महाड़ सत्याग्रह के नब्बे साल : जब पानी में आग लगी थी

डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में चलाया गया महाड सत्याग्रह शूद्रो-अतिशूद्रों के संघर्षों के इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके माध्यम से ब्राह्मणवाद-मनुवाद को खुली चुैनौती दी गई थी। इस सत्याग्रह के नब्बे वर्ष पूरे हो  रहे हैं। क्या है इसकी ऐतिहासिक मह्ता, क्या है इसकी प्रासंगिकता बता रहे हैं, सुभाष गाताडे  :

भारत के सामाजिक आन्दोलन में महाड़ क्रान्ति दिवस के नाम से जाने जाते चवदार तालाब के ऐतिहासिक सत्याग्रह को तथा उसके दूसरे दौर में मनुस्मृति दहन की चर्चित घटना को दलित शोषितों के विमर्श में वही स्थान, वही दर्जा प्राप्त है जो हैसियत फ्रांसिसी क्रांति की यादगार घटनाओं से सम्बन्ध रखती है। यूं कहने के लिए तो उस दिन दलितों ने और ऐसे तमाम लोगों ने जो अस्पृश्यता की समाप्ति के लिए संघर्षरत थे, महज तालाब का पानी पिया था लेकिन रेखांकित करनेवाली बात यह थी कि इस छोटे से दिखनेवाले इस कदम के जरिये उन्होंने हजारों साल से जकड़ बनायी हुई ब्राहमणवादी व्यवस्था के खिलाफ बगावत का ऐलान किया था। जानवरों को भी जिस तालाब पर जाने की मनाही नहीं थीं, वहां पर इन्सानियत के एक हिस्से पर धर्म के नाम पर सदियों से लगायी गयी इस पाबंदी को तोड़ कर वह सभी नयी इबारत लिख रहे थे। यह अकारण नहीं कि महाड़ सत्याग्रह के बारे में मराठी में गर्व से कहा जाता है कि वही घटना जब पानी में आग लगी थीउसने न केवल दलित आत्मसम्मान की स्थापना की बल्कि एक स्वतंत्रत राजनीतिक सामाजिक ताकत के तौर पर उनके भारतीय जनता के बीच अपने आगमन का संकेत दिया था। दलितों द्वारा खुद अपने नेतृत्व में की गयी यह मानवाधिकारों की घोषणा एक ऐसा हुंकार था जिसने भारत की सियासी तथा समाजी हलचलों की शक्लोसूरत हमेशा के लिए बदल दी।

आंबेडकर के नेतृत्व में महाड सत्याग्रह (एक पेंटिंग)

एक हिन्दू पुरूष या स्त्री, जो कुछ भी वह करते हैं, वह धर्म का पालन कर रहे होते हैं। एक हिन्दू धार्मिक तरीके से खाना खाता है, पानी पीता है, धार्मिक तरीके से नहाता है या कपड़े पहनता है, धार्मिक तरीके से ही पैदा होता है, शादी करता है और मृत्यु के बाद जला दिया जाता है। उसके सभी काम पवित्र काम होते हैं। एक धर्मनिरपेक्ष नज़रिये से वह काम कितने भी गलत क्यों न लगें, उसके लिए वह पापी नहीं होते क्योंकि उन्हें धर्म के द्वारा स्वीकृति मिली होती है। अगर कोई हिन्दू पर पाप करने का आरोप लगाता है, उसका जवाब होता है, ‘अगर मैं पाप करता हूं, तो मैं धार्मिक तरीके से ही पाप करता हूं।

(‘द अनटचेबल्स एण्ड द पॅक्स ब्रिटानिका’ – डाक्टर भीमराव अम्बेडकर )

