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मैं दुर्गा पूजा क्‍यों नहीं मनाता

दुर्गा पूजा, कमज़ोर वर्गों के खिलाफ वर्चस्वशाली समूहों की लम्बे समय से चली आ रही हिंसा का प्रतिनिधित्व करती है – वह गुलामी को औचित्यपूर्ण ठहराती है

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पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले के केंदासोल में महिषासुर दिवस के आयोजन में कई पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किये गए. छाया: सौजन्य सरदिंदु उद्दीपन

अधिकांश बंगालियों की तरह, मेरे लिए भी दुर्गा पूजा जीवन का अभिन्न हिस्सा थी। बचपन में मेरे लिए दुर्गा पूजा का मतलब था नए कपड़े और बाहर का मज़ेदार खाना। और हाँ, मेरी माँ इन पांच दिनों में बहुत सोच-समझ के पैसे खर्च करने की अपनी आदत छोड़ देती थीं। जब भी हम किसी नए शहर में रहने जाते, हम बंगाली अंकलों के भोग के बारे में प्रश्नों से शिष्टतापूर्वक बचते हुए, ज्यादा से ज्यादा मूर्तियाँ देखने की होड़ में लगे रहते।

मैं मोटा-सा, शर्मीला बच्चा था  और मेरे दोस्तों की संख्या बहुत कम थी। मैं और मेरी माँ एक-दूसरे के साथी थे। तलाकशुदा होने के कारण उन्हें जो व्यंग्यबाण झेलने पड़ते थे, उनसे मुकाबला करने में राक्षस का वध करती देवी की छवि शायद उनकी कुछ मदद करती थीं। उन्हें तम्बोला में आमंत्रित नहीं किया जाता था और मैं बच्चों की उन जमातों में शामिल नहीं था, जो पूजा के समय पूरी रात मस्ती किया करते थे। अपने-अपने ढ़ंग से हम दोनों अकेले थे और हमें एक दूसरे का साथी बनते देर नहीं लगी। माँ दुर्गा तो हमारे साथ थीं हीं।जब मैं कोलकाता में रहने आया तो पूजा के दिनों में मेरे लिए पूरा शहर मानों आमोद-प्रमोद का मैदान सा बन गया।

मेरे जीवन के बीसवें दशक के शुरूआती सालों में मैं पूरी रात एक पंडाल से दूसरे पंडाल घूमता  रहता  था। मेरे पास शहर के प्रसिद्ध पूजा स्थलों की सूची रहती थी। जिस पंडाल को मैं देख लेता, उसके नाम के आगे सही का निशान लग जाता। पूरी रात गलियों में पैदल भटकने के बाद, थकान से चूर, भोर होते ही मैं कहीं नाश्ता करने की जुगाड़ करने में जुट जाता। इस भागमभाग में सोचने-विचारने के लिए समय ही नहीं होता था।

पूजा वह एकमात्र समय होता है जब कोलकाता सुंदर लगता है और एक पंडाल से दूसरे पंडाल भागते बंगाली उत्सव की किसी प्रकार की समालोचना करने के मूड में नहीं रहते हैं। इस शहर, जहाँ रेस्त्रां भी वर्गीय पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हैं, में गरीबों की उत्सव में भागीदारी को उद्धृत कर, उत्सवी माहौल को पूर्णता देने का प्रयास किया जाता। अधिकांश बंगाली पूजा की किसी भी तरह की आलोचना को यह कह कर दरकिनार कर देते हैं कि इस उत्सव का किसी धर्म से कोई लेनादेना नहीं है। हमसे कहा जाता है कि पूजा हिन्दू धर्म का नहीं बल्कि मस्ती का त्यौहार है और मस्ती करने से भला किसे इनकार हो सकता था। यह सब कहने-सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है परन्तु यह सच नहीं हैं। जो भी दुनिया में कहीं भी किसी भी पूजा पंडाल में गया है, वह यह जानता है कि वहां जो कुछ भी होता है, उसका निर्धारण धर्मग्रन्थ ही करते हैं – चाहे वह आरती का समय हो, लोगों का पहनावा या भोग के व्यंजन या पूजा का तरीका। पुरोहित हमेशा ब्राह्मण होता है और व्यवस्थाओं की बागडोर, वर्चस्वशाली जातियों के विवाहित लोगों की हाथों में होती है।

दुर्गा को एक स्त्रीवादी प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है: एक ऐसी रक्षक मां के रूप में, जो अपने 9 करोड़ बंगाली पुत्र-पुत्रियों की खातिर राक्षसों का संहार करती है। राज्य की मातृपूजक संस्कृति ने देवी को एक लाक्षणिक निहितार्थ दे दिया है और यह संस्कृति हर महिला और फिल्म अभिनेत्री में दुर्गा को ढूँढती है और यहाँ तक कि दुर्गा, होर्डिंगों में मारी बिस्कुट बेचती नज़र आतीं हैं।

परन्तु असल में दुर्गा हर महिला का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं और पूजो में बहिष्करण और लैंगिक भेदभाव पर आधारित अनुष्ठानों की भरमार है। इनमें से एक है सिन्दूर खेला – जिसे विद्या बालन की ‘कहानी’ ने प्रसिद्द कर दिया है – और जिसमें केवल विवाहित (और ऊंची जातियों की) महिलाएं ही भाग लेती हैं। मेरी मां आपको बतायेंगीं कि पूजो एक युद्धक्षेत्र भी है, जिसमें उन वर्गों का प्रवेश रोकने के लिए मोर्चाबंदी रहती है, जिन्हें बंगाली भद्रलोक पसंद नहीं करते यथा अविवाहित, तलाकशुदा और गरीब। छोटी-छोटी रस्में, जिनमें फल काटना, भोग तैयार करना, उसे परोसना और पुरोहित के साथ रहना आदि शामिल हैं, को तक अलग-अलग लोग अपनी-अपनी जागीरें समझते हैं। और अगर फिर भी हम पूरे उत्सव को केवल मस्ती और आनंद के मौके के रूप में देखते हैं तो उसका कारण है सामूहिक जूनून।

