फॉरवर्ड प्रेस

छोटानागपुर के असुर

 – नवल किशोर कुमार

उन दिनों, मैं पटना में तरुणमित्र के समन्वय संपादक के रूप में कार्य कर रहा था। पूरे दिन रूटिन की खबरें और  सियासी गलियारे की उठापटक के बीच पत्रकार के बजाय रोबोट बन चुका था। वैसे मैं यह मानता हूं कि पत्रकारिता के हिसाब से यह भी अनिवार्य उपक्रम है। खासकर दैनिक अखबारों की प्रकृति ही ऐसी होती है। हर दिन हमारे लिए अखबारों के पन्ने कोरे होते हैं और आप शून्य से ही शुरू करते हैं। एक दिन फारवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन जी का फोन आया। उन्होंने पूछा कि असुरों से मिलने चलेंगे? अचानक रोबोट बन चुके नवल के भीतर का इंंसान जाग उठा। मैंने तपाक से कहाँ – कब चलना है। सबसे बड़ा संकट, समय का था। अधिक से अधिक दो दिनों का समय निकाला जा सकता था। तय कार्यक्रम के अनुसार 1 नवंबर 2015 को प्रमोद रंजन दिल्ली से रांची पहुंचे। मैंने योजना बनायी कि ट्रेन से पटना से रांची की दूरी नापी जाय। परंतु देर रात तक काम करने के बाद सुबह-सुबह जगना संभव न हो पाया और पटना से रांची जाने वाली जन शताब्दी हाथ से निकल गयी। जाना तो था ही, सो उसी दिन पटना से रांची के लिए बस में सवार हुआ।

रांची में पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरू शिबू सोरेन के साथ प्रमोद रंजन (फोटो : एफपी ऑन द रोड, 2015)

पूरे रास्ते विलुप्त होते असुर समुदाय के बारे में सोचता रहा। मिथकों के पुनर्पाठ के क्रम में, खासकर महिषासुर का कैरेक्टर कई मायनों में खास है। रणेंद्र के ‘ग्लोबल गांव का देवता’ में, इसके कुछ नये आयाम दिखते हैं। इन आयामों में ऐतिहासिक तथ्य और प्रमाण भी मिलते हैं। मसलन छोटानागपुर के पठार में बसे लोहरदग्गा और गुमला आदि जिलों के संदर्भ में, जहां वर्तमान बड़ी तेजी से बदल रहा है। रणेंद्र की किताब इस बदलाव के अलग-अलग आयामों को सामने लाती है। दिल्ली व पटना से गुमला के सुदूर गांवों तक की हमारी यात्रा, इन्हीं आयामों के तह तक जाने को लेकर केंद्रित रही। साथ ही झारखंड के सबसे ऊंचे पठार पर स्थापित भव्य नेतरहाट का, वहां आसपास के गांवों पर क्या प्रभाव पड़ा है, इसे देखने की इच्छा थी।

प्रमोद रंजन जी ने यह जानकारी दी कि झारखंड के गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड में आदिम आदिवासी असुर जाति के लोग रहते हैं। लुप्त होती जातियों में से एक, असुर जाति की संस्कृति और उनके अस्तित्व को लेकर हमारे मन में कई सवाल थे। सवाल इसलिए भी कि इस जाति के लोग पूर्व में लोहा निकालकर उसे गलाने का काम करते थे। वे जिन इलाकों में रहते हैं वहां लौह खनिज (हेमेटाइट, मेग्नेटाईट और  जोईथाईट आदि) व अल्युमिनियम का खनिज बॉक्साइट प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। प्रकृति के साथ उनका जुड़ाव उनके संस्कारों में भी दिखायी देता है।

गुमला के पठारी इलाके में अनिल असुर के साथ नवल किशोर कुमार(फोटो : एफपी ऑन द रोड, 2015)

रणेंद्र जी के कारण रांची से करीब ढाई सौ किलोमीटर दूर गुमला तक की यात्रा और फिर इसके बाद असुर जाति के लोगों से मिलने में सुविधा हुई। उन्होंने बिशुनपुर ब्लॉक के बीडीओ रवि कुमार को हमारे वहां जाने की जानकारी पहले ही दे दी थी। सुबह करीब 9 बजे रांची से चलकर हम  अपने पहले पड़ाव (बिशुनपुर प्रखंड कार्यालय) करीब तीन पहुंचे। इस क्रम में हम जैसे-जैसे रांची से बाहर निकल रहे थे, गांवों और शहरों के बीच की खाई बढ़ती जा रही थी। स्थानीयता के सवाल पर झारखंड की राजनीति भले ही आये दिन वहां तूफान मचाती हो, परंतु सामान्य जनजीवन में यह सब सामान्य सा लगता है।

दिखी स्वर्णरेखा नदी की बदहाली

वहीं गांव के बाजार में सुबह का नाश्ता (सखुआ के दोनों में स्थानीय सब्जी की रसदार तरकारी और पूरी) के बाद हम आगे बढ़े। इस दौरान ऊंचे होते जाते पठार भी हमराही हो चले थे। रास्ते में स्वर्णरेखा नदी मिली। एकदम निष्प्राण। उसके पेट में पड़े पत्थरों के बीच रिस रहे पानी रक्त के रिसाव के समान थे। थोड़ी देर हम रूके। हम स्थिर होकर उस नदी का हश्र देख रहे थे जो उस पूरे इलाके के लिए जीवन रेखा है और सोच रहे थे कि जब जीवन रेखा की स्थिति ऐसी है फिर इसके आसरे रहने वाले लोगों का जीवन कैसा होगा। पहाड़ों पर रहने वाले लोग कैसे पानी पीते होंगे। स्वर्णरेखा नदी का आकार क्या ऐसा ही रहा होगा अतीत में। करीब पौने पांच सौ किलोमीटर तक सफर तय करने वाली यह नदी 28,982 वर्ग किलोमीटर भूभाग में रहने वाले लोगों के लिए जीवन रेखा है। इसके अतीत के बारे में एक ख्याल आया। ख्याल यह कि इसी नदी के किनारे जमशेदजी टाटा ने लोहा की फैक्ट्री लगायी थी और बाद में पूरा शहर ही बसा दिया, जिसे जमशेदपुर कहा जाता है। क्या कनेक्शन रहा होगा, स्वर्णरेखा नदी और लोहे की फैक्ट्री के बीच में?

स्वर्णरेखा को उसके हाल पर छोड़ कर, आगे बढने पर भी वह हमारा पीछा नहीं छोड़ रही थी। हमारे जेहन में इस नदी का नाम था। माना जाता है कि इस नदी में सोने के कण मिलते हैं। कुछ लोग नदी में बालू छानकर उसमें सोने के कण तलाशते हैं। हालांकि वर्तमान में स्वर्णरेखा नदी का मरणासन्न होना इसे सिरे से खारिज करता है। एक वजह यह कि जिस नदी में पानी की तेज धार न हो वह भला पत्थरों को कणों में कैसे बदलेगी और फिर सोने के कण आयेंगे कहां से? वैसे स्वर्णरेखा का नाम इस संदर्भ में सार्थक लगा कि पूर्व में यह नदी सचमुच सोना लाती होगी, जो खेतों में किसान बोते होंगे और काटते भी होंगे। फिलहाल जो मंजर था, उसमें न स्वर्णरेखा थी और न किसान। स्वर्ण रेखा नदी से बिहार में गंगा की सहायक नदी सोन की याद भी आयी। सोन कैमूर रेंज की पहाड़ियों में जमा होने वाले बरसात की पानी को गंगा में मिलाती है। हालांकि इसमें सोना के कण नहीं मिलते परंतु बालू के कारण इसका आर्थिक महत्व बहुत अधिक है और राजनीतिक भी। इसी नदी के पास बसे औरंगाबाद जिले में जिउतिया पर्व मनाया जाता है, जाे मूलनिवासियों का पर्व है।

पहले लूटा लोहा अब बॉक्साइट पर जोर

स्वर्ण रेखा नदी का सोना और सोन नदी का बालू और यहां से 250 किलोमीटर दूर औरंगाबाद में मनाए जाने वाले जिउतिया के बीच समानता व संबंधों को सोचते विचारते हम आगे बढ़ रहे थे। सामने भयावह मंजर था। लेकिन सड़कें अच्छी थीं। सड़कों पर बॉक्साइट से लदी गाड़ियों की रेलमपेल थी। बॉक्साइट एक प्रकार का खनिज है जिससे अल्युमिनियम निकाला जाता है। इसके अलावा बॉक्साइट के पत्थरों में लोहा भी मौजूद रहता है। संभवत: यही वजह है कि पूरे इलाके में जिंदल जैसी बड़ी कंपनियां सक्रिय हैं। सरकार भी मुनाफे पर ध्यान रखने के लिए यदा-कदा नजर आती है। इसके लिए सरकार ने धर्मकांटा लगा रखा है जिनका इस्तेमाल बॉक्साइट लदी गाड़ियों के वजन के लिए किया जाता है और इसी आधार पर कर का निर्धारण किया जाता है। धर्मकांटा शब्द थोड़ा अजीब सा लगा। क्या वाकई इस प्रकार के कांटे धर्म के आधार पर तौलते हैं और फिर उनका धर्म कैसा होता है। ब्राह‍मण ग्रंथों के मिथकों में वर्णित ताकतवर के पक्ष में झुका हुआ धर्म? कारपोरेट परस्ती का धर्म?

