जाति विरोधी थे भगत सिंह

अंग्रेजों ने भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दे दी। लेकिन वे उनके विचारों को खत्म नहीं कर सके। आज उनके विचारों को खत्म करने की कोशिशें की जा रही हैं। भगत सिंह और उनके साथियों को उनके शहादत दिवस के मौके पर याद कर रहे हैं मोहनदास नैमिशराय :

आज की तारीख में भगत सिंह और भी प्रासंगिक हो जाते हैं तब समाज में जातिवादियों के द्वारा फिर से योजनाबद्ध तरीके से दलितों, पिछड़ो और महिलाओं के खिलाफ गतिविधियों को तेज कर दिया गया है। भगत सिंह को याद करना ही बिखरते समाज को सकारात्मक रूप से आगे ले जाना है। वे ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आजादी की जंग छेड़ने वाले ही नही थे बल्कि सामाजिक न्याय के समर्थक भी थे।

भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव

भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को लायलपुर पंजाब में हुआ था। अगर यह कहा जाये कि देश भक्ति उन्हें विरासत में मिली थी तो गलत नही होगा। जिस दिन उनका जन्म हुआ उसी दिन उनके पिता सरदार किशन सिंह, चाचा सरदार अजित सिंह,सरदार स्वर्ण सिंह जेल से रिहा हुए थे। इस तरह बचपन से ही उनमें देशभक्ति की भावना आ गई थी।

सन‍‍् 1926 में भगत सिंह ने नौजवान भारत सभा गठन किया था। इस समय उत्तर प्रदेश, पंजाब, बंगाल व बिहार में कई क्रांतिकारी संगठन विद्यमान थे, परंतु उनमें आपस में समन्वय न था। 8 व 9 सितंबर, 1928 को समस्त भारत के क्रांतिकारियों की एक गुप्त सभा दिल्ली के फिरोजशाह किले के खण्डहरों में हुई और एक नई केंद्रीय समिति का गठन किया गया, जिसमें चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, फणीन्द्रनाथ घोष, सुखदेव, विजय कुमार, शिव वर्मा एवं कुंदन लाल को शामिल किया गया। इस सभा में सशस्त्र क्रांति का निर्णय लिया गया।

भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दी गयी। इससे संबंधित 25 मार्च 1931 को अंग्रेजी समाचारपत्र ट्रिब्यून में प्रकाशित खबर

असल में साइमन कमीशन के विरोध में हुए प्रदर्शन में लाला लाजपत राय पर पुलिस ने निर्ममता से लाठियां चलाई थीं, जिससे बाद में उनकी मृत्यु हो गई। क्रांतिकारी समिति ने इसका बदला लेने की ठानी। उस पुलिस अफसर की हत्या का निश्चय किया गया। इसकी जिम्मेदारी चार सदस्यों को दी गई – चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु व जयगोपाल। 17 दिसंबर 1928 को घटनाचक्र ऐसा हुआ कि जिस अफसर को मारना चाहते थे, उसके बदले अन्य पुलिस अफसर सांडर्स पर गोली चली। सांंडर्स वहीं ढेर हो गया। पीछा करने वाले एक कांस्टेबल की भी मृत्यु हो गई। इसके बाद 8 अप्रैल, 1929 को एसेम्बली बमकांड हुआ। बाद में भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के साथ अन्य क्रांतिकारियों को भी गिरफ्तार कर लिया गया। 7 अक्टूबर, 1930 को लाहौर षड्यंत्र मुकदमे का फैसला आया। जिसमें भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई।

जेल वार्डेन ने उन्हें फांसी होने से थोड़ा पहले कहा था, भगत सिंह अब तो ईश्वर को याद कर ले। ऐसे समय भगत सिंह ने जवाब दिया था,

पूरी जिंदगी ईश्वर को याद नही किया। बल्कि गरीबों के दुखों के लिए कोसा ही था। अगर अब में ईश्वर को याद करूँगा तो लोग मुझे डरपोक ही कहेंगे। उन्होंने फांसी से एक दिन पहले सफाई कर्मी बेबे (मां) से घर से भोजन लाने के लिए कहा था। बेबे उसके लिए भोजन ले भी आता, लेकिन जेल के आदेश के तहत भगत सिंह को पहले से निश्चित फांसी देने का समय बारह घण्टे पहले कर दिया था।

अक्टूबर 1968 में भारत सरकार द्वारा शहीद भगत सिंह की स्मृति में डाक टिकट जारी किया गया।

भगत सिंह को फांसी की सजा सुनाए जाने के विरोध में देश भर में हड़ताली और प्रदर्शन हुए। बम्बई में ट्रेने भी रोकी गई। प्रिवी काउंसिल में फाँसी के विरोध में अपील की गई, जो खारिज कर दी गई। उस समय ब्रिटिश सरकार पर दबाव डाला जा सकता था। इरविन ने आश्वासन भी दिया था। वैसे वे भगत सिंह की फांसी को रदद करवा सकते थे। क्योंकि यह उनके अधिकार छेत्र में था ,लेकिन वे इस बारे में गांधी की सिफारिश चाहते थे। जो अंतिम समय तक नही हुई।

भगत सिंह ने एक ऐसे भारत का सपना देखा था, जो दमन,अत्याचार और अन्याय से सर्वथा मुक्त हो। उनके लिए आजादी का अर्थ ब्रिटिश सरकार से मुक्ति नही बल्कि देसी राजाओं, नवाबों, सामन्तो तथा पूंजीपतियों के उत्पीड़न से भी आम आदमी को छुटकारा मिले। भारत मे बहुजन समाज को उनके अधिकार मिले।

भगत सिंह को आरम्भ से ही किताबें पढ़ने का शोक था। जब वे जेल में थे तब लाहौर की द्वारका दास लायब्रेरी से किताबे मंगाते थे।

भगत सिंह साम्प्रदायिकता को समाज का दुश्मन मानते थे। उन्होंने जिस नौजवान सभा की स्थापना की, उसमे सर्वसम्मति से  यह प्रस्ताव भगत सिंह की अगुआई में पारित किया गया था कि किसी भी धार्मिक संगठन से जुड़े नौजवान को उसमें शामिल नही किया जा सकता। आज भगत सिंह की गौरवशाली विरासत को हम आगे बढ़ाएं।


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