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श्रीलंका : मुस्लिम-विरोधी दंगे और सिंहली बौद्ध राष्ट्रवाद

श्रीलंका के केन्डी में हाल में हुए मुस्लिम-विरोधी दंगों से यह साफ है कि दक्षिण एशिया में राजनीति सहित सार्वजनिक जीवन में धर्म का हस्तक्षेप बढ़ता ही जा रहा है। हाल की मेरी श्रीलंका यात्रा के दौरान, मैंने कई लोगों से चर्चा की, जिनमें सरकारी अधिकारी भी शामिल थे। इस चर्चा से भी यही बात उभरकर सामने आई।

श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में मुस्लिमों के खिलाफ प्रदर्शन करते बोधू बाल सेना के कार्यकर्ता (फोटो न्यूज 24, श्रीलंकाई स्थानीय वेब पोर्टल)

हाल में 26 फरवरी को श्रीलंका के पूर्वी प्रांत के अंपारा शहर में मुस्लिम-विरोधी दंगे हुए। इसके कुछ ही दिनों  बाद, 2 मार्च को केन्डी जिले के टेडेनिया और उडिसपट्टुआ में भी मुसलमानों के खिलाफ हिंसा हुई। अंपारा में दंगों की शुरूआत तब हुई जब एक होटल में एक मुस्लिम बावर्ची द्वारा बनाए गए भोजन में कुछ सिंहली ग्राहकों को गेहूं के आटे का एक टुकड़ा मिला। उन्हें शक हो गया कि इसमें गर्भनिरोधक गोलियां मिलाई गई हैं। इस मुस्लिम बावर्ची का एक वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें, यह पूछे जाने पर कि क्या खाने में गर्भनिरोधक गोलियां मिलाई गई हैं, वह अपना सिर हिलाता हुआ नजर आ रहा है। वह अपना सिर डर के मारे हिला रहा था या बात ठीक से समझ में न आने के कारण, यह कहना मुश्किल है। इस तथ्य की जानकारी पुलिस को देने की बजाए, सिहंली अतिवादी संगठनों ने इलाके में मुसलमानों की संपत्तियों को नष्ट करना और मस्जिदों पर हमले करना शुरू कर दिया। बाद में हुई जांच से यह स्पष्ट हो गया कि यह संदेह गलत था। इसके अतिरिक्त, एक तथ्य यह भी है कि ऐसी कोई गोली उपलब्ध नहीं है जो किसी व्यक्ति को हमेशा के लिए बच्चे पैदा करने में अक्षम बना सके।

केन्डी में दंगे तब शुरू हुए जब, 22 फरवरी को, चार मुस्लिम युवकों ने, जो कथित रूप से नशे में थे, एक सड़क दुर्घटना के बाद, सिंहली ट्रक ड्राईवर की जबरदस्त पिटाई लगा दी। घायल ट्रक ड्राईवर ने 2 मार्च को एक अस्पताल में दम तोड़ दिया। आरोपी युवकों को घटना के दिन ही गिरफ्तार कर लिया गया और 7 मार्च तक के लिए जेल भेज दिया गया। इसके बाद भी हिंसक सिंहली भीड़ों ने मुसलमानों की संपत्तियों पर हमले षुरू कर दिए। इन हमलों में संपत्ति का भारी नुकसान हुआ। सरकार के अनुसार, 465 घरों, दुकानों और गाड़ियों को नुकसान पहुंचाया गया। श्रीलंका सरकार ने वहां आपातकाल घोषित कर दिया, सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिए और कर्फ्यू लागू कर दिया। कुछ लोगों का मानना है कि इतना कुछ किए जाने की जरूरत नहीं थी। देश में पिछली बार कर्फ्यू सन् 2011 के गृहयुद्ध के दौरान लगाया गया था।