पहाड़ों का सीना काटकर बनाये गये रास्ते, अक्सर चौड़े नहीं होते। उस पर बॉक्साइट लदे ट्रकों के आने जाने का लंबा सिलसिला हमें डरा दे रहा था। अचानक नजर आने वाले इन ट्रकों से बचने का एकमात्र उपाय किनारे होकर जान बचाना ही है। थोड़ी सी असावधानी होने पर सैंकड़ों फुट गहरे खाई का खतरा हमारे सामने था।

अब हम रांची से 240 किलोमीटर दूर बिशुनपुर प्रखंड कार्यालय परिसर में थे। भारतीय शासन व्यवस्था की एक इकाई। लोगों का हुजूम था। जानकारी मिली कि पंचायती राज निकायों के चुनाव होने हैं और उम्मीदवारों द्वारा नामांकन किया जा रहा है। हालांकि जो गहमागहमी परिसर में थी, वह अंदर बाबुओं के चैम्बरों में नहीं थी। हम प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) रविन्द्र गुप्ता के सामने थे। करीब 8-10 लोग थे। कोई राशन कार्ड को लेकर याचना कर रहा था, तो कोई अनाज नहीं मिलने की शिकायत कर रहा था। किसी का वृद्धा पेंशन नहीं आया। रविन्द्र लोगों की शिकायतें सुन रहे थे।

अमतीपानी गांव में हिंडाल्को कंपनी के बॉक्साइट खदान का दृश्य (फोटो : एफपी ऑन द रोड, 2015)

थोड़ी ही देर में जन- शिकायतों का दौर समाप्त हो गया और रविन्द्र हम लोगों से मुखातिब हुए। बातचीत के क्रम में उन्होंने जानकारी दी कि उनके इलाके में बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो अमीर होने के बावजूद गरीबों के राशन कार्ड पर कब्जा कर रखे हैं। उनके मुताबिक उन्होंने ऐसे लोगों से अपना राशन कार्ड सरकार को वापस करने की अपील की, जिसका सकारात्मक परिणाम उन्हें मिला था।

हमारे जेहन में असुर समाज और उनकी संस्कृति थी। जल्द ही रवि जी ने एक नौजवान से हमारा परिचय कराया। नाम था अनिल असुर। आधुनिक शैली का पोशाक पहने, अनिल को देखकर हम इस निष्कर्ष पर पहुंच गये कि असुर समाज में भी बड़ी तेजी से बदलाव हो रहा है। शेष भारत के जैसे उनका जीवन भी बदल रहा है। रविन्द्र जी ने ही अनिल असुर को हमारे साथ कर दिया। अब असुर संस्कृति से हमारा साक्षात्कार करवाने की जिम्मेदारी अनिल असुर की थी।

बिशुनपुर प्रखंड कार्यालय में ही, एक और जानकारी मिली। वह भी प्रमाण के साथ। प्रखंड विकास पदाधिकारी ने ही बसंती असुर नामक महिला से हमारा परिचय कराया। बसंती असुर ने हमें बताया कि उन्हें झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के द्वारा लिये गये एक फैसले के कारण सरकारी नौकरी मिली। उन्होंने लुप्त होते आदिम आदिवासियों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद सीधे नौकरी की व्यवस्था की थी। असुर जाति तेजी से खत्म होने वाली जातियों में से एक है। वर्ष 2011 में हुए जनगणना के मुताबिक इनकी संख्या अब 7,783 शेष बची है।

असुरों के गांवों की ओर

बीडीओ साहब को धन्यवाद देकर हम अपनी यात्रा पर आगे बढ़े। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे थे आदिवासी संस्कृति और जीवनशैली अधिक सजीव रूप में हमारे सामने आ रही थी। इस क्रम में अनिल असुर के साथ कई मुद्दों पर बातचीत हुई।  अनिल असुर जैसे युवा इस समाचार से खूब अच्छी तरह वाकिफ थे कि महानगरों में महिषासुर विमर्श का विषय बन चुके हैं। उन्होंने बताया कि रांची से उनके पास एक पर्चा आया था, जिसमें दुर्गा और महिषासुर को लेकर विस्तार से वर्णन किया गया था। महिषासुर को अपना पूर्वज और अपना गौरव बताने वाले अनिल असुर ने हमें बताया कि आज असुर समुदाय भी संक्रमण काल  से गुजर रहा है। युवा अपने पूर्वजों के बारे में नहीं जानते हैं। उनके पास शिक्षा का अभाव है। जब वे असुर समाज में शिक्षा के अभाव की बात कर रहे थे तो हमें लगा कि वे पारंपरिक शिक्षा की बात कर रहे हैं। लेकिन अनिल ने विस्तार बताया कि उनके कैसे पूरे इलाके में ब्राह‍मणवादी संस्थाएं अपनी शिक्षा नीति थाेपने में कामयाब हो रही हैं।

बातचीत का सिलसिला चलता रहा और हम नेतरहाट जाने के दोराहे पर खड़े थे। एक रास्ता रणेंद्र द्वारा लिखित ‘ग्लोबल गांव का देवता’ में वर्णित देवताओं के स्वर्ग यानी नेतरहाट स्कूल जाता था. तो दूसरा रास्ता उन असुरों के गांव की ओर, जिनकी धरती पर नेतरहाट बनाया गया है। हम आगे बढ़ रहे थे। एक बोर्ड पर लिखा था – “अरूण यह मधुमय लातेहार हमारा”। जयशंकर प्रसाद की कविता की पैरोडी कर लिखी गई, इन पंक्तियों के साथ कुछ जंगली जानवरों के चित्र जरूर बने थे लेकिन उनमें कोई आदिवासी इंसान नहीं था। पर्यटकों को लुभाने के लिए वैसे भी जंगली जानवर महत्वपूर्ण माने जाते हैं, इसमें इंसानों की क्या भूमिका। मेरे जेहन में जयशंकर प्रसाद की कविता थी-

“अरुण यह मधुमय देश हमारा।

जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।”

तब तक दोपहर के करीब तीन बज चुके थे। हमारे पास दो ही विकल्प थे। पहला तो यह कि पहले नेतरहाट जाकर गेस्ट हाउस में थोड़ी देर आराम कर लें और रात गुजारने का इंतजाम पहले कर लें। दूसरा विकल्प यह कि हम पहले असुरों के गांव जाकर उनसे अधिक से अधिक जानकारियां हासिल करें। आखिर यही हमारी यात्रा का उद्देश्य भी था।

बॉक्साइट खदान मजदूरों का हाल

हम नेतरहाट जाने वाले रास्ते से, फिर मिलने का वादा कर असुरों के गांव की ओर बढ़ चले। साथ में अनिल असुर हमारे मार्ग-दर्शक थे। उन्होंने बताया कि उनका अपना गांव सखुआपानी है। सबसे पहले हम वहीं रूके। बॉक्साइट निकाले जाने के बाद धरती पर बने बड़े-बड़े निशान कई सवाल खड़े कर रहे थे। इन सवालों की एक वजह यह भी थी कि अनिल असुर ने हमें बताया कि बॉक्साइट का उत्खनन करने वाली कंपनियों को राज्य सरकार की तरफ से स्पष्ट निर्देश है कि उत्खनन के उपरांत गडढों को भर दें। कुछ कंपनियां राज्य सरकार के इस निर्देश का पालन करती हैं तो कई धरती को दिये, अपने जख्मों को वक्त के आसरे छोड़कर चली जाती हैं।

अमतीपानी बॉक्साइट खदान के मजदूर पर्यावरण दिवस समारोह की तैयारी करते हुए(फोटो : एफपी ऑन द रोड, 2015)

ऐसे ही एक उत्खनन केंद्र के पास हम रूके। अनिल से पूछा तो जानकारी मिली कि यह इलाका अमतीपानी के नाम से जाना जाता है। बातचीत के क्रम में मालूम हुआ कि अधिकांश् मजदूर असल में अपने उन खेतों के मालिक हैं, जिनके खेतों से बॉक्साइट निकाला जा रहा है। खेत का मालिक अपने ही खेत में मजदूर की हैसियत से काम करने को विवश है। कारपोरेट जगत के मालिक और मजदूर शब्द की परिभाषा को लेकर हम कुछ सोच ही रहे थे कि एक दिलचस्प दृश्य नजर आया।

कुछ असुर मजदूर सखुआ के सूखे तने जमीन में गाड़ रहे थे। पहले तो मामला समझ में नहीं आया। सूखे पेड फिर से सजीव होंगे क्या? हद तो तब हो गयी जब वे मजदूर तनों में सखुआ के हरे-हरे पत्ते लपेट रहे थे। निर्जीव तने को सजीव पेड़ बनाने के प्रयास के बारे में पूछा तो जानकारी मिली कि विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर कंपनी के बड़े पदाधिकारी आने वाले हैं। यह सब उनकी आगवानी के लिए किया जा रहा है। ताकि उन्हें ऐसा नहीं लगे कि वे किसी निर्जन स्थान पर आये हैं। प्रकृति की नैसर्गिक सुंदरता को उजाड कर, अब वे वहीं पर्यावरण दिवस मना रहे हैं।

ढाबे पर ही हमारी मुलाकात एक और अनिल असुर से हुई। ये दूसरे वाले अनिल असुर सुषमा असुर के भाई निकले। वहीं सुषमा असुर, जिनकी हिंदीकविताओं ने असुरों के विमर्श के बारे में शेष दुनिया का ध्यान खींचा था। इस संबंध में फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर, 2012 अंक में आवरण कथा का प्रकाशन हो चुका था।  हम उस अंक की कुछ प्रतियां साथ लेकर आए थे। हमने  सुषमा असुर के भाई को उसकी एक प्रति दी। सुषमा असुर के भाई अनिल असुर ने खदानों के मामले में जानकारी दी। मसलन, उन्होंने अपनी एकड़ जमीन कंपनी को दी। इसके बदले में कंपनी ने करीब डेढ़ लाख रुपए दिया। इसके अलावा वे अपने ही खेत में बने खदान में मजदूरी करते हैं। इसके लिए उन्हें प्रतिदिन के हिसाब से 230 रुपए दिये जाते हैं।

