फॉरवर्ड प्रेस

गणपतिचंद्र गुप्त बनाम रामचंद्र शुक्ल

गणपतिचंद्र गुप्त

गणपतिचंद्र गुप्त हिंदी के प्रखर आलोचक हैं। उन्होंने महाकवि बिहारी पर शोधकार्य किया था तथा साहित्य-विज्ञान पर डीलिट की उपाधि प्राप्त की थी। वे ओबीसी वैश्य समुदाय में पैदा हुए और पंजाब विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर थे। ओबीसी वैश्य समुदाय में पैदा हुए डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त की हिंदी आलोचना पर कई पुस्तकें प्रकाशित हैं। साहित्यिक निबंध, हिंदी काव्य में शृंगार-परंपरा और महाकवि बिहारी, हिंदी साहित्य : समस्याएं और समाधान, साहित्य विज्ञान, साहित्य की आत्मा, साहित्य के तत्व, साहित्य की शैली आदि उनकी प्रमुख आलोचनात्मक कृतियां हैं। उन्होंने ‘आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी : व्यक्तित्व एवं साहित्य’ का संपादन भी किया था। किंतु उन्हें असाधारण ख्याति ‘हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास’ (1965 ई) से मिली। ज्ञातव्य है कि उन्होंने हिंदी साहित्य का ‘समीक्षात्मक’, ‘आलोचनात्मक’ अथवा ‘नया’ इतिहास नहीं लिखा है, जैसा कि हिंदी साहित्य के अन्य द्विज इतिहासकार लिखते रहे हैं बल्कि उन्होंने ‘वैज्ञानिक’ इतिहास लिखा है।

कथित रामकाव्य परंपरा का वैज्ञानिक विश्लेषण

रामचंद्र शुक्ल

डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त ने लिखा है कि मध्यकाल की अनेक काव्य-परंपराओं के प्रचलित नामकरण पर विचार होना चाहिए। उदाहरण के लिए, रामभक्ति काव्यधारा को लीजिए। रामचंद्र शुक्ल के अनुसार इस धारा की प्रतिष्ठा तुलसीदास के द्वारा हुई और यह लगभग उन्हीं के साथ समाप्त हो गई-क्योंकि बाद में किसी का साहस ही नहीं हुआ कि वह तुलसी की प्रतिद्वंद्विता में उतरता। तुलसीदास के अतिरिक्त इस धारा में तीन-चार कवियों का नाम और गिनाया जाता है, जिनमें से किसी ने नाटक लिखा और किसी ने मुक्तक। वस्तुत: इतिहास में परंपरा या धारा उसे कहते हैं जिसमें एक जैसी विषयवस्तु, पद्धति एवं शैली में कम से कम आठ-दस रचनाएं अवश्य मिलती हों, पर यह बात रामकाव्य परंपरा पर लागू नहीं होती। शुक्ल इस बात से वाकिफ थे कि रामकाव्य धारा की स्थापना गलत प्रयास है, पर जातिवाद का संस्कार इतना बलशाली होता है कि उसने आखिरकार सब कुछ जानते हुए भी उन जैसे धीर-गंभीर इतिहासकार से ‘रामकाव्य परंपरा’ का कपोल-कल्पित मिथ रचवा डाला। इसीलिए गणपतिचंद्र गुप्त ने इस काव्यधारा को वैज्ञानिक दृष्टि से आंकते हुए इसका नामकरण ‘राम काव्य परंपरा’ न करके ‘पौराणिक प्रबंध काव्य परंपरा’ किया है। कारण कि मध्यकालीन हिंदी साहित्य में रामकाव्य से कई गुना समृद्ध काव्य परंपरा शिवभक्ति-काव्य, भक्ति-काव्य और हनुमद्भक्ति-काव्य की रही है। शिव, शक्ति और हनुमान से संबंधित ग्रंथों की संख्या प्रत्येक की अलग-अलग कोई 25 से 50 के बीच है, जबकि राम से संबंधित ग्रंथों की संख्या फुटकल सहित दर्जनभर भी नहीं है।