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दस अक्टूबर को कृष्णानगर के रहवासी संथाल दसई नृत्य का आनंद लेते हुए. छाया: अनिक शर्मा कश्यप

परन्तु इस त्यौहार के जिस पक्ष से सहमत होना सबसे कठिन है, वह है पाप और दुष्टता के प्रतीक नीले-हरे महिषासुर की हत्या। पूजा के पीछे पागल बंगालियों के दिमाग में महिषासुर के लिए इतनी कम जगह होती है कि अब तो मूर्ति निर्माताओं ने भी इस दानव को मनुष्याकार से भी छोटा बनाना शुरू कर दिया है। महिषासुर कोई साधारण आदमी नहीं है। उसे एक ऐसे आदिवासी राजा के रूप में देखा जाता है, जो एक आर्य देवी के हाथों मारा गया और झारखण्ड और पश्चिम बंगाल में असुर नामक एक जनजातीय समूह आज भी अपने इस न्यायप्रिय राजा को सम्मान से याद करते हैं। भारत के दलितों और आदिवासियों के लिए,  दुर्गा पूजा उनकी राजा की हत्या और एक विदेशी शक्ति द्वारा उनकी धरती पर कब्ज़ा ज़माने का भौंडा जश्न है।

हम हिंसा की इस याद पर स्त्रीवाद का मुल्लमा चढ़ा सकते हैं परन्तु इससे यह याद मिटने वाली नहीं है।हर साल देश के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग आदिवासी समुदाय, महिषासुर को याद करते हैं और उनकी आराधना करते हैं। कई दुर्गा पूजा के अवसर अपने घर के अन्दर बंद हो जाते हैं ताकि उन्हें उस यंत्रणा से न गुजरना पड़े, जिससे उनके पूर्वजों को गुजरना पड़ा था। परन्तु ये वैकल्पिक आख्यान बंगाल के पूजो के अधार्मिक आयोजकों के कानों तक नहीं पहुँचते।

पिछले कई सालों से मैं पूजा के अनुष्ठानों, जो मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा हैं, और हिंसा के इस इतिहास के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहा हूँ। पूजा पर वर्चस्वशाली जातियों के नियंत्रण से ही उसका लैंगिक चरित्र उभरा है। जाति और पितृसत्तात्मकता के परस्पर संबंधों से हम में से कौन वाकिफ नहीं है। और यही हमें यह भी बताता है कि दो सदियों पहले तक, मुख्यतः धनी ज़मींदारों द्वारा मनाया जाने वाला यह त्यौहार, क्यों और कैसे इस क्षेत्र की संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया।

युवा महिषासुर, चित्र : डॉ. लाल रत्नाकर
युवा महिषासुर, चित्र : डॉ. लाल रत्नाकर

दुर्गा पूजा, कमज़ोर वर्गों के खिलाफ वर्चस्वशाली समूहों की लम्बे समय से चली आ रही हिंसा का प्रतिनिधित्व करती है – वह गुलामी को औचित्यपूर्ण ठहराती है

इस वर्ष, जब मेरे कुछ मित्रों ने मुझे पुष्पांजली में भाग लेने के लिया चलने को कहा तो मैं कुछ हिचकिचाया । आखिर यह कैसे संभव है कि कोई उस देवी की पूजा करे जिसने अपनी तलवार आदिवासियों के राजा के सीने के आर-पार कर दी हो और कमज़ोर वर्गों के खिलाफ हिंसा का अपरोक्ष समर्थन न करे?आखिर हम आदिवासियों के खिलाफ रोज़ होने वाले अत्याचारों को कैसे भुला सकते हैं? हम यह कैसे भुला सकते हैं कि आधुनिकीकरण के उन्मत्त भगवान ने उन्हें उनकी रोज़ी-रोटी और घरबार से वंचित किया है? आप आखिर हत्या के जश्न में कैसे शामिल हो सकते हैं? मैंने अपने दोस्तों को कुछ बहाने बना दिए और पुष्पांजली के लिए देरी से पहुंचा । मुझे लगता है कि यह मेरी आखिरी दुर्गा पूजा होगी। आदिवासियों की हत्या का संस्कृति के नाम पर महिमामंडन बंद होना चाहिए।

(यह लेख 10 अक्टूबर, 2016 के हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुआ था और लेखक की अनुमति से यहाँ पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है) 


महिषासुर से संबंधित विस्तृत जानकारी के लिए  ‘महिषासुर: एक जननायक’ शीर्षक किताब देखें। द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन, वर्धा/ दिल्‍ली। मोबाइल  : 9968527911ऑनलाइन आर्डर करने के लिए यहाँ  जाएँ : महिषासुर : एक जननायकइस किताब का अंग्रेजी संस्करण भी ‘Mahishasur: A people’s Hero’ शीर्षक से उपलब्ध है।

लेखक के बारे में

ध्रुबो ज्योति

पत्रकार ध्रुबो ज्योति 'हिंदुस्तान टाइम्स' से संबद्ध हैं।

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