तीसरे अनिल असुर से हुई दिलचस्प मुलाकात

अमतीपानी खदान के पास काम कर रहे अधिकांश मजदूरों के लिए हमारे सवाल परायों के सवाल थे। हालांकि वे यह समझ रहे थे कि हम उनके बारे में ही बात कर रहे हैं। सबसे दिलचस्प यह कि लगभग सभी मजदूर बिना किसी संकोच के अपने नाम के अंत में असुर जोड़ रहे थे। हालांकि असुर जनजाति की परंपरा आदि के बारे में पूछने पर या तो वे शरमा जाते या फिर खामोश रहना ही बेहतर समझ रहे थे। इस बीच हमने बातचीत खदान कंपनियों द्वारा जमीन अधिग्रहण को लेकर शुरू की। जानकारी मिली कि यह किसान पर निर्भर करता है कि वह अपनी जमीन कंपनी को दे या न दे। कंपनी जबरदस्ती नहीं करती है। इस बीच हमारी मुलाकात एक तीसरे अनिल असुर से हुई। वह भी उसी गांव के जहां के, जहां के हमारे सहयात्राी अनिल असुर थे। यानी सखुआपानी के। वेशभूषा अलग थी। डील-डौल भी अलग। नाम पूछा तो जवाब मिला अनिल असुर। हम मुस्करा रहे थे। एक साथ तीन अनिल असुरों को देखकर। खैर उनसे बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। वे बताने लगे कि  लड़ाई हुई और एक पार्टी जीत गई। लेकिन हम यह मानते हैं कि महिषासुर को छल से मारा गया। महिषासुर महिलाओं पर हथियार नहीं उठाते थे। अनिल ने बताया कि “महिषासुर शहादत दिवस” वे लोग नहीं मनाते हैं। लेकिन दिल से महिषासुर को याद करते हैं। यह पूछने पर कि क्या दुर्गा पूजा बंद होना चाहिए। अनिल ने कहा कि बंद हो न हो लेकिन असुर जाति के लोग इसमें भाग न लें। उन्होंने यह भी बताया कि बगल के गांव जोभीपाट में दुर्गापूजा होती है।

खदान कंपनियों का सच

बॉक्साइट के खदान और उत्खनन की पूरी प्रक्रिया को करीब से देखने की हमारी इच्छा थी। अनिल असुर और हम खदान मजदूरों के साथ एक बेहद खस्ताहाल जीप पर सवार होकर अमतीपानी खदान की ओर चले। रास्ते में मजदूरों से उनकी मजदूरी और उनके काम करने में आने वाली परेशानियों के बारे में जानकारी मिली। हम खदान में खड़े थे। बड़ी-बड़ी मशीनें लगी थीं। वे जोर से वार करतीं और पहाड़ का सीना टुकड़ों में बंट जाता। मजदूरों ने बताया कि इस पूरे इलाके में बॉक्साइट प्रचुर मात्रा में मिलता है।  कंपनियां छोटा से छोटा टुकड़ा भी नहीं छोड़ती हैं। निकाले गये खनिज को गाड़ियों में लादने का काम भी वे मशीनें ही करती थीं। महज कुछ मिनटों में बड़ा सा डंफर भर जाता और दूसरा डंफर अपने काम के लिए मुस्तैद। बॉक्साइट के खदान में मजदूरों की आवश्यकता नाम मात्र की होती है। एक बड़ी सी खदान जिसके हम साक्षी बने, कुल मिलाकर चार या पांच मजदूर रहे होंगे। सभी मशीनों पर सवार। हालांकि बाद में मजदूरों ने बताया कि उनमें से कई डंफरों को चलाने का काम करते हैं।

सूरज वापसी की राह पर अग्रसर हो चुका था। हम सखुआपानी गांव पहुंचना चाहते थे। बॉक्साइट कंपनियों की सक्रियता का असर इस पूरे इलाके में देखने को मिला। सड़कें संकीर्ण ही सही लेकिन अच्छी थीं। वैसे भी असुरों की बस्ती में इतनी आबादी नहीं होती कि सड़कों पर भीड़भाड़ मिले। इक्के-दुक्के लोग अपने पशुओं के साथ नजर आते। मानो वे कह रहे हों कि अब तो सूर्यास्त हो रहा है। अब असुर संस्कृति कहां?

असुरों में बढ़ा है आलू की खेती का प्रचलन

अनिल के अनुसार परंतु रणेंद्र जी जब बिशुनपुर प्रखंड के बीडीओ बनकर आये, तब उन्होंने कंपनियों से सरकारी आदेश का अनुपालन करवाया। कंपनियों ने गड्ढों को भरवाया। परंतु बाद में उनके जाने के बाद कंपनियां मनमौजी करने लगी हैं। अनिल ने एक जानकारी और दी। यह जानकारी बड़ी दिलचस्प थी। किसान परिवार के आने वाले रणेंद्र जी एक कुशल प्रशासक हैं। पठारी इलाकों में बने खेतों में पानी नहीं ठहरता। इस कारण वे फसलें जिन्हें अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है, लोग खेती नहीं कर पाते थे।  रणेंद्र जी ने जमीनी स्तर पर कार्य करते हुए पहले तो खेतों की मिट्टी जांच करवायी। बाद में यह तय किया कि पठार के ढलान वाले खेतों में बरसाती आलू की खेती की जा सकती है। पहले प्रयोग के स्तर किया गया। बाद में यह पूरे इलाके में लोकप्रिय हो गयी। इसने असुरों व अन्य जनजातियों के आर्थिक आधार को एक नया आयाम दिया।

यह संयोग ही रहा कि एक बुजुर्ग किसान अपने खेत में हल जोतते मिल गये। पूछा तो उनकी पीड़ा सामने आयी। बॉक्साइट उत्खनन के बाद कंपनियां जो गड‍्ढा भरती हैं, वह उपजाऊ नहीं रह जाता है। ऊपर से उसपर हल चलाना एक मुश्किल काम है। पत्थर के टुकड़े आ जाने से भी कठिनाई होती है। मुख्य फसलें मसलन धान और मक्का की खेती नहीं हो पाती है। इस कारण हमलोग आलू की खेती करते हैं। इसमें मेहनत कम लगता है और पानी भी कम लगता है।

प्रकृति से जुड़ा है गांवों का नामकरण

सखुआपानी गांव में प्रवेश करने के बाद सड़क का रंग बदल गया। काली सड़क का रंग लाल हो गया। पथरीले रास्तों पर चलते हुए हम अनिल असुर के गांव पहुंचे। उनका घर हमारे सामने था। वहीं बगल में सुषमा असुर का घर। गांव में ही स्कूल भी नजर आया। युवाओं की टोली शराब में मग्न थी। हमें देख पहले वे हिचकिचाये। लेकिन जल्द ही वे बताने लगे कि वे अब हंड़िया नहीं पीते। वे स्पिरिट से बनने वाली देशी शराब पी रहे थे।

गांव की महिलायें चूल्हा जलाने में मशगूल दिखीं। गांव में अधिकांश घरों से धुआं निकलने लगा था। इस बीच अनिल असुर ने अपने गांव के नाम के बारे में जानकारी दी। उनके मुताबिक सखुआ असुरों की संस्कृति में सबसे महत्वपूर्ण पेड़ माना जाता है। वे सखुआ के पेड़ को सरणास्थल (पूजा करने का स्थान) बताते हैं। अनिल के मुताबिक सखुआपानी का मतलब सखुआ के पेड़ के बगल से बहने वाली पानी की धारा। इसी आधार पर उन्होंने कई ऐसे गांवों के नाम बताये। मसलन काठोपानी का मतलब लकड़ी और पानी की धारा। अमतीपानी के बारे में उन्होंने बताया कि अमती एक प्रकार का पेड़ है जिसके फल ईमली के समान खट्टेमीठे होते हैं। आंवड़ापाठ का मतलब बताते हुए अनिल कहते हैं कि पाठ का मतलब उंचे स्थान पर बसा एक गांव और आंवड़ा यानी आंवला का पेड़। इसी प्रकार गोरा पहाड़ का मतलब काला, लाल या उजला पहाड़ नहीं बल्कि आसुरी भाषा में गोरा शराब के लिए तैयार किए गए महुआ को कहा जाता है। इसी प्रकार के कई गांवों के नाम जैसे पोलपोलपात, सुजाम, खैरीपात, हीरोडीह, आंबाकोना(आंबा मतलब आम) आदि।

सखुआपानी गांव में अपने एक मित्र के साथ अनिल असुर (फोटो : एफपी ऑन द रोड, 2015)

असुरों का जीवन प्रकृति पर आधारित माना जाता है। अनिल असुर के मुताबिक उनका गांव सखुआपानी गुरबेरी पंचायत का हिस्सा है। इस संबंध में उन्होंने बताया कि असल में गुरबेरी शब्द गुरदेरी (गुरू का द्वार) से बना है। उनके मुताबिक पहले असुर जनजाति के लोग गुरबेरी में ही रहते थे। वहां एक चट्टान आज भी है। करीब पांच फीट के चट्टान के बीच में लोटा डुबाने भर की जगह है जहां से पानी निकाला जाता है। पानी कभी कम नहीं होता है। अनिल ने बताया कि उनके गांव के आसपास कई झरने हैं। यह मान्यता है कि इन झरनों में नहाने से कई प्रकार की बीमारियां ठीक हो जाती हैं।

