क्यों न मनाएं हम राष्ट्रीय छलकपट दिवस?

गांधी या उनकी शिक्षाओं पर प्रश्नचिन्ह लगाना, हमारे देश में ईशनिंदा के समकक्ष समझा जाता है। यह प्रवृत्ति वैचारिक गुलामी की निशानी है। जहां तक शूद्रों की गुलामी की जंज़ीरों के महिमामंडन का प्रश्न है, गांधी ने मनु को भी मीलों पीछे छोड़ दिया था। हमारे सामने नंगी तलवार लिए खड़ा दुश्मन, एक ऐसे दुश्मन से हमेशा बेहतर होता है, जो देवदूत का रूप धरे हो और पवित्र ग्रंथों का जाप कर रहा हो

हमारी दुनिया के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जिसे उतनी घृणा की दृष्टि से देखा जाता है, जितना कि हिटलर को। हिटलर ने एक सनातन सत्य को उद्घाटित करते हुए कहा था कि ‘‘जनसाधारण किसी बड़े झूठ पर, किसी छोटे झूठ की तुलना में, कहीं अधिक आसानी से विश्वास कर लेता है, विशेषकर यदि उसे बार-बार दोहराया जाए’’। जो लोग धर्म और देशभक्ति के नाम पर जन सामान्य को मूर्ख बनाते हैं, उनका उद्देश्य केवल अपना हितसाधन होता है। इस धोखे के शिकार आमजन, उनके झूठ का पर्दाफाश करना तो दूर, उसे समझ ही नहीं पाते क्योंकि इन कपटियों और ढोंगियों के चारों ओर उनके भक्त और राज्य एक अभेद्य दीवार खड़ी कर देते हैं। भारत में यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति एक लंबे समय से बनी हुई है और शायद अगले कई दशकों तक बनी रहेगी। यह ढोंगियों और पाखंडियों के हित में है कि देश के नागरिक निरक्षर और अज्ञानी बने रहें।

हमारे देश के भोले-भाले नागरिकों को, देश के दुश्मन सदियों से ठगते आए हैं। इनमें से एक था वह व्यक्ति, जिसे आज साधु, अहिंसा का अग्रदूत और राष्ट्रपिता कहा जाता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस ऐतिहासिक व्यक्तित्व ने हमारे देश के सबसे वंचित और निम्न लोगों को ठगा-उन लोगों को, जो इस देश के सबसे अभागे नागरिक थे।

उसके पाखंड को देखिएः ‘‘वे शूद्र, जो अपने धार्मिक कर्तव्य बतौर केवल (ऊँची जातियों की) सेवा करते हैं, जिनकी कोई संपत्ति नहीं होती और जिन्हें कुछ पाने की महत्वाकांक्षा नहीं होती, वे हमारे शत-शत प्रणाम के अधिकारी हैं। देवता भी उन पर पुष्पों की वर्षा करेंगे’’।[1]  यह कथन, हिटलर की उपरलिखित भविष्यवाणी और नुस्खे के अनुरूप है। उस पर किसी ने प्रश्न नहीं उठाए। उसका कद इतना ऊँचा है कि आम आदमी उस तक पहुंच ही नहीं सकता; उसे कोई चुनौती नहीं दे सकता; उस पर संदेह करने वालों का मुंह बंद कर दिया जाता है। उस पर या उसकी शिक्षाओं पर प्रश्नचिन्ह लगाना, हमारे देश में ईशनिंदा के समकक्ष समझा जाता है। यह प्रवृत्ति वैचारिक गुलामी की निशानी है। जहां तक शूद्रों की गुलामी की जंज़ीरों के महिमामंडन का प्रश्न है, गांधी ने मनु को भी मीलों पीछे छोड़ दिया था। हमारे सामने नंगी तलवार लिए खड़ा दुश्मन, एक ऐसे दुश्मन से कहीं बेहतर है, जो देवदूत का रूप धरे हो और पवित्र ग्रंथों का जाप कर रहा हो।

