एसटी, एससी और ओबीसी दुनिया में सबसे बदहाल

यह तस्वीर सिर्फ गरीबी की नहीं है, बल्कि अशिक्षा, भूमिहीनता, विस्थापन और सामाजिक भेदभाव की भी है। विचारणीय है कि हमारे देश में सबसे ज्यादा गरीब लोगों के बीपीएल के सरकारी आंकड़े अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों के अनुरूप नहीं हैं। स्वदेश कुमार सिन्हा की रिपोर्ट :

तमाम दावों के बावजूद भारत के बहुजन सबसे अधिक बदहाल हैं। यह हालत तब है जब केंद्र सरकार द्वारा आर्थिक विकास के नये-नये आंकड़े गढ़े जा रहे हैं। बीेते 23 मार्च 2018 को लोकसभा में जगदंबिका पाल के एक प्रश्न के जवाब में जो तथ्य सरकार ने स्वीकार किया है, वह सरकारी योजनाओं और उनके अनुपालन पर सवाल खड़ा करता है। केंद्रीय योजना राज्यमंत्री इंद्रजीत सिंह ने कहा कि 45.3 फीसदी आदिवासी और 31.5 फीसदी दलित गरीबी रेखा के नीचे हैं। वहीं अंतरराष्ट्रीय समाजसेवी संगठन एक्शन अगेंस्ट हंगर की रिपोर्ट बताती है कि भारत में कुपोषण जितनी बड़ी समस्या है, वैसा पूरे दक्षिण एशिया में और कहीं देखने को नहीं मिला है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में अनुसूचित जनजाति (28%), अनुसूचित जाति (21%), पिछड़ी जाति (20%) और ग्रामीण समुदाय (21%) पर अत्यधिक कुपोषण का बहुत बड़ा बोझ है।

भारतीय बच्चों में है सबसे अधिक कुपोषण

 

बहुजनों में कुपोषण

समुदाय/वर्गकुपोषण
अनुसूचित जनजाति28%
अनुसूचित जाति21%
ओबीसी20%
श्रोत : एक्शन अगेंस्ट हंगर, 2017

साथ ही पिछले वर्ष जारी ‘वर्ल्ड हंगर इंडेक्स के अनुसार दुनिया में सबसे ज्यादा गरीब तथा भुखमरी से शिकार लोग भारत में हैं, तथा इनमें से अधिकाँश दलित, पिछड़े तथा जनजातीय समाज के हैं। यह तबका भारत में सामाजिक रूप से ‘बहुजन’ है।  इनके विकास के तमाम दावों तथा आरक्षण की व्यवस्था के बाद भी इनकी स्थिति बद से बदत्तर होती जा रही है। और अब तो यह तथ्य सरकार भी स्वीकार कर रही है कि भारत में सामाजिक पिछड़ापन और आर्थिक वंचना एक-दूसरे से काफी हद तक जुड़ी है।

 

बीपीएल के आंकड़े

समुदाय/वर्गबीपीएल के आंकड़े
अनुसूचित जनजाति45.3%
अनुसूचित जाति31.5%
ओबीसीसरकार द्वारा आंकड़े जारी नहीं किये गये
श्रोत : भारत सरकार द्वारा लोकसभा में प्रस्तुत आंकड़ा

लोकसभा में सरकार का जवाब इस निर्मम सच्चाई को ही सामने लाती है। देश की आबादी में दलित 16-17 फीसदी और 7-8 फीसदी आदिवासी हैं। जो सरकारी आँकड़े सामने आए हैं वे पहले के सर्वेक्षणों से मेल खाते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में 21-22 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, लेकिन दलितों में यह अनुपात देश के कुल औसत से 10 प्रतिशत अधिक है और जनजातियों में तो यह देश की औसत से 200 फीसदी से भी ज्यादा है। यह स्थिति इस तथ्य की ओर इशारा करती है कि सामाजिक श्रेणीबद्धता काफी हद तक आर्थिक स्थिति का निर्धारण करती है। इस वास्तविकता से नज़र चुराना नामुमकिन है कि दलित, पिछड़े तथा जनजातीय समाज से जुड़े लोगों के साथ सदियों से कैसा अमानवीय व्यवहार होता रहा है। वे छुआ-छूत, अलगाव समेत अनेक प्रकार के सामाजिक विभेदों के शिकार होते रहे हैं। ऐसे में आय वाले सम्मानजनक रोज़गार पाना उनके लिए हमेशा ही कठिन रहा है। यह बात भी सत्य है कि दलित, पिछड़े तथा जनजातीय समाज से कुछ लोग आरक्षण के सहारे उच्च पदों पर पहुँच गए, लेकिन आरक्षण का लाभ कभी भी इन तबकों के व्यापक समाज तक नहीं पहुँच सका, तथा यह थोड़े से लोगों के बीच सिमटा रहा, इसलिए सभी आरक्षित वर्गों में दलितों व आदिवासियों में तो खासकर आरक्षण से लाभान्वित तबकों तथा बाकी लोगों के बीच काफी गैर बराबरी दिखलाई देती है। इन वर्गों के बीच से जो लोग वामपंथी पार्टियों सहित सभी राजनीतिक दलों में सांसद, विधायक, मंत्री आज बने, वह भी इन वर्गों के छोटे से तबके का ही हित साधते रहे।

छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में एक आदिवासी परिवार

आज देश में स्थिति यह है कि अधिकांश दलित असंगठित क्षेत्र के श्रमिक हैं, जहां गुज़ारे लायक तथा निरन्तर आय की गारंटी नहीं होती। कृषि मजदूरों में अधिकांश दलित तथा अति-पिछड़ी जातियों के हैं। कृषि आज लगातार घाटे की स्थिति में है, ऐसे में इन वर्गों की स्थिति बद से बदत्तर होती जा रही है। जंगलों की व्यावसायिक कटाई तथा विभिन्न परियोजनाओं के नाम पर आदिवासियों को जल, जंगल तथा ज़मीन से वंचित किया जा रहा है। एक समय में आत्म-निर्भर जीवन जीने वाले इन लोगों को उनके क्षेत्रों में राष्ट्रीय तथा बहु-राष्ट्रीय कंपनियों के मजदूर होकर जीवन यापन करना पड़ रहा है, तथा उनका भारी पलायन महानगरों की ओर हो रहा है, वहां भी वे यौन शोषण सहित हर तरह के शोषण तथा लूट के शिकार हो रहे हैं।

इस तरह से हम देखते हैं कि यह तस्वीर सिर्फ गरीबी की नहीं है, बल्कि अशिक्षा, भूमिहीनता, विस्थापन और सामाजिक भेदभाव की भी है। इस तथ्य पर भी गौर करने की ज़रूरत है कि हमारे देश में सबसे ज्यादा गरीब लोगों के बीपीएल यानी गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने वालों के सरकारी आंकड़े अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों के अनुरूप नहीं हैं। अगर इसे वैश्विक पैमाने पर लागू करें तो बीपीएल का आंकड़ा बहुत अधिक निकलेगा, तथा दलितों व आदिवासियों की हालत और भी बदत्तर दिखलाई पड़ेगी।


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  1. chandrahashya Reply
  2. mukesh kumar Reply

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