रामस्वरूप वर्मा : एक प्रतिबद्ध आंबेडकरवादी

चौधरी चरण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में वित्त मंत्री रहे रामस्वरूप वर्मा एकमात्र उदाहरण हैं जिन्होंने मुनाफे का बजट पेश किया। ब्राह्म्णवाद के सवाल पर डा राम मनोहर लोहिया तक से किनारा करने वाले वर्मा जी ने अर्जक संघ के रूप में बहुजनों के लिए अलग राह बनायी जिसकी मंजिल वही है जो आंबेडकर ने तय किया था। बता रहे हैं वर्मा जी के सहयोगी रहे वरिष्ठ चिंतक दयाराम

भारत के सबसे बडे़ प्रान्त उत्तर प्रदेश के जनपद कानपुर देहात के गौरी करन गाँव में पिता वंशगोपाल, माता सुखिया की कोख से 22 अगस्त, 1923 को एक साधारण कुर्मी किसान परिवार में रामस्वरूप वर्मा (22 अगस्त, 1923 – 19 अगस्त, 1998) का जन्म हुआ। माता पिता की इच्छा थी कि उनका बेटा उच्च शिक्षा ग्रहण करे। वर्मा जी पढ़ने में मेधावी थे। वे उस जमाने में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. और आगरा विश्विद्यालय से एलएलबी की डिग्री प्राप्त की, जब शूद्रों के लिए शिक्षा का दरवाजा बन्द था, किन्तु ब्रिटिश हुकूमत के कारण शूद्रों और महिलाओं की शिक्षा का रास्ता प्रशस्त हो रहा था जिसका लाभ रामस्वरूप वर्मा को मिला। उन्होंने उर्दू, अंग्रेजी, हिन्दी और संस्कृत भाषा की शिक्षा ग्रहण की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके सामने तीन विकल्प थे। पहला विकल्प प्रशासनिक सेवा में जाना, दूसरा वकालत करना, तथा तीसरा विकल्प था राजनीति के द्वारा मूलनिवासी बहुजनों व देश की सेवा करना। वर्मा जी ने आईएएस की लिखित परिक्षा भी उत्तीर्ण कर ली थी किन्तु साक्षात्कार में पूर्व ही वे निर्णय ले चुकेे थे कि प्रशासनिक सेवा में रहकर वे आराम की जिन्दगी व्यतीत कर सकते हैं लेकिन बहुजन समाज को भाग्यवाद, पुर्नजन्म, अन्धविश्वास, पाखण्ड, चमत्कार, जैसी धारणा से निजात नहीं दिला सकते। इसलिए सामाजिक चेतना और जागृति पैदा करने के लिए उन्होंने 1 जून 1968 को सामाजिक संगठन ‘अर्जक संघ’ की स्थापना की।  रामस्वरूप वर्मा में राजनैतिक चेतना का प्रार्दुभाव डा अम्बेडकर के उस भाषण से हुआ जिसे उन्होंने मद्रास के पार्क टाउन मैदान में 1944 में शेड‍यूल्ड कास्ट फेडरेशन द्वारा आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में दिया था। इस भाषण में डा. आंबेडकर ने कहा था कि “तुम अपनी दीवारों पर जाकर लिख दो कि तुम्हें कल का शासक बनना है जिसे आते जाते समय तुम्हें हमेशा याद रहे।” इसके अतिरिक्त उन पर  आंबेडकर के उस भाषण का भी बहुत ही प्रभाव पड़ा जिसे उन्होंने 25 अप्रैल 1948 को बेगम हजरत महल पार्क में दिया था। उन्होंने कहा था कि जिस दिन अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के लोग एक मंच पर होंगे उस दिन वे सरदार बल्लभ भाई पटेल और पंडित जवाहर लाल नेहरू का स्थान ग्रहण कर सकते हैं।