हिंदी साहित्य में प्रांतवाद और जातिवाद

मैथिलीशरण गुप्त

हिंदी साहित्य के इतिहास को प्रांतवाद या जातिवाद के ढांचे में गढऩा एक ज्वलंत धारा को काठ के शिकंजे में कसना है। ऐसा इतिहास एक तरफ उभरा हुआ, दूसरी तरफ चिपका हुआ और बीच-बीच में उखड़ा हुआ आइना है, जो असली तस्वीर को अत्यंत विरूप बनाकर दिखाता है। रामचंद्र शुक्ल का इतिहास-ग्रंथ ब्राह्मण-कवियों की प्रशंसा से भरा पड़ा है। उनकी पुस्तक में सर्वाधिक पन्ने दो कवियों पर खर्च किए गए हैं-एक तुलसीदास और दूसरा सुमित्रानंदन पंत। अकेले तुलसीदास ऐसे कवि हैं जिन्हें शुक्ल जी ने उन्नीस पन्ने दिए हैं और ठीक उन्नीस पन्ने ही आधुनिक काल में उन्होंने सुमित्रानंदन पंत को दिए हैं। छायावादी कवियों में से प्रसाद, निराला और महादेवी वर्मा तीनों मिलकर शुक्ल जी के इतिहास-ग्रंथ में उन्नीस पन्ने छेंकते हैं, जबकि सुमित्रानंदन पंत अकेले उन्नीस पन्ने के हकदार हो बैठे हैं। गणपतिचंद्र गुप्त ने अपने इतिहास-ग्रंथ में जयशंकर प्रसाद को आधुनिक हिंदी कवियों में सर्वोच्च स्थान दिया है और लिखा है कि जयशंकर प्रसाद छायावाद के तो प्रवर्तक एवं सर्वश्रेष्ठ कवि माने ही जाते हैं, अन्य वर्गों के कवि भी उनकी बराबरी करने में असमर्थ हैं। उन्होंने अपने इतिहास-ग्रंथ में जयशंकर प्रसाद को कुल मिलाकर ग्यारह पन्ने दिए हैं, जबकि सुमित्रानंदन पंत को चार पन्ने दिए हैं जितना के वे वास्तव में हकदार हैं।

सुना है कि भारत के मर्यादावादी समाज में महिलाएं अपने पति का नाम नहीं लेती हैं। पर पता नहीं क्यों आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहानी ‘दुलाईवाली’ की लेखिका के रुप में बंग महिला का वास्तविक नाम नहीं बताते हैं। वर्षों बाद यह पता चला कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा वर्णित बंग महिला का असली नाम राजेन्द्रबाला घोष है। वे मिर्जापुर में किरायेदार के रूप में रहा करती थीं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का घर बंग महिला के घर के नजदीक था। वे रामचन्द्र शुक्ल के काफी निकट थीं। इसलिए उन्होंने 1910 में बंग महिला की रचनाओं का एक विशिष्ट भूमिका के साथ संकलन-संपादन किया था। वे सुंदर थीं और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से दो साल बड़ी थीं। बहरहाल आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अपने इतिहास ग्रंथ में हिंदी कहानी का इतिहास लिखते वक्त प्राय: मिर्जापुर के कहानीकारों का इतिहास लिख जाते हैं। शुक्ल के इतिहास में जिन प्रारंभिक पांच कहानीकारों की चर्चा है, उनमें से तीन मिर्जापुर में रहते थे, जहां वे स्वयं रहा करते थे। मास्टर भगवान दास (प्लेग की चुड़ैल 1902) आचार्य शुक्ल के सहपाठी थे और मिर्जापुर के थे। राजेन्द्रबाला घोष (दुलाईवाली 1907) भी मिर्जापुर में रहा करती थीं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल (ग्यारह वर्ष का समय 1903) भी उस वक्त मिर्जापुर में रहा करते थे। कहानीकार किशोरीलाल गोस्वामी (इन्दुमती 1900) काशी के थे और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने उन्हें हिंदी का प्रथम कहानीकार बताया है। दरअसल पंडित श्रीलाल कृत ‘धर्मसिंह का वृत्तांत’ हिंदी की पहली कहानी है, जिसका तीसरा संस्करण 1853 में आगरा से प्रकाशित हुआ था। तब किशोरीलाल गोस्वामी (1865-1932) का जन्म भी नहीं हुआ था। स्पष्ट है कि शुक्ल के इतिहास में क्षेत्रवाद का बोलबाला है वरना कहानी का इतिहास लिखते वक्त वे सिर्फ मिर्जापुर का इतिहास नहीं लिखते। इसके साथ ही उनका कहानियों का इतिहास सिर्फ एक पत्रिका ‘सरस्वती’ का इतिहास है। दाएं-बाएं जाने पर शुक्ल को और भी कहानियां मिल सकती थीं पर पता नहीं वे गए क्यों नहीं। इतिहास गवाह है कि शुक्ल से बहुत पहले 1881-90 में सिर्फ संयुक्त प्रांत में प्रकाशित होनेवाली उर्दू पुस्तकों की संख्या हिंदी की 2793 की तुलना में 4380 थी। इसी तरह उर्दू के 16256 सामाचारपत्र निकलते थे तो हिंदी के 8002।

