एकलव्य की आत्मकथा    

जाने-अनजाने द्विजों ने एकलव्य के रूप में एक ऐसे मिथक की रचना कर दी, जो उनके अाराध्य मिथकों की तरह कपटी और हत्यारा नहीं है और वंचितों का प्रतिनिधित्व करते हुए द्विजों के क्रूर चेहरे को बेनकाब करता है।  कौन थे एकलव्य और क्या थी उनकी कहानी? सुना रहे हैं, राजकिशोर

मुझे नहीं पता था कि मैं इतना मशहूर हो जाऊँगा कि मुझे अपनी पूरी कहानी लिखनी पड़ेगी। लेकिन इतिहास किसी को पूरी तरह भुला नहीं देता न किसी अन्याय को मिट्टी के नीचे गाड़ने देता है। हर घटना बोलती है, लेकिन हो सकता है उसकी आवाज तत्काल न सुनी जाये, या हजारों वर्ष बाद सुनी जाये। मेरा किस्सा बहुत पुराना है, पर आज उसमें जान आई है और वह करोड़ों पिछड़ों आदिवासियों और दलितों की प्रेरणा का स्रोत बन गई है। सच पूछिए, तो मेरे लिए यह एक बहुत साधारण बात थी, मैं जानता था कि इसका संदेश दूरगामी है। अगर इस तरह की घटना अकेले मेरे साथ हुई होती, तो इसे एक बूढ़े, चिंतित आचार्य द्वारा अपनी असुरक्षा की भावना को दूर करने का प्रयत्न मान कर भुला दिया गया होता। लेकिन मेरे समय में यह आम बात थी। इतिहास के पास इतनी जगह नहीं होती कि वह एक-एक आदमी का किस्सा दर्ज करे वह सिर्फ उन्हीं घटनाओं और प्रवृत्तियों पर फोकस करता है, जिनसे मनुष्यता का भावी इतिहास कुछ सीख सके। मेरा किस्सा भी कुछ ऐसा ही है।

द्विजों के शोषक इतिहास को बेनकाब करने वाले एकलव्य की एक पेंटिंग

वैसे, मैं कोई मामूली आदमी नहीं था। मेरे पिता हिरण्यधनु निषादों के राजा थे। उनका राज्य, जो श्रृंगबेर के नाम से प्रसिद्ध था, बहुत दूर तक फैला हुआ था। अन्य राज्यों के बारे में जो सूचनाएँ हमारे पास आती थीं, उन पर हमें हँसी आ जाती थी। दूसरे राजा कितनी शान-शौकत के साथ रहते थे। बड़े-बड़े महलों में उनकी दर्जनों पत्नियाँ रहा करती थीं। प्रजा को डराने के लिए उनके पास एक बड़ी सेना होती थी। वे जिसे चाहे, उसने अपराध किया हो या नहीं, दंडित कर सकते थे। यह सब हमारी संस्कृति के बिलकुल विपरीत था।

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हम मानते थे कि राजा को प्रजा की तरह ही रहना चाहिए। इसीलिए हमारे पास कोई भवन नहीं था, न नौकर-नौकरानियों का जत्था। हम एक साधारण-सी झोपड़ी में रहते थे, जिसे मेरे दादा जी ने अपने हाथों से बनाया था। बरसात के दिनों में कुछ मरम्मत की जरूरत होती थी, तो मेरे पिता और माँ खुद जुट जाते थे। मैं भी सहयोग करता था। मुझे रस्सी बटने में महारत हासिल थी।

तब तक हम लोगों ने खेती की कला नहीं सीखी थी। हम फलों और कंदमूलों पर निर्भर रहते थे। सुना है, हमारे पूर्वज पेट भरने के लिए जानवरों का शिकार भी किया करते थे। यह मेरे जन्म लेने के करीब पचास साल पहले एक संत महाराज को बहुत अखरा। उन्हें लोग प्यार से बाबा कहते थे। सो बाबा ने एक दिन खूब बड़ी पंचायत बुला कर लोगों को संदेश दिया कि जैसे धरती माँ ने हमें पैदा किया है, वैसे ही उसने जानवरों को भी पैदा किया है। हमारा जीवन जितना मूल्यवान है, उतना ही  जानवरों का जीवन भी मूल्यवान है। इसलिए हमें उनकी हत्या नहीं करनी चाहिए। हत्या तो जानवरों को भी हमारी नहीं करनी चाहिए, पर धरती माँ ने उन्हें इतना बुद्धिमान नहीं बनाया है। ऐसा क्यों किया, यह हम नहीं जानते। जैसे हम यह नहीं जानते कि पेड़ों पर हमेशा फल क्यों नहीं लगते खास मौसम में ही क्यों लगते हैं, या दिन कैसे होता है और रात कैसे होती है। हम यह भी नहीं जानते कि आसमान में डूबने के बाद  सूरज कहाँ चला जाता है और एक रात बाद फिर कैसे आसमान में चमकने लगता है। हमारी जानकारी बहुत कम है, हो सकता है हमारे वंशज बहुत-सी नई चीजों का पता लगा लें। लेकिन अभी हम इतना तो जानते ही हैं कि जैसे कोई भेड़िया हम पर हमला करता है, तो हमें तकलीफ होती है, वैसे ही हम किसी भेड़िए पर बरछा फेंकते हैं, तो उसे भी तकलीफ होती होगी। हम कितने ही पशुओं को मरने के पहले तड़पते हुए देखते हैं। तो हम ऐसा कोई काम करें, जिससे किसी को तकलीफ हो? पेट भरने के लिए धरती माँ ने इतने पेड़-पौधे उगा रखे हैं। जमीन के अंदर भी खाने को बहुत कुछ मिल जाता है। इसलिए आप लोग अभी से जानवरों का शिकार करना बंद कर दें।

हरियाणा के गुड़गांव में एकलव्य के नाम पर बनाया गया एक मंदिर। इस मंदिर के अंदर एकलव्य की कोई प्रतिमा नहीं है बल्कि एक चबूतरा है। इसी तरह के चबूतरे और पिंडी बहुजनों-असुरों के पुरखों के प्रतीक स्वरूप देश के बड़े हिस्से में मिलते हैं

बाबा के इस व्याख्यान से बहुत बवाल हुआ। पंचायत दो हिस्सों में बँट गई। एक पक्ष जानवरों के शिकार पर रोक लगाना चाहता था, दूसरा पक्ष इसे जारी रखना चाहता था। बँटवारा लगभग आधे-आधे का था। दोनों पक्षों ने खूब तर्क-वितर्क किया। यह तीन दिनों तक लगातार चलता रहा। कहते हैं कि दोनों तरफ तर्क इतने प्रबल थे कि दूसरे पक्ष का तर्क सुन कर एक पक्ष के कुछ लोग दूसरे पक्ष में चले जाते थे और पहले पक्ष का तर्क सुन कर दूसरे पक्ष के लोग पहले पक्ष में। कुछ अपने मूल पक्ष में लौट भी जाते थे, क्योंकि दोनों पक्षों के पास अपने-अपने समर्थन में शक्तिशाली तर्क थे। चौथे दिन भी जब फैसला नहीं हुआ और लगा कि तर्क-वितर्क मार-पीट में बदल जाएगा, तब पंचायत को शांत करने के लिए बाबा ने कहा : तुम लोग मेरा गला घोंट दो, क्योंकि मेरे प्रस्ताव से ही पंचायत पहली बार दो पक्षों में बँट गई है। मैं नहीं रहूँगा, तो बहस का कोई कारण ही नहीं रह जाएगा।

बाबा की बात पूरी होते ही, पंचायत में सन्नाटा छा गया। सभी लोग बाबा को मानते थे, क्योंकि बाबा अपने लिए नहीं, सब के लिए जीते थे। खास तौर पर सांप का विष निकालने में वे बहुत कुशल थे। शरीर के जिस स्थान पर सांप ने काटा होता, वहां एक छेद कर उस आदमी का जहरीला खून चूस लेते थे। यह गंदा खून होता था। आदमी थोड़ी देर के लिए बेहोश हो जाता था। फिर उसमें जान आ जाती थी। एक बार तो एक सांप काटे आदमी का खून चूसने के बाद बाबा खुद बेहोश हो गए थे। शायद सांप का विष उनके शरीर में प्रवेश कर गया था। दो दिन बाद उन्हें होश आया। बहुत कमजोरी आ गई थी, लेकिन वे प्रसन्न थे, क्योंकि जिस आदमी को सांप ने काटा था, वह बच गया था। लेकिन इस  जोखिम के बाद भी उन्होंने सांप काटे का इलाज कभी नहीं छोड़ा। ऐसे बाबा को कौन छू सकता था?

तब सन्नाटे को चीरते हुए बाबा ने अपने थैले से एक छोटी-सी रस्सी निकाली और विरोधी पक्ष के एक ज्यादा बोलने वाले आदमी के पास गए। उससे बिना क्रोध के सहज ढंग से बोले : देखो, जब कोई मेरी बात ही नहीं मानता, तो मैं जी कर क्या करूँगा। जरूर मुझमें कोई दोष है। यह रस्सी पकड़ो और मेरे गले में लपेट कर मुझे किसी पेड़ की डाली से लटका दो। सारा झमेला खत्म हो जाएगा। यह सुनते ही वह आदमी कई फुट पीछे हो गया और बाबा से बोला : यह पाप मुझसे नहीं होगा। तब बाबा दूसरे आदमी की तरफ गये। उसकी प्रतिक्रिया भी ऐसी ही थी। तीसरा, चौथा, पांचवां, जिसके पास भी बाबा जाते, वह सिर नवा कर कुछ कदम पीछे हट जाता। तब सभी को संबोधित करते हुए बाबा बोले : जब मेरी जान लेने में तुम लोगों को इतनी मुश्किल हो रही है, तो तुम जानवरों की जान कैसे ले सकते हो? वे आदमी नहीं हैं, आदमी से कम हैं, लेकिन उनमें भी जान है, उन्हें भी हमारी-तुम्हारी तरह भूख-प्यास लगती है, सुख-दुख होता है। फिर वे हम से कमजोर भी हैं। जब हम बीस-तीस लोग शेर पर हमला करते हैं, तब वह भी भाग जाता हैं। ऐसे लोगों का शिकार करने में कौन-सी बहादुरी है?