अर्जक संघ के संस्थापक रामस्वरूप वर्मा

रामस्वरूप वर्मा ने 1 जून 1968 एससी,एसटी और ओबीसी के सामाजिक ध्रुवीकरण के लिए ही अर्जक संघ की स्थापना लखनऊ में की। इसके पहले आजाद भारत के प्रमुख दल कांग्रेस थी विरोधी दल के रूप में डा राममनोहर लोहिया की समाजवादी पार्टी थी। डा लोहिया कांग्रेस के विरोधी नेता के रूप उभार पर थे। मूलनिवासी बहुजन समाज कांग्रेस के साथ था। 52 प्रतिशत अन्य पिछडे़ वर्ग का वोट हासिल करने के लिये डा लोहिया ने नारा दिया, “संसोपा ने बाँधी गाँठ, सौ में पावें पिछड़े साठ” इस नारे ने पिछड़ों को समाजवादी आन्दोलन से जुड़ने का रास्ता साफ किया। वर्मा जी भी संसोपा से जुड़ गये।

समाजवादी प्रचार करते रहे हैं कि जो समाजवादी होता है वह जातिवादी नहीं हो सकता और जो जातिवादी होता है वह समाजवादी नहीं हो सकता।  वर्मा जी ने राजनैतिक जीवन की एक घटना का खुलासा अपनी पुस्तक ”क्रान्ति क्यों और कैसे“ में किया है। वे लिखते हैं – “मंगल देव विशारद उत्तर प्रदेश राज्य के सार्वजनिक विभाग में मंत्री रहे। वे संसोपा में रहते हुए जब उन्हें अपने जन्म के जिला आजमगढ़ में एक भूमिहार के अन्य उच्चवर्णीय साथियों से अलग बैठाकर पत्तल के अभाव में एक फोड़ी गयी हण्डिया (छोटा मिट्टी का बर्तन जिसका मुंह फोड़कर चौड़ा पात्र बनाया गया था) चावल, दाल व सब्जी एक साथ दे दी गयी और पानी पीने के लिए एक कुल्हड़ के अभाव में दीवाली के दिये में पानी दिया गया। तब मंगल देव ऐसे विद्वान-सम्मानित व्यक्ति पर इस घृणा और तिरस्कार की कितनी चोट लगी होगी इसका अनुभव दरिद्र बाह्मण कैसे कर सकता है। भले ही भूमिहार पाखाना खाने वाली गाय का झूठा बर्तन माँज डालते हों, पवित्र मानते हों और उनके पालतू कुत्ते रोज बर्तनों में दूध रोटी खाते हों जिनके मांजने में उन्हें रंच मात्र भी संकोच नहीं होता है। लेकिन मंगलदेव के खाने में उनका धातु का बर्तन किसी काम का नहीं रह जाता। ऐसे तिरस्कार और घृणापूर्ण विचार पुनर्जन्म पर आधारित ब्राह्मणवाद के अलावा कहां से आ सकते हैं। यह दशा उत्तर प्रदेश राज्य के एक अन्त्यज मन्त्री की है तो फिर करोड़ों अन्त्यज मलेच्छ और शूद्र कितना तिरस्कार और घृणा पाते होंगे, इसका महज अनुमान लगाया जा सकता है। यह सही है मंगल देव विशारद इस अपमान को न सह सके और उन्होंने खाना नहीं खाया लेकिन इतनी तेजस्विता तो उँगली में गिने जाने वाले लोगों में ही है।”

