फॉरवर्ड प्रेस

आंदोलन से लेखन की यात्रा पर रजनी के 60 वर्ष

स्मृति शेष

प्रसिद्ध दलित लेखिका तथा सामाजिक कार्यकर्ता रजनी तिलक 30 मार्च 2018 को हमें छोड़ कर चली गई। उसकी उम्र करीब 60 वर्ष थी। सवाल उम्र का नहीं है बल्कि उसके द्वारा किये गए कार्यो की, अगर हम फेहरिस्त तैयार करें तो उसके जीवन संघर्ष के उन अध्यायों की तलाश करना होगा, जो अब इतिहास बन गए हैं। निश्चित ही रजनी ने अपना पूरा जीवन समाज सेवा में लगा दिया, न घर की फिक्र की और न परिवार की। याद रहा तो सिर्फ समाज, उसमें भी महिलाओं का यातनापूर्ण जीवन। जिस बारे में एक बार नहीं अनेक बार बाबा साहब डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि महिलाओं को हर हालत में शिक्षा लेनी है। तभी दलित समाज जागृत होगा। नई पीढ़ी में चेतना आयेगी। रजनी ने बाबा साहब की इसी बात को स्वीकार किया और चुनौती के रूप में आगे बढ़ी। कितना बड़ा उसका निर्णय था। वह भी एक दलित परिवार की लड़की के लिए। परिवार भी ऐसा जो आर्थिक तौर समृद्ध नहीं था। यह निर्णय उसने जब लिया तब उसकी उम्र केवल 16 वर्ष थी। उसका एक कारण यह भी था कि उसका परिवार आंबेडकरवादी था, जिनका मान सम्मान था। उन दिनों उसके परिवार में उसकी मां और पिता के अलावा बड़े भाई मनोहर तथा अशोक भारती के साथ छोटी बहनें अनिता भारती तथा पुष्पा भारती थे। वैसे दो भाई रजनी से छोटे भी थे, जो सभी सामाजिक कार्यो में रुचि लेते थे।

रजनी तिलक (27 मई 1958 – 30 मार्च 2018)

रजनी का जन्म 27 मई, 1958 को दिल्ली में ही हुआ था। जैसा मुझे याद आ रहा है मेरी उससे मुलाकात 40 वर्ष पूर्व हुई थी। मैं भी उन्हीं दिनों मेरठ से दिल्ली आया था। कहना न होगा कि उनके साथ दिल्ली में होने वाले कार्यक्रमों में मैं जाने लगा था। बाद में मेरी मुलाकात गिरधारी लाल सागर और शेखर से हुई। कभी-कभी मैं रजनी के साथ ही गिरधारी लाल सागर के घर भी जाता था। लम्बे समय तक रजनी एक्टिविस्ट के रूप में कार्य करती रही। दिल्ली से बाहर भी। विशेष रूप से नागपुर, बंबई, पुणे, जयपुर, लखनऊ, गाज़ियाबाद, मेरठ, आगरा, अलीगढ़, भोपाल, हैदराबाद, फरीदाबाद आदि जाने लगी, जहाँ उसे विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मलित होना होता था।

दलित समाज की अधिकांश महिलाओं को जीवन में पति, बच्चे और उस घर के अन्य सदस्यों का भार गृहणी के रूप में सहन करना होता है, जहाँ विवाह के बाद वे जिम्मेदारी उठाना सीख जाती हैं। पर वह सब रजनी को स्वीकार न था। उसके भीतर तो बाबा साहब के सपनों को पूरा करने की चाह थी। हालांकि उसके पति आनन्द स्वयं भी एक्टीविस्ट थे। जो बाबा साहब के स्थान पर मार्क्स को ज्यादा मानते थे। कुछ सालों बाद ही उनमें तलाक हो गया। इस बीच एक बेटी भी हुई। दोनों के रास्ते अलग-अलग। एक रास्ता मार्क्स की तरफ जाता था तो दूसरा आंबेडकर की ओर। सम्भवत: कुछ और भी कारण रहा हो, जिसमें हम नहीं जाना चाहते। यहां हम रजनी को याद करते हुए, उसके संघर्ष और लेखन के बारे में चर्चा करना चाहते हैं।

रजनी ने भारत सरकार के तहत नौकरी भी की। नौकरी में रहते हुए उसने बामसेफ और डीएस4 के लिए भी  अपना समय दिया। सम्भवत: 1978 से 1984 के बीच की बात है। दिल्ली में मान्यवर कांशीराम पांव जमाने की कोशिश कर रहे थे। यह वह समय था जब मैं स्वयं मेरठ से अध्यापक की नौकरी छोड़कर दिल्ली आ गया था। करोल बाग के बामसेफ ऑफिस में कांता मौर्य, कृपा गौतम के साथ रजनी भी आती थी। हम साथी कांशीराम जी के नेतृत्व में दिल्ली, शाहदरा, गाज़ियाबाद, मेरठ, फरीदाबाद में होने वाले कार्यक्रमों में शामिल होते थे। साथ ही कैडर कैम्प भी अटेंड करते थे। इस तरह रजनी की सामाजिक गतिविधियां बढ़ने लगी थीं। उसी दौर में वह भारतीय दलित पैंथर में भी रही। आंगनबाड़ी के साथ आह्वान थियेटर,नेशनल फेडरेशन फॉर दलित वीमेन,नैक्डोर वर्ल्ड डिग्निटी फोरम, दलित लेखक संघ और राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन आदि के साथ उसका गहरा जुड़ाव रहा। इनमें से कुछ संगठन 70 के दशक, कुछ 80 के तथा कुछ 90 और कुछ नई शताब्दी के थे। कहना न होगा कि वह लगातार समाज सेवा की मुहिम में लगी रही।