वर्ष 2013 में भारत सरकार द्वारा एकलव्य की स्मृति में जारी डाक टिकट

बाबा की यह ललकार सुन कर दोनों पक्षों की बैठक हुई और थोड़े समय के बाद उन्होंने एक राय से फैसला किया कि आज से हम जानवरों का शिकार नहीं करेंगे। उन्हें भाई-बहन मानेंगे। लेकिन कोई जानवर हमारा शिकार करने आया, तो हम उसका कचूमर निकाल देंगे। यह सुन कर बाबा बहुत खुश हुए। बोले : अपनी रक्षा करने का अधिकार सभी को है, पर दूसरे की जान लेने का अधिकार किसी को नहीं है।

उसी समय से हमारे राज्य में जानवरों का शिकार बंद हो गया। लेकिन इससे एक बड़ा भारी नुकसान भी हुआ। दो-तीन पीढ़ियों के बाद हमारे पास हथियार नहीं रह गये। पहले हम तीर-धनुष, बरछे, तलवार, भाले आदि का खूब इस्तेमाल करते थे। पर चूंकि इन हथियारों की जरूरत ही नहीं रह गई थी, इसलिए हथियार बनाने का कौशल भी खत्म हो गया। हम पूर्णतः हथियारविहीन हो गए। हमारे पास सिर्फ लाठी रह गई थी। आत्म-रक्षा के लिए वह पर्याप्त थी।  

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तीन पीढ़ियों से यह व्यवस्था ठीक-ठाक चलती रही थी। पर एक शाम मैंने देखा कि मेरे पिता जी सुबक रहे हैं। मैंने कारण पूछा, तो उन्होंने मना कर दिया। बोले : तुम अभी बच्चे हो, तुम्हें क्या बताऊं। जाओ, खा-पी कर सो जाओ। लेकिन मुझे नींद नहीं आई। रात भर सोचता रहा कि क्या हुआ होगा, क्योंकि पिता जी को रोते हुए मैंने इसके पहले कभी नहीं देखा था। वे हमेशा खुश रहते थे। अगले दिन मैं घटना का पता लगाने में जुट गया। सभी की आंखें नम थीं, पर कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं था। अंत में एक बूढ़ी माता ने राज खोला : बेटा, किसी से इसकी चर्चा मत करना। आज नगर वाले हमारे यहाँ की एक जवान लड़की को पकड़ कर ले गए। पहले भी कभी-कभी ऐसा होता था, पर हम ज्यादा ध्यान नहीं देते थे। इस बार दो-दो दिन के अंतर से यह तीसरी घटना है। कहते-कहते बूढ़ी मां की आंखों में पानी आ गया और वे सुबकने लगीं।

यह बहुत गंभीर बात थी। पिता ने यह पता लगाने के लिए चारों तरफ जासूस भेजे कि इन पकड़ कर ले गए लड़कों-लड़कियों के साथ होता क्या है। जासूसों ने लौट कर बताया कि इनसे कड़ी मेहनत कराई जाती है और इन्हें खाना बहुत कम दिया जाता है। लड़कियों के साथ जबरदस्ती भी की जाती है। वे नहीं मानतीं, तो प्रहरियों से कह कर उनके हाथ-पांव बांध दिए जाते हैं और उन्हें पलंग पर लिटा कर उनके साथ मनमानी की जाती है। अन्य समय में लड़कियों से भी बहुत काम कराया जाता है। अब मेरी समझ में आया कि पिता क्यों सुबक रहे थे। हमारे पास सिर्फ लाठियाँ थी, उनके पास तरह-तरह के लोहे के हथियार थे। हम उन पर हमला कर दें, तो हमारी ही नुकसान होगा।

लड़के-लड़कियों को पकड़ कर जबरदस्ती ले जाने की घटनाएँ धीरे-धीरे बढ़ने लगीं, तो यह पूरे राज्य के लिए चिंताजनक बात हो गई। लोग आपस में चर्चा करते, फिर उदास हो कर अपनी-अपनी झोपड़ी में लौट जाते। किसी की समझ में नहीं आता था कि क्या किया जाए। एक दिन बहुत बड़ी पंचायत बुलाई गई और उसमें राजा यानी मेरे पिता को भी बुलाया गया। मैंने भी साथ चलने का हठ किया। पहले पिता जी ने मना किया, फिर ले जाने के लिए राजी हो गए।

पिता जी जब पंचायत में पहुँचे, तो एकदम सन्नाटा छा गया। सभी लोग पिता जी की ओर देख रहे थे। तभी एक अधेड़-सा आदमी खड़ा हुआ और    बोला : राजा जी,  हम वर्तमान स्थिति से बहुत दुखी और परेशान हैं। जब न तब हमारे आदमियों को पकड़ कर वे अपने यहाँ ले जाते हैं और खूब खटवाते हैं। हमारी लड़कियों के साथ मनमानी की जाती है। आप हमारे राजा हैं। यह आप का कर्तव्य है कि हमारे दुख-सुख के बारे में आप सोचें। लेकिन आप हमारी रक्षा करने में विफल रहे हैं। इसलिए हमारी पंचायत ने एक राय से यह फैसला किया है कि हमें अपना राजा बदल देना चाहिए। हम अपने में से किसी ऐसे व्यक्ति को राजा चुनेंगे जो हमारी रक्षा कर सके।

बिरसा मुंडा के उलगुलान से लेकर जय आदिवासी युवा शक्ति और भीलीस्तान विकास मोर्चा सहित अनेक संगठनों के लिए एकलव्य प्रतीक के रूप में

मेरे पिता ने कुछ क्षण के लिए सोचा और फिर सिर नवा कर बोले : हाँ, मैं अपराधी हूँ। मुझे खुद से ही राजा का पद छोड़ देना चाहिए था। आप लोग मेरी जगह किसी को भी राजा चुन लें, मुझे बहुत खुशी होगी।

इस पर पंचायत हक्का-बक्का रह गई। लोग आपस में बातें करने लगे। मैं लड़का ही था। मैं घूम-घूम कर लोगों की बात सुनने लगा। कोई कह रहा था : लेकिन चुनें तो किसे? जो भी राजा बनेगा, उसके सींग तो नहीं होंगे। फिर वह हमारी रक्षा कैसे करेगा? किसी की राय थी : इतना अच्छा आदमी हमारे बीच कौन है? एक बार मैं एक गड्ढे में गिर गया था। राजा जी ने मुझे इस हालत में देखा, तो वे खुद गड्ढे में कूद पड़े और मुझे निकाला। अगले दिन मैं कुछ फल ले कर उनके घर गया, तो उन्होंने नहीं लिया। बोले, यह तो मेरा कर्तव्य था। किसी का मत था : हमें माया-मोह में नहीं पड़ना चाहिए। इस राजा के अच्छा होने से क्या फायदा, अगर वह हमारे लड़के-लड़कियों को नहीं बचा सके। हमें किसी चतुर और शक्तिशाली व्यक्ति को नया राजा बनाना ही होगा।

उन लोगों की बातें सुन कर मैं बहुत सोच में पड़ गया। राजा होने से कोई विशेष सुख-सुविधा नहीं थी। हम भी औरों की तरह ही रहते थे। पर लोगों के बीच हमारे परिवार का सम्मान बहुत था। क्या यह सम्मान हम खो देंगे? क्या मेरे पिता पर दाग लगेगा कि वे श्रृंगबेर की जनता की रक्षा नहीं कर सके? राजा का पद खो देने के बाद हम लोगों से कैसे आंख मिलाएंगे? मेरा दिमाग तेजी से काम कर रहा था। अंत में मुझे एक रास्ता सूझा। मैंने सभा में अपनी पूरी ताकत से चिल्ला कर कहा : मुझे वर्तमान समस्या का एक समाधान सूझ रहा है। आप लोग मेरे पिता जी को थोड़ा समय दीजिए। उसके बाद भी रास्ता नहीं निकला, तो बेशक राजा बदल लीजिएगा।

मेरी बात सुन कर पंचायत को जैसे राहत-सी मिली। वास्तव में वे मेरे पिता जी को राजा के पद से हटना नहीं चाहते थे, पर कुछ लोगों ने उन्हें हटाने की जिद पकड़ ली थी। उनके कारण ही पंचायत बुलाई गई थी। थोड़ी देर तक सब की राय समझने-बूझने के बाद वही अधेड़ आदमी, जिसका जिक्र मैंने पहले किया है, उठा और मेरे पास आ कर बोला : एकलव्य, हम तुम पर विश्वास करते हैं। बचपन से ही तुम बहुत होशियार हो। हम तुम्हें तीन चाँद (पूर्णिमा से पूर्णिमा तक यानी तीन महीने) का समय देते हैं। इस अवधि में कोई नतीजा नहीं निकला, तो हम राजा बदलने के लिए बाध्य हो जाएँगे।

 

इसी के साथ पंचायत उठ गई और हम पिता-पुत्र अपनी झोपड़ी की तरफ चले। रास्ते में पिता जी ने मुझसे कुछ नहीं पूछा।

अगले दिन, मैं वहाँ गया, जहाँ वे एक पेड़ से नाशपाती तोड़ रहे थे। मुझे देख कर वे ठहर गए और मेरी ओर देखने लगे। मैंने कहा : आप सोच रहे होंगे, मैं क्या कर सकता हूँ। आप का संदेह सही है। लेकिन मुझे एक मौका दीजिए। मुझे पूरा विश्वास है कि मैं समाधान निकाल दूँगा।

