे, जो शांतप्रिय लोग थे, जिनकी संस्कृति, जिनका सामाजिक ढांचा उज्‍जवल था, उसको आर्यों ने तहस-नहस कर दिया और यहाँ के मूलनिवासियो को अपना गुलाम बना लिया। अब आर्यों के चार वर्ण हो गए ब्राह्मण, क्षेत्रीय, वैश्य और शूद्र। शूद्रों में भी शुद्र और अतिशूद्र बनाये गए। जिनको आर्य हरा नहीं सके, उनको आर्यों ने असुर कहा, राक्षस कहा।

खेती करना, कपड़े बनाना, जूते बनाना, रहने के लिए बड़े-बड़े महल बनाना, पशु पालन, बर्तन बनाना मतलब इंसान के जिन्दा रहने के लिए सबसे जरूरी वस्तुओं के उत्पादन करने का सारा काम शूद्र करते थे। लेकिन उस उत्पादन के बड़े हिस्से का उपभोग क्षत्रिय और ब्राह्मण करते थे। शूद्र के पास न अच्छा खाना था, न मकान, न कपड़े, न बर्तन और न पहनने के लिए जूते जबकि इन् सभी को पैदा वह  खुद करता था। इस व्यवथा को बनाये रखने के लिए आर्यों  ने शूद्र को शिक्षा से वंचित रखा। ऐसे ही महिलाओं को भी शिक्षा से वंचित रखा गया। अगर शूद्र शिक्षित हो जायेगा, तो उनकी इस लूट से पर्दा उठ जायेगा। क्योकि शिक्षित इंसान गुलामी की जंजीरों को जल्दी तोड़ता है। ब्राह्मणों ने  ये प्रचार किया था कि शूद्र इसलिए शूद्र है क्योंकि उनके कर्मों में ये लिखा है। उन्होंने पिछले जन्म में अच्छे कर्म नही किये (अच्छे कर्म मतलब मालिक की सेवा, मालिक की आज्ञा का पालन, दान देना, महेनत करना) इसलिए भगवान ने उनको इस जन्म में यह जिंदगी दी है। अगर अगले जन्म में अच्छी जिंदगी चाहिए, तो अच्छे कर्म करो। गीता  में  लिखा है कि “कर्म करो, फल की चिंता मत करो”क्या हम कोई भी काम बिना फल की चिंता के करते है और क्या बिना फल की चिंता के कोई काम करना चाहिए। अब अगर शूद्र और महिला शिक्षित हो जाएंगे तो ब्राह्मणों के इस झूठे प्रचार की पोल खुल जाएगी। इसलिए शूद्र और महिला के लिए शिक्षा वर्जित थी।

दूसरा शिक्षा का हिस्सा युद्ध कौशल था अगर शूद्र युद्ध कौशल सिख गये तो शूद्र संख्या में ज्यादा है फिर वो उनकी गुलामी क्यों करेंगे। वो राज पर कब्जा करके असमानता पर आधारित इस व्यवस्था को उखाड़ देंगे।  इसलिए द्रोणाचार्य के स्कूल में सिर्फ ब्राह्मण और क्षत्रिय शिक्षा ले सकते थे। जब एक्लव्य द्रोणाचार्य के पास शिक्षा लेने गया तो उसको यह बोलकर मना कर दिया गया कि वह शूद्र है। लेकिन जब एक्लव्य ने खुद की मेहनत से धनुष विद्या सीख ली। इसका पता जब द्रोणाचार्य को लगा तो उसने अपने वर्ग के लोगो के साथ मिलकर छल-कपट या जबरदस्ती से एक्लव्य का अँगूठा काट लिया। द्रोणाचार्य कभी नही चाहता था कि एक एक्लव्य से हजार एकलव्‍य बने।

महावीर सिंह की बेटियों वीनेश फोगट (बाएं) व गीता फोगट ने कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स, 2014 में स्‍वर्ण पदक जीता।

महान दार्शनिक चार्वाक से लेकर सन्त शम्बूक जैसे महान लोगो को क्षत्रियो और ब्राह्मणों  ने इसलिए मार दिया क्योंकि वे अपने शूद्र वर्ग के बच्चों को, महिलाओ को शिक्षित कर रहे थे। इसलिए ऐसे असमानता और शोषण पर टिकी व्यवस्था के शिक्षक के नाम से शोभित आवार्ड क्या आपके लायक है!  क्योंकि आप भी एक शिक्षक हो। क्या आपने कभी किसी मजदूर-किसान-महिला को अपनी कला सिखाने से मना किया है। क्या आपने किसी से भेदभाव किया है। अगर नही किया तो यह आवार्ड आपके लायक नही है। ऐसे आवार्ड को आपने लेने से मना कर देना चाहिये।
अगर आप ऐसे असमानता के नाम के प्रतीक आवार्ड को लेने से मना करते हो तो एक बहस छिड़ना लाजमी है कि क्या ऐसे गुरुओं को आदर्श गुरु माना जा सकता है, जो अपने शिष्यों से भेदभाव करते थे और अब भी करते है, जिन्होंने कितनी असाधारण प्रतिभाओ का कत्ल किया है, जिनके कारण कितनी लड़कियों की जिंदगियां ख़राब हुई है। जिन्होंने कितने ही एकलव्यों के अंगूठे काट लिए हैं,  क्या ऐसे गुरु को आदर्श माना जा सकता है! अगर ऐसे गुरु को आदर्श नही माना जा सकता, तो क्यों ऐसे गुरु के नाम से आवार्ड का नाम है। और जिस दिन ऐसे गुरुओं के ऐसे आवार्ड से नाम हटा दिए जाएंगे तो किसी एक्लव्य को अपना अंगूठा कटवाने की जरूरत नही पड़ेगी। खेलो में सभी की समान भागीदारी हो सकेगी। हमको ऐसे किसी भी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में ऐसे सूखे के दिन देखने नही पड़ेंगे। प्रत्येक खेल में हरियाली ही हरियाली होगी। क्योंकि शिक्षक जैसा होता है उसके विद्यार्थी भी वैसे ही होते है।

आदरणीय महावीर सिंह जी, आप द्रोणाचार्य नहीं हो, आप शंबूक हो, जिसने वंचित तबकों की शिक्षा के लिए जान दे दी। आप जोतिबा  फुले, सावित्रीबाई फुले हो,  जिसने महिलाओ के लिए शिक्षा के दरवाजे खोलने के लिए संघर्ष किया,  जिसने रूढ़िवादी समाज की यातनाएं सही। आप महावीर सिंह हो, जिसने कुश्ती में लड़कियों के लिए दरवाजे खोले, जिसने समाज से संघर्ष किया। आप द्रोणचार्य कैसे बन सकते हो !  आपको तो द्रोणाचार्यों को महावीर सिंह बनाना है। मुझे और वंचित तबकों को आपसे बहुत आशाएं है।

अगर आप आवार्ड लेते हो तो जो चल रहा है, वह चलता रहेगा। द्रोणाचार्य के रूप में शिक्षक जिन्दा रहेगा और “एकलव्‍य” अपना अंगूठा कटवाता रहेगा। लेकिन इस असमानता पर आधारित व्यवस्था के खिलाफ आवाज बुलंद आज आप नही तो कल और कोई शिक्षक या विद्यार्थी जरूर करेगा। यह लड़ाई,  जो असमानता के खिलाफ हजारो सालो से जारी है,  इसको जारी रखने के लिए एकलव्यों, शम्बूकों की जरूरत है।