केन्डी में दंगे के बाद अपना टूटा घर दिखाती एक महिला

दोनों घटनाओं से यह पता चलता है कि श्रीलंका में मुसलमानों के प्रति भय, संदेह और पूर्वाग्रह का वातावरण व्याप्त है। श्रीलंका का मुस्लिम समुदाय काफी विविधवर्णी है जिसमें मूर, मलय, बोहरा, खोजा और मेमन शामिल हैं। सन् 2012 की जनगणना के अनुसार, मुसलमान, देश की कुल जनसंख्या का 9.66 प्रतिशत हैं। तमिलभाषी मूर, मुस्लिम समुदाय का सबसे बड़ा हिस्सा है और देश की आबादी का 9.30 प्रतिशत हैं। उनमें से कुछ सिंहली भाषा भी बोलते हैं। श्रीलंका में इस्लाम 7वीं सदी में अरब सौदागरों के साथ पहुंचा था। बाद में ये सौदागर यहीं बस गए।

जब मूरों ने इस धारणा का विरोध किया कि वे मूलतः इस्लाम में धर्मांतरित तमिल हैं, तब एलटीटीई ने उन्हें निशाना बनाना शुरू कर दिया। मूर लोगों का कहना है कि वे अरबों की संतान हैं। एलटीटीई के हमलों में कुछ सैकड़ा मूर मारे गए और लाखों को अपने घर-बार छोड़कर भागना पड़ा। इसके बाद, 26 साल तक चले गृहयुद्ध में श्रीलंका के मूरों ने सिंहलियों से हाथ मिला लिया। एक ओर एलटीटीई के हमले थे तो दूसरी ओर सिंहली बौद्ध राष्ट्रवाद। इन दोनों के बीच पिस रहे मुस्लिम समुदाय ने इस्लाम के नाम पर गोलबंद होना षुरू कर दिया। मई 2009 के पहले तक, अतिवादी सिंहली बौद्ध आंदोलन के निशाने पर तमिल थे। उन्हें मूरों से कोई शत्रुता नहीं थी। परंतु तमिल इलम का खतरा समाप्त होने के बाद, अतिवादी सिंहली बौद्ध राष्ट्रवादियों ने नए शत्रु ढू़ंढने शुरू कर दिए। उनके लिए ऐसा करना इसलिए ज़रूरी था ताकि वे अपने आपको सिंहली बौद्ध समुदाय का मुक्तिदाता और संरक्षक सिद्ध कर सकें। ऐसा कर वे न केवल ‘अन्यों‘ पर वर्चस्व स्थापित कर सकते थे वरन् सिंहली बौद्ध समुदाय में भी अपना दबदबा कायम कर सकते थे। उन्होंने पहले से परेशान मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाना शुरू कर दिया। पूरे विश्व में मुसलमानों के प्रति घृणा के वातावरण ने उनकी मदद की। एक बौद्ध भिक्षुक ने इस लेखक से पूछा कि आखिर क्या कारण है कि मुसलमान, जिन्होंने सिंहली संस्कृति अपना ली थी, सन् 1980 के बाद से अपनी इस्लामिक पहचान पर जोर  देने लगे हैं। इस भिक्षुक का कहना था कि सिंहली बौद्धों ने पहले ही तमिल इलम, जो कि बौद्ध संस्कृति विरोधी आन्दोलन था, को पराजित कर दिया है और अब वे उन लोगों से निपटेंगे, जो अपनी अलग पहचान स्थापित करना चाहते हैं।

बोधू बाल सेना (बीबीएस) या बुद्धिस्ट फोर्स आर्मी की स्थापना दो बौद्ध भिक्षुओं किरामा विमालजोति और सगलगोड़ा अत्थज्ञानसरा ने ‘जतिका हेलाका उरूमया‘ से अलग होने के बाद की थी। सन् 2012 में आयोजित अपने पहले राष्ट्रीय अधिवेशन में बीबीएस ने इस्लामिक पहचान पर जोर देने पर प्रश्नचिन्ह लगाया। उसने यह मांग की कि देश में एक समान कानून होना चाहिए। उसने हलाल भोजन और मुस्लिम महिलाओं द्वारा बुर्का पहने जाने का विरोध किया। उसने कहा कि बौद्ध भिक्षुओं को विश्वविद्यालय में इतिहास व अन्य विषय पढ़ाने चाहिए और उन्हें विश्वविद्यालयों में भर्ती में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उसने बौद्ध समुदाय के लिए परिवार नियोजन के उपाय लागू किए जाने का भी विरोध किया। बीबीएस के कर्ताधर्ता एक ओर  बौद्धों के लिए विषेशाधिकार की बात कर रहे थे, तो दूसरी ओर वे चाहते थे कि मुसलमानों का अ-इस्लामिकरण हो और वे बौद्ध संस्कृति अपनाएं। बीबीएस, केन्द्रीयकृत एकाधिकारवादी राज्य की पक्षधर है, जो सिंहली बौद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को संरक्षण दे। वह श्रीलंका के बहुधार्मिक, बहुनस्लीय और बहुसांस्कृतिक चरित्र को बनाए रखने के पक्ष में नहीं है।