लोग नहीं लगाते हैं अपने घरों में न कुंडी न ताला

अनिल असुर का गांव सखुआपानी एक मायने में सबसे खास है। गांव के किसी भी घर में ताला क्या कुंडी तक नहीं लगायी जाती है। इसका अनुभव हमलोगों ने स्वयं किया, सुषमा असुर के घर में। जानकारी मिली कि सुषमा असुर अब अपने गांव में नहीं रहती हैं। बीच-बीच में आती रहती हैं। लेकिन उनके नहीं रहने पर भी उनका घर हमलोगों ने खुला पाया। अंदर बने एक झोपड़ी में बल्ब जल रहा था। घर में समान के नाम पर कुछ बर्तन और चौकी।

इस बीच गांव के एक वृद्ध से मुलाकात हुई। उन्होंने असुर संस्कृति के बारे में विस्तार से बताया। मसलन लोहा गलाने की कला के बारे में। उनके मुताबिक यह कला बहुत प्राचीन है और अभी भी कुछ लोग यह काम करते हैं। हमारी इच्छा उस जगह पर जाकर उन लोगों से मिलने की थी जिन्होंने अपने पूर्वजों के उस महान आविष्कार को जिंदा रखा है, जिनके कारण आज पूरी दुनिया भर की संरचनाएं टिकी हैं। जरा सोचिए असुरों ने खनिज से लोहा निकालने और उसे गलाकर हथियार और औजार आदि बनाने की कला का आविष्कार किया था। खैर इतिहास में उन्हें इसका श्रेय क्यों नहीं दिया गया, यह सब सोचते-विचारते शाम हो गयी। अब सखुआपानी गांव से हम विदा हो रहे थे। पश्चिम में सूरज की चंद किरणें शेष थीं। रात हमने नेतरहाट के प्रसिद्ध डाकबंगला में गुजारी, जो एक सरकारी गेस्ट हाऊस है।

पठारी इलाकों में रात बड़ी तेजी से आती है। शाम होते ही सड़कें सूनी और लोग अपने-अपने घरों में बंद हो जाना चाहते हैं। गेस्ट हाउस के कमरे में हम उन तथ्यों को संकलित करने में जुटे, जो हमें दिनभर असुरों के संबंध में मिली थीं। प्रमोद रंजन जी और मैंने पहले तो यह प्रयास किया कि मिले तथ्यों को लिपिबद्ध कर लिया जाय। लेकिन रांची से नेतरहाट तक की यात्रा और पूरे दिन की थकान हमें इसकी इजाजत भी नहीं दे रही थी। इसके अतिरिक्त हमें अनेक जानकारियां अनिल असुर से लेनी बाकी भी थीं। हम देर रात अनिल से बातें करते रहे और जल्दी-जल्दी तथ्यों को डायरी में लिखकर  खुद को रात के हवाले कर दिया।

अगली सुबह सचमुच सुबह साबित हुई। नेतरहाट का अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य हमारे सामने था। ठंढ का हल्का-हल्का स्पर्श भी तब किसी हबीब के जैसा था। मेरा अंतर्मन उनके बारे में सोच रहा था जिनकी धरती पर बने डाकबंगला नामक इस महल के एक कमरे में हम थे।

शेष भारत के लोगों के जैसे ही असुरों के समाज में भी जीवन के हर अवसर के लिए परंपराएं हैं और सभी असुर इन्हें आज भी मनाते हैं। ये परंपराएं जन्म से लेकर मृत्यु तक जुड़ी हैं। किसी शिशु के जन्म लेने के बाद जो पहली परंपरा है, वह नामकरण की परंपरा है। बिहार के मैदानी इलाकों में सौरी की जो प्रथा है, वैसा ही असुर समाज में भी होता है। अंतर यह है कि गंगा के मैदानी इलाकों में बीस दिनों तक जच्चा और बच्चा दोनों एक कमरे में ही रहते हैं। इसे बीसौढ़ी भी कहते हैं। जबकि असुरों में यह अवधि केवल पांच दिनों की होती है। पांच दिन के बाद असुर महिला दूषित होने के अभियोग से मुक्त हो जाती है। छठे दिन बच्चे का मुंडन कराया जाता है और फिर उसके नामकरण की प्रक्रिया होती है। यह प्रक्रिया भी अनूठी है। जैसे सबसे पहले सखुआ के पत्त का दोना बनाया जाता है। फिर इसमें साफ पानी डाला जाता है। घर के सबसे बड़े बुजुर्ग इसमें चावल के दाने डालते हैं। सबसे पहला दाना अंतिम पूर्वज के नाम का प्रतीक होता है। फिर उसके बाद के पूर्वजों के नाम पर दाने डाले जाते हैं। इस क्रम में यदि कोई दाना सबसे पहले दाने के साथ सट जाय तो माना जाता है कि वहीं नवजात बच्चे का नाम है। पूर्वजों को यही पसंद है। इसके बाद प्रक्रिया खत्म हो जाती है। वहीं पूरी प्रक्रिया में यदि कोई दाना सबसे पहले दाने के साथ नहीं सटता है तब सबसे अंतिम पूर्वज का नाम ही नवजात बच्चे का नाम होगा। यह प्रक्रिया लड़के और लड़कियों दोनों के नामकरण के लिए की जाती है।

इन परंपराओं में महिलायें बराबर की साझेदार होती हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर। बच्चों के नामकरण संस्कार के मौके पर सखुआ के पत्तों का दाेना बनाना और पानी देना मुख्य तौर पर घर की महिलायें करती हैं। इसके पहले जिस जमीन पर यह प्रक्रिया की जाती है उसे साफ करना और उसे सजाने का काम भी महिलायें ही करती हैं।

महिलाओं की इच्छा भी महत्वपूर्ण

जन्म संस्कार के बाद मनुष्य के जीवन में दूसरा अहम संस्कार विवाह का होता है। असुर समाज खुले विचारों वाला समाज है। विवाह एक बंधन तो होता है लेकिन अनिवार्य बंधन नहीं। मसलन असुर दंपत्ति बिना शादी किये भी एक-दूसरे के साथ जीवन जी सकते हैं और संतान उत्पन्न् कर सकते हैं। उनके संतान को अवैध संतान की संज्ञा नहीं दी जाती है। बीती रात गेस्ट हाउस में अनिल असुर ने दिलचस्प जानकारी दी थी। उसके मुताबिक यदि कोई असुर महिला बलात्कार की शिकार हो जाय और उसके कारण उसे बच्चा हो तो, उस बच्चे को भी समाज में उतनी ही प्रतिष्ठा मिलती है जितना कि अन्य बच्चों को। असुर समाज में देह सामाजिक प्रतिष्ठा की कसौटी नहीं।

बिशुनपुर में अपने परिजनों के साथ सुषमा असुर (फोटो : एफपी ऑन द रोड, 2015)

सामान्य मामलों में विवाह में लड़का-लडकी दोनों की सहमति महत्वपूर्ण होती है। सहमति बनने की इस प्रक्रिया को सामाजिक स्वीकार्यता भी हासिल है। हिंदी कैलेंडर के मुताबिक नया वर्ष शुरू होने के मौके पर ही असुर सात दिनों का ढोलजतरा मेला लगाते हैं।

बिहार के मिथिलांचल में सौराठ सभा का आयोजन होता है जहां लड़के-लड़कियां जुटते हैं और अपने जीवनसाथी का चुनाव समाज की मर्जी से सबके सामने करते हैं। हालांकि बिहार में यह परंपरा भी दम तोड़ रही है।

ढोल जतरा यानी असुरों का स्वयंवर

ढोल जतरा में महिलायें सफेद रंग की लाल पाट वाली साड़ी पहनती हैं। इसके अलावा पैर, कमर, कान और गले में जेवर पहनती हैं। असुर समाज में नाक नहीं छेदा जाता है। महिलायें नाक में कोई जेवर नहीं पहनती हैं। पहले ये जेवर कीमती अष्ट धातु से बनाये जाते थे। पुरूषों के लिए भी जेवर होते थे। कमर और गले में। पैर में चौड़ी-चौड़ी पट्टी होती थी जिसमें घुंघरू लगे होते थे। धोती का इस्तेमाल कर दोनों बाहों में झालर बनाते थे। सिर पर मुरेठा के साथ मोर पंख होता था।

ढोल जतरा के दौरान यदि किसी लड़के को कोई लड़की पसंद आ जाये तो वह बिना पूछे उसके मांग में सिंदूर डाल देता है। यदि लड़की को भी सहज स्वीकार है तो दोनों पंच के पास जाते हैं और समाज उन दाेनों की शादी को स्वीकार कर लेता है। उसी समय लड़का लड़की को अपने घर ले जा सकता है।

वहीं लड़की द्वारा लड़के को स्वीकार नहीं किये जाने की अवस्था में लड़की अपने गांव के लोगों के पास जाकर शिकायत करती है। पहले तो समाज के लोग यह देखते हैं कि दोनों के बीच संबंध हो सकता है या नहीं। इसके बाद यदि कोई भी परेशानी होती है तो दोनों को उसी समय अलग कर दिया जाता है।

दिलचस्प यह कि इस परंपरा में महिलाओं की 80 फीसदी से अधिक सहभागिता होती है। मसलन यदि कोई महिला किसी पुरूष को पसंद करे और उसे अपना जीवन-साथी बनाना चाहे तो वह अपने परिवार से बात करती है और फिर उसके परिजन लड़के के परिजनों से बातचीत के आधार पर रिश्ता तय करते हैं। हमारी परंपरा में लड़कियों काे यह अधिकार हासिल है।

