फॉरवर्ड प्रेस

अदालत में आग

समन्दरि लागि आग, नदिया जल कोइला भई।
देखि कबीरा जागि, मच्छी रुखां चढ़ि गई..

(समंदर में आग लग गई, नदी जलकर कोयला हो गई, यह सब देख कबीर जागे तब मछली पेड़ चढ़ गई … )


सचमुच अफरा-तफरी मच गई, जब न्याय करने वाले ही न्याय की गुहार लगाने लगे। यह तो समंदर में आग लगने जैसी ही बात थी विचित्र, किन्तु सत्य। ऐसे ही किसी प्रसंग पर तो कबीर ने उपरोक्त पद गढ़े होंगे।

सर्वोच्च न्यायालय पर जजों ने ही उठाया सवाल

न्यायपालिका देश के नागरिकों को न्याय देने के लिए वचनबद्ध है और पूरा देश उसके प्रति विश्वास और सम्मान रखना चाहता है। सुप्रीम कोर्ट अपने मुल्क में न्याय की सबसे ऊँची पीठ है; उम्मीद की आखिरी मंजिल। सेक्युलर व्यवस्था में जनता द्वारा ही स्थापित एक ‘ईश्वर’, जिसके ऊपर या आगे कुछ नहीं है। लेकिन विगत 12 जनवरी 2018 को जो हुआ, उससे पूरा देश स्तब्ध रह गया। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर देश के नाम न्याय की गुहार लगाई और बतलाया कि स्वयं न्यायपालिका में न्याय नहीं हो पा रहा है। यह अत्यंत गंभीर मामला है। इसलिए, बेहतर होगा, मामले को थोड़े विस्तार से समझा जाय। न्यायमूर्ति जे. चेलमेस्वर के नयी दिल्ली स्थित सरकारी आवास 4, तुगलक रोड पर विगत 12 जनवरी को 12 बजे दिन में प्रेस कॉन्फ्रेंस होता है, जिसमे सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जज, सभी न्यायमूर्ति चेलमेस्वर, रंजन गोगोई, मदन वी लोकुर और कुरियन जोसेफ ने हिस्सा लिया और बतलाया कि सुप्रीम कोर्ट में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है।

12 जनवरी 2018 को देश के इतिहास में पहली बार प्रेस कांफ्रेंस करते सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जज

न्यायमूर्तियों के अनुसार दो महीने पहले उनलोगों ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा था कि महत्वपूर्ण मामले उनसे जूनियर जजों को नहीं दिए जाएँ। इन जजों ने यह भी बतलाया कि शुक्रवार को, यानि उसी रोज, उनलोगों ने मुख्य न्यायाधीश से मिल कर अपनी बातें रखीं, लेकिन वह नहीं माने। इसके बाद जजों के अनुसार, उनके पास कोई विकल्प नहीं था, और वे तमाम बातें देश के समक्ष रखने को मजबूर हुए। जजों के मुताबिक, उनका प्रेस के समक्ष जाने का यह फैसला इसलिए हुआ कि देश के लोग यह न समझें कि उनलोगों ने अपनी आत्मा बेच दी है। प्रेस वार्ता में दो महीने पूर्व लिखे गए मुख्य न्यायाधीश के नाम पत्र की प्रति भी जारी की गई। मामले की गंभीरता अधिक बढ़ गई जब सवाल-जवाब के क्रम में यह पूछे जाने पर कि क्या यह प्रसंग क्या जस्टिस जोया मामले से भी जुड़ा है? जस्टिस चेलमेस्वर ने जवाब दिया-आप यह मान सकते हैं। अब पूरा देश जनता है कि गैंगस्टर सोहराबुद्दीन मामले के सीबीआई जज जस्टिस बी.एच. लोया की मौत एक पहेली बन चुकी है। यह मामला मुख्य न्यायाधीश ने दसवें नंबर के जज अरुण कुमार मिश्र की पीठ में भेज दिया है। पूरे देश की इस पर नज़र है, क्योंकि इसके तार सत्ता पक्ष से जुड़ते हैं।

प्रेस को संबोधित करने जाते सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जज

बवाल मचना स्वाभाविक था, क्योंकि मामले की गंभीरता पर तो कोई विवाद ही नहीं है। सरकार भी कठघरे में आ गई। विपक्ष ने मुल्क की चिंता से खुद को जोड़ा तो सरकारी पक्ष बिफर उठा। भूतपूर्व जजों और दूसरे कानूनविदों ने अपनी चिंताएं जाहिर की। सबकी चिंता में कहीं-न-कहीं आम नागरिकों की चिंता भी शामिल थी। और अभी तो यह मामले का आरम्भ है, बात निकली है, तब दूर तक जाएगी। जानी चाहिए। 

