क्या आप विवाह की कीमत पर बहस में जीत रहे हैं?

विवाद, हमारी अंतरंगता में वृद्धि कर रिश्ते को बेहतर बना सकता है, अगर हम दोस्ती का हाथ बढ़ाना सीख लें

अपने जीवनसाथी से हमारी मतभिन्नता होना स्वाभाविक है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं-काम करने के तरीके, शब्दों का इस्तेमाल अथवा उनके निर्णय या अपेक्षाएं। मतभिन्नता के कारण हम क्रोधित, परेशान, दु:खी या चिड़चिड़े हो सकते हैं। अक्सर हमारी पहली प्रतिक्रिया होती है शब्द बाणों का जवाब शब्द बाणों से देना। आप चिल्लाते हैं, मैं ज्यादा जोर से चिल्लाता हूं। आप मुझे दोषी ठहराते हैं, मैं आपको और ज्यादा दोषी ठहराता हूं। आप मुझे नजरअंदाज करते हैं, मैं आपको नजरअंदाज करता हूं। आप चुप्पी साध लेते हैं, मैं चुप्पी साध लेता हूं। नतीजा यह होता है कि अपने जीवनसाथी के प्रति संवेदनशीलता और सहृदयता से व्यवहार करने की इच्छा के बावजूद हम आपस में लड़ बैठते हैं। इससे हमारा स्वास्थ्य तो प्रभावित होता ही है, हमारे विवाह, हमारे बच्चों, हमारे कामकाज और यहां तक कि हमारे सहकर्मियों से हमारे रिश्तों पर भी इसका असर पड़ता है।

हम विवादों से डरते हैं और उन्हें गलत मानते हैं। परंतु सच यह है कि विवाद इस बात का सुबूत हैं कि हम दोनों एक-दूसरे से अलग हैं और स्वतंत्र रूप से विचार करने में सक्षम हैं। समस्या विवाद नहीं है बल्कि यह है कि हम विवाद से कैसे निपटें। विवाद, हमारी अंतरंगता में वृद्धि कर सकते है और हमारे रिश्ते को बेहतर बना सकते हैं अगर हम दोस्ती का हाथ बढ़ाना सीख लें।

जब भी आप निराश होते हैं, आपको धक्का या चोट पहुंचती है, तो आपकी पहली प्रतिक्रिया बदला लेने की होती है, क्योंकि वह आत्मरक्षा का एक तरीका है। अहं और अंहकार के कारण हम हर युद्ध को हमेशा जीतना चाहते हैं। हम कठोर शब्दों का प्रयोग करते हैं और उन शब्दों का हमारे जीवनसाथी पर प्रभाव को देख आनंदित होते हैं। ”तुम अपने पिता से घृणा करते थे। बहुत अच्छे! तुम बिल्कुल उनके जैसे हो” या ”तुम कभी मेरी मां जैसी नहीं बन सकतीं। वे हमारे घर और हम बच्चों की अकेले देखभाल करतीं थीं और तुम तो हमेशा शिकायत ही करती रहती हो जबकि तुम्हारे पास करने-धरने को कुछ है ही नहीं”।

बदला लेने की भावना के अपने लाभ हैं परंतु इससे हमारे वैवाहिक संबंध स्वस्थ्य और बेहतर नहीं बनेंगे। उल्टे, इससे हमारा परस्पर सम्मान, विश्वास और अंतरंगता कम होगी और हमारे संबंधों में कटुता घुल जाएगी। हम एक-दूसरे से दूर हो जाएंगे और इस दूरी को पाटना कठिन हो जाएगा।

तो फिर रास्ता क्या है? अगर आप अपने जीवनसाथी से प्रेम करते हैं और अपने वैवाहिक संबंधों को महत्व देते हैं तो आपको बदला लेने की भावना पर नियंत्रण करना होगा और समझौते का हाथ बढ़ाने के लिए तैयार रहना होगा।

समझौते की राह

1. सबसे पहले, हमें यह निर्णय करना होगा कि ‘हम जीतें’ या ‘मैं जीतूं, तुम हारो’। ज्योहीं आपका फोकस मुझसे हटकर हम पर जाएगा, आप अगला कदम उठाने के लिए तैयार हो जाएंगे। समझौते का उद्देश्य है वैवाहिक संबंधों में अंतरंगता, परस्पर सम्मान और आपसी विश्वास की पुनर्स्थापना।

2. अगला कदम है शांति स्थापना की पहल। इसका इंतजार न करें कि आपका जीवनसाथी आपसे सॉरी कहे या कम से कम आपसे बातचीत करने लगे ताकि आप उससे माफी मांग सकें। पहल कीजिए, पहला कदम उठाइए। इसका कतई यह अर्थ नहीं है कि आप कमजोर या असहाय हैं बल्कि इससे यही सिद्ध होता है कि आप साहसी और उदार हैं। अपने अहं को समस्याओं के सुलझाव में बाधक न बनने दें। कई दंपति एक ही छत के नीचे अलग-अलग जिंदगियां जीते रहते हैं क्योंकि उनका अहं उन्हें पहल करने की इजाजत नहीं देता। अहंकार, वैवाहिक संबंधों को पतन की ओर ले जाता है।