पिता जी चुपचाप सुनते रहे। पर कुछ बोले नहीं। उनके चेहरे पर बस आश्चर्य और कुतूहल का भाव था।

मैंने पिता जी से कहा : एक बार घूमते-फिरते मैं शामली (बगल वाले) वन में चला गया था। मैंने देखा कि एक आदमी के हाथ से कोई लंबी-सी चीज सर्र करके निकली और सीधे पेड़ पर बैठे एक कबूतर को लगी। कबूतर घायल हो कर जमीन पर गिर पड़ा। उसे उठा कर वह आदमी चल दिया। मैं तभी से सोच रहा हूँ कि यह कौन-सी विद्या है। इतनी दूर से वह कबूतर को कैसे गिरा सका। आप मुझे अनुमति दें, तो मैं नगर की ओर जा कर पता लगाऊँ कि ऐसा कैसे हो सकता है,  क्या मैं भी ऐसा कर सकता हूं। अगर वह विद्या मैंने सीख ली, तो हम अपने राज्य के एक-एक आदमी को यह विद्या सिखा देंगे। उसके बाद किसी ने हमारे राज्य के किसी आदमी को छूने की कोशिश की, तो हम इसी तरह दूर से हमला कर उसे गिरा सकेंगे। बस निशाना सही होना चाहिए।

पिता के चेहरे पर थकी हुई-सी मुसकान उभरी। बोले : जाओ बेटा एकलव्य, माँ धरती तुम्हारी रक्षा करें, पिता आकाश तुम पर कृपा करें। नगर  में खर्च के लिए वे मुद्राएँ ढेर सारी ले लेना, जो हमारे जासूस बाहर जाते हैं, तब ले जाते हैं। कल तड़के ही निकल जाओ।

लेकिन मुझे यात्रा की तैयारी भी करनी थी। इसमें लगभग सात-आठ दिन   लग गये। मुख्य काम था उनकी भाषा सीखना, जिनके बीच मुझे जाना था। इसके लिए मैंने अपने जासूसों की सहायता ली। मैं लगातार उन्हीं के साथ उठता-बैठता रहा। जब मुझे विश्वास हो गया कि मैंने नगर की कामकाजी भाषा सीख ली है, तब मैं कुछ स्वर्ण मुद्राएँ ले कर रवाना हुआ।  

जहाँ तक श्रृंगबेर की सीमा थी, मैं एक गधे की पीठ पर गया। मेरे साथ मेरा छोटा भाई था। राज्य की सीमा पर मैं गधे की पीठ से उतर गया और छोटे भाई को प्यार से विदा किया। आगे शामली नामक एक बड़ा-सा जंगल था। वह एक तरह से हमारा रक्षक था, क्योंकि घना जंगल होने के कारण  उसे पार कर हमारे राज्य में आना कठिन था। मैंने उस जंगल को पार किया, तब तक शाम हो चुकी थी। मैंने एक झरने के किनारे अपने साथ लाए फल खाए और झरने का पानी पी कर वहीं एक पेड़ के नीचे सो गया। मौसम में ठंडक थी, इसलिए थकावट महसूस नहीं हो रही थी।

दूसरे दिन अरनी यात्रा मैंने फिर शुरू की और नगर की सीमा में प्रवेश कर गया। दिन का समय था, इसलिए नगर के दरवाजे खुले हुए थे। दोपहर तक इधर से उधर घूमता रहा और नगर को समझने की कोशिश करता रहा। जब शाम होने लगी, तो नगर के एक किनारे पहुँच कर आश्रय की तजवीज करने लगा। मैं किसी पांथशाला (सराय) में ठहर सकता था। पर वह खर्चीला पड़ेगा और लोग मुझ पर शक भी करेंगे,  यह सोच कर मैं किसी गृहस्थ का घर खोज रहा था। दो-तीन जगह ठुकराए जाने के बाद मुझे एक धोबी के घर में शरण मिली। मैंने उससे कहा कि यहाँ मैं अजनबी हूँ। मुझे कुछ दिन के लिए आश्रय दीजिए। बदले में एक स्वर्ण मुद्रा ले लीजिए। जरूरत पड़ने पर मैं आप का कुछ काम भी कर दिया करूँगा। वह राजी हो गया। उसके घर मैं पूरा एक चाँद (एक माह) रहा। उसी से मालूम हुआ कि जिस विद्या के बारे में मैं जानना चाहता था, वह धनुष-बाण  की विद्या थी। मुझे यह विद्या भा गई, क्योंकि इसके लिए किसी धातु की जरूरत नहीं थी। लकड़ी से ही काम चल जाएगा।

इक्कीसवीं सदी में भी झारखंड, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, मध्यप्रदेश, उड़ीसा और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में आदिवासी अपने पारंपरिक अस्त्र तीर-धनुष का इस्तेमाल करते हैं। उनके लिए यह संघर्ष का प्रतीक भी है

अब नगर भर में घूम कर मैं पता लगाने लगा कि बाण-धनुष की विद्या मुझे कौन सिखा सकता है। यह देख कर मैं सन्न रह गया कि साधारण नागरिक बाण-धनुष चलाना नहीं जानते थे। यह काम राजकुमारों का था। समाज कई जातियों में बँटा हुआ था। इनमें सिर्फ क्षत्रियों को सेना में दाखिल किया जाता था। इनके सैन्य प्रशिक्षण के लिए कई लोग नियुक्त थे। द्रोणाचार्य नाम के कोई बुजुर्ग सज्जन राजकुमारों को धनुष-बाण तथा युद्ध के अन्य हथियारों की शिक्षा देते थे। मैं भी अपने राज्य का राजकुमार था, इसलिए मुझे उम्मीद हुई कि वे मुझे बाण चलाने की शिक्षा आसानी से दे देंगे। यही उम्मीद ले कर मैं उनके घर गया। लेकिन मुझे निराशा हुई कि वे सब से नहीं मिलते। परिचय जान कर मिलते हैं। मैंने द्वारपाल से आग्रह किया कि उन्हें जा कर बताओ कि मैं निषादराज का बेटा हूँ और उनसे मिलने के लिए बहुत दूर से आया हूँ। द्वारपाल मेरी वेदना से पिघल गया। वह भवन के भीतर चला गया, लेकिन जब लौटा तो उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं। बोला :  मित्र, तुम्हारे कारण मुझे डाँट पड़ गई। आचार्य ने कहा कि वे तुम से किसी भी तरह नहीं मिल सकते। यह समय उनके आराम का है। इसमें किसी प्रकार का विघ्न उन्हें सह्य नहीं है। मैं अपना-सा मुँह ले कर लौट आया।

इसके बाद कई दिनों तक अलग-अलग समय में मैं अपनी किस्मत आजमाता रहा कभी सुबह, कभी देर शाम, कभी रात को, लेकिन द्रोणाचार्य मुझसे मिलने को तैयार नहीं हुए। मेरी निराशा घनीभूत होती जा रही थी, लेकिन मेरे मन में आचार्य के प्रति प्रशंसा भाव भी पैदा हो रहा था कि यह आचार्य कितना सिद्धांतनिष्ठ है। कोई कितनी ही बार आए, वह नहीं मिल सकते तो नहीं मिल सकते। तब मेरे मन में विचार आया कि आचार्य जिस मैदान में राजकुमारों को शस्त्रास्त्र की शिक्षा देते हैं, वहीं उनसे मिल लूँ। बातचीत नहीं भी हुई, तो कम से कम अपने समय के शस्त्र विद्या के सब से बड़े आचार्य के दर्शन तो हो ही जायेंगे। मन ही मन मैं उन्हें अपना गुरु मानने लगा।

मार्च, 2018 में नई दिल्ली में आयोजित थियेटर आेलंपिक के दौरान एकलव्य नाटक की प्रस्तुति की गयी। इस दृश्य में द्रोणाचार्य एकलव्य से उनका अंगुठा मांग रहा है

अगले दिन मैं उस मैदान में पहुँच गया, जहाँ राजकुमारों को शस्त्रास्त्र की शिक्षा दी जाती थी। द्रोणाचार्य से मैं मिल तो नहीं पाया था, पर द्वारपाल ने मेरे बार-बार अनुरोध करने पर उसने मुझे उनका एक बड़ा-सा रेखाचित्र दिखा दिया था। चित्र में वे एक बड़े-से रथ में बैठे हुए थे। उसी के आधार पर मैंने द्रोणाचार्य को पहचान लिया। वे एक घने पेड़ की छाया में पत्तों पर बैठे थे, बगल में खड़ा एक सेवक पंखा झल रहा था, और उनके तमाम राजकुमार शिष्य बाण चलाने का अभ्यास कर रहे थे। वे करीब बीस-पच्चीस थे। कोई किसी पेड़ के खास निशान को लक्ष्य कर बाण चला रहा था, तो कोई पेड़ों पर बैठे पक्षियों पर निशाना साध रहा था। कुछ के बाण निशाने पर लगते थे, कुछ के नहीं। एक बार आचार्य खुद उठ कर एक राजकुमार के पास गए और उसका धनुष अपने हाथ में पकड़ कर उसे बताया कि निशाने पर बाण ऐसे चलाते हैं। दो बार विफल होने के बाद तीसरी बार राजकुमार ने सही निशाना साधा। इस पर आचार्य बहुत प्रसन्न हुए और उसकी पीठ थपथपा कर अपनी जगह लौट आए। इस दृश्य ने मुझे बहुत प्रभावित किया। मैंने निश्चय कर लिया, द्रोणाचार्य ही मेरे गुरु हैं और मैं उन्हीं से बाण चलाना सीखूँगा। बची हुई सारी स्वर्ण मुद्राएँ दक्षिणा के रूप में उन्हें दे दूँगा और घर लौट जाऊँगा।