बच्चे भी शामिल होते हैं मां-बाप की शादी में

ढोल जतरा के अतिरिक्त सामाजिक संपर्क के जरिए भी रिश्ता तय किया जाता है। खास बात यह है कि लड़की वाले पहले लड़के वालों के घर नहीं जाते हैं। असुर समाज में लड़का के माता-पिता लड़की के घर जायेंगे। बातचीत होने के बाद लड़की पक्ष के लोग लड़के के घर जायेंगे। सभी को रिश्ता पसंद आने की स्थिति में शादी के पहले ही लड़की को लड़के के घर का जिम्मा दे दिया जाता है और लड़की अपने ससुराल आ जाती है। बाद में जब दोनों से संतान की उत्पत्ति होती है तब जाकर उनकी शादी करायी जाती है। इस परंपरा में शादी के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं होती है। प्राय: यह देखा जाता है कि लड़का और लड़की दोनों अपना गृहस्थी चलाने के योग्य हुए हैं या नहीं। साथ ही शादी करना भी जरूरी नहीं है। लेकिन वे अपने बच्चों की शादी तब तक नहीं कर सकते हैं जबतक कि वे स्वयं शादी न कर लें। इसलिए असुर समाज में कई अवसरों पर बच्चों की शादी के समय ही उनके माता-पिता की शादी भी करायी जाती है।

असुर साहित्य व संस्कृति को लेकर सजग सुषमा असुर के मुताबिक असुर घर ढुकु शादी भी करते हैं। देश भर में नारी अस्मिता और विमर्श चलाने वालाें को यह जानकार आश्चर्य होगा कि यदि कोई असुर लड़की किसी लड़के को पसंद करे तो वह उस लड़के के घर में प्रवेश कर सकती है। परिजनों की स्वीकार्यता अनिवार्य नहीं होती। अनिवार्यता केवल इतनी ही है  कि नया जीवन शुरू करने वाले युगल इसके लिए तैयार हों। असुरों की यह निराली परंपरा उन्हें अलग बनाती है।  असुर सामाजिक मान-मर्यादा के लिए अपने बच्चों का ऑनर किलिंग  नहीं करते।

शादी के लिए गोत्र महत्वपूर्ण, अनिवार्य नहीं

असुर परंपराओं को ध्यान से देखें और समझने का प्रयास करें तो यह तय कर पाना जटिल है कि असुरों की परंपराओं को गैर असुरों ने अपनाया या फिर गैर असुरों की परंपराओं का असुर अनुसरण करते हैं। हालांकि असुर सबसे प्राचीन जनजातियों में शुमार हैं, इस लिहाज से पहली स्थिति की प्रबल संभावना बनती है। यह बात इसलिए कि असुर भी गोत्र देखकर शादी करते हैं। गोत्रों में बेंग, टोप्पो और केरकेट्टा आदि शामिल हैं। यदि कभी ऐसी अवस्था आती  है कि लड़का और लड़की दोनों एक ही गोत्र के हों तो इसका उपाय बड़ा गोत्र और छोटा गोत्र बनाकर निकाला जाता  है। जैसे किसी असुर पुरूष का का गोत्र बेंग है (जिसे हिन्दी में मेंढक कहा जाता है।) और लड़की भी इसी गोत्र की हो तो एक को बड़ा बेंग और दूसरे को छोटा बेंग कहा जाएगा।

इतना ही नहीं असुर अपने परिवारों के बीच भी शादी करते हैं। इसे अनिल असुर के शब्दों में कहें, तो इसे ऐसे समझिये कि मैं किसी लड़की को अपने घर लाया और हमारी संतान हुई। तब हमारे संतान की शादी मेरी पत्नी के भाई के बच्चों के साथ भी हो सकती है। हालांकि हम एकदम करीब के रिश्तों में ऐसा नहीं करते हैं। मसलन एक भाई के बच्चों की शादी दूसरे भाई के बच्चों के साथ नहीं हो सकती है। मुसलमानों में भी ऐसी परंपरा होती है।

विवाह : नेग और रस्म

विवाह किसी भी समाज में हों, जश्न तो बनता ही है। असुर भी जश्न मनाते हैं और कई सारे नेग भी करते हैं। गीत और नृत्य के बीच। दहेज की परंपरा है लेकिन यह एकांगी नहीं। मसलन लड़के वाले भी लड़की वालों को तोहफा देते हैं और लड़की वाले भी। हाल के दिनों में इसमें मामूली बदलाव हुआ है। मसलन लड़की पक्ष के लोग नवदंपत्ति को नया जीवन शुरू करने हेतु बहुत मामूली रकम, गाय या बकरी आदि देते हैं। इसके अलावा लड़की पक्ष के लोग लड़के की मां, बहन एवं अन्य महिला सदस्यों के लिए कपड़े आदि अपनी आर्थिक सहुलियत के हिसाब से देते हैं। यह सब शादी के नेग(रस्म) का हिस्सा है।

असुरों की शादी के नेग यानी रस्म भी अनोखे हैं। हालांकि ऐसे ही नेग बिहार और झारखंड के गांवों में गैर असुर भी करते हैं। लड़के वाले बारात लेकर आते हैं। इसके अलावा लड़की पक्ष के घर में मंड़वा (मंडप) गाड़ा जाता है। असुरी संस्कृति के अनुसार पूजापाठ भी कराया जाता है। इस क्रम में सबसे पहले पूर्वजों की आत्मा की शांति एवं उनका समर्थन लेने के लिए मुर्गे-मुर्गियों क बलि दी जाती है। इसे अनिवार्य कहा जा सकता है।

शादी के दौरान एक महत्वपूर्ण नेग तेल और हल्दी लगाया जाना है। इस नेग में वर और वधू दोनों को उनके अपने-अपने परिजन तेल और हल्दी लगाते हैं। इस दौरान महिलायें विवाह गीत भी गाती हैं। इस पूरे नेग में हल्दी तो कम ही होता है लेकिन सरसों तेल  2 से 3 लीटर तक लगाया जाता है।

इसके बाद मिट्टी कोड़ने का नेग होता है। यह नेग भी लड़का और लड़की दोनों के साथ किया जाता है। उनके परिजन खेतों में जाकर मिट्टी लाते हैं और अपने साथ कल्याणी नामक पौधा लाते हैं जिसे आंगन में लगाया जाता है। साथ ही नौ खूंटा गाड़कर लायी गयी मिट्टी से ही मंड़वा की लिपाई की जाती है। इसके बाद शादी की विधि शुरू होती है। इसमें धान और चावल की भूमिका शुरू से लेकर अंत तक बनी रहती है।

परिवार की बुनियाद स्वतंत्रता

असुर समाज अापसी सहमति के विचार से चलता है। दांपत्य जीवन की बुनियाद भी यही है। परंतु यह कोई अनिवार्यता नहीं है। संतान नहीं होने पर या किसी विषम स्थिति में दंपत्ति एक-दूसरे से अलग हो सकते हैं। समाज भी कोई बखेड़ा नहीं खड़ा करता। परंतु असुर समाज में इसे अशुभ माना गया है। मतलब यह कि समाज में तलाक के लिए कोई अलग से व्यवस्था नहीं है। कोई भी दंपत्ति आपस में नहीं बनने पर स्वेच्छा से अलग हो सकते हैं। समाज का इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। हालांकि समाज द्वारा उन्हें सुझाव अवश्य दिया जाता है। कोशिश की जाती है कि उनका रिश्ता बना रहे। यदि कोई महिला अपने पति को छोड़कर दूसरी शादी करना चाहे तो वह नि:संकोच कर सकती है। इसके लिए समाज में कोई रोक-टोक नहीं है। कोई भी महिला चाहे तो अपने पति का घर छोड़कर किसी दूसरे के साथ शादी कर सकती है। यहां तक कि यदि वह चाहे तो एक ही गांव में दूसरे पुरूष के साथ रह सकती है। इसी प्रकार पुरूष भी चाहे तो दूसरी शादी कर सकते हैं।

मरने के बाद जलाते नहीं, दफनाते हैं

असुर संस्कृति में मृत्यु को लेकर कई अवधारणायें हैं। मसलन यदि किसी की सामान्य मृत्यु होती है तो वे यह मानते हैं कि धरती पर रहने, जीने और खाने की अवधि इतनी ही थी। इसलिए मृत्यु हो गयी। वहीं यदि कोई बीमारी से मरता है तो  मानते हैं कि उसकी आयु अभी शेष थी, लेकिन कोई डायन उसे खा गयी।

द्रविड़ संस्कृति के लिंगायतों की तरह ही, असुर समाज में भी लाश जलाने की परंपरा नहीं है। यहां मिट्टी देने की परंपरा है यानी दफनाया जाता है। मिट्टी देने का काम सबसे पहले घर के सबसे बड़े बुजुर्ग करते हैं। उसके बाद घर के अन्य परिजन और बाद में पूरा गांव-समाज मिट्टी देता है। महत्वपूर्ण यह कि शरीर को मिट्टी देने के साथ ही आत्मा को भी मिट्टी देते हैं। शरीर को दफनाने के बाद गांव की सीमा पर पहले मुर्गी की बलि दी जाती है और परिजनों की संख्या के हिसाब से असुर छोटे-छोटे पत्थर चुनकर मिट्टी में गाड़ देते हैं।

सामान्य तौर पर मृत्योपरांत स्त्री और पुरूष के दफनाने की प्रक्रिया में कोई अंतर नहीं किया जाता है। हालांकि कोई महिला यदि प्रसव के दौरान मर जाती है तो माना जाता है कि उसकी आत्मा भटक रही है। इसलिए उसे अलग दफनाते हैं।