उसके बाद महात्मा, भंगियों के प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त करते हैं: ‘‘मैंने कई बार यह कहा है कि अगर मुझे इस जन्म में मुक्ति नहीं मिलती तो मेरी यह इच्छा है कि अगले जन्म में मैं भंगी के रूप में जन्म लूं। मैं वर्णाश्रम धर्म और उससे जुड़े जन्म और कर्म के सिद्धांतों में विश्वास करता हूं परंतु मैं यह मानने को तैयार नहीं हूं कि भंगी, पापी होते हैं। इसके विपरीत, मैं ऐसे अनेक भंगियों को जानता हूं, जो मेरी श्रद्धा के पात्र हो सकते हैं और ऐसे कई ब्राह्मणों को भी, जिनकी प्रशंसा करने के लिए, कोई कारण ढूंढना बहुत कठिन होगा। मैं भंगी के रूप में जन्म लेकर भंगियों की अधिक सेवा कर सकूंगा और मैं अन्य समुदायों को भंगियों को सही नज़रिए से देखना सिखा सकूंगा। ऐसा करना अधिक मुश्किल होगा, यदि मैं ब्राह्मण के रूप में जन्म लूं। मैं भंगियों की कई तरह से सेवा करना चाहता हूं परंतु मैं उन्हें यह सलाह कदापि नहीं दूंगा कि वे ब्राह्मणों से नफरत करें या उनका तिरस्कार करें। घृणा हमेशा गहरी पीड़ा को जन्म देती है। मैं भंगियों का उत्थान करना चाहता हूं परंतु मैं नहीं चाहूंगा कि वे पश्चिम की तरह, अपने अधिकार, छीन कर हासिल करें। उस तरीके से कुछ भी करना, हमारे धर्म के अनुरूप नहीं है।’’[2]

इस कुत्सित घोषणा पर चढ़ाया गया धर्म का मुलम्मा चकित कर देने वाला है। अपने निहित स्वार्थों के कारण, बुद्धिजीवी वर्ग, अक्सर, राष्ट्रीय नायकों को इस रूप में प्रस्तुत करते हैं मानो उनके आचरण और चरित्र में तनिक सी भी त्रुटि या कमी न हो और उनकी झकों और सनकों को भी आध्यात्मिक ज्ञान बताया जाता है। अगला जन्म और पुनर्जन्म जैसी कल्पनाएं, हिन्दू धर्मग्रंथों द्वारा प्रचारित सबसे भयावह अवधारणाएं और शुद्ध झूठ हैं। परंतु समस्या यह है कि इन अवधारणाओं का सत्यापन या पड़ताल करने का कोई तरीका हमारे पास नहीं है और न ही ये ग्रंथ हमें इसकी इजाज़त देते हैं।

दशकों बाद, गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इन्हीं झूठों का इस्तेमाल, भंगियों के लिए अपनी सरकार की योजनाओं को प्रस्तुत करते हुए किया। ‘‘मैं यह नहीं मानता कि वे (वाल्मीकि) यह काम अपने जीवीकोपार्जन के लिए करते हैं। अगर ऐसा होता, तो वे पीढ़ी दर पीढ़ी यही काम न करते रहते। किसी न किसी वक्त, उनमें से किसी को यह ज्ञान मिला होगा कि ईश्वर और पूरे समाज की प्रसन्नता और भलाई के लिए यह काम करना उनका कर्तव्य है और जो ज़िम्मेदारी उन्हें ईश्वर ने सौंपी है, उसे उन्हें पूरा करना होगा। सफाई का यह आध्यात्मिक काम वे सदियों तक करते रहे, बिना यह समझे कि वे एक आध्यात्मिक कार्य कर रहे हैं। यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहा होगा। यह विश्वास करना असंभव है कि उनके पूर्वजों के सामने कोई और काम करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था।’’  [3]

गुजरात की पवित्र भूमि पर पैदा हुए दो महान नेताओं, जिनमें से एक का जन्म दूसरे की मृत्यु के बाद हुआ था, एकसे विचारों का प्रतिपादन करते हैं।