रामस्वरूप वर्मा सम्पूर्ण क्रान्ति के पक्षधर थे। उनकी सम्पूर्ण क्रान्ति में भ्रान्ति के लिए कोई स्थान नहीं। वर्मा जी के अनुसार जीवन के चार क्षेत्र होते हैं- राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक। इस चारो क्षेत्रों में गैरबराबरी समाप्त करके ही हम सच्ची और वास्तविक क्रान्ति निरूपित कर सकते हैं। क्रान्ति शब्द के बारे में जितना अनाप-शनाप इस्तेमाल किया गया है और किया जा रहा है, उस स्तर पर लोग इसका वास्तविक अर्थ नहीं समझते हैं। क्रान्ति जिसे हम इंकलाब ओर रिवलूशन भी कहते हैं, हमें ऐसा आभास होता है जैसे कोई ऐसा जादू है जिसमें सब कुछ तत्काल बदल जायेगा, जबकि क्रान्ति बदलाव की एक सतत प्रक्रिया है। जीवन के पूर्व निर्धारित मूल्यों का मानव हित में पुर्ननिर्धारण का नाम है क्रान्ति है।  रामस्वरूप वर्मा निःसन्देह डा. राम मनोहर लोहिया के राजनैतिक दल संसोपा से जुड़े थे किन्तु लोहिया जी के साथ वर्मा जी का वैचारिक मतभेद था। लोहिया गान्धीवादी थे, वर्मा जी आंबेडकरवादी। लोहिया के आर्दश मर्यादा पुरषोत्तम राम और मोहन दास करमचन्द गान्धी थे, माननीय रामस्वरूप वर्मा के आदर्श बुद्ध, फूले, आंबेडकर और पेरियार थे। डा. आंबेडकर ने कहा था, “असमानता की भावना, ब्राह्मणवाद को उखाड़ फेकों, वेदों और शास्त्रों में डाइनामाइट लगा दो।” अर्जक संघ के संस्थापक माननीय रामस्वरूप वर्मा ने अर्जक संघ के कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि पूरे देश में जहाँ जहाँ अर्जक संघ के कार्यकर्ता हैं वे बाबा साहब  आंबेडकर के जन्म दिन को चेतना दिवस के रूप में मनाएं और मूल निवासी बहुजनों को जागरूक करने के लिए 14 अप्रैल 1978 से 30 अप्रैल तक पूरे महीने रामयण और मनुस्मृति का दहन करें। अर्जक संघ के कार्यकर्ताओं ने रामस्परूप वर्मा के आदेशों का पालन करते हुए रामायण और मनुस्मृति को घोषणा के साथ जलाया। सन् 1967 की संबिद सरकार में वर्मा जी डा. लोहिया की पार्टी संसोपा पार्टी से जीतकर उप्र विधान सभा पहुँचे। चौधरी चरण सिंह के मंत्रीमंडल में वित्त मंत्री बनाये गये जहाँ उन्होंने मुनाफे का बजट पेश किया। इतना ही नहीं वर्मा जी ने उत्तर प्रदेश के सरकारी और गैरसरकारी पुस्तकालयों में बाबा साहब डा. आंबेडकर का साहित्य रखवाया जिसके कारण मूलनिवासी बहुजनों में स्वाभिमान जागने लगा। तत्पश्चात शासक जातियों ने बाबा साहब द्वारा लिखित- जातिभेद का उच्छेद ओर धर्म परिवर्तन करें दोनो पुस्तकों को जब्त करने का आदेश जारी कर दिया। शासनादेश के विरोध में रामस्वरूप वर्मा ने ललई सिंह यादव से हाईकोर्ट इलाहाबाद में याचिका दायर करवाय। ललई सिंह यादव ने विधिक लड़ाई जीतकर इलाहाबाद हाईकोर्ट से दोनों पुस्तकों को बहाल करवाया। इतना ही नहीं उन्होने उत्तर प्रदेश सरकार पर मानहानि का मुकदमा दायर कर उन्होनेे उत्तरप्रदेश सरकार से पूरे मुकदमें का हर्जा और खर्चा भी वसूल किया।