वे इस बात का ख्याल रखते हैं कि मृत्यु किस तरीके से हुई है। मसलन यदि किसी की सामान्य मृत्यु होती है तो उसे हम दैवी इच्छा मानकर पवित्र स्थान पर दफनाते हैं। छोटी और अगंभीर बीमारियों से होने वाली मौत को भी सामान्य मौत कहा जाता है। परंतु यदि किसी की मौत मलेरिया और हैजा आदि से हो जाये तो उसे गांव की सीमा से दूर दफनाते हैं। किसी की हत्या हो जाये तो कहीं और दफनाते हैं। हत्या के कारण होने वाली मौत के मामले में मृत्युपरांत होने वाले रस्म नहीं निभाते हैं। मसलन दशकर्म आदि की परंपरा नहीं होती है।

असुरों में भी मृत्युपरांत भोज की परंपरा है।  खासतौर पर वे, उनलोगों को बुलाकर भोज देते हैं जो अर्थी में शामिल होते हैं। हंड़िया पिलाया जाता है। इसमें अर्थी देने वाले लोगों को प्राथमिकता देते हुए अच्छी क्वालिटी का हंड़िया दिया जाता है। इनके अलावा तीन लोग जो दफनाने के लिए गड‍ढा खोदते हैं, उन्हें भी इसी तरह से प्राथमिकता देते हुए अधिक मात्रा में हंड़िया पिलायी जाती है। समाज के अन्य लोगों को भोज के रूप में चावल और साग आदि दिया जाता है। मीट मुर्गा का चलन नहीं है, दशकर्म में। लोग अपने-अपने घरों से हंड़िया लेकर आते हैं और आपस में मिलजुलकर पीते हैं। शादी हो या मृत्यु के बाद दिया जाने वाला भोज असुर समाज में हंड़िया ही महत्वपूर्ण है। सब पीकर मस्त रहते हैं।

असुरों के जीवन और परंपराओं को अपनी डायरी में दर्ज करते समय मेरे जेहन में एक सवाल था। क्या असुर समाज की अपनी भाषा है? जवाब में अनिल असुर ने कहा कि हां, हमारी भाषा अलग है। इसे हम मालेटा कहते हैं। लेकिन हमारी भाषा की कोई अपनी लिपि नहीं है। इसलिए हम हिंदी शब्दों का इस्तेमाल लिखने के लिए करते हैं। उनके मुताबिक असुरों की मालेटा भाषा में कोई किताब उपलब्ध नहीं है। न कहानी न इतिहास कुछ भी नहीं। गीत हैं तो गाये जाते हैं। लिखित रूप में कुछ भी नहीं है।

अपना समाज, अपना कानून

असुरों का  अपना कोई लिखित कानून नहीं हैं,परंपराएं उनके जीवन को अनुशासित करती हैं।  असुर धर्म में कोई धर्मगुरू नहीं बल्कि सामाजिक गुरू होते हैं। अन्य आदिवासियों की ही भांति इन्हें  बैगा, पुजार और पाहन आदि संबोधनों से बुलाते हैं। हमें यह जानकर आश्चर्य भी हुआ कि असुर अपने सामाजिक गुरू का चयन लोकतांत्रिक तरीके से करते हैं। बैगा का चुनाव तीन वर्षों के लिए किया जाता है। यह चुनाव गांव- समाज के लोग करते हैं। इसके लिए समाज के लोग मिलकर उन व्यक्तियों का चुनाव करते हैं जो परंपराओं और नियम-कायदों को जानते हैं। इनसे अलावा उन्हें गांव के पूर्वजों के बारे में जानकारी हो। इसके बाद चयनित लोगों के नाम पर मिट्टी के ढेले रखे जाते हैं। इस क्रम में एक सूप और लोढा  (मसाला पीसने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला पत्थर) का उपयोग किया जाता है। अनिल मानते हैं कि जब ऐसा होता है तब दैवी शक्ति काम करती है। सूप में लोढ़े को रख दिया जाता है और उसे दोनों हाथों से फटकारा जाता है। असुर समाज के लोगों के अनुसार उस समय दैवी शक्ति इतनी प्रबल होती है कि वह उन्हें उस व्यक्ति के घर तक ले जाती है जो बैगा बनने के लिए सबसे उपयुक्त है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि एक घर में यदि तीन भाई हों और उनमें से बैगा कौन बनेगा इसके लिए दैवी शक्ति खुद ब खुद उसके कमरे तक लेकर जाती है।

बैगा सामाजिक उत्सवों और त्यौहारों के अवसर पर समाज की अगुआई करते हैं। जबकि पुजार का काम बैगा की सहायता करना तथा पाहन का कार्य समाज के लोगों को धार्मिक आयोजन के संबंध में जानकारी देना होता है। बैगा न्यायाधीश के रूप में भी कार्य करते हैं। गांव-समाज में होने वाले झगड़ों में उनका निर्णय सभी के लिए मान्य होता है। धर्म स्थल के लिए सरनास्थल का उपयोग करते हैं जो मूल रूप से एक बड़ा और पुराना पेड़ होता है। उसी के नीचे असुर अपने सभी आराध्यों को स्थापित करते हैं और पूजा करते हैं। उल्लेखनीय है कि सभी आदिवासी जनजातियों में सरनास्थल का इस्तेमाल धर्म स्थल के रूप में किया जाता है। फिर चाहे वे असुर आदिम जनजाति हो या फिर मुंडा या उरांव जनजाति के लोग।

तीज-त्यौहार

असुरों का जीवन प्रकृति आधारित त्यौहारों का तानाबाना है। हिंदी कैलेंडर के अनुसार ही चैत महीना से साल शुरू होता है। नये साल के मौके पर सात दिनों तक होली होती है और इसी मौके पर डोल- जतरा का आयोजन भी होता है। होली के मौके पर असुर अपने खेतों में हल चलाते हैं। इसके अलावा अपने पशुओं को नहलाकर उन्हें अच्छा खाना खिलाते हैं। होली में हमलोग रंगों का इस्तेमाल नहीं करते हैं। अनिल के अनुसार उनकी परंपरा में पहले होलिका दहन नहीं होता था। लेकिन अब यह होली का हिस्सा बन चुका है।

सरहूल असुरों के लिए भैंसासुर की पूजा के बाद दूसरा  मुख्य पर्व है। यह असल में प्राकृतिक पूजा है। इस मौके पर सरनास्थल पर अपने देवी-देवताओं के नामपर मुर्गे-मुर्गियों की बलि देते हैं। इसके अलावा  तीन घड़े रखते हैं। घड़ों में पानी डाला जाता है। पूजा कराने की जिम्मेवारी बैगा की होती है जबकि उनकी सहायता करने वाले पुजार और पहान यह देखते हैं कि पूजा के दौरान घड़ों में पानी कम हुआ या फिर पानी जस का तस है। जब पूजा के दौरान पानी घड़ों से गिरने लगता है तो वे यह मानते हैं कि इस साल बरसात अच्छी होगी और घट जाय तो मानते हैं कि इस बार बरसात कम होगी या सूखा पड़ेगा।

करमा असुरों का पर्व नहीं है। अब आदिवासी जनजातियां एक-दूसरे से घुलमिल गयी हैं। इसलिए करमा पर्व असुर समुदाय भी मनाता है। मूल रूप से यह उरांव समुदाय का पर्व है जो भाई-बहनों के बीच प्यार व अपनापन पर आधारित होता है। (यह पर्व बिहार के मगध इलाकों मसलन गया, अरवल, जहानाबाद, नालंदा, पटना आदि जिलों में भी इसी रूप में मनाया जाता है।) आदिवासी समुदाय के लोग करमा के मौके पर पवित्र सरना पेड़ की टहनी लाकर पहले अपने खेतों में गाड़ते हैं ताकि खेत में अच्छी फसल हो। इसके बाद टहनी को घर में लाया जाता है। इस मौके पर गीत व नृत्य का आयोजन भी होता है। इसके अलावा वे अपने खेतों में भकटी भी लगाते हैं। भकटी लगाने के पीछे मकसद फसल को बुरी नजरों से बचाना और पंछियों व जानवरों को खेतों से दूर रखना होता है।

भैंसासुर/महिषासुर की पूजा सबसे बड़ी

अनिल के मुताबिक दीपावली मुख्य रूप से असुरों का पर्व है और भैंसासुर की पूजा सबसे बड़ी पूजा। तीन दिनों तक चलने वाले इस पर्व में वे अपने पशुओं को साफ करते हैं और उन्हें तेल लगाते हैं। दीपावली के अगले दिन भैंसासुर की पूजा भी होती है। इस पर्व को मुख्य रूप से पुरूष् मनाते हैं जबकि महिलायें पुरूषों का सहयोग करती हैं। इस मौके पर असुर अपने पशुओं को मकई खाने को देते हैं। वे जितना खा सकें। इस मौके पर गांव के चरवाहे एक मैदान में जमा होते हैं। कांसे की थाली में सभी के लिए हंड़िया परोसा जाता है। साथ ही थाली में पैसा भी रखा जाता है। शर्त यह होती है कि घुटनों के बल पर मुंह लगाकर हंड़िया पीना पड़ता है। हाथ का इस्तेमाल वर्जित होता है। जो चरवाहा हंड़िया पीने के साथ ही मुंह से पैसा उठा ले तो उसे सर्वश्रेष्ठ चरवाहा घोषित किया जाता है। इसके बाद जो हंड़िया बचता है वह माता-पिता, भाई-बहन सब एक साथ मिलकर पीते हैं।

