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हमारा महिषासुर दिवस

मेरा नाम सुषमा असुर है। मैं नेतरहाट (झारखंड) के पहाड़ों पर रहती हूं। जब मैं स्कूल गई तो वहां मुझे एक बेहद कठिन भाषा पढ़ाई गई। वैसे अब मैं इंटर पास कर चुकी हूं। मैंने किताबों में पढ़ा है कि हमलोग (असुर समुदाय) राक्षस होते हैं। जबकि सच तो है कि आजतक हमने किसी से कुछ नहीं छीना। उल्टे लोगों ने हमारा सबकुछ छीन लिया। टाटा ने हमारा विज्ञान और बिड़ला ने हमारी जमीनें छीन ली। देवताओं ने हमारा राज और इतिहास तक छीन लिया। आज मैं अपने इतिहास, असुरों के इतिहास को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही हूं।  

सुषमा असुर

नवरात्र और महिषासुर वध के बारे में ज्यादातर लोगों को जानकारी है। लेकिन महिषासुर के असुरसमुदाय के बारे में अधिकांश लोग अनिभिज्ञ हैं। ज्ञातव्य है कि  प्रायः जंगलों में रहने वाला यह समुदाय आज भी जीवित है। लोहा गलाने के परम्परागत पेशे को छोड़ यह समुदाय अब खेती और मजदूरी कर गुजर-बसर करता है।

बीते दिनों शोधकर्ताओं, लेखकों और साहित्यकारों ने असुर समुदाय के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहुलओं पर ध्यान दिया है। जिसके बाद असुरों के इतिहास और कला संबंधित कई जानकारियां सामने आ सकीं हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार असुर समुदाय की कुल आबादी लगभग आठ हजार के आसपास ही बची है। असुरों के गीतों, पौराणिक कथाओं और रीति रिवाजों से यह स्पष्ट होता है कि महिषासुर, जिन्हें हम लोग भैंसासुर के नाम से पुकारते हैं, एक लोकप्रिय और शक्तिशाली राजा थे। उन्हें परास्त करना देवताओं के लिए मुश्किल था। माना जाता है कि देवताओं ने छल से स्त्री भेजकर उन्हें मरवाया। असुर मान्यताओं के अनुसार ब्राह्मणों ने शास्त्रों को रचने के क्रम में चालाकियां की। झूठ को सच और सच को झूठ बनाने की साजिशें रची।

असुर समुदाय में भैंसासुर की अराधना-विधि

हमारे असुर समुदाय में भैंसासुर की पूजा दीपावली के दिन होती है। इस सन्दर्भ में मेरे पिता खमिला असुर बताते थे कि जब हिंदू समुदाय नवरात्रि मनाता है, उस समय असुर समुदाय के लोग महिषासुर, असुर राजा के मृत्यु का शोक मनाते हैं।

जिस दिन कथित मुख्यधारा की हिंदू सभ्यता चमचमाती रोशनी और पटाखों के शोर में डूबी होती है, उस समय हमारे घरों में एक अलग अनुष्ठान होता है।

असुर समुदाय के लोग वाद्य यंत्रों के साथ, साथ में गायिकाओं का दल फोटो साभार – सुरेश जगन्नाथम्