कवि लक्ष्मीनारायण कुशवाहा

द्विवेदी-मंडल के कवियों की चर्चा करते हुए डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त ने लिखा है कि इस मंडल के कवियों द्वारा रचित प्रबंधात्मक काव्यों एवं कविताओं की संख्या बहुत बड़ी है। आदर्शमूलक प्रबंध-काव्यों की यह परंपरा द्विवेदी युग के बाद भी विकसित होती रही है। इसी क्रम में वे कवि लक्ष्मीनारायण कुशवाहा का नामोल्लेख करते हैं। कवि लक्ष्मीनारायण कुशवाहा का नामोल्लेख हिंदी साहित्य का कोई भी वर्णवादी इतिहास-ग्रंथ नहीं करता है। डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त ने लिखा है कि लक्ष्मीनारायण कुशवाहा का ‘तात्या टोपे’ (1957 ई) वीर रस एवं राष्ट्रीय क्रांति के भावों से ओत-प्रोत अत्यंत सशक्त रचना है। यह 31 आहुतियों (सर्गों) में विभाजित है। इसके आगे उन्होंने कवि लक्ष्मीनारायण कुशवाहा की कुछ कविताएं उद्धृत की हैं। सचमुच कवि लक्ष्मीनारायण कुशवाहा की कविताएं सांस्कृतिक अभ्युत्थान और राष्ट्रीय जागरण का एक विराट अननुष्ठान हैं, पर ऐसे कवि को अन्य इतिहासकारों द्वारा इतिहास-ग्रंथ में जगह नहीं देना जातीय संकीर्णता का ही परिचायक है।

हिंदी के प्रथम कवि

जयशंकर प्रसाद

हिंदी के प्रथम कवि और रचना को लेकर इतिहास-ग्रंथ में भारी जातिगत एवं क्षेत्रगत मारामारी हुई है। रामचंद्र शुक्ल हिंदी के प्रथम कवि के मामले पर सावधानीपूर्वक चुप हैं, परंतु वे ऐसा लिखते हैं कि मानो मुंज (973-996 ई.) और भोज (1010-1055 ई.) हिंदी के कोई बड़े कवि हों। उन्होंने अपने इतिहास-ग्रंथ में लिखा है कि मुंज और भोज के समय (संवत् 1050 के लगभग) में तो ऐसी अपभ्रंश या पुरानी हिंदी का पूरा प्रचार उपयोग शुद्व साहित्य या काव्य रचनाओं में भी पाया जाता है। अत: हिंदी साहित्य का आदिकाल संवत् 1050 से लेकर 1375 तक अर्थात् महाराज भोज के समय से लेकर हम्मीरदेव के समय के कुछ पीछे तक माना जा सकता है। जाहिर है कि मुंज और भोज पहले राजा हैं, गौण रूप से रचनाकार हैं। वर्णाश्रमी पोषक इतिहासकारों की ऐसी स्थापना हिंदी साहित्य के आरंभ को लेकर इसलिए है कि मुंज और भोज मध्यदेश के ब्राह्मण थे और अनेक मंदिरों के निर्माता थे। डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त ने ऐसी ब्राह्मणमूलक स्थापना को खंडित करते हुए लिखा है कि हिंदी साहित्य के इतिहास का आरंभ किसी हिंदी प्रदेश से न होकर गुर्जर-भूमि के जैन-कवियों की रचनाओं से होता है। इतिहास गवाह है कि जैन कवियों में अधिकांश वैश्य परिवार में जन्में हैं। सचमुच कई शताब्दियों तक समाज और इतिहास की नियति को किसी देवता के हस्तक्षेप अथवा महान पुरुषों के आधार पर समझा गया है। श्रेष्ठ लेखकों के प्रसंग में भी इतिहास सिर्फ राजनीतिक घटनाओं का वर्णन और उनकी व्याख्या था, तब राजा-रानी के वृत्तांत को इतिहास समझा जाता था। शुक्ल ने हिंदी साहित्य के आरंभ को राजा मुंज और भोज से जोड़कर ऐसा ही किया है। ऐसा इतिहास (सामाजिक विज्ञान के संदर्भ में) वस्तुत: राजनीतिक शक्ति मात्र का इतिहास होता है, जो भारी पैमाने पर हुई हत्याओं तथा अपराधों के इतिहास से भिन्न नहीं है।

