फॉरवर्ड प्रेस

1000 स्‍थानों पर मनाया जा रहा महिषासुर स्‍मरण दिवस

जहां एक ओर देश में ब्राह्मणवादी हिंदुत्व अपने आक्रामक दौर में है, वहीं अखिल भारतीय स्तर पर कुछ और भी घट रहा है, बहुजन समुदाय अपनी संस्कृति और परंपरा को पुनर्जीवन दे रहे हैं, अतीत के धुंधलके में छिपे या षडयंत्रपूर्वक खलनायक बना दिये गये अपने नायकों की पुनर्खोज कर रहे हैं।

बिहार के गंगा पार शहर हाजीपुर से लगभग 16 किलोमीटर दूर भगवानपुर अट्टा में महिषासुर के स्‍मरण में विशाल जनसभा। फाइल फोटो, 1 नवंबर, 2015

झारखंड का असुर समुदाय ही  सिर्फ महिषासुर को अपना पूर्वज नहीं  मान रहा है बल्कि गुजरात के आदिवासी भी महिषासुर को अपना नायक मानने लगे हैं। इस प्रकार देखें तो महिषासुर शहादत दिवस अब अखिल भारतीय बहुजन सांस्‍कृतिक आंदोलन का रुप ले चुका है। झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता राजदेव विश्वबंधु बताते हैं कि वे पिछले दिनों गुजरात के दौरे पर थे तो उन्हें  सामाजिक कार्यकर्ता जयंती भाई ने बताया कि बड़ौदा के पंचमहल इलाके के 2000 से ज्यादा आदिवासी समुदाय इस साल महिषासुर शहादत दिवस मनाने की तैयारी कर रहे हैं। इस साल देश भर में छोटे-छोटे गांवों व शहरों-कस्‍बों समेत 1000 से ज्यादा स्थानों पर महिषासुर शहादत अथवा महिषासुर स्मरण दिवस मनाया जा रहा है,‍ जिनमें से अकेले पश्चिम बंगाल में 700 जगहों पर यह आयोजन हो रहा है।  देश की सीमा पार कर यह आंदोलन अब नेपाल भी पहुंच गया है।

सरकार और मनुवादियों की बौखलाहट

महज पांच सालों में ही इन आयोजनों न सिर्फ देशव्यापी सामाजिक आलोडऩ पैदा कर दिया है, बल्कि ये आदिवासियों, अन्य पिछडा वर्ग व दलितों के बीच सांस्कृतिक एकता का एक साझा आधार भी प्रदान कर रहे हैं। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में भी महिषासुर शहादत दिवस मनाने की तैयारी चल रही है,  वहां की बीजेपी सरकार ने राज्य में ऐसा माहौल बना दिया कि जैसे वहां कोई आतंकी संगठन आतंकी वारदात करने जा रहा हो। वहां के लोकप्रिय सीपीआई नेता मनीष कुंजाम, जिन्‍होंने महिषासुर से संबंधित एक पोस्‍ट व्‍हाट्स एप्‍प पर शेयर की थी,  उनके खिलाफ ‘धर्म सेना’ ने थाने में तहरीर दर्ज करा दी थी। उसके बाद से वहां से आदिवासियों के बीच यह आंदोलन और तेज हो गया है।

क्या कहते हैं असुर

पश्चिम बंगाल के काशीपुर प्रखंड के झालगौडा में आयोजित महिषासुर दिवस में दसईंं नृत्‍य प्रस्‍तुत करते आदिवासी। यह विलाप का नृत्‍य माना जाता है। फाइल फोटो, अक्‍टूबर, 2015

झारखंड की ही असुर समुदाय की कवियत्री और आदिवासी इतिहास की जानकार सुषमा असुर कहती हैं कि ‘अगर हम राक्षस होते तो हम हर रोज लोगों को चबा कर खा रहे होते। झारखंड में कई एमएनसी कंपनी के दैत्य आ कर हमें जल-जंगल-जमीन से बेदखल कर रहे हैं तो क्या हम उन्हें चबा कर खा नहीं जाते। असुरों के साथ धार्मिक ग्रंथों ने जो ऐतिहासिक अन्याय किया है उसकी कलई खुलनी ही चाहिए। मनुवादियों ने साजिश के तहत मिट्टी की मूर्ति बनाकर हमारे वीभत्स काल्पनिक रुप गढ़े ताकि रंगभेदी, नस्लभेदी इतिहास की इजारेदारी पर कोई सवाल नहीं खड़ा कर सके। जान बूझ कर हमारे बड़े-बडे दांत बनाए, बड़े-बड़े नाखून बनाए और हमारे रंग-रुप को राक्षस जैसा बना दिया ताकि वो हमें जल-जंगल और जमीन से बेदखल कर अपनी सत्ता कायम कर सके। क्या कोई गोरा आदमी राक्षस नहीं हो सकता।’ सुषमा असुर ने हमसे बहुत ही संयमित स्वर में एक सवाल पूछा- ‘आप लोग पंडाल बनाते हैं, नौ दिन तक दुर्गा की पूजा करते हैं। और उसी पंडाल में लगे मेले में हर रोज औरत मर्दों के हाथ से अपमानित होती है। क्या वे मर्द राक्षस नहीं हैं।’ सुषमा का सवाल जायज था क्यों हम ऐतिहासिक नायकों के चरित्र जिनके रुप रंग हमारे बहुजन आदिवासी समुदाय से मेल खाते हैं, जो हमारे मूल निवासी हैं, उनको राक्षस और दैत्य बनाकर मानवजाति को अपमानित कर रहे हैं, आदवासी-बहुजनों की आबादी का खलनायकीकरण कर रहे हैं।