आचार्य के थोड़ा निकट गया, तो उनकी भव्य आकृति देख कर मैं भावनाओं में बहने लगा। आचार्य वृद्ध हो गए थे, पर उनके चेहरे पर एक ज्ञान और विद्वत्ता की चमक थी। सिर के बाल आधे गिर चुके थे,  पर उनकी लंबी सफेद दाढ़ी उनकी आकृति को एक अद्भुत भव्यता प्रदान कर रही थी। उनका शरीर ताँबई था, पर उनके पैर मटमैले थे। मैं लपक कर सीधे उनके पैरों पर गिर पड़ा। आचार्य ने मुझे अपने सधे हुए हाथों से उठाया और बोले : तुम कौन हो? मेरे पास किसलिए आए हो? तुम यहाँ के आदमी तो नहीं लगते। पर तुम्हारे व्यक्तित्व में नम्रता की आभा बता रही है कि तुम साधारण आदमी नहीं हो।

मेरे दोनों हाथ प्रणाम की मुद्रा में जुड़ गए। मैंने उनके पाँवों के नीचे की मिट्टी से कुछ धूल उठाई और अपने ललाट पर लगा ली। फिर हाथ जोड़ कर मैंने  कहा : आचार्यप्रवर, मैं पड़ोस के श्रृंगबेर राज्य का राजकुमार हूँ। मैंने आप का यश बहुत सुना है। मैंने मन ही मन आप को गुरु मान लिया है। मेरा विनम्र निवेदन है कि आप मुझे बाण चलाने की शिक्षा दें।      

यह सुनते ही द्रोणाचार्य की भृकुटि तन गई। वे तनिक आवेश में बोले : तुम ने मेरा स्पर्श कर अच्छा नहीं किया। अब मुझे स्नान करना होगा। तब तक मैं किसी राजकुमार को भी नहीं छू सकता। निषादों को हम म्लेच्छ मानते हैं। उनके राज्य को भी हेय दृष्टि से देखते हैं। सुना है, वे अधनंगे रहते हैं और फल-फूल खा कर जीवन बिताते हैं। ऐसे नीच स्थान से आए हुए युवक को मैं कोई शिक्षा नहीं दे सकता। तुम शीघ्र ही अपने वन में लौट जाओ।

मैंने बहुत प्रार्थना की, तरह-तरह से निवेदन किया, पर बार-बार उनका एक ही जवाब होता : किसी म्लेच्छ को मैं अपना शिष्य नहीं बना सकता। यह मेरे लिए अधर्म होगा। यह बार-बार सुन कर मेरी आँखों से आँसू टपक पड़े। तब भी उन्होंने मेरी नहीं सुनी। अंत में हताश हो कर एक बार फिर उनके पाँवों के नीचे की मिट्टी उठाई और अपने ललाट पर लगाते हुए बोला : आचार्यप्रवर, आप भले ही मुझे शिष्य नहीं बना सकते, पर मैं अपना गुरु नहीं बदल सकता। आप की भव्य छवि ही मेरा सहारा बनेगी और एक दिन मैं दुनिया के सब से बड़े धनुर्धर के रूप में आप के पैरों की धूल लेने आऊँगा।

आचार्य ने क्षण भर के लिए मुझे गौर से देखा, फिर पंखा झल रहे सेवक से कहा : सारथी से कहो, रथ यहाँ लाए। राजकुमारों से कहो कि आज की शिक्षा का समापन यहीं होता है। मैं अपने महल जा रहा हूँ। वे चाहें तो यहाँ अभ्यास कर सकते हैं।

मैं हताश हो कर उस धोबी के घर लौट आया, जहाँ मैं ठहरा था। मेरे आँसू अभी भी मेरे गालों पर ठहरे हुए थे। मुझ पर नजर पड़ते ही धोबी की मझली बेटी, जो अत्यंत सुंदर थी, एक बर्तन में पानी लाई और मुझे पकड़ा दिया। मैंने हाथ-मुँह धोया और अपने कमरे में जा कर बिस्तर पर लेट गया। मेरा दिमाग फट रहा था। हृदय में आग लगी हुई थी। हाथ-पाँव काँप रहे थे। आचार्य की एक ही बात मेरे अस्तित्व में गूँज रही थी : तुम म्लेच्छ हो, इसलिए मैं तुम्हें अपना शिष्य नहीं बना सकता। मैं म्लेच्छ। मैं अछूत। मैं जंगली। यह  इनकी कैसी सभ्यता है। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ हैं, बाजारों में तरह-तरह का सामान है, पांथशालाओं में मांस और मद्य की नदी बहती है, लोग एक-दूसरे को आर्य कहते हैं, महिलाओं को सम्मान के साथ आर्या कहा जाता है, पर उनके जैसे ही एक आदमी के लिए इनके मन में इतनी घृणा है। एक दिन यह घृणा ही इन्हें ले डूबेगी। द्रोणाचार्य से तो यह धोबी ही बेहतर है जिसने मुझसे कुछ नहीं पूछा और एक असहाय अजनबी के रूप में मुझे शरण दी। मुँह से ये शब्द निकलते ही मुझे असीम दुख हुआ। मैंने आचार्य का अनादर किया है। मन ही मन उनसे क्षमा माँगते हुए कहा : गुरुवर, आप के आचरण से मुझे बहुत क्लेश पहुँचा है। लेकिन सपने में भी मैं आप का अपमान नहीं कर सकता। कल सूर्य निकलते ही मैं यह नगर छोड़ दूँगा। अब आप की भव्य स्मृति ही मेरे लिए गुरु का काम करेगी। कुछ सीख सकूँगा, तो आप  का ही गुणज्ञान होगा। अगर मैं विफल रहा, तो किसी नदी में जा कर डूब मरूँगा।

निषाद समुदाय से आने वाली भूतपूर्व सांसद फूलन देवी ने 1990 के दशक में किया था एकलव्य सेना का गठन

अगले दिन अल्पाहार के बाद मैंने विजयंत से, धोबी का यही नाम था,  से कहा कि मेरा उद्देश्य पूरा हो गया है, अब मुझे अनुमति दीजिए। विजयंत आश्चर्य में डूब गया। आग्रह करने लगा कि अभी कुछ दिन और ठहरिए। नगर की शोभा देखिए। मैंने जवाब दिया कि अब मैं एक दिन भी नहीं रुक सकता, क्योंकि करने के लिए मेरे पास बहुत काम है। तभी उसकी मझली बेटी रोती हुई वहाँ आई और मेरे पैर पकड़ कर मिट्टी के फर्श पर बैठ गई। तब तक धोबिन भी वहाँ आ गई। धोबी ने तृष्णा के साथ मेरी ओर देखा और कहा : महोदय एकलव्य,  इसी कारण मैं आप से रुकने को कह रहा था। मेरी बेटी कादंबरी को आप से प्रेम हो गया है, वह आप से परिणय बंधन में बँधना चाहती है। मैं भी आप के बात-व्यवहार को गौर से देख रहा था। आप बहुत ही शिष्ट और सज्जन हैं। आप के सारे लक्षण राजकुमारों जैसे हैं। कृपया मेरी बात मत टालिए। कादंबरी आप के साथ सुखी रहेगी और आप के जीवन को भी सुखमय बनाएगी।

  संकोच के मारे मेरी आँखें जमीन में धँस गईं। कादंबरी को मैंने इस दृष्टि से कभी देखा ही नहीं था। वह सुंदर थी। बहुत ही शिष्ट थी। जितनी देर भी मैं यहाँ रहता, वह जरूर किसी न किसी बहाने से मेरे पास आ जाती थी और सिर झुका कर पूछती थी, कुछ चाहिए तो नहीं? मैं ही मूर्ख था जो उसकी भावना को समझ नहीं सका। अगर उसके मंतव्य का आभास भी मुझे हो जाता,  तो मैं उसे समझा सकता था कि हमारे बीच परिणय संभव नहीं है। लेकिन अब तो मेरे सामने उसका पूरा परिवार था। क्या जवाब दूँ। फिर भी मैंने विनम्रता से कहा : देखिए श्रीमान जी, आप जानते ही हैं,  मैं दूसरे राज्य से हूँ। यहाँ जैसी सुख-सुविधाएँ वहाँ नहीं मिलेंगी। हमारा जीवन बहुत सादा है। हम फलों और कंदमूलों पर निर्भर रहते हैं। आप की बेटी इन कठिनाइयों के बीच नहीं रह सकेगी। हमारे यहाँ विवाह करने के लिए माता-पिता की स्वीकृति नहीं लेनी पड़ती, लेकिन मेरे पिता वहाँ के राजा हैं और मैं राजकुमार हूँ। इसलिए हमारा जीवन व्यक्तिगत जीवन नहीं है, वह सार्वजनिक जीवन है। अतः विवाह जैसे बड़े निर्णय के लिए मुझे अपने माता-पिता से तो बात करनी ही होगी। लेकिन मुख्य बात यह नहीं है।  अगर मैंने स्वेच्छा से आप की कन्या से विवाह कर लिया, तो मैं अपने राज्य में किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहेगा। वह सुंदर और शीलवान है। उसे यहाँ मुझसे कहीं बेहतर पात्र मिल जाएँगे। मेरी समस्या यह है कि हमारे राज्य पर एक बहुत बड़ा संकट है और मैं उस संकट का समाधान खोजने निकला हूँ। अगर मैंने विवाह कर लिया, तो वह काम संभवतः नहीं हो पाएगा। कादंबरी पर भी आरोप लगेगा। आप लोग कृपया मुझे क्षमा करें और जाने दें।

यह सुन कर कमरे में मायूसी छा गई। मेरे पैरों पर कादंबरी की पकड़ और मजबूत हो गई। धोबिन की, उसका नाम मुझे पता नहीं था, आँखें गीली हो आईं। लेकिन धोबी ने मेरी कठिनाई समझ ली थी। उसने गंभीर आवाज में   कहा : बेटा एकलव्य, तुम्हारी परिस्थिति मैं समझ रहा हूँ। तुम जा सकते हो। कादंबरी को मैं समझा दूँगा।