असुरों का जनजीवन सरल और समावेशी प्रवृति के सिद्धांत पर आधारित है। वे सांस्कृतिक उदारवाद का उदाहरण पेश करते हैं जब वे अन्य आदिवासी जनजातियों की परंपराओं को अपने जीवन में शामिल करते हैं। हालांकि अनिल असुर अनुमान लगाते हैं कि पहले विभिन्न जनजातियों यथा मुंडा, उरांव व असुरों के बीच वर्चस्व को लेकर लड़ाइयां होती थीं। परंतु अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई के समय में सब एक हो गये और तभी से आदिवासी परंपरायें एक-दूसरे से मिलने लगीं। अब तो विभिन्न समुदायों में शादी-विवाह भी होने लगे हैं।

डायन और प्रेत

गेस्ट हाउस में बातचीत के दौरान एक प्रसंग में अपने परदादा का नाम अनिल असुर ने स्वर्गीय घुरा असुर कहा। यह हमारे लिए महत्वपूर्ण हो गया कि क्या असुर समुदाय भी स्वर्ग और नर्क के सिद्धांत में यकीन रखता है। जवाब में अनिल असुर का जवाब सकारात्मक था। उनके मुताबिक यदि किसी व्यक्ति ने अपने जीवन में अच्छे काम किये हों और उसकी मौत सामान्य हो तब हम मानते हैं कि मरने के बाद उनकी आत्मा को भी शांति मिल गयी। लेकिन जिस व्यक्ति ने अपने जीवन में दूसरों को प्रताड़ित किया हो और उसकी मौत हो गयी हो तो हम मानते हैं कि उसकी आत्मा अभी भटक रही है। इसी के आधार पर भूत-प्रेत की अवधारणा बनती है। बुरा काम करने वाली महिलाओं को डायन कहा जाता है। अनिल के अनुसार समाज में भूत भगाने और डायनों के प्रकोप को खत्म करने के लिए पूजा दी जाती है। लेकिन यह पूजा बैगा नहीं कराते हैं। इसके लिए खास लोग होते हैं। अनिल के अनुसार बैगा केवल त्यौहारों और शादी-विवाह के मौके पर पूजा-पाठ करवाते हैं।

दिल में बसते हैं महिषासुर

हिंदू धर्म में अधिकांश पर्व और त्यौहार युद्ध आधारित हैं। देवता तो देवता, देवियां भी हाथों में हथियार लिए दिखती हैं, फिर चाहे उन्होंने सोलहों श्रृंगार क्यों न किया हो। हथियार जरूरी है। वहीं असुरों के देवता महिषासुर किसी को डराते नहीं हैं। डुमरी के टांगीनाथ में महिषासुर का लिंग, त्रिशुल और नाग; आर्यों की सांस्कृतिक डकैती का पर्दाफाश भी करते हैं। सवाल उठता है कि सनातनियों का शंकर असल में महिषासुर तो नहीं? इसका जवाब डा. कंगाली भी अपनी किताब  में “पारी कुपार लिंगो गोंडी पूनम दर्शन” देते हैँ।

इस बारे में झारखंड के असुर स्वयं क्या सोचते हैं? अनिल असुर के मुताबिक महिषासुर उनके पूर्वज थे और दुर्गा ने उनकी हत्या धोखे से कर दी। इसी कारण असुर समुदाय के लोग दशहरा नहीं मनाते हैं। मान्यताओं के अनुसार दुर्गा बंगाल की कुंवारी लड़की थी जिसने अपने रंगरूप से महिषासुर को अपने वश में कर लिया। जब महिषासुर को इस बात का अहसास हुआ कि वह गलत लड़की के संपर्क में आ गये हैं, तब उन्होंने टांगीनाथ नामक जगह पर अपनी शक्ति को स्थापित कर दिया।

हम अपने सवाल का और जवाब तलाशना चाहते थे।

असुरों की धरती पर ब्राह्म्णों का भव्य गुरूकुल

गेस्ट हाउस में रात गुजारने के बाद हम सभी की इच्छा थी कि झारखंड के सबसे ऊंचे पहाड़ से उगते हुए सुरज को देखें। अनिल असुर पहले ही इसकी मनोरम छटा के बारे में बता चुके थे। जल्दी-जल्दी हम तैयार होकर गेस्ट हाउस परिसर में ही बने वॉच टॉवर की ओर आगे बढ़े। लेकिन सूरज अपनी राह पर आगे बढ़ चुका था। धरती के अंदर से निकल आसमान पर छा जाने के उस दृश्य को हम नहीं देख सके। लेकिन हमें मलाल नहीं था। वैसे भी हमारा मकसद न तो सूरज को देखना था, न देवताओं के ऐश्वर्य को। हम तो असुरों को देखने गये थे।

प्रमोद रंजन जी ने मुस्कराते हुए कहा कि एक बार नेतरहाट देख ही लिया जाय। खुबसूरत पहाड़ों के बीच छोटे से नेतरहाट का प्रसिद्ध स्कूल आज भी अपनी गुणवत्ता के लिए जाना जाता है। इसकी स्थापना वर्ष 1954 में हुई थी। यहां नामांकन प्रवेश परीक्षा के आधार पर होता है। पहले जब झारखंड बिहार का हिस्सा था तब यहां गैर आदिवासी बच्चे ही अधिक होते थे। झारखंड बनने के 15 साल बाद भी नेतरहाट में आदिवासी बच्चों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है। यह जानकारी हमें नेतरहाट स्कूल में सुरक्षा प्रहरी के रूप में काम करने वाले एक आदिवासी से हुई।

नेतरहाट विद्यालय का विहंगम दृश्य (फोटो : एफपी ऑन द रोड, 2015)

नेतरहाट स्कूल के प्रांगण में एक प्रतिमा दिखी। यह प्रतिमा पीठ पर अपना बच्चा बांधे  और माथे पर पानी लिए आदिवासी महिला की थी। दिलचस्प यह कि इस प्रतिमा को ‘नेतरहाट श्री’ की संज्ञा दी गयी है और इसका अनावरण 26 फरवरी 1988 को दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल की तत्कालीन आयुक्त श्रीमती राधा सिंह के द्वारा की गयी थी, जो उस समय विद्यालय कार्यकारिणी समिति की अध्यक्ष भी थीं। हम प्रांगण में घूम रहे थे। हमें उस बच्चे की कातर निगाहें देखती हुई प्रतीत हुईं। हमारे लिए यह प्रतिमा आदिवासियों के शोषण की प्रतीक सरीखी लगी, तो यह ख्याल भी आया कि देवताओं को इसमें जरूर कोई विशेष कला दिखी होगी। वैसे भी, वे गरीबी और बदहाली का बाजारीकरण करने में शुरू से माहिर रहे हैं। स्कूल प्रांगण से बाहर निकलते समय हमारी नजर एक शिलालेख पर गयी, जिसने इस बात की पुष्टि कर दी। लिखा था – ‘उधिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’। नीचे इसका भावार्थ भी लिखा था – उठो, जागो, तमस तजो, श्रेष्ठ व्यक्तियों के समीप, ज्ञानार्जन में लगो।

सरकारी पूजा है दुर्गापूजा

नेतरहाट स्कूल की खुबसूरती को छोड़ हम निकल पड़े। हम वहां जाना चाहते थे जिसके बारे में अनिल असुर ने बताया था कि यहां के असुर दुर्गापूजा मनाते हैं। गांव का नाम जोभीपाट। प्रखंड बिशुनपुर, जिला गुमला। गांव तक जाने में कोई परेशानी नहीं हुई। हिंडाल्को ने अपनी गाड़ियों के लिए एक सड़क बना दिया है। हम गांव के बीचोंबीच उस जगह रूके जहां एक मैदान में मंदिर दिखा। दृश्य कमोबेश वही जो हमलोगों ने सखुआपानी में देखा था। मंदिर के बगल में चापाकल नजर आया। मन में विचार आया कि चापाकल और मंदिर के बीच बड़ा रिश्ता है। क्या यहां के असुर सचमुच में दुर्गापूजा में शामिल होते हैं। जहां एक ओर नौजवान पीढ़ी इस सवाल पर दुविधा में दिखी तो एक बुजुर्ग गोला असुर के जवाब ने एक ही वाक्य में सदियों से हो रहे संर्घष  को बयां कर दिया। हमारा सवाल था – क्या आप दुर्गापूजा में शामिल होते हैं? जवाब था – नहीं, वहां ब्राह्म्ण आता है। सरकारी पूजा है। हम् असुर नहीं जाते।

जोभीपाट गांव में यह बुजुर्ग दंपत्ति अपने घर के पास खेत में काम करती दिखी। दोनों की उम्र 80 वर्ष से अधिक रही होगी। हम उनके पास गये, नाम पूछा तो दोनों ने अपना-अपना नाम गोला असुर और फुलो असुर बताया। हमने गोला असुर से गांव में होने वाले दुर्गापूजा के बारे में पूछा। उन्होंने इस पूजा को सरकारी पूजा की संज्ञा दी। हमारे लिए यह शब्द सबसे अलग लगा। कारण पूछने पर गोला असुर ने बताया कि दुर्गापूजा के आयोजन में मुख्य रूप से वे लोग भाग लेते हैँ जो खदानों में काम करने बाहर से आये हैं या फिर सरकारी कर्मी हैं। पूजा के दौरान एक ब्राह्मण भी आता है। उनके मुताबिक महिषासुर उनके पूर्वज हैं और हम दुर्गापूजा से दूर रहते हैं।

जोभीपाट गांव में गोला असुर और सुमित्रा असुर से बात करते प्रमोद रंजन (फोटो : एफपी ऑन द रोड, 2015)