दलित महिलाओं के लिए आजीवन लड़ती रहीं रजनी तिलक

इस बीच मैं भी दिल्ली रहने लगा था और ‘बहुजन अधिकार’ नाम से हिंदी पाक्षिक शुरु किया था। मैंने रजनी को एक दो बार सलाह दी कि वह समाज सेवा के साथ किताबें भी लिखे। आरम्भ में उसकी रुचि नही थी। समाज सेवा को वह वरीयता देती थी, लेखन के बारे में वह कहती  थी, क्या होता है केवल लिखने से। पर बाद में वह गम्भीरता से पढ़ने- लिखने लगी। यह अच्छा ही हुआ, इस लिए कि उत्तरी भारत मे उसने महिलाओं में चेतना तो भरी ही साथ ही साहित्य के माध्यम से संवाद भी जारी रखा। मैं अगर यह कहूं तो गलत नही होगा कि पूरे उत्तरी भारत में वह एकमात्र ऐसी लेखिका थी जो साथिनों के घर जाकर अपनी बात कहती थी। उन्हें समझाती थी, हिन्दू धर्म की बेड़ियों से मुक्त होने को प्रेरित करती थी। छोटी-छोटी किताबें उन्हें बिना मूल्य के पढ़ने को देती थी। मुझे याद है कि महानायक बाबा साहब डॉ. आंबेडकर उपन्यास की 50 प्रतियां उसने स्वयं खरीदकर साथियों को भेंट की। दूसरे मैं यह भी यहाँ बताना चाहता हूं कि हर माह वह कभी नागपुर, कभी मुंबई तथा कभी पूना आदि जाती थी। कहना न होगा कि इस तरह से उसने मराठी और हिंदी दलित महिलाओं के बीच सवांद जारी किया। मराठी भाषा भी सीखना शुरु किया।

जहाँ तक उसके द्वारा लिखित, अनुवादित और सम्पादित पुस्तकों की बात है, उनमें भारत की ‘प्रथम शिक्षिका सावित्री बाई फुले’, कविता संग्रह ‘पदचाप’, ‘बुद्ध ने घर क्यो छोड़ा’, ‘डॉ. आंबेडकर और महिलाएं’, ‘समकालीन दलित महिला लेखन’ तथा एक दो वर्ष पूर्व नामदेव ढसाल की कविताओं का संग्रह ‘गोलपीठा’ का अनुवाद, सम्पादन में शेखर और मेरे साथ मिलकर कार्य किया। जो हिंदी में पहली बार छपा था। यहां एक महत्वपूर्ण पुस्तक का जिक्र और करना चाहता हूं। मराठी में आम्ही भी इतिहास घडविला, जिसे मीनाक्षी मून तथा उर्मिला पवार ने लिखा और संपादन किया था। उसे शेखर जी की मदद से वह प्रकाशित कराना चाहती थी। असल में महाराष्ट्र की लगभग पचास दलित समाज की महिलाओं के जीवन संघर्ष से जुड़ा यह दलित दस्तावेज है। इनमें से अधिकांश महिलाओं ने बाबा साहब के साथ कार्य किया था।

उसका हिंदी भाष्य ‘हमने भी इतिहास रचा है’, इस पुस्तक पर रजनी ने बहुत मेहनत की, लेकिन उसके जीते जी छप नहीं सकी। कारण कुछ भी रहा हो कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने बीएसपी से चुनाव भी लड़ा था।
इधर इन दिनों हिंदी में दलित आत्मकथा तेजी से प्रकाशित होने लगी थी। 2017 में रजनी की आत्म कथा ‘अपनी जमीं अपना आसमां’ आई। जिसका हिंदी और मराठी साथियो द्वारा स्वागत हुआ। असल मे जब भी कोई साथी अनायास इस दुनिया से रुखसत हो जाता है तब उसके बहुत से कार्य अधूरे रह जाते है। ऐसा ही रजनी के साथ भी हुआ। उसकी आत्मकथा का दूसरा भाग भी छपने वाला था। नामदेव ढसाल का एक और कविता संग्रह हिंदी में आने वाला था, जिसका टाइटल था ‘तुम्हारी योग्यता क्या है?’ जिसका सम्पादन वह कर रही थी। इसके अलावा रमाबाई, जोती राव फुले, सावित्रीबाई फुले तथा बाबा साहब के जीवन संघर्ष पर कविताओं का संकलन करना चाहती थी। बहुत सारे कार्य अधूरे रह गए। अक्सर ऐसा होता भी है। आशा है साथी मिलजुल कर जिन्हें पूरा करेंगे।


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