जब मैं विजयंत के घर से चला, तो कपड़े की  छोटी-छोटी कई पोटलियों में खाने की तमाम चीजें मुझे भेंट की गई। कादंबरी मेरे लिए लकड़ी के जूते ले आई। विदाई के समय मैं एक और स्वर्ण मुद्रा विजयंत के हाथ में पकड़ाने लगा, तो उसने हाथ पीछे कर लिया। बोला : मुझे पहले वाली स्वर्ण मुद्रा लेने पर ही ग्लानि है। आप हमारे अतिथि थे और अतिथि के साथ पैसे-कौड़ी का व्यवहार नहीं होता। अब मुझे और मत गिराइए। कभी इधर आइएगा, तो हमारे घर ही ठहरिएगा।

इस तरह मेरी विदाई बहुत ही व्यथित वातावरण में हुई। चलते समय वह स्वर्ण मुद्रा मैंने धोबिन के आँचल में डाल दी और कहा : कादंबरी से कहिएगा, इससे वह अपने परिणय के समय कपड़े और गहने खरीद लेगी। अपने आँसुओं को छिपाते हुए मैं चल पड़ा। मैंने सिर्फ एक बार पीछे देखा : परिवार के सभी व्यक्ति जैसे उसी मुद्रा में ठहर गए थे जिस मुद्रा में मैंने उन्हें छोड़ा था। सिर्फ कादंबरी वहाँ नहीं थी।

द्रोणाचार्य ने मुझे निराश किया था। पर मैं अपने आप को कैसे निराश कर सकता था?  नगर से बाहर निकलने के पहले मैं एक दुकान में गया, जहाँ तरह-तरह के शस्त्रास्त्र बिक रहे थे। मुझे किसी भी अन्य शस्त्र या अस्त्र से मतलब नहीं था। मुझे सिर्फ धनुष-बाण चाहिए थे। मैंने कई आकार-प्रकार के धनुष और उनसे मेल खाते हुए बाण खरीदे। व्यापारी थोड़ा चकित था। जब मैं अपनी पसंद की सामग्री ले कर दुकान से चलने लगा, तो मुझे पीछे से आती आवाज सुनाई दी लगता है, दूसरा अर्जुन बनेगा। तब तक मैंने अर्जुन का नाम नहीं सुना था। रास्ते में कई लोगों से पूछने पर पता लगा कि अर्जुन युधिष्ठिर और भीम के बाद पांडु की तीसरी संतान है और द्रोणाचार्य का प्रिय शिष्य है। वह बहुत बड़ा धनुर्धर है और अपने बाण से उड़ती चिड़िया को भी गिरा सकता है। मैंने अपने आप से कहा :  मुझे न तो दूसरा अर्जुन बनना है और न दूसरा द्रोणाचार्य। ये सभ्य लोग है, उनसे मेरा क्या मुकाबला। मैं अपने राज्य के सीधे-साधे, भोले-भाले लोगों के लिए कुछ कर सकूँ, यही मेरे लिए बहुत है।

मैंने नगर की सीमा पार कर ली थी और अब मैं शामली नाम के  जंगल में प्रवेश कर रहा था, जो नगर और हमारे राज्य के बीच पड़ता था। मैंने सोचा कि बिना कोई निदान निकाले मैं अपने राज्य में कैसे लौट सकता हूँ। मुझे इसी जंगल में कुछ दिन रहना चाहिए और बाण चलाने का अभ्यास करना चाहिए। इस विद्या में पूरी तरह से निष्णात हो कर ही मुझे अपने राज्य में वापस जाना चाहिए, ताकि हमारे प्रत्येक जन यह कला सीख लें और आत्मरक्षा कर सकें। हमारे इलाके से लड़के-लड़कियों को चुरा कर ले जाने वाले किसी भी दुष्ट की पीठ में हमारा एक भी बाण धँसेगा, तो वह बिलबिला कर वहीं गिर पड़ेगा।     

जंगल में चलते-चलते मुझे एक खँडहर दिखाई दिया। शायद वहाँ कोई मंदिर या महल रहा होगा, जो अब खँडहर बन गया था। खँडहर  की ओर बढ़ने पर मुझे किसी देवता की पत्थर की टूटी-फूटी मूर्ति मिली। देवता का मुँह बहुत सुंदर नहीं था। वह भैंसे के सिर की तरह दिखता था। उसके एक ही सींग था, दूसरे सींग का कहीं अता-पता नहीं था। कहीं ये महिषासुर तो नहीं हैं, जिनका जिक्र हमारे किस्से-कहानियों में बहुत आता है?  कुछ लोग उन्हें भैंसासुर भी कहते हैं। अचानक वह स्थान मुझे बहुत पवित्र लगने लगा। मैंने उसी खँडहर को अपनी निवास बनाने का निर्णय किया। फिर समस्या आई गुरु की। गुरु के बिना कोई कैसे कुछ सीख सकता है? पास ही एक छोटा-सा तालाब था। वहाँ से पानी और  गीली मिट्टी ले कर मैंने द्रोणाचार्य की बड़ी-सी मूर्ति बनाई। मूर्ति बनाना मुझे नहीं आता, इसलिए मूर्ति बहुत भोंडी बनी। मुखाकृति भी ठीक-ठीक गुरुवर की नहीं लगती थी। हाँ, उनकी लंबी दाढ़ी से कुछ मिलान जरूर था। लेकिन मुझे मूर्तिकार थोड़े बनना था। मुझे तो धनुर्धर बनाना था। गुरु का स्मरण करने के लिए यह अनगढ़ मूर्ति बहुत थी।

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जिस दिन मूर्ति पूरी हुई, मैं थक गया था। उस दिन मैं जम कर सोया। कुछ फल का भी प्रबंध नहीं किया,  बस तालाब का पानी भरपेट पी कर सो गया था। अगले दिन सुबह से मेरा अभ्यास शुरू हुआ। गुरुवर द्रोणाचार्य को प्रणाम कर मैंने धनुष उठाया और सामने वाले पेड़ पर लटक रहे एक बड़े-से फल पर निशाना साधा। फल को कुछ नहीं हुआ, बाण पता नहीं कहाँ जा कर गिरा। दूसरा बाण, तीसरा बाण,  चौथा बाण, सभी इसी तरह बेकार गए। मैं निराश होने लगा। फिर गुरुदेव को स्मरण कर मैंने पाँचवाँ बाण खूब सँभल कर चलाया। इतने जोर से कि बाण के छूटने ही धनुष ही टूट गया। लेकिन मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब वह ठीक उसी फल पर लगा और फल नीचे गिर पड़ा। मैं पेड़ के नजदीक गया। मुझे भूख भी लग रही थी। मैंने फल को चखा, थोड़ी-सी कड़वाहट लिए हुए मीठा था। उसके बाद बाण चला कर उसी पेड़ से एक और फल गिराया। दोनों बड़े-बड़े फल खा कर मैं पास के जलाशय में गया। पानी कुछ गरम था। मैंने थोड़ा-सा पानी पिया। फिर अपने सारे बाण वापस चुन कर अपने खँडहर वाले निवास पर आ गया। खँडहर बहुत बड़ा था। हो सकता है, किसी राजा का भवन रहा हो। दो-तीन कमरे ठीक-ठाक बचे हुए थे, हालाँकि उनकी छत जहाँ-तहाँ से थोड़ी टूटी हुई थी। उन्हीं में से एक को मैंने अपना घर बनाया था। उसी खँडहर में मुझे मिट्टी का एक साबुत घड़ा भी मिल गया। इससे पानी को जमा करने की समस्या हल हो गई। उसके पहले जब भी प्यास लगती थी, मुझे तालाब के पास जाना पड़ता था।

अगले दिन से अभ्यास का सिलसिला शुरू हो गया। मैं तरह-तरह से बाण चलाता। तरह-तरह की चीजों को निशाना बनाता। मेरा निशाना धीरे-धीरे अचूक होता गया। अब एक भी बाण व्यर्थ नहीं जाता था। लेकिन अभी तक मैंने पेड़ पर बैठे या आकाश में उड़ते हुए पक्षियों पर निशाना नहीं साधा था। असल में मैं किसी पक्षी की हत्या करना नहीं चाहता था। तब मेरे मन में यह बात आई कि निशाना ऐसा होना चाहिए कि बाण पक्षी को बस छू कर निकल जाए और पक्षी दहशत के मारे जमीन पर आ गिरे।

बुंदेलखंड के चौका-सोरा गांव में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित भैंसासुर स्मारक मंदिर। इस मंदिर में भैंसासुर के प्रतीक के रूप में एक चबूतरा है

यह बहुत कठिन काम था, क्योंकि जब तक बाण उड़ते हुए पक्षी की जगह पर पहुँचता, वह उड़ कर आगे जा चुका होता था। तब मैंने हिसाब लगाना शुरू किया कि पक्षी की गति को देखते हुए बाण किस बिंदु पर फेंकूँ कि वह पक्षी को बस छू कर गुजरे। पहले दिन मेरे सारे बाण व्यर्थ गए। लेकिन अगले दिन पहला ही बाण एकदम एक पक्षी को छू कर गुजरा। पक्षी जमीन पर गिरने लगा। मैं दौड़ कर उसकी तरफ गया। मैंने पक्षी को हाथ में उठा कर देखाउसे बिलकुल चोट नहीं लगी थी, सिर्फ एक पर में हलकी-सी खरोंच लगी थी। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। जैसे ही मैंने हाथ ढीला किया, पक्षी उड़ कर आसमान की ओर भागा। बाण भी पास में ही गिरा हुआ था। मैंने उसे उठा लिया और वापस आ गया। मेरे पास कोई और काम तो था नहीं। भूख मिटाने के लिए कुछ फल खा लेता था और प्यास बुझाने के लिए तालाब का पानी तो था ही। एक बड़े-से पत्थर पर घासफूस बिछा कर मैंने नरम-सा पलंग बना लिया था। तकिए का इस्तेमाल हम नहीं करते थे। इसलिए उसकी कोई जरूरत नहीं थी। वसंत का मौसम था। इसलिए दिन भर अभ्यास करते रहने पर भी मैं थकता नहीं था। धीरे-धीरे मेरा आत्मविश्वास काफी बढ़ गया और मैं अपने राज्य में लौटने की सोचने लगा।