गोला असुर ने बताया कि दिवाली के दिन असुर जनजाति के लोग अपने-अपने घरों में भैंसाासुर की पूजा करते हैं। इस मौके पर वे मुर्गियों की बलि देते हैं और पशुओं को साफ करने के बाद तेल लगाते हैं। इसके अलावा इस दिन विशेष खाना बनता है। खाना पहले मवेशियों को दिया जाता है और बाद में घर के लोग प्रसाद के रूप में खाते हैं। करीब दो घंटे तक चलने वाले इस पूजा में महिलायें प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं होती हैं।  यही बात बुजुर्ग महिला फुलो असुर ने भी कही।

जोभीपाट गांव में सबसे अधिक असुर जनजाति के लोग रहते हैं। इनके अलावा मुंडाओं के 9 घर और उरांव जनजाति के परिवार का एक घर है। यहां रहने वाले काया मुंडा के अनुसार मुंडाओं और असुरों के पर्व व त्यौहार अलग-अलग हैं। मुंडा सरना कोड में शामिल हैं। हालांकि सरहुल और करमा जैसे पर्व भी हैं जिसे सभी आदिवासी जनजातियों के लोग मनाते हैं। दिलचस्प यह कि काया मुंडा के मुताबिक  जोभीपाट में करीब 10 वर्ष पहले दुर्गापूजा की परंपरा शुरू हुई है और वे भी इस तरह के आयोजन को गलत करार देते हैं क्योंकि दुर्गा ने महिषासुर का कत्ल किया था।

शिक्षक बदल देते हैं असली नाम

असुर नौजवान महिषासुर को अपना आराध्य मानते हैं। लेकिन वे सीधे तौर पर कहते नहीं। ऐसा क्यों है? यह सवाल हमारे लिए महत्वपूर्ण था। क्या इसकी वजह आर्यों का निरंतर सांस्कृतिक हमला है या फिर आज की नवउदारवारी अर्थव्यवस्था के द्वारा बनाये गये बाजार की मजबूरी। जवाब मिला जब ढोरा असुर नामक बुजुर्ग ने बताया कि जोभीपाट स्कूल में शिक्षक असुर बच्चों का नामकरण अपने हिसाब से कर देते हैं। मसलन घुरा असुर का नाम अनिल असुर उनके माता-पिता ने नहीं बल्कि स्कूल के गैर असुर हेडमास्टर ने दिया था। उनके परिजनों ने उनका नाम घुरा असुर रखा था। गांव में ही कई सारे लोग मिले जिनके नाम का पहला भाग संस्कृत के शब्द थे, लेकिन अंत में असुर शब्द को यथावत रहने दिया गया। यह एक गहरी साजिश भी हो सकती है।

जोभीपाट गांव में दुर्गा मंदिर और चापाकल (फोटो : एफपी ऑन द रोड, 2015)

हम उनसे असुरों के गीत को लेकर बात कर रहे थे। उसी दरम्यान अनिल असुर ने हमारा परिचय रागा असुर से कराया। अनिल के मुताबिक ढोरा असुर और रागा असुर दोनों गाते हैं। अनुरोध करने पर वे गाने को तैयार हुए।अब हम श्रोता थे। भाषा की समस्या आड़े नहीं आयी। ढोरा असुर और रागा असुर अपने गाये गीतों का मतलब भी बता रहे थे। सुनकर सुखद आश्चर्य भी हुआ कि हम दिल्ली-पटना के वाशिंदे उन गीतों को ही पसंद करते हैं जिनकी परिधि में इंसानों के सुख-दुख, मिलन-विरह और रोमांस ही समाहित होता है वहीं असुर अपने गीतों में खुद के बजाय अपने साथ जीवन गुजर बसर करने वाले पंछियों की बात कहते हैं।

कमी पैसा की थी, कपड़े की नहीं

दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में आदिवासियों की फोटो प्रदर्शनियां बड़े चाव से देखी जाती हैं। अर्द्धनग्न पुरूष, बिना ब्लाउज केवल कपड़े में लिपटी आदिवासी महिलाओं की तस्वीरें,  बड़े घरों के लोगों के बैठकखाने की शोभा बढ़ाती हैं। जब हमने इस संबंध में ढोरा असुर से पूछा तो उन्होंने कहा कि पहले अभाव था, तो महिला हो या पुरूष एक ही कपड़ा से अपना काम चलाते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। हालांकि ढोरा असुर का यह कहना असुरों और आदिवासियों के साथ आर्थिक् ज्यादती को बयां कर गया कि पहले भी कमी कपड़े की नहीं थी, बल्कि पैसे की थी। उनकी इस बात से हम भी सहमत हुए। अंग्रेजों के राज में अंग्रेज इसी देश में थ्री पीस सूट पहनते थे जबकि आम भारतीयों के पास तन ढंकने को कपड़ा नहीं था।  

जोभीपाट गांव के अंतिम हिस्से का एक दृश्य (फोटो : एफपी ऑन द रोड, 2015)

हम लौट रहे थे। उन पेड़ों-पठारों और असुरों से दूर वहां जहां से हम आये थे। हमारे जेहन में असुरों के बारे में कुछ रोचक जानकारियां, कैमरे में तस्वीरें, वीडियो के अलावा असुरों का वह जीवन था, जिसके बारे में भौतिकवादी सुखों के आदी हो चुके लोग केवल कल्पना कर सकते हैं। आइंस्टीन के सापेक्षवाद के सिद्धांत के आधार पर स्वयं को अधिक सुखी मान खुद को भाग्यशाली भी कह सकते हैं। परंतु क्या असुरों को उनके स्वर्ग पर अधिकार मिल सकेगा? वह स्वर्ग जो कि अब पलायन व बॉक्साइट उत्खनन करने वाली कंपनियों के कारण तेजी से बदलता जा रहा है। इसके परिणाम क्या होंगे और यह भी कि क्या असुर जनजाति के लोग अपनी संस्कृति को बचा पायेंगे? क्या होगा जब सारे बॉक्साइट छोटनागपुर के इस पठार के कलेजे को कोड़कर निकाल लिये जायेंगे, तब यहां के लोगों का क्या होगा? उनकी आजीविका कैसे चलेगी? कई  सवाल हमारे सामने अब भी शेष थे और जवाब भविष्य के गर्भ में। कुछ जवाब सुषमा असुर की कविता ‘हम जरूर जीयेंगे’ तुम्हारी तरह’ भी दे रही थी –

पठारी क्षेत्र में तुमने

हमें (असुरों) को जन्म दिया

पर जिंदा रहने के लिए रास्ता नहीं बतलाया

पठारी क्षेत्र में तुमने

हमें (असुरों) को मजदूर बनाया

पर स्कूल जाने के लिए पैसा नहीं दिया

हमें आगे बढ़ने के लिए रास्ता नहीं बतलाया

अब तो हमारे पास भाषा नहीं है

हमारे पास संस्कृति नहीं है

हम तुम्हें कैसे पुकारें

हम तुम्हें किस विधि से याद करें

हे धरती के पुरखों

हे आसमान के पुरखों

ओ हमारे माता-पिता ओ सभी असुर बूढा-बुढिया

तुम्हारे भोजन की जिम्मेवारी जंगल की थी

तुम्हार मजूरी खेत की जिम्मेवारी थी

यहां से वहां तक फैला पठार ही तुम्हारी पाठशाला थी

पहाड़-झरने तुम्हें रास्ता बताते थे

हे धरती के पुरखों, हे आसामान के पुरखों

ओ हमारे माता-पिता ओ सभी असुर बूढा-बुढिया

तुम सब नहीं जानते थे कचिया-ढिबा (रुपया-पैसा)

तुम सब नहीं जानते थे परजीविता

हम तुम्हें दोष नहीं देते

हम तुम्हें अपनी सहायता के लिए

कोर्ट-कचहरी नहीं करते

पर जब कंपनी धम धम आती है

पर जब सरकार दम दम बेदम करती है

हम किसको गोहरायें

हम किस छाती में आसरा ढूंढें?

हे धरती के पुरखों, हे आसामान के पुरखों

ओ हमारे माता-पिता ओ सभी असुर बूढा-बुढिया

हम सीखेंगे तुम्हारी तरह बोलना

हम सीखेंगे तुम्हारी तरह नाचना

हम करेंगे शिकार तुम्हारी तरह

उन सभी जानवरों का

जो असुरों का घर खोद रहे हैं

जो हमारे झरनों को फुसला-बहला रहे हैं

जिन्हें धरती और इंसान खाने की लत है

हम जरूर जियेंगे तुम्हारी तरह ही

पठार की तरह निश्चिंत निश्छल

तुम्हारे रचे इस असुर दिसुम में

(2015 में छोटानागपुर के असुर-गांवों की इस यात्रा के लिए प्रमोद रंजन दिल्ली से आए थे, जबकि मैं पटना से। हम इस इलाके  में 2 और 3 नवंबर को  रहे। वापस लौटते हुए हमलोगों ने  रांची में 4 नवंबर को  झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री प्रसिद्ध आदिवासी नेता शिबू सोरेन से मुलाकात की। बुजुर्ग हो चले सोरेन उस समय अस्वस्थ थे, इसके बावजूद वे बहुत स्नेह से मिले। उन्होंने  हमारी यात्रा पर खुशी जाहिर की व जेएनयू समेत देश की कई विश्वविद्यालयों में आरंभ हुए महिषासुर आंदोलन के लिए अपनी शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि महिषासुर, रावण आदि आदिवासी समुदाय के पुरखा और आदि-गुरू हैं। बहुजन समुदाय से आने वाले युवाओं को इनकी शहादत को नहीं भूलनी चाहिए)

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के संपादक (हिन्दी) हैं।


 

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