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बिहार में असुर परंपराएं

बिहार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल ये तीनों राज्य 1 अप्रैल 1912 के पहले एक बंगाल प्रेसीडेंसी में शामिल थे। अंग्रेजों ने तब बिहार और बंगाल को अलग किया। तब बिहार और उड़ीसा दोनों एक साथ थे। परंतु 1 अप्रैल 1936 में बिहार का एक बार फिर बंटवारा हुआ और उड़ीसा को बिहार से अलग कर दिया गया। इस बंटवारे के बाद राजनीतिक नक्शा भले ही बदल गया, लेकिन स्वभाविक रूप से सांस्कृतिक-मानचित्र जस का तस रहा।

दाेनों राज्यों (15 नवंबर  2000 को झारखंड के अलग होने के बाद तीन राज्य) में परंपरा व परिपाटियां अभी भी कायम है। उनमें असुर-आदिवासी संस्कृति के निशान आज भी देखे जा सकते हैं।

बिहार के अरवल जिला के एक किसान (कुशवाहा) परिवार और पटना के गौपालक (यादव) परिवार में मनुजदेवा की पिंडी

पहले कुछ सवाल और कुछ जवाब। कभी आपने सोचा है आपने कि बुद्ध को गया में ही ज्ञान की प्राप्ति क्यों हुई? यह सवाल इसलिए कि जिस गया में उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई वह गयासुर की धरती है। आपके लिए एक सवाल यह भी कि जिस नालंदा में विख्यात बौद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, वह धरती जरासंध की धरती थी। ब्राह‍्मण-साहित्य के मुताबिक राजगृह (आज का राजगीर) जरासंध की राजधानी थी। गया के बगल में ही बराबर की गुफायें हैं जिन्हें वाणावर की गुफायें भी कहा जाता है। यह वाणासुर से जुड़ा है और पुरातात्विक प्रमाणों के अनुसार यह लोकायतिक परंपरा के साधकों की स्थली रही है।  

इस प्रकार ब्राह‍मण मिथकों के मुताबिक ही मौजूदा दक्षिणी बिहार का इलाका असुरों की भूमि थी। इस पूरे इलाके में अनेक ऐसे प्रमाण आज भी हैं जो यह साबित करते हैं कि इस पूरे इलाके में मूलनिवासियों का राज था।  बिहार के कैमूर जिला में कई जगह दैत्यरा (असुर) की मूर्ति की पूजा होती है। किसान वर्गों में यह धारणा है कि दैत्यराज सुदूर खेतों की फसलों की रक्षा करते हैं। इसलिए वे उनकी पूजा करते हैं और काले रंग का धागा भी उनके नाम की कलाइयों पर बांधते हैं। उनका मानना है, दैत्य राज ही उन्हें अशुभ से बचायेंगे। बिहार, उडीसा और पश्चिम बंगाल समेत देश के अनेक हिस्सों में दीपावली के एक दिन पूर्व यम का दीया जलाया जाता है। परिपाटी यह है कि महिलायें अपने-अपने घर के आगे दीया जलाती हैं। यह अमावस्या के ठीक एक दिन पहले किया जाता है। इसी दिन परिवार की सबसे बुजुर्ग महिला सूप लेकर दरिद्रता को भगाती है। इसका भी सीधा संबंध भी प्राचीन काल की असुर संस्कृति से ही है।

झारखंड के असुरों में एक परंपरा के मुताबिक असुर दीपावली के दिन दीये में दाल डालकर जलाते हैं और अगले दिन बचे तेल को अपनी नाभि व शरीर के कई हिस्सों में लगाते हैं। वे लोग दीपावली के दूसरे दिन भैंसासुर की पूजा करते हैं। उनके ही तर्ज पर बिहार के मवेशीपालक भी दीपावली के एक अपने मवेशियों की पूजा करते हैं। असुरों की भांति ही वे भी पहले अपने मवेशियों को नहलाते हैं और उन्हें तेल लगाते हैं। फिर उनका नाथ-पगहा बदला जाता है। कई तो इस मौके पर रंगबिरंगे पत्थरों से बनी माला और घंटी पहनाकर अपने मवेशियों का श्रृंगार भी करते हैं। इतना ही नहीं जैसे असुर भैंसासुर की पूजा के दौरान अपने मवेशियों को सबसे पहले स्वादिष्ट खाना देते हैं और फिर बाद में खुद भी खाते हैं, बिहार में भी मवेशीपालक यही करते हैं। हाल के दिनों में यह पर्व अब राजनीतिक स्वरूप भी धारण कर चुका है। इस मौके पर बिहार में कई राजनीतिक कार्यक्रम होते हैं जिनमे सभी पार्टियों के नेता (खासकर यादव जाति के) भाग लेते हैं।