ओबीसी कवियों पर लांछन

रसखान हिंदी के पहले समलैंगिक कवि हैं। ऐसी स्थापना रामचंद्र शुक्ल ने अपने इतिहास ग्रंथ में की है। ऐसी स्थापना के लिए उन्होंने एक सांप्रदायिक गद्य-ग्रंथ को आधार बनाया है जिसमें दर्ज है कि रसखान पहले एक बनिए के लड़के पर आसक्त थे, सदा उसी के पीछे-पीछे फि रा करते और उसका जूठा खाया करते थे। गोस्वामी बिट्ठलनाथ से दीक्षित होने के बाद इनका चरित्र-परिवर्तन हो गया। जाहिर है कि रसखान को समलैंगिक कवि साबित करने का एकमात्र साक्ष्य गोस्वामी बिट्ठलनाथ की सांप्रदायिक-परंपरा का गद्य-ग्रंथ ही है। किसी कवि के निजी जीवन पर इस प्रकार का कीचड़ उछालना आलोचना की कौन-सी पद्धति है। कबीर को खंडन-मंडन का कवि बताए जाने पर तो ‘फारवर्ड प्रेस’ ने बहस चलाई है। इस पर भी विमर्श होना चाहिए। हिंदी में अष्टछाप के कवियों का महत्वपूर्ण स्थान है। अष्टछाप के कवियों में सूरदास, नंददास, परमानंददास, छीत स्वामी और गोविंददास ब्राह्मण थे। कुंभनदास और चतुर्भुजदास क्षत्रिय थे। सिर्फ कृष्णदास कुनबी जाति के ओबीसी कवि थे। इन्हें डकैत बताया गया है। इन पर यह भी आरोप है कि वे आगजनी किया करते थे। ऐसा आरोप अष्टछाप के किसी भी कवि पर नहीं लगा है। हिंदी साहित्य में आलोचना की यह कौन-सी पद्धति है?

अष्टछाप और त्रयी

हिंदी साहित्य में ‘अष्टछाप’ की अवधारणा आई और कई ‘त्रयी’ बनाए गए। ‘अष्टछाप’ के आठ कवियों में सात सवर्ण हैं और एक ओबीसी कवि को सावधानीपूर्वक शामिल कर लिया गया है। छायावाद की ‘त्रयी’ में दो ब्राह्मणों के बीच एक ओबीसी बनिए को शामिल कर लिया गया है। यदि वैश्य जयशंकर प्रसाद को छोड़कर महादेवी वर्मा के साथ यह ‘त्रयी बनाई ग’ई होती तो ऐसी ‘त्रयी’ शत-प्रतिशत सवर्णों की ‘त्र’ हो जाती। ऐसी गलती वर्णाश्रम धर्म के पोषकों ने कभी नहीं की है। नई कहानी की भी ‘त्रयी’ बनी है। इसमें भी दो सवर्णों मोहन राकेश और कमलेश्वर के बीच एक यादव ओबीसी को रखा गया है। अष्टछाप कवियों के बीच एक कुनबी ओबीसी कवि कृष्णदास को रखा गया है। छायावादी त्रयी में एक बनिया ओबीसी कवि प्रसाद को रखा गया है और नई कहानी की त्रयी में एक यादव ओबीसी कहानीकार राजेन्द्र यादव को रखा गया है। ऐसा इसलिए कि कोई आलोचक यह नहीं कह पाए कि हिंदी का कोई भी ‘अष्टछाप’ अथवा ‘त्रयी’ पूरा का पूरा सवर्णों का है।