रावण-महिषासुर हमारे पुरखे

भारतीय गोंडवाणा पार्टी के पूर्व विधायक मनमोहन शाह बट्टी द्वारा 25 सितंबर, 2016 को मध्‍यप्रदेश के राज्‍यपाल को भेज गया पत्र, जिसमें उन्‍होंने कहा है कि रावण, मेघनाथ व महिषासुर प्राचीन काल से गोंड जनजाति के नायक रहे हैं। इसका अपमान करने वाले कार्यक्रमों पर रोक लगायी जाए, अन्‍यथा सामाजिक तनाव बढ सकता है।

मध्य भारत यानि मध्य प्रदेश के गोंडवाणा समाज के लोगों ने राज्यपाल को ज्ञापन देकर मांग की है कि इस साल दशहरा में रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाए। गोंडवाणा समाज ने दिए ज्ञापन में स्पष्ट रुप से कहा है कि रावण और महिषासुर हमारे पूर्वज थे और उनका पुतला जलाना गोंडवाणा समाज का अपमान है। जाहिर है देश के मूलनिवासियों की सांस्कृतिक अस्मिता के खलनायकीकरण पर आज न कल तो सवाल उठता ही। अब हिन्दूवादी धार्मिक ग्रंथों के अस्तित्व पर भी बहुत जल्द संकट आएंगे, क्योंकि मिथकीय चरित्रों का फरेबी इतिहास और ग्रंथ ज्यादा दिन तक लोगों को भरमाए हुए नहीं रख सकता है।

न्याय और शांतिप्रिय बहुजन राजा महिषासुर

झारखंड के गिरीडीह जिले में वकालत कर रहे दामोदर गोप ने जानकारी दी कि ‘इस साल सिर्फ असुर समुदाय ही नहीं बल्कि महिषासुर शहादत दिवस मनाने के लिए यादव, कुशवाहा, कुम्हार, कुर्मी, निषाद, मांझी, रजक, रविदास आदि जातियांां बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही है। धनबाद, गुमला, कोडरमा, गिरीडीह समेत कई जिलों में महिषासुर शहादत दिवस मनाने की जोर-शोर से तैयारी चल रही है। महिषासुर हमारे पूर्वज थे और उनके बारे में ब्राह्मणों द्वारा स्थापित किए गए झूठ का पोल खोलने के लिए इस बार हम लोग हजारों की संख्या में ऐतिहासिक साक्ष्यों से जुड़े दस्तावेजों का पर्चा भी छपा रहे हैं, जिसमें यह प्रमाणित है कि महिषासुर एक शांतप्रिय और न्यायप्रिय राजा थे।’ दामोदर गोप इतिहासकार डीडी कौशांबी के लिखे ऐतिहासिक प्रमाण का हवाला देते कहते हैं कि ‘महिषासुर यादवों के राजा थे। इतिहासकार डी डी कौशांबी ने महिषासुर को म्होसबा कहा है जो पशुपालक है, गवली है। सामाजिक इतिहास में तो पशुपालक यादव ही रहे हैं।’ कौशांबी ने अपनी किताब प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता में लिखा है कि ‘जिन पशुपालकों (गवलियों) ने वर्तमान दुर्गा देवी को स्थापित किया है, वे इन महापाषाणों के निर्माता नहीं थे, उन्होंने चट्टानों पर खांचे बना कर महापाषाणों के अवशेषों का अपने पूजा स्थलों के लिए, स्तूपनुमा शवाधानों के लिए, सिर्फ पुन: उपयोग ही किया है। उनका पुरुष देवता म्हसोबा या इसी कोटि का कोई देवता बन गया, जो आरंभ में पत्नी रहित था और कुछ समय के लिए खाध संकलनकर्ताओं की अधिक प्राचीन मातृदेवी से