वह तीस का दशक था जिसने ऐतिहासिक महाड सत्याग्रह को एक पृष्ठभूमि प्रदान की। सभी जानते हैं कि देश और दुनिया के पैमाने पर यह एक झंझावाती काल था। महान सर्वहारा अक्तूबर क्रांति के पदचाप भारत में भी सुनाई दे रहे थे। नये आधार पर एक नयी कम्युनिस्ट पार्टी बनाने की योजनाएं आकार ग्रहण कर रही थीं। यही वह काल था जब गांधी के नेतृत्ववाली कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग ने असहयोग आन्दोलन में जोरदार हिस्सा लिया था। जातिप्रथा की मुखालिफत करते हुए देश के अलग अलग हिस्सों में राजनीतिक सामाजिक हलचलें भी इन दिनों तेज हो रही थीं। पतुआखली, वैकोम आदि स्थानों पर होनेवाले सत्याग्रहों के जरिये ब्राहमणवाद तथा जातिप्रथा की जकड़न को चुनौती दी जा रही थी। यही वह दौर था जब असहयोग आन्दोलन की असमय समाप्ति के बाद देश में साम्प्रदायिक तनाव बढ़ने के मसले सामने आने लगे थे और हिन्दू तथा मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठनों की गतिविधियों में तेजी देखी गयी थी।

इसी पृष्ठभूमि में वर्ष 1923 में बम्बई विधान परिषद् में रावसाहेब बोले की पहल पर यह प्रस्ताव पारित हुआ कि सार्वजनिक स्थानों पर दलितों के साथ होने वाले भेदभाव पर रोक लगायी जाये। बहुमत से पारित इस प्रस्ताव के बावजूद तीन साल तक यह प्रस्ताव कागज़ पर ही बना रहा। उसके न अमल होने की स्थिति में 1926 में जनाब बोले ने नया प्रस्ताव रखा कि सार्वजनिक स्थानों, संस्थानों द्वारा इस पर अमल न करने की स्थिति में उनको मिलने वाली सरकारी सहायता राशि में कटौती की जाय।

विलायत से अपनी पढ़ाई पूरी करके लौटे बाबासाहेब आम्बेडकर दलितों शोषितों के बीच जागृति तथा संगठन के काम में जुटे थे, उन्हीं दिनों महाड़ तथा आसपास के कोंकण के इलाके के दलितों के बीच सक्रिय लोगों ने एक सम्मेलन की योजना बनायी तथा उसके लिए डॉ. अंबेडकर को आमंत्रित किया। इस सम्मेलन के प्रमुख संगठनकर्ता थे रामचंद्र बाबाजी मोरे (1903-1972) जिन्होंने अपनी सामाजिक गतिविधियों से पहले से इलाके में अलग पहचान बनायी थी और उनकी अगुआई में कुछ माह पहले ही क्राफोर्ड तालाब सत्याग्रह का आयोजन हुआ था जिसमें सार्वजनिक जल स्रोतों पर दलितों के समान अधिकार का दावा रेखांकित किया गया था। बाद में रामचंद्र मोरे कम्युनिस्ट पार्टी के साथ सक्रिय हुए और मुंबई की ऐतिहासिक गिरणी कामगार यूनियन के संस्थापक सदस्य बने।

इसे संयोग कहा जाना चाहिए कि महाड़ ही वह भूमि थी जहाँ पर बाबासाहेब के पूर्ववर्ती महात्मा फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज के दलित समाज के अग्रणी कार्यकर्ता गोपालबुवा वलंगकर ने अपने जनजागृति की शुरूआत की थी। महाड़ उसी कोंकण का इलाका है जहां के एक गांव के स्कूल में बाबासाहब का बचपन बीता था। तीसरा अहम संयोग यह था कि बम्बई विधानपरिषद के प्रस्ताव के बाद महाड़ नगरपालिका ने अपने यहां एक प्रस्ताव पारित कर अपने यहां के तमाम सार्वजनिक स्थान दलितों के लिए खुले करने का निर्णय लिया था।

महाड़ के वीरेश्वर थिएटर में हो रहे इस सम्मेलन में लगभग तीन हजार लोग एकत्रित थे जिनमें महिलाएं भी भारी संख्या में उपस्थित थीं। गं.नी.सहस्त्रबुद्धे, अनंत चित्रे, शंकरभाई धारिया, तुलजाभाई,  सुरेन्द्रनाथ टिपणीस जैसे समाज सुधारों के लिए अनुकूल सवर्ण भी शामिल थे। ये वही सुरेन्द्रनाथ टिपणीस थे जिन्होंने महाड़ नगरपालिका द्वारा प्रस्ताव पारित कराने में पहल ली थी। सवर्णों की इस उपस्थिति के दो निहितार्थ थे: एक पहलू यह था कि जातिभेद के उन्मूलन के लिए या समाज सुधार के लिए इनमें से एक छोटा तबका तत्पर था तथा उन्हें बाबासाहब के नेतृत्व पर भी यकीन था। दूसरे बाबासाहेब का अपना दृष्टिकोण सर्वसमावेशी था तथा वे ब्राहमणवाद की समाप्ति के लिए सभी तरह के लोगों को साथ लेकर चलने के लिए तैयार थे।