बिहार की राजधानी पटना के एक गांव में गौरेया बाबा की पिंडी। गांव की सीमाओं पर बने गौरेया बाबा को गांव का रक्षक माना जाता है। इन गांवों में अधिकांश यादव, कुशवाहा और कुर्मी आदि जाति के लोग रहते हैं

झारखंड के असुरों और बिहार के मवेशीपालक जातियों की परंपराओं में एक गजब की समानता यह भी है कि असुर भी सोहराय गाते हैं और बिहार के मवेशीपालक, दुग्ध उत्पादक भी। एक समानता यह भी कि असुरों द्वारा भैंसासुर की पूजा में महिलायें प्रत्यक्ष तौर पर शामिल नहीं होती हैं  और बिहार में भी सोहराय पर्व (इसे गायडांढ़ भी कहा जाता है) के दौरान महिलायें शामिल नहीं होती हैं। सोहराई गायन मुख्य तौर पर पुरूष करते हैं। वे समूह में इसका गायन करते हैं। मांदड़ और ढोल बजाने की परंपरा है। ठीक ऐसे ही आयोजन असुर समाज में भी होता है।

बिहार और झारखंड में करमा पर्व का खास महत्व है। आदिवासी इसे धान की फसल अच्छी होने की कामना के लिए करते हैं। वहीं बिहार में भी यह पर्व धुमधाम से मनाया जाता है। दिलचस्प यह है कि आदिवासी समुदाय के पुरूष इस मौके पर अपने घर की महिलाओं के प्रति आभार प्रकट करते हैं और उनके मेहनत में खुद को शामिल करते हैं तो बिहार में होने वाले करमा पर्व का सीधा संबंध भाई से जुड़ा होता है। बिहार में महिलायें इस मौके पर दिनभर का उपवास रखती हैं और अपने भाईयों के लंबे और समृद्ध जीवन की कामना करती हैं। महत्वपूर्ण यह है कि इस पूजा के दौरान किसी ब्राह्म्ण की आवश्यकता नहीं होती है। महिलायें खेती में उपयोग की जाने वाले उपकरणों और कुश (एक प्रकार का घास) का उपयोग करती हैं।

बहन और भाई के बीच प्यार को जाहिर करने वाला यह पर्व दीपावली के दूसरे दिन होता है। पूरी प्रक्रिया लगभग करमा पर्व के जैसी ही है। इस पर्व के बारे में जोती राव फुले ने भी अपनी पुस्तक गुलामगिरी में लिखा है। उनके मुताबिक बलीप्रतिपाडा दिन (दीपावली के दूसरे दिन, भैया या भऊबीज), मूलनिवासी महिलाएं भाई का स्वागत या आदर करती हैं और आशा करती हैं कि दूसरा राजा बली आएगा। बिहार में इस पर्व को महिलाएं अपने भाईयों के लिए करती हैं। इसे गोधन भी कहा जाता है। इस मौके पर गोधन कूटने की परंपरा है। गोधन कूटने के दौरान महिलाएं अपने भाइयों के मरने और उनके फिर जीने की कामना करती हैं। यह परंपरा बलीराजा के फिर जिंदा होने की कथा से प्रेरित हो सकती है।

असुर प्रकृति पूजक होते हैं। उनके देवता भी प्रकृति के प्रतिरूप होते हैं। ठीक यही परंपरा बिहार के मैदानी इलाकों में आज भी कायम है। मसलन बिहार के मैदानी इलाकों में हर गांव में गौरेया बाबा मिल जाते हैं, जो असुर परंपरा से ही संबद्ध है। गांव की सीमा के बाहर गौरेया बाबा को स्थापित किया जाता है। इसके लिए एक आकृति का निर्माण किया जाता है जो पहाड़नुमा होता है। कई गांवों में मिट्टी से इस आकार को बनाया जाता है वहीं कई गांवों में अब इसे सीमेंट का पक्का भी बनाया जाने लगा है। महिषासुर की भांति  गौरेया बाबा के बारे में कथा यह है कि ये गांव के रक्षक होते हैं। गांव को हर प्रकार की विपदा से बचाते हैं। इतना ही नहीं गांव के लोग खेत-खलिहानों में फसलों के ढेर पर गोबर का ढेला बनाकर गौरेया बाबा को स्थापित करते हैं ताकि वे उनके फसलों की रक्षा कर सकें।