उसका संघर्ष भी चला। परंतु जल्दी ही इन दोनों मानवसमूहों का एकीकरण भी हुआ और देवी (दुर्गा) और देवता (म्हसोबा) का विवाह भी हो गया। कभी-कभी किसी ग्रामीण देव स्थल में महिषासुर-म्हसोबा को कुचलने वाली देवी का दृश्य दिखाई देता है तो 400 मीटर की दूरी पर वह देवी, थोड़ा भिन्न नाम धारण करके उसी म्हसोबा की पत्नी के रुप में दिखाई देती है।’ कौशांबी की यह स्थापना इस बात की तस्दीक करती है कि महिषासुर यानि म्हसोबा पशुपालकों का देवता था, जिसके साथ देवी दुर्गा ने विवाह किया। खाध संकलनकर्ता आर्य़ थे, जिन्होंने खल स्त्री के जरिए पशुपालकों का नरसंहार किया था और अपनी सत्ता कायम की थी।

अनूठा अनुभव

महिषासुर दिवस मनाने वालों का कहना कि वह तो आर्यों-अनार्यों की लड़ाई थी और महिषासुर हम अनार्यों के पुरखा और नायक हैं। इन आयोजनों के एक अध्येता के रूप में देश के विभिन्न हिस्सों में महिषासुर दिवस के आयोजकों से बात करना मेरे लिए भी एक अनूठा अनुभव रहा। झारखंड के असुर समुदाय से जुडे एक सामाजिक कार्यकर्ता अनिल असुर को जब मैंने फोन लगाया तो उन्होनें अभिवादन में शुरू और अंत दोनों में हमसे जय महिषासुर कहा। यानि महिषासुर को ब्राह्मणों ने चिरकाल से जो दानव बना कर रखा है, वह धीरे-धीरे अब नायक बनते जा रहा है। खास बात यह है कि असुर समुदाय जिनकी आबादी अब 9000 के आसपास ही सिमट कर रह गई है, वह  महिषासुर को पूर्वज तो मानते हैं मगर उनको देवता नहीं बनाते हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि देवी-देवता तो ब्राह्मणों ने अपनी झूठी सत्ता स्थापित करने के लिए बनाया था। हमें तो बस अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की पहचान भर की दरकार है।

पटना में महिषासुर दिवस पर बहुजन जातियों व महिलाओं को अपमानित करने वाले विभिन्‍न ग्रंथों को आग के हवाले किया गया। फाइल फोटो, 2014

आदिवासी इतिहास और बहुजनों के सांस्कृतिक इतिहास पर शोध कर रहे दिल्ली के विष्णु रावत बताते हैं कि ‘महिषासुर- रावण को नायक मानने का इतिहास कोई नई बात नहीं हैं। पेरियार और बाबा साहेब ने काफी पहले हिन्दू धर्म के मिथकीय इतिहास पर चोट करते इन बातों को जिक्र किया था। ईश्वर की अवधारणा ही झूठी और मिथकीय है। हिन्दू धर्म ग्रंथों का इतिहास दरअसल देश की बहुजन आबादियों के शोषण और उनको खलनायक साबित करने का इतिहास है।’

महिषासुर दिवस मनाने वाले लोग बताते हैं कि दुर्गा व उनके सहयोगी देवताओं द्वारा महिषासुर की हत्या कर दिये जाने के बाद आश्विन पूर्णिमा को उनके अनुयायियों ने विशाल जनसभा का आयोजन किया था, जिसमें उन्होंने अपनी समतामूलक संस्कृति को जीवित रखने तथा अपनी खोई संपदा को वापस हासिल करने का संकल्प लिया था। यही कारण है कि विभिन्न स्थानों पर जो आयोजन हो रहे हैं, उनमें से अधिकांश आश्विन पूर्णिमा वाले दिन ही होते हैं। यह पूर्णिमा दशहरा की दसवीं के ठीक पांच दिन बाद आती है। हालांकि कई जगहों पर यह आयोजन ठीक दुर्गा पूजा के दिन भी होता है तथा कहीं-कहीं आयोजक अपनी सुविधानुसार अन्य तारीखें भी तय कर लेते हैं। कहीं इसे ‘महिषासुर शहादत दिवस’ कहा जाता है तो कहीं ‘महिषासुर स्मरण दिवस।’

महिषासुर शहादत दिवस ले रहा है आंदोलन का स्वरुप


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इस  किताब का अंग्रेजी संस्करण भी ‘Mahishasur: A people’s Hero’ शीर्षक से उपलब्ध  है।