केन्डी में एक मस्जिट की सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मी

अतिवादी बौद्ध सिंहली राष्ट्रवाद, अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय, जो आबादी के 10 प्रतिशत से भी कम है, का डर दिखाकर बहुसंख्यक बौद्ध सिंहलियों को गोलबंद करना चाहता है। उसका तर्क है कि सिंहली बौद्धों के पास रहने के लिए पूरी दुनिया में सिर्फ एक ही देश है जबकि मुसलमान, हिन्दू और ईसाई कई अन्य देशों में भी रह सकते हैं। परंतु क्या यह सच नहीं है कि मूरों और सिंहली ईसाईयों की भी एक ही मातृभूमि है। इस राष्ट्रवाद के पैरोकार हर जगह ‘ऊग रही मस्जिदों‘ का विरोध करते हैं और कहते हैं कि मुस्लिम आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है और बौद्धों को ईसाई बनाया जा रहा है।

बीबीएस के महासचिव गणसारा ने भारत में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने का स्वागत किया था। उनका दावा था कि वे दक्षिण एशिया में ‘हिन्दू-बौद्ध शांति क्षेत्र के निर्माण‘ के लिए आरएसएस से चर्चा कर रहे हैं। यद्यपि भाजपा महासचिव राम माधव ने आरएसएस के बीबीएस के साथ किसी भी प्रकार के संबंध से इंकार किया परंतु उन्होंने सोशल मीडिया पर बीबीएस की प्रषंसा करते हुए लिखा, ‘‘बोधू बाल सेना मूलतः विदेशी धर्मों से अपने देश की संस्कृति की रक्षा की बात करती है‘‘। आरएसएस भी ठीक यही कर रहा है, बस उसका उद्धेष्य बौद्ध धर्म की जगह हिन्दू धर्म की रक्षा करना है। बीबीएस और आरएसएस, दोनों के काल्पनिक शत्रु हैं  ईसाई धर्म और इस्लाम के अनुयायी और दोनों ही अपनी ‘एकमात्र मातृभूमि‘ की इस्लाम और ईसाई धर्म से रक्षा करना चाहते हैं। बौद्ध और हिन्दू श्रेष्ठतावादी संगठन, काल्पनिक शत्रुओं का काल्पनिक भय दिखाकर बहुसंख्यक समुदाय को अपने झंडे तले लाना चाहते हैं ताकि वे स्वयं को अपनी-अपनी सांस्कृतिक विरासतों के रक्षक के रूप में प्रस्तुत कर सकें। उन्हें न तो सच से कोई लेनादेना है ना ही वे स्थापित प्रक्रियाओं और प्रजातांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करते हैं। केन्डी में मुस्लिम-विरोधी दंगे इस तथ्य के बावजूद भड़के कि ट्रक ड्राईवर पर हमले के आरोपी मुस्लिम युवकों को उसी दिन गिरफ्तार कर लिया गया था। इसी तरह, अंपारा में मुसलमानों के खिलाफ पूर्वाग्रहों के चलते, एक मुसलमान की होटल के सिंहली ग्राहकों को यह संदेह हो गया कि उन्हे खाने में गर्भनिरोधकक गोलियां दी जा रही हैं ताकि वे बच्चे पैदा करने में अक्षम हो जाएं और इस तरह सिंहलियों की आबादी न बढ़ सके। उन्होंने न तो जांच पूरी होने का इंतजार किया और ना ही इस तथ्य पर ध्यान दिया कि इस तरह की कोई गर्भनिरोधक गोली होती ही नहीं है।