बुन्देलखंड के महोबा में महिषासुर की आराधना की जाती है। इसके लिए भी मिट्टी के टीले का उपयोग किया जाता है। यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसा कि मध्य और दक्षिणी बिहार के ग्रामीण इलाकों में ढेलहवा बाबा की आराधना की जाती है। परंपरा यह है कि गांव की सीमा के बाहर लोग आते-जाते समय गांव के रक्षक माने जाने वाले ढेलहवा बाबा को याद कर उनके नाम से मिट्टी का ढेला चढ़ाते हैं तभी आगे बढ़ते हैं। यह परंपरा असुर संस्कृति के विस्तार का द्योतक है।

असुर जनजाति के लोगों और बिहार के मैदानी इलाके के लोगों में एक महत्वपूर्ण समानता यह है कि वे अपने पूर्वजों को देवता मानते हैं और सभी महत्वपूर्ण अवसरों पर उन्हें याद करते हैं। बिहार के मैदानी इलाकों में लोगों के घरों में अपने-अपने देवता हैं। इन्हें मनुजदेवा ( मनुष्यदेवा) भी कहा जाता है। एक मिथक यह भी है कि परिवार में कोई जवान सदस्य का निधन हो जाय तो वह मनुजदेवा बन जाता है। घर के लोग उसे मनुजदेवा मानकर याद करते  हैं। और ऐसा मानने वाले परिवारों के घरों में  किसी भी अनुष्ठान में सबसे पहले इनकी ही आराधना की जाती है। इस क्रम में उन्हें दारू की छांक भी दी जाती है।

नालंदा, बिहार के निश्चलगंज के समीप ढेलहवा बाबा को नमन करती किसान परिवार की एक वृद्धा

बिहार के मैदानी इलाकों में बख्तौर बाबा की पूजा बड़े पैमाने पर होती है। यह पूजा भी असुरों द्वारा की जाने वाली पूजा के समान ही होती है। बख्तौर बााबा की पूजा मुख्य रूप से यादव जाति के लोग करते हैं और इनकी पूजा को बड़का पूजा कहते हैं। इस मौके पर गैरब्राह्मण भगत पूजा कराते हैं। पूजा के दौरान मांदड़ और ढोल आदि बजाया जाता है। इसके अलावा यह माना जाता है कि पूजा के दौरान भगत के देह में बख्तौर बाबा प्रवेश कर जाते हैं और लोग उनसे अपने लिए सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इस अवसर पर दूध और घी आदि के बने विशेष पकवान लड़ुआ (चावल और गुड़ का लड्डू) प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।

मगध में सलाना पूजा की परंपरा और कई कथायें है। गांव के मंदिर में हर साल इस पूजा का आयोजन किया जाता है। हालांकि पहले इस पूजा में ब्राह्मण नहीं आते थे परंतु हाल के वर्षों में ब्राह्म्णों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। ब्राह्मण के अलावा इस पूजा में गांव के भगत शामिल होते हैं। इस पूजा में मंदिर में पूर्व से स्थापित सात पिंडियों की पूजा की जाती है। माना जाता है कि ये सात पिंडियां देवी के सात बहनों की प्रतीक हैं। कई जगहों पर इसे दुर्गा की सात बहनों की संज्ञा दी जाती है तो कई जगहों पर गांव की कुल देवी व उनकी बहनों के नाम से जाना जाता है। इस पूजा के दौरान गांव के सभी लोग एकजुट होते हैं। इसके अलावा इस पूजा के लिए महिलायें विशेष गीत गाती हैं । दरअसल वे प्राचीन देवियां हैं, जिनका संबंध असुर परंपराओं से है।  गीत में महिलायें देवी के श्रृंगार आदि की चर्चा करती हैं और उनसे अपने परिवार व गांव-समाज के लिए समृद्धि की कामना करती हैं।