सम्मेलन के अपने धारदार भाषण में बाबासाहब ने सदियों से चली आ रही ब्राहमणवाद की गुलामी की मानसिकता से विद्रोह करने के लिए दलितों तथा अन्य शोषितों का आवाहन किया। महाड़ सत्याग्रह की चर्चित घोषणा में उन्होंने कहा कि –

‘‘तीन चीजों का तुम्हें परित्याग करना होगा। उन कथित गंदे पेशों को छोड़ना होगा जिनके कारण तुम पर लांछन लगाये जाते हैं। दूसरे, मरे हुए जानवरों का मांस खाने की परम्परा को भी छोड़ना होगा। और सबसे अहम है कि तुम उस मानसिकता से मुक्त हो जाओ कि तुम अछूतहो ।’’

उनका यह भी कहना था कि –

‘‘क्या यहां हम इसलिये आये हैं कि हमें पीने के लिए पानी मयस्सर नहीं होता है ? क्या यहां हम इसलिये आये हैं कि यहां के जायकेदार कहलानेवाले पानी के हम प्यासे हैं ? नहीं, दरअसल इन्सान होने का हमारा हक जताने हम यहां आये हैं ।’’

महाड सत्याग्रह के दौरान सभा का एक चित्र

सम्मेलन की औपचारिक समाप्ति तथा धन्यवाद ज्ञापन के बाद – जिसे महाड़ के सामाजिक कार्यकर्ता अनंत चित्रे ने रखा, उन्होंने बाद में सम्मेलन को सम्बोधित किया और लोगों का आवाहन किया कि प्रस्तुत सम्मेलन को एक महत्वपूर्ण काम को अंजाम दिए बिना पूरा नहीं समझा जाना चाहिए। उनका कहना था कि समाज में जारी छूआछूत की प्रथा के चलते आज भी इलाके के दलितों को चवदार तालाब – जो सार्वजनिक तालाब है – उसमें से पानी लेने नहीं दिया जाता। महाड़ नगरपालिका द्वारा इस सम्बन्ध में प्रस्ताव पारित किए जाने के बावजूद वह कागज पर ही बना हुआ है। अगर यह सम्मेलन इस प्रथा की समाप्ति के लिए आगे आता है तो यह कहा जा सकेगा कि इसने एक महत्वपूर्ण कार्यभार पूरा किया। चित्रे के चंद शब्दों ने पूरे जनसमूह को आंदोलित किया और वह डा अंबेडकर की अगुआई में कतारबद्ध होने लगे। 20 मार्च की तपती दुपहरिया में लगभग चार हजार की तादाद में वहां जमा जनसमूह ने चवदार तालाब की ओर कूच किया । समूचे महाड़ नगर में उनका अनुशासित जुलूस आगे बढ़ा। जुलूस में शामिल लोग नारे लगा रहे थे

महात्मा गांधी की जय’, ‘शिवाजी महाराज की जय’, ‘समानता की जय

जुलूस तालाब पर जाकर रूका और फिर सबसे पहले अम्बेडकर ने अपनी अंजुरी भर पानी पिया और फिर जुलूस में शामिल हजारों लोगों ने पानी पीया। गौरतलब है कि इस ऐतिहासिक सत्याग्रह में गैरब्राहमण आन्दोलन के शीर्षस्थ नेताओं के साथ साथ मेहनतकशों के आन्दोलन से जुड़े क्षेत्रीय कार्यकर्ता भी शामिल थे ।

अछूतों द्वारा चवदार तालाब पर पानी पीने की घटना से बौखलाये सवर्णों ने यह अफवा फैला दी कि चवदार तालाब को अपवित्र करने के बाद ये अछूतवीरेश्वर मन्दिर पर धावा बोलनेवाले हैं। पहले से ही तैयार सवर्ण युवकों की अगुआई में सभा स्थल पर लगे तम्बू कनात पर हमला करके कई लोगों को घायल किया गया।