मेरे चाचा चामरा असुर को भैंसासुर की आराधना विधि की बहुत बारीक जानकारी है। वे गांव में पुजार भी रहे हैं। वे बताते हैं कि भैंसासुर की पूजा के लिए दिवाली की अमावस्या के दिन सुबह में गाय, भैंस, बकरी या मवेशियों को नहलाकर इरिंडी की डालियां दी जातीं हैं। रात को मिट्टी के बने दीप में कुजरी (मुंजनी) या करंज का गर्म तेल डाला जाता है। साथ ही तेल भरे दीप में उरद की दाल डाली जाती है। इस तेल को असुर समुदाय के पुरुष नाभि, छाती और कानों में लगाते हैं। यह दिन हमारे मवेशियों के लिए भी खास होता है। इस दिन मवेशियों के सींग में भी यही तेल लगाए जाने की परंपरा है। जिन मवेशियों के सींग में तेल नहीं लगाया जा सकता या पकड़ के बाहर हों उनके ऊपर शगुन के रूप में तेल छिड़का जाता है। साथ ही खीरा खाने का भी रिवाज है। चुंकि नाभि, छाती और कान शरीर के जीवन केंद्र और तेल रक्षा का प्रतीक होता है। इस अवसर पर असुर मन्त्र का पाठ होता है- “पुरखा के च चबा गोसेया जमा शक्ति तरअ अले के बनचाव लेमे हेतरा जीविड चेलमे जीविड चेलमे देवी।” अर्थात, पुरखों को नष्ट करनी वाली सारी शक्तियों के सेवन से औषधि हमारी रक्षा करें और जीवन का संचार करें।

गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड के शहरी इलाके में अपने नये घर में परिजनों के साथ सुषमा असुर

महिलाएं हड़िया बनाती हैं जिसे असुर समुदाय के लोग पीते हैं। बच्चों को कंद-मूल आदि दिया जाता है। अगली सुबह मवेशी जब खेतों से चर कर आते हैं तब उनके बाड़ों को गोबर से लिप दिया जाता है। घर की महिलाएं अपने सामर्थ्य के अनुसार फल-फूल सजाती हैं। दोपहर की पूजा में सम्मिलित होने वाले घर के बुजुर्ग मुर्गे की बलि चढ़ाते हैं। रौ के पत्ते पर अंगूठे से मुर्गे का गला दबाकर बलि दी जाती है। बुजुर्ग खून का टीका बच्चों को लगाते हैं। अनाज और हड़िया दोनों मवेशियों को दिया जाता है। मवेशियों से अत्यधिक लगाव स्वरुप उनका जूठन भी लोग सहर्ष खाते हैं। इस तरह हम असुर यह त्योहार मनाते हैं। हालांकि पूजा की सम्पूर्ण प्रक्रिया- इरिंडी का तेल लगाने से लेकर खून के टीके तक- में महिलाएं शामिल नहीं होती। छोटी बच्चियां पूजा में शामिल हो सकती हैं तथा अनुष्ठान के बाद स्त्री-पुरूष सभी की हिस्सेदारी प्रसाद में होती है।

आप सब अंडमान के आदिवासियों और विदेशों में मरने वाले भारतीयों के बारे में दुखी और चिंतित होते हो। रंगभेद नहीं करने का दावा करते हो। हम असुर आपके इतने करीब हैं। बिल्कुल पटना, रांची, रायपुर, राउरकेला, बांसवाड़ा में स्थित हैं लेकिन हमारी पीड़ा किसी को दिखाई नहीं देती?

मैं एक असुर की बेटी जो आपके प्रचलित मिथकों, कथाओं और धर्मग्रंथों में हजारों बार मारी और अपमानित की गई हूं। क्या हमारी मौत से होकर विकास का रास्ता जाता है? चुंकि ये संस्कृतियाँ बहुत तेजी से समाप्त हो रही हैं इसलिए बिना किसी पूर्वधारणा के इनके पुनर्लेखन और पुनर्पाठ की जरुरत है।

हमें अपनी भाषा, संस्कृति और जल-जंगल-जमीन के साथ जीने दो!

(सुषमा असुर द्वारा लिखित एक अप्रकाशित डायरी व उनसे बातचीत पर आधारित)


महिषासुर से संबंधित विस्तृत जानकारी के लिए  ‘महिषासुर: एक जननायक’ शीर्षक किताब देखें। ‘द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशनवर्धा/दिल्‍ली। मोबाइल  : 9968527911. ऑनलाइन आर्डर करने के लिए यहाँ जाएँ: अमेजनऔर फ्लिपकार्ट इस किताब के अंग्रेजी संस्करण भी  Amazon,और  Flipkart पर उपलब्ध हैं