”ठीक है, मैं माफी चाहता हूं। आओ हम सब भूलकर जिंदगी को आगे बढ़ाएं”, ”ठीक है, मैं तुम्हें माफ करती हूं। ऐसा फिर न करना।” इस पहले कदम से पूरी समस्या नहीं सुलझेगी। आपका उद्देश्य विवाद का पटाक्षेप करना है न कि कड़वा घूंट पीकर चुप रह जाना। खुले दिल और ईमानदारी से बातचीत करें ताकि आप दोनों की चोटों पर मरहम लग सके और अंतरंगता में वृद्धि हो।

3. अत: तीसरा कदम है, अपने जीवनसाथी की भावनाओं से सहानुभूति रखना और उसके दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करना। आप उसके विचार से सहमत हों यह आवश्यक नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि आप उसके विचार को समझें और स्वीकार करें। इसके लिए यह आवश्यक है कि आप उसकी बात को बिना टोकाटाकी के सुनें। स्वयं को सही ठहराने की कोशिश न करें। जब आप अपना दृष्टिकोण बताएं, तब इस तरह के आरोप लगाने से बचें ”तुमने यह किया…”, ”तुम्हारे कारण यह हुआ…”। इसकी जगह, आप केवल अपनी भावनाओं को व्यक्त करें। ”मुझे बुरा लगा जब तुमने मुझसे कहा कि…”, ”मुझे गुस्सा आया जब तुमने मेरे मित्रों के सामने मेरी बात को हवा में उड़ा दिया”।

4. विवाद में अपनी भूमिका की जिम्मेदारी लीजिए। किसी भी रिश्ते में ऐसा कभी नहीं होता कि ”मैं बिल्कुल सही हूं”, ”तुम बिल्कुल गलत हो”। अगर हम ईमानदारी से सोचेंगे तो हमें समझ आएगा कि हम वह या यह बात बेहतर शब्दों में भी कह सकते थे। अगर आप विवाद में अपनी भूमिका की जिम्मेदारी स्वीकार कर लेंगे तो दूसरे व्यक्ति को अपना बचाव नहीं करना पड़ेगा और उसके लिए अपनी कमजोरियों को स्वीकार करना आसान हो जाएगा। जब आप किसी भी विवाद पर चर्चा करें तो बहुत जरूरी है कि आप ”कभी सामने वाले व्यक्ति पर हमला न करें”। आप एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं। आप एक ही टीम के सदस्य हैं और आपके समक्ष उपस्थित समस्या का समाधान कर अपने रिश्ते को मजबूती देना चाहते हैं। अपने जीवनसाथी को दोषी ठहराना या उस पर कोई लेबल चस्पा करना उसके आत्मसम्मान को चोट पहुंचा सकता है और आपके प्रति उसके प्रेम को प्रभावित कर सकता है।

5. अंत में आपको यह समझना होगा कि आपका लक्ष्य विवाद को सुलझाना नहीं बल्कि अपने जीवनसाथी से समझौता करना है। आप अपने जीवनसाथी से इसलिए बात नहीं कर रहे हैं ताकि आप किसी समस्या का हल ढूंढ सकें या यह तय कर सकें कि किसने गलती की और किसमें सुधार की जरूरत है। आप बातचीत इसलिए करते हैं ताकि आपकी अंतरंगता बढ़े और मतविभिन्नता के बावजूद आप एक-दूसरे के नजदीक आ सकें। अगर आपके रिश्ते स्वस्थ्य और प्रेमपूर्ण होंगे तो समस्याओं का हल तो निकल ही आएगा। परंतु यदि आप एक-दूसरे से युद्धरत रहेंगे और एक दूसरे को दोषी ठहराते रहेंगे तो कोई समस्या कभी नहीं सुलझेगी।

जब आप समझौते की राह पर चलते हैं तो आपके बीच विश्वास कायम होता है, परस्पर सम्मान और प्रेम जागता है व अंतरंगता बढ़ती है। जब यह होता है तो कई बार जिन मुद्दों पर हम विवाद करते हैं, वे हमें बहुत महत्वहीन लगने लगते हैं। जब हमारा विवाह सुरक्षित रहेगा और हमें हमारी कमियों के साथ स्वीकार किया जाएगा और हमसे प्रेम किया जाएगा तब बिस्तर पर पड़ी गीली तौलिया और सिंक में डले बालों के गुच्छे हमारी रातों की नींद हराम नहीं करेंगे।

आपको और आपके जीवनसाथी को चाहिए कि लड़ाई में जीत के अस्थायी आनंद की बजाए आप समझौते के स्थायी आनंद को पाने की कोशिश करें।

 

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी 2015 अंक में प्रकाशित)


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