दलितों के इस ऐतिहासिक विद्रोह के प्रति मीडिया की प्रतिक्रिया में भी उसके जातिवादी आग्रह साफ दिख रहे थे। कई सारे समाचार पत्रों ने डॉ. आम्बेडकर के इस बाग़ी तेवर के खिलाफ आग उगलना शुरू किया। भालानामक अख़बार जो सनातनी हिन्दुओं का पक्षधर था उसने 28 मार्च को दलितों को सम्बोधित करते हुए लिखा :

‘‘.. आप लोग मन्दिरों और जलाशयों को छूने की कोशिशें तुरंत बन्द कीजिये। और अगर ऐसा नहीं किया गया तो हम तुम लोगों को सबक सीखा देंगे ।…’’

इसके जवाब में बाबासाहब ने लिखा कि –

‘‘ ..जो हमें सबक सीखाने की बात कर रहे हैं हम उनसे भी निपट लेंगे ।..’’

बहरहाल जिस तरह का आलम था उसके इस बात की जरूरत महसूस की गयी कि अपनी बात जनमानस तक पहुंचाने के लिए एक स्वतंत्र अख़बार होना चाहिए। पहले निकाले जाते रहे अख़बार मूकनायकका प्रकाशन बन्द हो चुका था। इस जरूरत को पूरा करने के लिए सत्याग्रह की समाप्ति के बाद बम्बई लौटने पर चन्द दिनों के अन्दर ही बहिष्कृत भारतनामक अख़बार का प्रकाशन शुरू किया गया। प्रवेशांक निकला था 3 अप्रैल 1927 को।

अपने इस अख़बार के जरिये न केवल नवोदित दलित आन्दोलन ने उसके खिलाफ शुरू हो रहे अनर्गल प्रचार का जवाब देने की कोशिश की बल्कि सकारात्मक ढंग से अपनी समूची परियोजना को भी लोगों के सामने रखने के काम की शुरूआत की।

22 अप्रैल के अंक में बाबासाहब ने लिखा –

‘‘...महात्मा गांधी की तरह आज तक हम लोग भी यही मानते आये थे कि अस्पृश्यता यह हिन्दुधर्म के ऊपर लगा कलंक है। लेकिन अब हमारी आंखें खुली हैं और हम समझ रहे हैं कि यह हमारे शरीर पर लगा कलंक है। जब तक हम इसे हिन्दुधर्म पर लगा कलंक समझते थे तब तक इस काम को हमने आप लोगों पर सौंपा था लेकिन अब हमें इस बात का एहसास हुआ है कि यह हमारे शरीर पर लगा कलंक है तो इसे खत्म करने के पवित्र काम को हमने खुद स्वीकारा है।…’’

महाड़ सत्याग्रह का दूसरा चरण पहले जितना ही क्रांतिकारी था। यह महसूस किया गया था कि यूं तो कहने के लिए महाड़ सत्याग्रह के अन्तर्गत चवदार तालाबपर पानी पीने या छूने के लिए दलितों पर लगायी गयी सामाजिक पाबंदी तोड़ दी गयी थी लेकिन अभी भी यह लड़ाई तो अधूरी ही रह गयी है।

घटना के दूसरे ही दिन महाड़ के सवर्णों ने अछूतोंके स्पर्श से अपवित्रहो चुके चवदार तालाब के शुद्धीकरण को अंजाम दिया था। घटना के चन्द दिनों के बाद महाड़ नगरपालिका ने अपनी एक बैठक में अपने पहले प्रस्ताव को वापस लिया था। तथा महाड़ के चन्द सवर्णों ने अदालत में जाकर यह दरखास्त दी थी कि यह चवदार तालाबदरअसल चैधरी तालाबहै और यह कोई सार्वजनिक स्थान नहीं है। गौरतलब है कि अदालत ने उनकी याचिका स्वीकार की थी और फैसले के लिए अगली तारीख मुकर्रर की थी।

तय किया गया कि 25-26 दिसम्बर को महाड़ सत्याग्रह के अगले चरण को अंजाम दिया जाएगा। उसके लिए हैण्डबिल प्रकाशित किये गये तथा उसकी तैयारी के लिए जगह-जगह सम्मेलन भी आयोजित किये गये। बम्बई में इसी के लिए आयोजित एक सभा में 3 जुलाई 1927 को बाबासाहब ने कहा