गांधी के हरिजन प्रेम की कीमत

गांधीजी पर भंगियों की दुर्दशा ने कितना गहरा प्रभाव डाला, उसे रेखांकित करने के लिए लैरी कोलिन्स और डोमिनीक लेपायर ने गहन शोध कर जो पता लगाया, उस पर ध्यान दें। प्रसिद्ध कवियत्री, स्वाधीनता संग्राम सेनानी और वक्ता सरोजिनी नायडू, गांधी के प्रमुख सहयोगियों में से एक थीं। गांधी ने उन्हें ‘भारत की बुलबुल’ की संज्ञा दी थी। दिल्ली पहुंचने के कुछ समय बाद, गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन ने एक बैठक के दौरान सरोजिनी नायडू से पूछा कि गांधी जिस तरह गरीबी में रहने की ज़िद पर अड़े रहते हैं, उसके चलते, कांग्रेस, उन्हें सुरक्षा कैसे प्रदान करेगी। सरोजिनी नायडू ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘आपको और गांधी को ऐसा लग सकता है कि जब वे कलकत्ता स्टेशन के प्लेटफार्म पर यात्रियों से भरे थर्ड क्लास के डिब्बे की तलाश कर रहे होते हैं, तब वे अकेले होते हैं और उनकी सुरक्षा का कोई इंतज़ाम नहीं होता। जो वे नहीं जानते वह यह है, कि उनके पीछे-पीछे अछूतों की तरह कपड़े पहने हमारे आदमी होते हैं, जो उनके साथ ट्रेन के डिब्बे में घुसते हैं।’’ सरोजनी नायडू ने गांधी की कलई खोलते हुए मांउटबेटन को बताया कि ‘‘जब वे दिल्ली की भंगी बस्ती में रहने गए, तो हरिजनों के पहनावे में दर्जनों कांग्रेस कार्यकर्ता उनके साथ वहां रहने भेजे गए। प्रिय लार्ड लुई, आप कभी नहीं जान सकेंगे कि कांग्रेस को उस बूढ़े आदमी को गरीबी में रखने के लिए कितना खर्च करना पड़ता है।’’  [4] भारत की बुलबुल ने महात्मा का सच बयान कर दिया। बेचारे महात्मा! उन्हें उनकी ही कांग्रेस पार्टी ने कितना बेवकूफ बनाया।

गांधी का अछूतों के प्रति प्रेम इतना था कि वे उनको, उनके भाई-बंधुओं से भी सुरक्षित रखना चाहते थे! रामेश्वर अग्निभोज नामक एक स्नातक और जानेमाने स्वाधीनता संग्राम सैनानी को डा. नारायण भास्कर खरे के मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। डा. खरे, सेंट्रल प्राविन्सेज एंड बरार के अगस्त 1937 से जुलाई 1938 तक मुख्यमंत्री (तब राज्य सरकारों के मुखियों को प्रधानमंत्री कहा जाता था) थे। गांधी ने अग्निभोज को मंत्री बनाने के लिए खरे को सार्वजनिक रूप से फटकारा। उन्होंने कहा कि वे ‘‘अनुसूचित जाति के सदस्यों में इस तरह की उच्च महत्वाकांक्षाएं पैदा किए जाने के खिलाफ हैं।’’ [5] खरे इससे इतना घबरा गए कि उन्होंने कांग्रेस के इस ज़िद्दी तानाशाह को प्रसन्न करने के लिए अपनी मंत्रीपरिषद को तुरंत भंग कर दिया। स्पष्टतः, गांधी जानते थे कि महत्वाकांक्षा अछूतों के लिए बुरी है और द्विजों के लिए अच्छी!  क्यों न महात्मा के पाखंड और कपट का जश्न मनाने के लिए एक दिन निर्धारित कर दिया जाए?

[1]. डा.  बी.आर. अंबेडकर, राईटिंग्स एंड स्पीचीज़, खंड 9, महाराष्ट्र शासन, बंबई, पृष्ठ 376

[2].  ‘नवजीवन’, 11 जनवरी, 1912 (‘डे टू डे गांधी’, महादेव एच देसाई, खंड 5, पृष्ठ 334)

[3] . द टेलिग्राफ, कलकत्ता, 21 अगस्त, 2016, ‘‘स्केवेंजिंग जेब एट मोदी’’, आंदोलनकारियों ने गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कार्पोरेशन द्वारा नवंबर, 2007 में प्रकाशित ‘साधना पर्व’ पुस्तक के पृष्ठ 48-49 पर प्रकाशित सामग्री का हवाला दिया।

[4] . लेपायर, डामिनीक व लैरी कोलिन्स, फ्रीडम एट मिडनाइट, 1975

[5]. वाह्ट कांगे्रस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स, बी.आर. अंबेडकर, राईटिंग्स एंड स्पीचीज़ खंड 9, पृष्ठ 98


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