तभी एक विचित्र घटना हुई।

दोपहर हो गई थी। हवा में ताप था। मैं बाण चलाने का अभ्यास कर रहा था। पता नहीं किस दिशा से एक हृष्ट-पुष्ट कुत्ता आया और भौंकने लगा। शामली में बहुत-से पशु थे, जैसे हिरण, मोर, सियार, लोमड़ी, बारहसिंगा, नीलगाय आदि, लेकिन कुत्ता मैंने कभी नहीं देखा था। तो यह कुत्ता कहाँ से आ गया? वह लगातार भौंके जा रहा था। मैंने देखा कि उसके गले में चमड़े का एक पट्टा भी बँधा हुआ था। इसका मतलब यह था कि वह जंगली कुत्ता नहीं है। कोई उसका स्वामी है। उसके लगातार भौंकते जाने से मुझे बहुत परेशानी हो रही थी। मेरा अभ्यास रुक गया था। तब मैंने एक तरकीब सोची। छोटे-छोटे बाण बनाए, और ध्यान दिया कि उनमें से किसी में भी नुकीलापन न हो। मैंने नौ-दस बाण कुत्ते के मुँह में मारे। दो बाण निशाने पर नहीं लगे। बाकी बाणों से उसका मुँह भर गया। अब वह भौंक नहीं पा रहा था। कुछ देर तक वह मुझे आश्चर्य और आक्रोश की मुद्रा में देखता रहा, फिर जिधर से आया था, उधर ही लौट गया। मैं अपने अभ्यास में लग गया।

थोड़ी देर बाद मैंने जो देखा, वैसा आश्चर्य मेरे जीवन में दुबारा नहीं घटा। मेरे सामने साक्षात द्रोणाचार्य थे। उनके साथ पाँच युवक भी थे, जो राजकुमार की तरह लग रहे थे। कुत्ता ही उन्हें यहाँ तक ले आया होगा। मेरी श्रद्धा में ज्वार आ गया। मैं तत्काल गुरुदेव के चरणों में गिर गया और उनके पाँव के नीचे की मिट्टी अपने ललाट पर मल ली। द्रोणाचार्य ने मुझे अपने हाथों से पकड़ कर खड़ा किया और पूछा : वत्स, इस कुत्ते के मुँह में तुम ने ही बाण मारे हैं? हाँ में सिर हिला कर मैं कुत्ते के पास गया और उसके मुँह से सारे बाण निकाल लिए। कुत्ता अब शांत था तथा मुझे स्नेह-भरी नजरों से देख रहा था। मैंने उसके मुँह के भीतरी हिस्से में उँगलियां डाल कर देखा कि कहीं चोट तो नहीं लगी है। मुँह में कहीं भी चोट के निशान नहीं थे, न कहीं से खून बह रहा था।

आचार्य का चेहरा आश्चर्य में डूबा हुआ था। उन्होंने कुछ बाण, जो कुत्ते के मुँह से निकाले गए थे,  मुझसे लिए और उनकी जाँच करने लगे।  फिर मुझसे पूछा : तुम्हारा नाम क्या है? यह विद्या तुम ने किससे सीखी? तुम्हारे गुरु कौन हैं?

मैंने विनम्रता से कहा : मेरा नाम एकलव्य है। आइए, मैं अपने गुरु के दर्शन कराता हूँ।

वे सब मेरे पीछे-पीछे आए जहाँ मेरे गुरु की मिट्टी की मूर्ति थी। मैंने नम्रता से कहा : यही मेरे गुरु हैं। वे लोग मूर्ति को गौर से देख रहे थे, पर उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था। तभी एक युवक ने मानो चौंक कर कहा : गुरुदेव, यह आप की ही मूर्ति है। बड़े-बड़े कानों को देखिए। दाढ़ी तो बिलकुल आप के जैसी है।

आचार्य : अर्जुन, तुम शायद ठीक कह रहे हो।

मैंने और अधिक विनम्रता से कहा : आचार्य, यह आप की ही मूर्ति है। मैंने ही बनाई है। मैंने मूर्ति बनाना सीखा नहीं है, इसलिए बस जैसी-तैसी बना दी। इसके लिए मुझे क्षमा कीजिएगा। इस मूर्ति में आप को साक्षात स्थापित मान कर मैं आप से ही प्रेरणा ले कर बाण चलाने का अभ्यास करता हूँ।

पीछे से एक राजकुमार की आवाज आई : अर्जुन, अब तुम्हारा क्या होगा? तुम तो सात जन्म में भी इतनी सूक्ष्मता से बाण नहीं मार सकते।

जिसे संबोधित किया गया था, वह बड़े उदास स्वर में बोला :  दुर्योधन, मैं कुछ नहीं जानता। यह आचार्यप्रवर ही कहा करते थे कि मैं तुम्हें दुनिया का सब से बड़ा धनुर्धर बनाना चाहता हूँ। मुझे बाएँ हाथ से बाण चलाना तो उन्होंने सिखा दिया है, पर इस करतब को देख कर मेरा मन बुझ गया है। लगता है, मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है।

दुर्योधन ने हँसते हुए कहा :  महोदय, आप जिंदगी भर सीखते ही रहेंगे। जितना हम जानते हैं, दुनिया उससे बहुत बड़ी है।   

आचार्य ने हाथ के संकेत से सब को चुप रहने को कहा। फिर मुझे गंभीर आवाज में संबोधित किया : एकलव्य, तुम सचमुच अपने को मेरा शिष्य मानते हो?

मैंने उत्तर दिया : आचार्य को संदेह क्यों हो रहा है? आप ही मेरे गुरु हैं, मेरे आचार्य हैं। आप की ही प्रेरणा से मैं बाण चलाना थोड़ा-बहुत सीख पाया हूँ। सघन वन के इस एकांत में और कोई  नहीं रहता बस आप और मैं।  

द्रोणाचार्य ने मुझ पर एक नजर डाल कर कहा :  वत्स, अब तुम सिद्ध धनुर्धर हो गए हो। अर्जुन को मैं दुनिया का सब से श्रेष्ठ धनुर्धर मानता था। पर तुम्हारे आगे वह कुछ नहीं है। सच तो यह है कि तुमने जिस तरह बाणों से  श्वान का मुँह भर दिया था, वैसा मैं भी नहीं कर सकता। तुम मुझसे भी आगे निकल गए हो। अब इस बीहड़ में कुछ नहीं रखा है। तुम अपने राज्य में लौट जाओ।

मैंने सिर झुका कर कहा : जैसी आप की आज्ञा। मैं कल सुबह ही यह स्थान छोड़ दूँगा।

आचार्य मुस्कराए : गुरुदक्षिणा दिए बगैर?

सिर से पैर तक मुझ पर उत्फुल्लता छा गई। यही तो मैं चाहता था। गुरुदक्षिणा तो देनी ही चाहिए। बल्कि यह प्रस्ताव मुझे ही करना चाहिए था। आचार्य को स्वयं बोलना पड़ा, यह मेरे लिए कितनी लज्जा की बात है।

मैंने हाथ जोड़ कर क्षमा माँगते हुए कहा : आचार्य, यहाँ मैं क्या दे सकता हूँ? यहाँ है ही क्या मेरे पास –  आप की अनगढ़ मूर्ति,  मैं,  यह खँडहर, कुछ बाण-धनुष, बस। आप हमारे राज्य में चलें, वहाँ आप के हर आदेश का पालन होगा।

द्रोणाचार्य ने शांत मुद्रा में जवाब दिया : तुम्हारे राज्य में जाने का समय अभी मेरे पास नहीं है। कभी संभव हुआ तो अवश्य जाऊँगा। लेकिन तुम्हारा यह कहना सही नहीं है कि तुम्हारे पास कुछ नहीं है। एक बहुमूल्य चीज है तुम्हारे पास। गुरुदक्षिणा के रूप में उसे दे सकते हो।

मैं चकित। मेरे पास क्या है? अँगूठी तक तो मैं पहनता नहीं। जिज्ञासा के साथ मैंने कहा : आचार्य जो भी कहेंगे, अगले ही क्षण वह आप के हाथ में होगा। लेकिन गुरुवर, मेरे पास है क्या?

द्रोणाचार्य कुछ गंभीर हुए। बोले : बताऊँ?  ना तो नहीं करोगे?

आचार्य की पहेली मेरी समझ में नहीं आ रही थी। मैंने विनीत स्वर में कहा : आचार्य संकोच न करें। आप को जो भी चीज चाहिए, निःसंकोच बता दें। मेरे लिए कुछ भी अदेय नहीं है। कृपा करके बताएँ,  आप को क्या चाहिए।

आचार्य ने पहले से कुछ अधिक गंभीर स्वर में कहा : मुझे तुम्हारे दाहिने हाथ का अँगूठा चाहिए। दे सकोगे?