‘‘.. सत्याग्रह का अर्थ लड़ाई। लेकिन यह लड़ाई तलवार, बंदूकों, तोप तथा बमगोलों से नहीं करनी है बल्कि हथियारों के बिना करनी है। जिस तरह पतुआखली, वैकोम जैसे स्थानों पर लोगों ने सत्याग्रह किया उसी तरह महाड़ में हमें सत्याग्रह करना है। इस दौरान सम्भव है कि शान्तिभंग के नाम पर सरकार हमें जेल में डालने के लिए तैयार हो इसलिये जेल जाने के लिए भी हमें तैयार रहना होगा।.. सत्याग्रह के लिए हमें ऐसे लोगों की जरूरत है जो निर्भीक तथा स्वाभिमानी हों। अस्पृश्यता यह अपने देह पर लगा कलंक है और इसे मिटाने के लिए जो प्रतिबद्ध हैं वही लोग सत्याग्रह के लिए अपने नाम दर्ज करा दें। …’’

27 नवम्बर के अपने लेख में बाबासाहब ने सरकार को यह भी चेतावनी दी कि उसके साथ न्याय के रास्ते में अगर बाधाएं खड़ी की गयीं तो वह अपनी समस्या को दुनिया के सामने रखने में भी नहीं हिचकेगा।

‘‘... सरकार कितने लोगों को जेल भेजेगी ? कितने दिन जेल में रखेगी ?... शान्तिभंग के नाम पर अगर सरकार हमारे न्याय अधिकारों के आड़े आएगी तो हम सुधरे हुए देशों का जो राष्ट्रसंघ बना है उसके पास फरियाद करके सरकार के अन्यायी रूख को बेपर्द करेंगे।…

महाड सत्याग्रह की एक पेंटिंग

25 दिसम्बर को चार बजे हजारों जनसमूह की भीड़ के बीच सम्मेलन की शुरूआत हुई। प्रस्तुत सम्मेलन के लिए महज महाड़ और उसके आसपास से ही नहीं बल्कि समूचे महाराष्ट्र से जातिभेद का उन्मूलन में रूचि रखनेवाले लोग जुटे थे। समूचे मण्डप में अलग अलग नारे लिख कर लगाये गये थे। गांधी के नेतृत्व के बारे में दलित आन्दोलन में तब तक व्याप्त मोह की झलक इस बात से भी मिल रही थी कि वहां महज एक ही तस्वीर लटकी थी और वह थी गांधी की। सम्मेलन के शुरूआत में उन बधाई सन्देशों को पढ़ कर सुनाया गया जो जगह जगह से आये थे। इसमें एक महत्वपूर्ण सन्देश था लोकमान्य तिलक के सुपुत्र श्रीधर तिलक का जो जातिभेद उन्मूलन के काम में लगे थे तथा इसके लिए एक अलग संस्था बना कर काम कर रहे थे ।

सम्मेलन के अपने शुरूआती वक्तव्य में बाबासाहेब ने प्रस्तुत सत्याग्रह परिषद का उद्देश्य स्पष्ट किया –

‘‘ अन्य लोगों की तरह हम भी इन्सान है इस बात को साबित करने के लिए हम तालाब पर जाएंगे। अर्थात यह सभा समता संग्राम की शुरूआत करने के लिए ही बुलायी गयी है। आज की इस सभा और 5 मई 1789 को फ्रांसीसी लोगों की क्रांतिकारी राष्ट्रीय सभा में बहुत समानताएं हैं। .. इस राष्ट्रीय सभा ने राजा-रानी को सूली पर चढ़ाया था, सम्पन्न तबकों के लिए जीना मुश्किल कर दिया था, उनकी सम्पत्ति जब्त की थी । 15 साल से ज्यादा समय तक समूचे यूरोप में इसने अराजकता पैदा की थी ऐसा इस पर आरोप लगता है। मेरे खयाल से ऐसे लोगों को इस सभा का वास्तविक निहितार्थ समझ नहीं आया।.. इसी सभा ने जन्मजात मानवी अधिकारों को घोषणापत्र जारी किया था.. इसने महज फ्रान्स में ही क्रान्ति को अंजाम नहीं दिया बल्कि समूची दुनिया में एक क्रांति को जनम दिया ऐसा कहना अनुचित नहीं होगा’’

