फॉरवर्ड प्रेस

अपने काम के प्रति ईमानदार रहो

प्रिय दादू,

मैं आपके इस तर्क से सहमत हुए बिना नहीं रह सकता कि अंतत: एकमात्र वह चीज़ जिसका हमारे जीवन में महत्व है, वह है हमारा चरित्र। मुझे लगता है कि मैंने यह जान लिया है कि जीवन में मुझे क्या करना है। परन्तु जो रास्ता मैंने चुना है वह एक लंबा और कठिन रास्ता है।

मुझे इस राह पर चलते जाने की ताकत कहाँ से मिलेगी? कठिनाईयों के दौर में मैं अपना हौसला कैसे बनाये रखूँगा?

सप्रेम,

धीरज

 

प्रिय धीरज,

मुझे बहुत प्रसन्नता है कि तुमने जो कठिन राह अपने लिए चुनी है, उसकी चुनौतियों के प्रति तुम्हारा यथार्थपूर्ण रवैया है।

जो पहली चीज़ तुम्हें चलते रहने में मदद करेगी वह यह ज्ञान है कि तुम जिस राह पर चल रहे हो, वह सही राह है।

दूसरे, तुम्हें यह भी पता होगा कि वह सर्वश्रेष्ठ राह है, यद्यपि कभी-कभी तुम्हें इस पर संदेह हो सकता है।

तीसरी चीज़ यह कि यह राह तुम्हें एक ऐसी मंजिल तक पहुंचाएगी, जो अंतत: तुम्हें असीम सुख और संतोष देगी और यह सुख और संतोष, तुम्हें किसी और राह पर चल कर नहीं मिलेगा।

परन्तु ये केवल शब्द और अवधारणायें हैं। अब हम कुछ व्यवहारिक बातें करेगें।

मैं रबीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रसिद्ध गीत ‘यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे तबे एकला चलो रे’ (तेरी आवाज पर कोई न आये तो अकेले चलो) का जबरदस्त प्रशंसक हूँ परन्तु हम और तुम जानते हैं कि अकेले चलना आसान नहीं होता। अगर हमारे साथ एक-दो मित्र हों तो यात्रा का मज़ा दूना हो जाता है। तो इसलिए कोशिश करो कि तुम एक-दो ऐसे मित्र खोजो जो तुम्हारे साथ चलने के लिए तैयार हों, जो तुम्हारा साथ दें और जिनके पास यह समझने के लिए समय और धैर्य हो कि तुम्हारे काम और चरित्र निर्माण में तुम्हें कौनसी चुनौतियां और कठिनाईयां पेश आ रहीं हैं और तुम्हें किस तरह के त्याग करने पड़ रहे हैं, और लम्बे समय तक ऐसा वे ही लोग कर सकते हैं जो तुम्हारे निकट मित्र हों।

इसके अलावा, चरित्र का संबंध मूल्यों से भी है। अगर हमें अपने चरित्र का विकास करना है तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम हमारे मूल्यों को कभी विस्मृत न होने दें। कौनसे मूल्य? इस बारे में अनेक मत हैं। परन्तु विश्व भर के दर्शनों और धर्मों के मेरे अध्ययन से मैंने पाया है कि ईसा मसीह के जीवन और उनकी शिक्षाओं से बेहतर और ऊंचे कोई आदर्श या मूल्य नहीं हैं। इसलिए मैं रोज़ न्यू टेस्टामेंट के एक अंश का ध्यान करता हूँ। मुझे लगता है कि इससे मैं उन अनेक महानायकों की आत्मकथाओं और जीवनियों से भी रूबरू हो जाता हूँ, जिनका कद कम था (क्योंकि उनका चरित्र परिपूर्ण नहीं था)। इन नायकों से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि अपने मूल्यों को हम अपने जीवन में कैसे उतारें। इनमें शामिल हैं हमारे देश के महात्मा फुले, डॉ. आंबेडकर व मदर टेरेसा जैसे लोग और दूसरे देशों के अब्राहम लिंकन, नेल्सन मंडेला और विलियम विल्बरफोर्स जैसे व्यक्तित्व।

मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि हमें रोज़ कुछ समय निकालकर अपने जीवन के बारे में विचार करना चाहिए। हमें यह सोचना चाहिए कि हम किस दिशा में जा रहे हैं और उन चुनौतियों व विकल्पों पर भी विचार करना होगा जो हमारे सामने प्रस्तुत हैं। कुछ हिंदू परंपराओं में मंगलवार का दिन धार्मिक कृत्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है और मंगलवार के दिन इन विषयों पर विचार किया जा सकता है। ईसाईयों के लिए यह दिन रविवार हो सकता है और यहूदियों के लिए शनिवार। मुसलमान इस काम के लिए शुक्रवार को चुन सकते हैं। नास्तिक और अनीश्वरवादियों के लिए रविवार सबसे उपयुक्त होगा क्योंकि उस दिन अधिकांश लोगों की काम से छुट्टी होती है। इन दिनों के अलावा, पूरे साल में हम कई त्योहार मनाते हैं और हमें कई छुट्टियां मिलती हैं। इनका इस्तेमाल हम अपने दैनिक जीवन की भागादौड़ी से मुक्त होकर चिंतन करने के लिए कर सकते हैं।

यद्यपि भारत में यह आम नहीं है परंतु कई देशों में ”सबेटिकल’’ की व्यवस्था रहती है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह सात साल में एक बार मिलने वाली लंबी छुट्टी है। आजकल सरकारें और कंपनियां इस मामले में कम उदार हो गई हैं। अधिकांश मामलों में सबेटिकल का अर्थ होता है एक साल तक की सवैतनिक छुट्टी। इस समय का इस्तेमाल आगे की पढ़ाई करने या फिर कुछ नया सीखने के लिए किया जा सकता है। इस समय में, हम अपने समुदाय, देश या दुनिया के लिए कुछ कर भी सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि साप्ताहिक छुट्टियां, त्योहार व सबेटिकल आदि हमें तरोताज़ा बनाते हैं और अगर हमें खुश रहना है और थका हुआ, उदास आदमी नहीं बनना है तो हमें हमेशा तरोताज़ा बने रहने की कोशिश करनी होगी।

मुझे यह भी लगता है कि मुझे ईश्वर से संवाद करने और उसे सुनने की ज़रूरत भी है। जब लोग मुझ पर कटु हमले करते हैं या मेरे बारे में अनुचित बातें करते हैं तब मुझे रोने के लिए ईश्वर का कंधा चाहिए होता है। जब मैं कोई गलती कर देता हूं या मैं अपनी पूरी क्षमता से कोई काम नहीं करता या मैं वह नहीं करता, जो सही और उचित है तब मुझे न केवल संबंधित मनुष्यों वरन् ईश्वर के सामने भी इसे स्वीकार करना होता है ताकि मुझे माफी मिल सके और मैं एक बार फिर स्वयं को कुछ करने की ऊर्जा से भरा हुआ पाऊं। मुझे ईश्वर के अलौकिक साथ और शक्ति की सबसे ज्यादा आवश्यकता तब होती है जब मुझे जीवन में दुखों का सामना करना पड़ता है और आसान राहें मुझे ललचाती हैं।

कुछ मौकों पर हो सकता है कि तुम्हें अकेले चलना पड़े या कम से कम तुम्हे ऐसा लगे कि तुम अकेले चल रहे हो परंतु ईश्वर हमारी प्रगति को देखता है और हमारा साथ देता है। वह अपने दूत- अलौकिक या लौकिक-भेजकर हमें प्रोत्साहन देता है। जो हमसे पहले उस राह से गुजरे हैं वे भी हमें साहस बंधाते हैं, यद्यपि अक्सर हम उन्हें देख नहीं पाते। और वह दिन आएगा, जब, अंतत: हम उन्हें देखेंगे और उनके साथ होंगे। यही नहीं, अंतत: हम जीतेंगे क्योंकि हमारी दुनिया नैतिक है। हमारा काम पूरा होगा और ईश्वर की कृपा से हम प्रेम, आनंद, शांति, धैर्य, दयालुता वफादारी, आत्मनियंत्रण और विनम्रता से परिपूर्ण होंगे।

प्रिय धीरज, अगर तुम अपना चरित्र खो दो, अपनी आत्मा खो दो, तो फिर पूरी दुनिया को जीतने का भी कोई लाभ नहीं है। शुरूआत में दूसरी राहें आसान लग सकती हैं परंतु वे हमें गलत मंजिल पर पहुंचाएंगी। यही वह सबसे बड़ा कारण है जिसके चलते तुम्हें अपनी चुनी हुई कठिन राह पर चलते जाना चाहिए। तुम्हारी इस हजार मील की यात्रा की सफलता के लिए मेरी शुभकामनाएं परंतु याद रखो कि यह यात्रा तुम्हें कदम-दर-कदम पूरी करनी होगी।

सप्रेम

दादू