मुझे लगा जैसे मुझ पर बिजली गिरी हो। मेरा पूरा अस्तित्व अंधकार में डूब गया। यह क्या। यह अँगूठा ही तो मेरा जीवन है। उसके बिना मैं क्या कर पाऊँगा? फिर मैंने अपने के स्थिर किया। जब गुरु माना है, तो गुरु दक्षिणा के लिए मैं ना कैसे कर सकता हूँ?  मैंने काँपते हुए स्वर में कहा : आचार्यप्रवर, आप के इस शिष्य के लिए कुछ भी अदेय नहीं है। अँगूठा क्या, आप मेरा दाहिना हाथ भी माँग सकते हैं।  आप का ऋण तो मुझे हर हाल में चुकाना ही है। लेकिन गुरुवर, मेरा अँगूठा आप के किस काम आएगा? वह तो एक मृत अंग होगा। किसी के भी काम नहीं आ सकता।

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यह सुन कर आचार्य ने राजकुमारों को वहीं ठहरने के लिए कहा और मुझे  थोड़ी दूरी पर एक पेड़ की छाया में ले गए। उन्होंने मेरे दोनों हाथ पकड़ कर कहा : एकलव्य, तुमने मेरा जैसा सम्मान किया है, वैसा न किसी और ने किया है, न कोई और भविष्य में कर सकेगा। लेकिन मेरे बहाने तुम ने धर्म और शास्त्र, दोनों का अपमान भी किया है। तुम म्लेच्छ परिवार के हो। तुम्हें सिर्फ दासता शोभा देती है। त्रेता युग में शंबूक ने भी यही किया था। वह शूद्र था, तपस्वी बनना चाहता था। भगवान राम को उसका वध करना पड़ा। मैं तुम्हारे साथ ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहता। बस केवल इतना आदेश है कि अपने दाहिने हाथ का अँगूठा मुझे दे दो। इसके बाद तुम्हारी सारी विद्या लुप्त हो जाएगी। वर्ण व्यवस्था की रक्षा हो जाएगी। मैं ब्राह्मण हूँ। मेरे हाथों, वैदिक युग से चली आ रही वर्ण व्यवस्था भंग हो, यह मैं कैसे संभव होने दूँगा? जीवन भर लांछित रहूँगा, अगले सात जन्म भी व्यर्थ हो जाएँगे।

मैं सिर झुकाए सुन रहा था। मेरा खून खौल रहा था। तो आचार्य को अर्जुन की नहीं, मेरी नहीं, वर्ण व्यवस्था की चिंता है! मुझे मौन देख कर आचार्य को संभवतः शंका हुई कि उनका मनोरथ पूरा होगा या नहीं। तभी आचार्य ने अपने निश्चय की घोषणा की :  देखो, मेरे सम्मुख दो ही विकल्प हैं। या तो इस वन में किसी वृक्ष से लटक कर अपने प्राण दे दूँ या गुरुदक्षिणा में तुम्हारा अँगूठा ले कर अपन ब्राह्मणत्व की रक्षा करूँ। निर्णय तुम्हें ही करना है।

द्रोणाचार्य को इतना निरीह देख कर पहले तो मेरा क्रोध जागा। मैं बहुत विचलित था। कहीं यह निरीहता धोखा तो नहीं है? यह वर्ण व्यवस्था तुम लोगों ने बनाई हुई है। मैं उसका अंग नहीं हूँ। उसकी रक्षा करने का मेरा कोई दायित्व नहीं है। तुम सभ्य लोगों से तो हम निषाद बेहतर हैं, जो किसी का नुकसान करने की कभी सोचते ही नहीं हैं। अगर तुम्हारी वर्ण व्यवस्था मेरे कटे हुए अँगूठे पर ही टिकी रह सकती है, तो ऐसी व्यवस्था को जला कर भस्म कर देना चाहिए। यह कैसा कुटिल आचार्य है कि गुरुदक्षिणा के नाम पर अपने शिष्य का सर्वस्व लूट लेना चाहता है? इसने तो वास्तव में कुछ सिखाया ही नहीं है। मैंने जो भी सीखा है, अपने आप सीखा है। इसके पास गया था, तो इसने म्लेच्छ बता कर मुझे दुरदुरा दिया था। आज इसे गुरुदक्षिणा चाहिए। फिर मेरा क्रोध शांत हुआ। गुरु नीच हो सकता है, पर शिष्य नहीं।  मेरा नाम एकलव्य है। मैंने आचार्य को जो वचन दिया है, कभी भी उसके विरुद्ध नहीं जा सकता। वचन वचन होता है, माथे का टीका नहीं, जिसे जब चाहो पोंछ दो। गुरु कैसा भी हो,  शिष्य को अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटना चाहिए। मैंने आचार्य से कहा : आप कुछ क्षण प्रतीक्षा करें। मैं अभी आता हूँ।

मैं अपने अभ्यास स्थल पर गया और एक धनुष तथा कुछ बाण ले कर वापस आ गया। मैंने आचार्य से कहा : गुरुवर, उस अकेले उड़ते हुए पक्षी की तरफ देखिए और मेरी उँगलियों पर भी दृष्टि रखिए। मैंने धनुष पर बाण चढ़ा कर उस पक्षी की ओर निशाना साधा और अँगूठे का इस्तेमाल किए बिना तर्जनी से बाण चला दिया। पक्षी जमीन पर गिरने लगा।  

उसके बाद मैंने अपनी कमर से एक छोटी-सी छुरी निकाली, जो पिता जी ने मुझे रवाना होते समय दी थी और जो हमेशा मेरे साथ रहती थी। मैंने बाएँ हाथ से छुरी को पकड़ा और दाहिने हाथ का अँगूठा काट कर आचार्य के हाथ पर रख दिया। आचार्य की नजर कुछ देर तक मेरे कटे हुए अँगूठे पर टिकी रही। फिर जमीन खोद कर उसे गाड़ते हुए आचार्य ने कहा : बेटा, तुम मुझसे बहुत बड़े हो। तुम ने जो कुरबानी दी है, वह मैं भी नहीं दे सकता था। जब भी मेरी स्मृति आए, समझना एक बूढ़ा भिखमंगा था, जिसने राज्य का नमक खाया था और उसे चुकाने के लिए नीच से नीच काम कर सकता था। मैं अब चलता हूँ। पुत्र, तुम एकलव्य हो, एकलव्य ही रहोगे। मैंने देख लिया है, तुम्हारी शेष चारों उँगलियाँ तुम्हारे अँगूठे से जरा भी कम नहीं हैं। तुम अद्वितीय हो। अर्जुन क्या, कोई भी तुम्हारा मुकाबला नहीं कर सकता। मैं धन्य हूँ कि मैं तुम्हें शिष्य नहीं बना सका, पर तुम ने मुझे अपना गुरू बना दिया। इस नाते हो सके तो मुझे क्षमा कर देना,  हालाँकि मैंने तुम्हारे साथ जो किया है, वह हर दृष्टि से अक्षम्य है।

ऐसा कह कर द्रोणाचार्य राजकुमारों के पास गए और उन्हें ले कर लौटने लगे। कुत्ता मुझे देख कर फिर भौंकने लगा था। साथ ही, वह गर्दन घुमा-घुमा कर मेरी ओर देखते हुए अपनी टोली के पीछे-पीछे चला जा रहा था।

मैंने अपने कमरे में जा कर कटे हुए अँगूठे की जगह एक जड़ी लगा कर पत्तों से पट्टी की और पुवाल के बिस्तर पर धम्म से जा गिरा। मैंने अपने आप से कहा : एकलव्य, तुम्हें नहीं पता कि तुम ने क्या किया है। हजारों साल तक लोग द्रोणाचार्य के नाम पर थूकेंगे और तुम्हारे आत्मोत्सर्ग पर गर्व करेंगे। वे यह भी कहेंगे कि झोपड़ियों वाली सभ्यता अट्टालिकाओं वाली सभ्यता से महान है।

उस दिन इतनी गहरी नींद आई जितनी पहले कभी नहीं आई थी।

हाँ, एक बात छूट रही है। जब मैं अपने कटे हुए अँगूठे पर पट्टी कर रहा था, तो कुछ क्षणों के लिए मुझे कादंबरी की याद आई थी कि काश, इस समय वह यहाँ होती। मगर यह एक लघु सपने की तरह आया और चला गया। जैसे गरमी में कभी-कभी तूफान के साथ वृष्टि होती है, फिर सन्नाटा छा जाता है।    

लोग समझते हैं कि मेरा किस्सा यहीं खत्म हो गया। लेकिन ऐसा नहीं है। मेरी दृष्टि में तो असली कहानी इसके बाद ही शुरू होती है।

मैं चाहता तो अपने कटे हुए अँगूठे को जोड़ सकता था। श्रृंगबेर में ऐसे-ऐसे वैद्य थे, जिनके लिए यह मामूली बात थी। लेकिन सच पूछिए, तो मुझे अपने उस अँगूठे से घृणा हो गई थी, जिसके कारण एक इतने बड़े आचार्य को, जो पांडवों और कौरवों का गुरु था और जिसका यश चारों ओर फैला हुआ था, इतना नीच कर्म करना पड़ा था।