भारतेंदु और प्रसाद के प्रेम-प्रसंग

भारतेंदु हरिश्चंद्र

डॉ. मोतीचंद्र ने लिखा है कि जो प्रसाद जी से परिचित थे, वे जानते थे कि प्रसाद जी योगी न होकर भोगी थे। अच्छे, साफ -सुथरे कपड़े, इत्र, फू ल-माला और बहुत अच्छा भोजन उन्हें प्रिय था। जयशंकर प्रसाद भोगी थे, इसे लेकर उनके निजी जीवन के अनेक प्रसंगों की चर्चा हिंदी साहित्य में हुई है, जिसमें एक है किसी के साथ प्रेम करना। आलोचकों ने बताया है कि उनके ‘आंसू’ काव्य-ग्रंथ का आलंबन वही प्रेयसी है जिससे जयशंकर प्रसाद प्रेम किया करते थे। उस प्रेयसी की आत्महत्या की चर्चा भी साहित्यिक गलियारों में होती है। हिंदी साहित्य में किसी कवि के काव्य-ग्रंथ के मूल्यांकन की यह कौन-सी पद्धति है? ‘आंसू’ का मूल्यांकन आलोचना के मानदंड पर होना चाहिए। ऐसा नहीं कि प्रसाद के निजी जीवन के किसी विफ ल प्रेम-प्रसंग के आधार पर होगा। भारतेंदु हरिश्चंद्र के प्रेम-प्रसंग को लेकर जयशंकर प्रसाद से भी तेज आंधी साहित्यिक हलकों में बहती है। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने एक विधवा बंगालिन मल्लिका को अपनी धर्मकांता के रूप में आजीवन स्वीकार किया था। ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ की जगह ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ नामकरण उनकी पत्रिका का हुआ। यहां तक बात ठीक है। पर, ‘चंद्रिका’ कौन थी और उससे भारतेंदु के क्या रिश्ते रहे हैं, यह आलोचना साहित्य का विषय नहीं है। पर आलोचकों ने इसे भी लक्ष्य किया है। भारतेंदु मंडल के ही एक कवि ठाकुर जगमोहन सिंह थे। उनका एक विवाहिता सुनारिन से घनानंदी इश्क था। इसकी चर्चा भारतेंदु के प्रेम-प्रसंग से कम क्यों है? हिंदी साहित्य के सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और सुमित्रानंदन पंत के रिश्तों पर विचार क्यों नहीं होता है? आलोचक गणपतिचंद्र गुप्त तो भारतेंदु के इतने कायल थे कि उन्होंने अपने चंडीगढ़ स्थित आवास का नामकरण ही ‘भारतेंदु-भवन’ कर लिया था और उनका ‘हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास’ यही से छपा भी है।

गणपतिचंद्र गुप्त की नजर में मैथिलीशरण गुप्त

गणपतिचंद्र गुप्त ऐसे पहले आलोचक हैं, जिन्होंने मैथिलीशरण गुप्त को ‘तुलसीदास का आधुनिक संस्करण’ कहे जाने का विरोध किया। उनका मानना है कि तुलसीदास तो मुस्लिम विरोधी भी थे, पर मैथिलीशरण गुप्त के साहित्य में ऐसा कुछ भी नहीं है। गुप्त जी की दो पुस्तकें बौद्ध धर्म से जुड़ी हैं।किन्तु तुलसीदास ने बौद्ध विषयक किसी ग्रंथ की रचना नहीं की। हिंदी साहित्य में आलोचना की यह कौन-सी पद्धति है जिसमें ओबीसी साहित्यकारों पर तरह-तरह के लांछन लगाए गए-किसी को खंडन-मंडन, किसी को चोर, किसी को लंपट प्रेमी और किसी को समलैंगिक कहा गया? आलोचना की पारंपरिक पद्धति निश्चित रूप से कबीर, कृष्णदास, भारतेंदु से लेकर मैथिलीशरण गुप्त और जयशंकर प्रसाद तक के कवियों का सही मूल्यांकन करने में विफ ल रही है। गणपतिचंद्र गुप्त की आलोचना-पद्धति में ऐसे प्रसंगों की चर्चा नहीं है।

 

(फारवर्ड प्रेस के अगस्त 2014 अंक में प्रकाशित)


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