अपनी पत्नी सविता के साथ आंबेडकर

मूलनिवासी बहुजन समाज में जन्में महान साहित्यकार एवं लेखक मुद्राराक्षस डा. राममनोहर लोहिया और रामस्वरूप वर्मा के सम्बन्धों की चर्चा करते हुए लिखते हैं, ”मेरी भेंट वर्मा जी से दिल्ली में डा. राममनोहर लोहिया के गुरूद्वारा रकाबगंज रोड स्थित बंगले में एक बजे दोपहर के समय तब हुई जब वे रामचरित मानस को लेकर डा. राममनोहर लोहिया से बेहद उत्तेजक बहस कर रहे थे। डा. लोहिया की पुस्तक थी रामचरित मानस। वे मनुस्मृति को भी उतना ही पसन्द करते थे। मनुस्मृति और रामचरित मानस पर मैं भी डा. राममनोहर लोहिया से पहले भिड़ चुका था वे हिन्दुत्व को गांधी के नजरिये से देखते थे। उन्हें हिन्दुओं में कुछ ऐसा जरूर दिखता था जिसमें सुधार व संशोधन किया जाये लेकिन हिन्दुत्व को खारिज करना उन्हें पसन्द नहीं था। और रामस्वरूप वर्मा भारतीय समाज में क्रान्तिकारी और बुनियादी परिवर्तन के लिए हिन्दुत्व से मुक्ति चाहते थे। डा. लोहिया को हिन्दुत्व को खारिज किया जाये कतई बर्दाश्त नहीं था। इन्ही मुद्दों पर डा. लोहिया का वर्मा जी से भारी विवाद हुआ और यही विवाद डा. लोहिया की पार्टी से अलगाव का कारण बना।” वर्मा जी इस मुद्दे कितने सही थे, दूसरा बड़ा सबूत यही है लोहिया के रिश्ते तत्कालीन जनसंघ से बहुत गहरे हो गये थे। उनके हिन्दुत्व प्रेम का ही परिणाम था उन्होने जनसंघ प्रमुख दीनदयाल उपाध्याय के पक्ष में चुनाव प्रचार किया था और उनके महत्वपूर्ण साथी जार्ज फर्नांडीज जैसे लोग सीधे भारतीय जनता पार्टी में जुड़ गये थे। वर्मा जी ने नारा दिया था, ”मारेंगे, मर जायेंगे, हिन्दू नहीं कहलायेंगे।“ डा. राममनोहर लोहिया के आदर्श गांधी, गांधी के आदर्श मर्यादा पुरूषोत्तम राम। राम ने बाह्मण धर्म की रक्षा के लिए अवतार लिया। गांधी जी ने वर्ण धर्म का समर्थन किया जो जाति व्यवस्था की फैक्ट्री है। फिर डा. लोहिया को समाजवादी कहना बहुत ही बड़ी भूल है। रामचरित मानस में पिछड़ी जातियों को नीच और जंगली कहा गया है उसी रामचरित मानस को आदर्श ग्रन्थ मानकर डा. राममनोहर लोहिया रामायण मेला लगवाते थे फिर लोहिया को समाजवादी कैसे कहा जा सकता है। लोहिया समाजवादी नहीं ब्राह्मणवादी थे। वहीं ब्राह्म्णवाद जिसे उखाड़ फेंकने में रामस्वरूप वर्मा आजीवन संघर्ष करते रहे। रामस्वरूप वर्मा, महामना गौतम बुद्ध के सन्देश को अंगीकृत करते हुए, अपना दीपक खुद बने।

समाजवादी चिंतक डा. राम मनोहर लोहिया

उन्होंने संसोपा से अलविदा कर मूलनिवासी बहुजन समाज के शुभचिन्तक चौधरी महाराज सिंह भारती, बाबू जगदेव प्रसाद, प्रो.  जयराम प्रसाद सिंह, लक्ष्मण चौधरी, नन्द किशोर सिंह से सम्पर्क कर 7 अगस्त 1972 को शोषित समाज दल की स्थापना की और नारा दिया-

“दस का शासन नब्बे पर नहीं चलेगा नहीं चलेगा।

सौ में नब्बे शोषित हैं नब्बे भाग हमारा है।”