मैंने मन-ही-मन कहा : जा मेरे प्रिय अँगूठे और जा मेरे आदरणीय गुरु, नगर की सभ्यता तुम दोनों को मुबारक। जितना मेरे पास बचा है, उससे मेरा काम चल जाएगा। श्रृंगबेर में हजारों अँगूठे हैं, जो मेरे द्वारा प्रशिक्षण देने के बाद इतनी ही निपुणता से बाण चला सकेंगे। बुद्धि शरीर में या शरीर के किसी अंग में नहीं रहती है। वह तो दिमाग में रहती है। द्रोणाचार्य, तुम हमारा अंग भंग कर सकते हो, हमें विकलांग बना सकते हो, अपने शिष्यों से कह कर हमारे प्राण भी ले सकते हो पर हमारे दिमाग तक,  हमारे मन तक तुम्हारी पहुँच नहीं हो सकती। वहाँ हम सजीव हैं, तो हर जगह हम सजीव हैं। मुझे इतनी बड़ी कुर्बानी देने में एक क्षण भी नहीं लगा, क्योंकि हम अहिंसक लोग हैं। हमें अपना वचन निभाना आता है। यह तुम हो, जो आसानी से अपनी बात से मुकर जा सकते हो। लेकिन ऐसा लगता है कि भविष्य में हमेशा ऐसा नहीं होगा। जब हमारे राज्य के लोगों की इच्छाएँ बढ़ेंगी, उपभोग के पीछे वे दीवाना होंगे, तब वे भी तुम्हारी तरह हिंसक हो जाएँगे। मैं माँ धरती और पिता आकाश से हाथ जोड़ कर प्रार्थना करता हूँ कि ऐसा कभी न हो, हमारे वंशज थोड़े में ही संतोष करना सीखें और अपने सुख के लिए किसी की बलि न देंयह सही है कि हिंसा हमारे स्वभाव में नहीं है। यह भी सुन लो द्रोणाचार्य,  भविष्य तुम्हारा नहीं है, क्योंकि तुम अन्याय के रास्ते पर हो। भविष्य हमारा है, क्योंकि हम न्याय के रास्ते पर हैं। तुम सुधरोगे भी तो हम से बदतर रहोगे। हम बिगड़ेंगे भी तो तुम से बेहतर रहेंगे।

मैंने कुछ दिन और उसी खँडहर में बिताए यह देखने के लिए कि तर्जनी और मध्यमा उँगली से मैं बाण चला सकता हूँ कि नहीं। मैं चला पा रहा था। एक दिन मैंने बाएँ अँगूठे से तीर चलाने की कोशिश की। सफलता तो नहीं मिली, पर संभावना जरूर दिखाई दी। अब तक अँगूठे का घाव लगभग सूख गया था।

जब मैं श्रृंगबेर वापस पहुँचा, तो मेरी माँ और मेरे पिता ने मुझे गले लगा लिया। मेरा पूरा किस्सा सुन कर तो वे और प्रसन्न हुए। मेरा छोटा भाई दौड़ कर एक पत्तल पर ढेर सारे ताजे फल लाया। मैं बाएँ हाथ से खा रहा था, तो माँ मेरा दाहिना अँगूठा टटोल रही थीं।

जब मेरा घाव पूरी तरह से सूख गया, तब मेरे पिता ने श्रृंगबेर की पंचायत बुलाई। काफी लोग आए थे। पंचायत में पिता ने मेरी यात्रा की कहानी सुनाई अँगूठे वाला प्रसंग उन्होंने छिपा लिया, और बताया कि एकलव्य कुछ लोगों को प्रशिक्षण देगा, वे लोग कुछ और लोगों को, फिर इसी तरह और-और लोग और-और लोगों को प्रशिक्षण देंगे।  यह सिलसिला चल निकला, तो दो या तीन चाँद में हर निषाद बाण चलाने में निपुण हो जाएगा और हम आत्मरक्षा कर सकेंगे।

यह कार्यक्रम वास्तव में सफल हुआ। अल्प समय में ही श्रृंगबेर के सभी वयस्क लोग यानी स्त्रियाँ और पुरुष तथा कुछ लड़के भी बाण चलाना सीख गए। यह भी तय हुआ कि कभी भी कोई अकेला नहीं रहेगा कम से कम तीन लोग एक साथ रहेंगे, ताकि कोई खतरा हो, तो वे मिल-जुल कर मुकाबला कर सकें। इसके बाद जब भी अपहरण करने वाला आया, तो तीर लगते ही भागा। एक बार पाँच-छह लोगों का समूह आया। वे लोग दो लड़कियों को पकड़ कर ले जाने लगे। तभी उन पर तीरों की वर्षा हुई, तो वे भाग चले।

जब हमारे लोगों के अपहरण का सिलसिला रुक गया, तब मेरे पिता ने फिर एक पंचायत बुलाई। सभी के लिए अल्पाहार और ठंडा जल आया। जब सभी लोग खा-पी चुके, तो मेरे पिता जी ने गंभीर आवाज में कहना शुरू किया : मेरे पुत्र एकलब्य ने एक बड़ा काम किया है। हम लोग अब पूरी तरह से सुरक्षित हैं। हमारे बेटे-बेटियों का अपहरण नहीं होता। लेकिन एकलव्य विफल भी हो सकता था। अभी एक और जिम्मेदारी बाकी है। हमारे जिन लोगों का अपहरण हुआ है,  उन्हें हम छुड़ा कर नहीं ला पाए हैं। अब मेरी उम्र भी हो गई है। मैं नहीं जानता कि मुझसे क्या हो सकता है और क्या नहीं। मेरे हाथ काँपते हैं। लेकिन मेरे लिए सब से बड़ी बात यह है कि कुछ समय पहले आप लोगों को मेरे बारे में शक हो गया था कि मैं आप लोगों का जीवन सुरक्षित कर पाऊँगा या नहीं। मेरा मानना है कि राजा के विरुद्ध प्रमाण न हो सिर्फ शक हो जाए, तब भी उसे अपना पद छोड़ देना चाहिए। इसलिए मैं घोषणा करता हूँ कि मैं अब आप का राजा नहीं हूँ। आप जिसे ठीक समझें, उसे नया राजा चुन लें।

यह घोषणा होते ही पूरी सभा में अफरा-तफरी मच गई। लोग मेरे पिता के पास आ-आ कर मनाने लगे कि आप यह पद मत छोड़िए, हमारे राजा बने रहिए। बहुतों की आँखों में आँसू थे। वे छाती पीट-पीट कर चिल्ला रहे थे कि ऐसा राजा कहाँ मिलेगा। सात-आठ लोग मेरे पिता के पैरों पर लेट गए थे और कह रहे थे कि जब तक आप अपना निर्णय वापस नहीं लेंगे, हम आप के पैर नहीं छोड़ेंगे।

मेरे लिए यह एक अद्भुत दृश्य था। मैं सोच भी नहीं सकता था कि मेरे पिता जी इतने लोकप्रिय हैं। मेरी आँखों से भी आँसू बह रहे थे।

जब यह स्पष्ट हो गया कि मेरे पिता अपने निर्णय से बिलकुल नहीं डिगेंगे, तो नए रोजा की खोज होने लगी। लेकिन कोई भी नाम सर्व-स्वीकृत नहीं हो पा रहा था। तब वही अधेड़ आदमी उठा,  जिसने पिछली पंचायत में मेरे पिता जी से राजा के पद से हटने की माँग की थी, और बोला : क्यों न हम लोग एकलव्य को ही अगला राजा चुन लें।

यह सुनते ही पूरी पंचायत हर्ष में डूब गई, जैसे उनकी डूबती हुई नाव किसी लहर के थपेड़े से अचानक किनारे पर पहुँच गई हो। लेकिन मेरे पिता तत्काल उठे और बोले : मैं और मेरा परिवार अलग-अलग नहीं हैं। एकलव्य मेरा पद नहीं सँभालेगा। आप लोग किसी अन्य व्यक्ति का चुनाव कर लें।

लेकिन उनकी कौन सुनता। वही अधेड़ आदमी, जिसका नाम मुझे बाद में मालूम हुआ कि सत्यकर्मा था, मेरे पिता को संबोधित करते हुए बोला : एकलव्य सिर्फ आप का नहीं है, वह हमारा भी है। अब आप राजा नहीं हैं। अतः आप का आदेश मानने के लिए हम बाध्य नहीं हैं। हमें जो उचित लगेगा, हम वही करेंगे।

फिर वह पंचायत की ओर मुड़ा और जोर से पूछा : भाइयों और बहनों, क्या कहते हो? हम एकलव्य को अगला राजा चुनें या नहीं? सभी ने हर्ष-विभोर हो कर स्वीकृति दी : हाँ, हाँ, एकलव्य को ही चुनें। अब वही हमारा राजा है।  

इस तरह, एक क्षण में मैं श्रृंगबेर का राजा हो गया।

राजा हो कर मैंने क्या-क्या किया, अपहृत लड़के-लड़कियों को किस तरह छुड़वाया, यह कहानी भी कम लंबी नहीं है। आसपास के कई छोटे-छोटे राज्य हमारे राज्य में सम्मिलित हो गए। हमारी सीमाएँ बढ़ गईं।

लेकिन आत्म-प्रशंसा करने की भी एक सीमा है। अतः मुझे इस आत्मकथा को यहीं समाप्त करने की अनुमति दीजिए। इससे कुछ शिक्षा मिलती हो, तो आप उसे अपना लीजिए। आप लोगों से विदा लेते हुए मैं यही कहूँगा कि संतोष लालच से बड़ी चीज है। लालच में पड़ जाने के कारण ही मेरे जीवन काल में ही महाभारत नाम का महायुद्ध हुआ, जिसमें न द्रोणाचार्य बचे और न ही अर्जुन न युधिष्ठिर। दूसरी ओर अपनी अहिंसक संस्कृति के चलते ही हम बहुत दिनों तक बने रहे। हमने न अपनों की हत्या की और न दूसरों की। हमारे बचे रहने का रहस्य यही था।

और वह अँगूठा, जिसे मेरे गुरु द्रोणाचार्य ने मुझसे छीन लिया था और जमीन में गाड़ दिया था?

कई बार मेरी इच्छा हुई कि उसे वहाँ से निकाल कर अपने पास ले आऊँ और उसकी पूजा करूँ। लेकिन मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। इतिहास को जितना याद रखने से फायदा है, उतना ही याद रखना चाहिए। बाकी चीजों को भुला देना चाहिए। इसी से इतिहास आगे बढ़ता है। नहीं तो अपनी स्मृति का शिकार हो कर हम न खुद जी सकेंगे न किसी और को जीने देंगे।


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  1. अमित Reply
    • सिद्धार्थ Reply
  2. omprakash kashyap Reply
  3. Ganesh Reply
    • फारवर्ड प्रेस Reply

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