बिहार में जट-जटिन की परंपरा है। लोक कथाओं में यह युगल कई रूपों में नजर आता है। बिहार के इतिहासकार डा. कौलेश्वर राय बक्सर की ताड़कासुर को यक्षिणी के रूप में मान्यता देते हैं और यक्ष-यक्षिणियाँ बौद्ध धम्म से गहरे रूप में जुड़ी हुई हैं। प्राचीन मंदिरों की दीवारों पर वे आज भी शोभा बढ़ा रही हैं। वर्तमान में पटना के सियासी गलियारे में 1,देशरत्न मार्ग जो कि जननायक कर्पूरी ठाकुर स्मृति संग्रहालय भी है, के मुख्य दरवाजे पर जट-जटिन की आकृतियां हैं। बिहार के मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर मूल रूप से समस्तीपुर जिले के पितौंझिया (अब कर्पूरी ग्राम) के रहने वाले थे जो मिथिला का भाग है। मिथिला में यक्ष-यक्षिणी (जट-जटिन) के बारे में कई कहानियां हैं। यहां तक कि सीतामढ़ी में भी जट-जटिन की मूर्तियां हैं। ध्यातव्य है कि इन मूर्तियों में अासुरी शिल्प का प्रभाव देखा जा सकता है।

परंपराओं में समानता केवल मूर्तियों, देवताओं और पर्वों तक सीमित नहीं हैं। जीवन के विभिन्न आयामों से जुड़ी परंपराओं में भी समानतायें हैं। मसलन शादी-विवाह के दौरान नेगों की परंपरा। झारखंड के असुर विवाह के दौरान मिट्टी कोड़ते (खोदते) हैं। वे दीमक की बांबियों के पास की उर्वर मिट्टी कोड़ते हैं और फिर उसका उपयोग मंडप में कलश रखने के लिए आधार बनाने के लिए किया जाता है। ऐसी ही परंपरा बिहार के मैदानी इलाकों में होती है। ठीक असुरों के जैसे ही महिलायें फिर चाहे वह वधू पक्ष की हो या फिर वर पक्ष की, मिट्टी कोड़ने जाती हैं और इस मौके पर मंगल गीत भी गाती हैं। इन गीतों में ननद-भौजाई व अन्य रिश्तों को लेकर छेड़छाड़ तो होती ही है, साथ ही प्रकृति की आराधना भी शामिल होती है। असुरों में मिट्टी कोड़ते समय गीत गाने की परंपरा है।

मगध के इलाकों में शादी के दौरान एक नेग है डोलपत्ता। इसके तहत महिलायें गांव के चौर में आम के पेड़ के पास जाती हैं और शादी के पहले प्रकृति की पूजा करती हैं। वहीं असुरों में शादी से जुड़ी एक परंपरा ढोल जतरा है। इस परंपरा में महिला और पुरूष को अपना-अपना जीवन साथी चुनने का अवसर मिलता है। कदापि यह संभव है कि मगध के इलाकों में भी यह परंपरा रही होगी, परंतु कालांतर में यह खत्म हो गयी और केवल रस्म मात्र शेष है। ऐसी ही एक परंपरा डोमकच की है। विवाह की रात महिलायें स्वांग कर उत्सव मनाती हैं। यह उत्सव असुर समाज की महिलायें भी मनाती हैं और मगध के गांवों की महिलायें भी।

बहरहाल, कर्मकांड चाहे असुर-परंपरा के हों या ब्राह‍मण परंपरा के, दोनों ही आधुनिक समय के लिए अनुपयोगी हैं, लेकिन दुखद यह है कि असुर परंपराएं तो कमजोर पड रही हैं और  प्रतिगामी ब्राह‍मणवादी कर्मकांडों  का जोर बढता जा रहा है। जरूरत इस बात की है कि हम असुर परंपरा के प्रकृति के संरक्षण वाले भाग और समतामूलक भाव को स्वीकार करें तथा अनुपयोगी हो चुकी चीजों को छोड दें। साथ ही विषमतामूलक ब्राह‍मणवादी संस्कृति और उसके कर्मकांडों को तो पूर्ण तिरस्कार आवश्यक है ही।


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