शोषितों का राज, शोषितों के लिए शोषितों के द्वारा होगा।

रामस्वरूप वर्मा का मानना था सामाजिक चेतना से ही सामाजिक परिवर्तन होगा और सामाजिक परिवर्तन के बगैर राजनैतिक परिवर्तन सम्भव नहीं। अगर येन केन प्रकारेेण राजनैतिक परिवर्तन हो भी गया तो वह ज्यादा दिनों तक टिकने वाला नहीं होगा। रामस्वरूप वर्मा सामाजिक सुधार के पक्षधर नहीं थे। वे सामाजिक परिवर्तन चाहते थे। वे हमेशा समझाया करते थे कि जिस प्रकार दूध से भरे टब में यदि पोटेशियम साइनाइट का टुकड़ा पड़ जाये तो उस टुकड़े को दूध के टब से निकालने के बाद भी दूध का प्रयोग करना जानलेवा होगा। इस लिए ब्राह्मणवादी मूल्यों में सुधार की कोई गुंजाइश नही है। ब्राह्मणवाद सुधारा नहीं जा सकता बल्कि नकारा ही जा सकता है। रामस्वरूप वर्मा संसोपा से सन् 1957 में कानपुर के रामपुर क्षेत्र से चुनाव लड़े और विधान सभा के सदस्य चुने गये। इसके बाद 1967, 1969,1980,1989, और 1991 में सदस्य विधान सभा के चुनाव में विजयी रहे। वर्मा जी के तर्क के सामने विधान सभा में शासक जातियों की घिग्घी बंध जाती थी। उनके अनुयायियों ने ही उत्तर प्रदेश विधान सभा में रामायण के पन्ने फाड़े। बाहर रामायण और मनुस्मति को जलाकर राख कर दिया। वर्मा जी ने उत्तरप्रदेश विधानसभा में एक ऐसा बिल पेश किया कि धर्म के नाम पर सार्वजनिक भूमि पर मन्दिर और मजार बनाकर सरकारी भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है। सड़कों के किनारे व बीच में धर्म स्थल बनाया जा रहा है। इसे रोकने की आवश्यकता है। सवर्णों ने बिल का विरोध किया कि ऐसा करने से साम्प्रदायिकता बढ़ेगी। वर्मा जी ने उन्हे उत्तर देते हुए कहा, ”कुछ लोगों ने कहा है कि इससे साम्प्रदायिकता बढ़ेगी। तमिलनाडु में सरकार ने 12 हजार मन्दिरों को अपने हाथ में ले लिया वहां कोई अशान्ति नहीं हुई। कोई साम्प्रदायिकता नहीं भड़की। हाँ अगर यह होता कि विधेयक के जरिये जो मन्दिर हैं उनको गिरा दिया जाये तो जरूर अशांति की बात होती। इसमें तो यह है कि जितने पूजा स्थल हैं उनको सरकार अपने नियन्त्रण में ले और हर पूजा स्थल पर जो चढ़ावा चढ़ेगा वह सरकार को प्रात्त होगा। पुजारी रखने के बाद जो बचता है वह धर्महित कार्यों में खर्च किया जाये । इसमें साम्प्रदायिकता लेश मात्र भी नहीं हैं। मूलनिवासी बहुजन समाज के विधायक जहाँ एक तरफ बिल का समर्थन कर रहे थे तो ब्राह्मण विधायक परेशान थे। ब्राह्मण विधायक राम औतार दीक्षित ने कहा कि हम भी रामचरित मानस को धर्म ग्रन्थ नहीं मानते किन्तु उसका जलाना उचित नहीं। रामस्वरूप वर्मा ने उत्तर देते हुए कहा- ”मैं दीक्षित जी काे याद दिलाता हूँ कि वे रामयण को धार्मिक किताब नहीं मानते। इसी सदन में जब रामयण का पन्ना फाड़ा गया तो फैसला हुआ कि रामयण धार्मिक किताब है। गांधी जी इस किताब को मानते थे। जब रामयण धर्म की किताब नहीं है फिर झगड़ा काहे का है। दूसरे ब्राह्मण विधायक ब्रज किशोर मिश्रा बिल के विरोध में बोलते हुए कहा, ”वह धर्म की है या कर्म की है लेकिन आपको उसको जलाने का अधिकार नहीं है।“ वर्मा जी ने ब्रज किशोर मिश्रा को उत्तर देते हुए कहा, ”हम तो अपनी किताब जलाते हैं। आपकी तो जलाते नहीं। जहां तक किताबों की बात है वह हमारी विचारधारा है और इस देश में अपनी विचारधारा को रखने का अधिकार सबको हैं आप हमारी विचारधारा को रोक नहीं सकते। मान्यवर रामायण जलाने का कार्य 1978 में 14 अप्रैल से 30 अप्रैल तक हुआ था। चेतना जागृति के नाम पर पर्चे बाँट कर जलाई थी। मनुस्मृति जलाई जो संविधान विरोधी है। उसको जलाया और जब फिर अवसर आयेगा तो फिर जलायेंगें। गांधी जी ने जब असहयोग आन्दोलन किया तो उन्होने कहा था विदेशी कपड़ों का विरोध करो तो मान्यवर कपड़े तो सभी को हानि नहीं करते। जब हमारी सरकार बनेगी तब आप ऐसा नहीं बोलोगे। तब तो आप बिल्कुल ठीक बोलेगें।“

रामस्वरूप वर्मा ने कभी भी सिद्धान्तो से समझौता नहीं किया। उन्होंने सिद्धान्त हीन राजनीति नहीं की। 19 अगस्त 1998 को वे यशकायी हो गये। आज उनकी काया(शरीर) हमारे बीच नहीं है किन्तु उनका यश(यादगार) उनकी साहित्य सम्पदा के रूप में जिन्दा है।


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  1. AJAY KUMAR LODHI Reply
  2. Upendra pathik Reply
  3. arvind dohare 'samir' Reply

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