दक्षिणपंथी अतिवादी, साधारण घटनाओं और विवादों को बड़ा रूप देकर उनके बहाने संबंधित समुदाय के ऐसे सदस्यों पर सामूहिक हमले करते हैं, जिनका उस घटना से कोई लेनादेना ही नहीं होता। अगर कानून, पीड़ितों के पक्ष में तनिक सी भी कार्यवाही करता है, तो उसे तुष्टिकरण करार दे दिया जाता है। दरअसल, अतिवादी श्रेष्ठतावादी, ‘दूसरे‘ के विरूद्ध नहीं बल्कि प्रजातंत्र और कानून के राज के खिलाफ युद्ध कर रहे हैं।

सन् 2013 में बीबीएस के एक अधिवेशन, जिसमें 1,300 बौद्ध भिक्षुओं समेत लगभग 16,000 व्यक्ति उपस्थित थे, में संगठन के महासचिव गणसारा ने ‘महारगमा घोषणापत्र‘ जारी किया। उन्होंने कहा, ‘‘यह सिंहली बौद्धों की सरकार है और इसे सिहंली बौद्ध ही बने रहना चाहिए। यह सिंहलियों का देश है और यहां सिंहलियों का राज होना चाहिए। प्रजातांत्रिक और बहुवादी मूल्य, सिंहली नस्ल को नष्ट कर देंगे।‘‘ उन्होंने वहां मौजूद सिंहली बौद्धों का आव्हान करते हुए कहा कि उन्हें ‘मुस्लिम अतिवादियों के खिलाफ नागरिक पुलिस बल के रूप में कार्य करना चाहिए‘।     

बीबीएस ने आरएसएस से भी काफी कुछ सीखा है।  उदाहरण के लिए, केन्डी में 17 मार्च, 2013 को आयोजित एक रैली में बीबीएस ने घोषणा की कि रत्नापुरा जिले में स्थित कुरागला बौद्ध मठ के परिसर में दसवीं सदी की जो मस्जिद है, उसे मुस्लिम कट्टरपंथियों ने एक बौद्ध इमारत को गिराकर बनाया था। चूंकि भारत पर मुस्लिम बादशाहों ने राज किया था, इसलिए संघ परिवार के लिए यह दावा करना आसान हो गया कि बाबरी मस्जिद को रामजन्मभूमि मंदिर के मलबे पर बनाया गया है। श्रीलंका में मुसलमानों ने कभी राज नहीं किया। वह पहले पुर्तगाल का उपनिवेश था और बाद में ब्रिटेन का। बीबीएस ने ‘फैशन बग‘ और ‘नो लिमिट‘ नामक खुदरा स्टोरों की श्रृंखला पर आरोप लगाया कि वे बौद्ध सिंहलियों को मुसलमान बना रहे हैं। इन दोनों कंपनियों के मालिक मुसलमान हैं। कोलंबो जिले के पेप्लीआना में फैशन बग की एक दुकान,  जिसका मालिक मुसलमान था, पर बौद्ध भिक्षुओं के नेतृत्व में एक भीड़ ने हमला किया। दक्षिणपंथी श्रेष्ठतावादी, विदेशी सांस्कृतिक प्रभावों पर तो प्रश्न उठाते हैं परंतु स्वयं विदेशी राजनैतिक विचारधाराओं, जिनमें फासीवाद और नाजीवाद शामिल है, से प्रेरणा ग्रहण करते हैं।

आरएसएस और बीबीएस एक-दूसरे की चुनावी जीतों से प्रसन्न होते हैं और कहते हैं कि इससे दक्षिण एशिया में स्थिरता आएगी। ये दोनों मुसलमानों और ईसाईयों को अपना दुश्मन मानते हैं। दोनों के बीच ‘उच्च स्तरीय‘ वार्ताएं भी होती रहती हैं। परंतु तथ्य यह है कि दीर्घावधि में इन दोनों के हित एक-दूसरे के विरोधाभासी हैं। बीबीएस, सिंहली बौद्धों की मातृभूमि की रक्षा की बात करती है तो आरएसएस का लक्ष्य अखंड भारत की स्थापना है, जिसका एक ही धर्म और एक ही संस्कृति होगी। अखंड भारत में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, म्यांनमार और चीन के भी कुछ हिस्से शामिल हैं।