उन्होंने अपील की थी इस सभा को फ्रेंच राष्ट्रीय सभा का लक्ष्य अपने सामने रखना चाहिए..‘‘ हिन्दुओं में व्याप्त वर्णव्यवस्था ने किस तरह विषमता और विघटन के बीज बोये हैं इस पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘समानता के व्यवहार के बिना प्राकृतिक गुणों का विकास नहीं हो पाता उसी तरह समानता के व्यवहार के बिना इन गुणों का सही इस्तेमाल भी नहीं हो पाता। एक तरफ से देखें तो हिन्दू समाज में व्याप्त असमानता व्यक्ति का विकास रोक कर समाज को भी कुंठित करती है और दूसरी तरफ यही असमानता व्यक्ति में संचित शक्ति का समाज के लिए उचित इस्तेमाल नहीं होने देती। ..‘‘सभी मानवों की जनम के साथ बराबरी की घोषणा करता हुआ मानवी हकों का एक ऐलाननामा भी सभा में जारी हुआ। सभा में चार प्रस्ताव पारित किये गये जिसमें जातिभेद के कायम होने के चलते स्थापित विषमता की भर्त्सना की गयी तथा यह भी मांग की गयी कि धर्माधिकारी पद पर लोगों की तरफ से नियुक्ति हो। इसमें से दूसरा प्रस्ताव मनुस्मृतिदहन का था जिसे सहस्त्राबुद्धे नामक एक ब्राहमण जाति के सामाजिक कार्यकर्ता ने प्रस्तुत किया था। प्रस्ताव में कहा गया था कि :

‘‘शूद्र जाति को अपमानित करनेवाली उसकी प्रगति को रोकनेवाली उसके आत्मबल को नष्ट कर उसके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक गुलामी को मजबूती देनेवाली मनुस्मृति के श्लोकों को देखते हुए …ऐसे जनद्रोही और इन्सानविरोधी ग्रंथ को हम आज आग के हवाले कर रहे हैं।’’

शाम को सभा-स्थान पर पहले से तैयार किये गये एक यज्ञकुण्ड में मनुस्मृति को आग के हवाले किया गया। यज्ञकुण्ड के आसपास अस्पृश्यता नष्ट करो’ ‘पुरोहितशाही का विध्वंस करोजैसे बैनर लगे थे। सभा के दूसरे दिन स्थानीय कलेक्टर ने अदालत की ओर से जारी उस स्थगनादेश की प्रतियां सम्मेलन को सौंपी जिसमें कहा गया था कि फिलहाल तालाब पर यथास्थिति बनायी रखी जाय अर्थात् उसमें दलितों को वहां का पानी छूने से मना किया गया था। निश्चित ही वह एक बेहद उलझन का समय था। एक तरफ सत्याग्रहियों का विशाल जनसमूह था जो चवदार तालाब पर सत्याग्रह के लिए तैयार था और जिसके लिए जेल जाने के लिए भी तैयार था दूसरी तरफ था सरकार का वह आदेश जिसके तहत इस पर पाबंदी लगा दी गयी थी। रात भर विचार-विमर्श चलता रहा। अन्त में सत्याग्रह स्थगित करने का कटु फैसला लिया गया। 27 दिसम्बर के अपने भाषण में डॉ. आम्बेडकर ने कहा कि

‘‘…मुझे आपकी ताकत का अन्दाजा है । लेकिन अपनी शक्ति का उपयोग समय स्थान देख कर किया जाना चाहिये ऐसा मुझे लगता है। …सवर्णों ने सब तरफ से दमन का चक्र चलाया है। व्यापारियों ने बाजार बन्द किया है। भूस्वामी ( खोत) खेत नहीं दे रहे हैं। किसान लोग जानवरों को उठा ले जा रहे हैं।’’

इसके बाद बाबासाहेब ने विशेषकर महिलाओं को सम्बोधित करते हुए लम्बा वक्तव्य दिया जिसमें उन्हें सामाजिक समता लाने की लड़ाई में जोरों से आगे आने की अपील की गयी थी।


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