मै, उन असंख्य लोगों में हमेशा एक रहा हूँ, जो मुल्क में जुडिसियरी की चिंता में शामिल रहे हैं। मैं कोई कानूनविद नहीं हूँ, न ही होना चाहता हूँ। मेरी आज़ाद ख़याली को कानून और व्यवस्था की बंदिशें बहुत रास नहीं आतीं। मैंने हमेशा करुणा को कानून और विचार से अधिक महत्वपूर्ण माना है। लेकिन व्यवस्थाओं का सम्मान करना जानता हूँ, इसकी अहमियत भी समझता हूँ। इसलिए मुझे हमेशा महसूस हुआ है कि व्यवस्था और कानून को जन पक्षधर होना ही चाहिए। सबसे निचले स्तर पर जो जी रहे हैं, व्यवस्था औ र कानून को उनके साथ होना चाहिए। यदि वह नहीं है, तब इनके होने के कोई अर्थ नहीं हैं। लेकिन यह जाहिर सच्चाई है कि व्यवस्था और कानून दोनों आज आम आदमी से दूर हो गए हैं और दिन-प्रतिदिन होते जा रहे है। कानून के दायरे में न्याय हासिल करना इतना महंगा और जटिल हो गया है कि आम आदमी इससे दूर ही रहना चाहता है। न्याय पाने की जिद में बर्बाद हुए लोगों की कहानियां, हमारे फ़िल्मी पटकथाओं की पसंदीदा विषय वस्तु रही है। 

मुख्य न्यायाधीश और सरकार दोनों पर सवाल : एक कार्यक्रम के दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी


और यह सब कोई आज से नहीं है। महात्मा गाँधी ने 1909 में ही अपनी विचार पुस्तिका ‘हिन्द-स्वराज’ में यूरोपीय तर्ज़ वाली इस न्यायपालिका पर सवाल उठाये थे और इसे भारत की गुलामी का एक कारक बतलाया था। भारत की पारम्परिक न्याय प्रणाली जनता द्वारा निर्वाचित होती थी। पञ्च अथवा न्यायकर्ता में दोनों पक्षों का विश्वास आवश्यक होता था। लेकिन यूरोपीय न्याय व्यवस्था, जो इस मुल्क में अंग्रेजों के द्वारा स्थापित हुई, मनोनयन द्वारा जजों की स्थापना करती थी। ऐसा समझा जाता था कि ये मनोनीत लोग इतनी ऊँची नैतिकता और दृष्टिकोण के होंगे कि संकीर्णताओं की उपेक्षा करेंगे। जिन दिनों देश में समाज सुधार के आंदोलन चल रहे थे, इन अदालतों की प्रासंगिकता बढ़ गई थी। समाज सुधार स्वप्नजीवी और भविष्यद्रष्टा सामाजिक दार्शनिकों द्वारा उठाया गया कदम था। लोक मान्यताओं से उनकी कड़ी टक्कर थी। सती प्रथा, विधवा विवाह, बाल विवाह आदि के प्रश्न पर समाज सुधारक प्रचलित लोक मान्यताओं से जूझ रहे थे। यही कारण था कि जन नेताओं और समाज सुधारकों में भी कई दफा आपसी टकराव हुए। ऐसे में मनोनयन वाली अदालतों की प्रासंगिकता समाज सुधारकों और प्रगतिशील तबकों में बढ़ी। डॉ आंबेडकर पंचायती राज व्यवस्था से इसी कारण सहमत नहीं थे। इन पंचायतों द्वारा आधुनिक विचारों के प्रसार में बाधा होने की आशंका थी। यह दो परस्पर विरोधी मान्यताओं का संघर्ष था, जिसमेंजिसमे न्यायपालिका आधुनिकता और प्रगतिशीलता की पक्षधर मानी जाती थी। उद्देश्य सामान कानून से पूरे देश के जनमन को एक सूत्र में बांधना भी था। इस तरह यह हमारे राष्ट्रवाद के आंदोलन में भी सहायक था। इसके द्वारा हमने धीरे-धीरे मनुवादी-मुल्लावादी मिज़ाज़ से भी अपनी दूरी बनाई। 

जस्टिस लोया की तस्वीर

लेकिन स्वतन्त्र भारत में आधुनिकता का लबादा ओढ़कर एक खास तबके ने धीरे-धीरे इस तंत्र पर अपना कब्ज़ा बनाना शुरू किया और अंततः वह सफल हो गए। आम नागरिक और आम जन इससे दूर होते चले गए। यहाँ तक कि इस तंत्र पर वर्गीय-वर्णीय वर्चस्व की भी बात उठी, और उसमेंउसमे बहुत हद तक सच्चाई भी है। इसलिए आज समय का तकाज़ा है कि शिद्ददत के साथ इस पूरी व्यवस्था पर विचार किया जाए और तदनुरूप आवश्यक सुधार किये जाएँ। कुछ लोग यह मानते हैं कि इस व्यवस्था में आरक्षण का प्रावधान कर देने से इसकी खामियां ख़त्म हो जाएँगी, तो शायद वे सही नहीं हैं। जिन व्यवस्थाओं में सामाजिक आरक्षण के प्रावधान हैं, वहां भी सब कुछ ठीक नहीं है। न्यायपालिका को कहीं अधिक सुधार की दरकार है। मुल्क में जनतंत्र की सलामती के लिए यह आवश्यक है। इसलिए मैं उनलोगों में शामिल हूँ, जो 12 जनवरी के प्रेस-प्रकरण को सकारात्मक समझ रहे हैं।


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