अपनी बातों और हरकतों से दक्षिणपंथी श्रेष्ठतावादी, हाशिए पर पड़े अल्पसंख्यक वर्गों – जिन्हें राज्य भी बहुत तव्वजो नहीं देता – में असुरक्षा के भाव को और गहरा करते हैं और इसके कारण अल्पसंख्यक वर्ग अपने धर्म के आधार पर गोलबंद होने लगते हैं। हलाल भोजन को 2012 के बाद एक समस्या बताया जाने लगा। यह कोई नई चीज नहीं है और वैसे भी गैर-मुसलमानों को इस बात से क्यों फर्क पड़ना चाहिए कि मुसलमान कैसा भोजन करते हैं।

एशियन मुस्लिम एक्शन नेटवर्क के मुस्तफा निहमात ने इस लेखक को बताया कि श्रीलंका में लगभग 3,000 मस्जिदें हैं और उन सभी में तमिल भाषा का ही उपयोग होता है। परंतु हाल में कोलंबो की पांच मस्जिदों में जुमे की नमाज के बाद की जाने वाली तकरीर सिंहली भाषा में की जाने लगी है। मूर मुसलमान बहुत मेहनती हैं और उनमें से अधिकांश व्यवसायी हैं। मेरी टैक्सी के ड्राईवर ने मुझे बताया कि श्रीलंका में हर दूसरी दुकान या तो मूरों की है या तमिलों की। यह अतिशयोक्ति सकती है परंतु यह तथ्य है कि हर दंगे में मुसलमानों के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को सबसे अधिक नुकसान पहुचाया जाता है।

सभी देशों में अतिवादी दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी, बहुसंख्यक समुदाय के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों का भयादोहन कर उन्हें दूसरे धर्मों के उन लोगों के प्रति घृणा के भाव से भर देते हैं, जो आर्थिक दृष्टि से उन्हीं के वर्ग के होते हैं। उपयुक्त शिक्षा और विभिन्न समुदायों के बीच संवाद से इस समस्या से निपटा जा सकता है। भारत की तरह, श्रीलंका का संविधान भी सभी नागरिकों को – चाहे वे किसी भी धर्म के हों – समान दर्जा देता है और उन्हें अपने धर्म का पालन करने की पूर्ण स्वतंत्रता उपलब्ध करवाता है। परंतु कार्यपालिकाएं, कानून को निष्पक्षता से लागू नहीं करतीं। श्रीलंका के एक मंत्री ने एक समूह, जिसमें यह लेखक भी शामिल था, से बातचीत करते हुए कहा कि हिंसा में शामिल बहुत कम लोगों पर मुकदमे चलाए जाते हैं और उनमें से भी बहुत कम को सजा मिल पाती है। हिंसा को रोकने के लिए यह जरूरी है कि घृणा-जनित अपराधों पर नियंत्रण पाया जाए, गुप्तचर व्यवस्था को मजबूत किया जाए और गुप्त सूचनाओं पर उपयुक्त कार्यवाही हो। यद्यपि श्रीलंका सरकार ने मुस्लिम-विरोधी दंगों को गंभीरता से लेते हुए, सोशल मीडिया पर रोक लगाई और आपातकाल की घोषणा की परंतु कार्यपालिका ने आपातकाल लागू होने के कारण उसे मिले अतिरिक्त अधिकारों का दुरूपयोग करते हुए अल्पसंख्यकों को ही प्रताड़ित किया। श्रीलंका में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ रही है और आर्थिक श्रेष्ठि वर्ग, दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद को आर्थिक मदद उपलब्ध करवा रहा है ताकि ‘अन्य‘ समुदायों के गरीबों की बेहतरी की राह में रोड़े अटकाए जा सकें।

 

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया)


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