फॉरवर्ड प्रेस

अवध के किसान विद्रोह का बहुजन पुनर्पाठ

भारत एक कृषि प्रधान देश है, यह बात विद्यार्थियों को 20वीं शताब्दी तक प्राथमिक कक्षाओं में रटा दी जाती थी, किन्तु किसानों के इस देश में, कभी भी किसान नेतृत्वकारी भूमिका में नहीं रहा। आजादी की लड़ाई के दौरान, किसानों ने कई बार जमींदारों और ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी, अपने हितों का बलिदान कर आजादी के संघर्ष को तेज किया। इन सबके बावजूद प्रायः कांग्रेस पार्टी, जो भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन की नेतृत्वकारी पार्टी थी, उनके संघर्षों को उतना ही महत्व दिया, जितना उच्च जातीय और उच्चवर्गीय लोगों के हितों की रक्षा के लिए जरूरी था। जिनका प्रतिनिधित्व कांग्रेस करती थी। कांग्रेस नेतृत्व ने कभी भी किसानों को नेतृत्वकारी भूमिका में आने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया, क्योंकि ऐसा करने का अर्थ होता उच्च जातीय और उच्च वर्गीय वर्चस्व को चुनौती देना। अवध के किसानों के विद्रोह के पुनर्पाठ के माध्यम से इस जातीय और वर्गीय कारणों का तथ्यपरक, व्यापक और गहन विश्लेषण सुभाषचंद कुशवाहा ने अपनी हाल में ही प्रकाशित किताब, ‘अवध का किसान विद्रोह, 1920-1922’ तक में किया है।

यह पुस्तक भारतीय किसान आन्दोलन के एक महत्त्वपूर्ण अध्याय पर केन्द्रित है। 1920-22 ईसवी के दौरान, अवध के लगभग सभी जिलों में स्वतःस्फूर्त ढंग से किसान विद्रोह फूट पड़ा। यह किसान विद्रोह उस आक्रोश की अभिव्यक्ति थी, जो किसानों के मन में लगातार उत्पीड़न और शोषण के चलते पनप रहा था। इस घटना ने जहाँ एक तरफ, तत्कालीन समय की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक नीतियों की वास्तविकता को उजागर कर दिया, वहीं दूसरी तरफ, राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्वकर्ताओं के जातीय और वर्ग-चरित्र को भी स्पष्ट कर दिया। इसने वर्ग और जाति की विकृतियों को भी उजागर कर दिया। किसानों का आक्रोश ब्रिटिश सत्ता से भी अधिक उच्च जातीय जमींदारों के प्रति था।

समीक्षित पुस्तक ‘अवध का किसान विद्रोह (1920-1922)’ का कवर पृष्ठ

अवध के किसान विद्रोह ने सम्भवतः पहली बार राष्ट्रवादी आन्दोलन से गढ़े जाने वाले भावी राष्ट्र की जातीय और वर्गीय प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया। आश्चर्य नहीं कि राष्ट्र निर्माण पहलकदमियों में आज भी न सिर्फ किसान बल्कि वे सारे छूट जाते हैं या छोड़ दिए जाते हैं, जिनका संबंध श्रमण परंपरा के बहुजन समाज से है।

अवध के किसान-विद्रोह का यह पुनर्मूल्यांकन आज के भारत में किसानों की स्थिति को समझने के बहाने भारतीय जनता के व्यापक मेहनतकश तबकों की सुनियोजित उपेक्षा की परम्परा के वर्तमान रूप को समझने के लिए भी उपयोगी है। किसान विद्रोह का यह पुनर्मूल्यांकन दलित-पिछड़ा केन्द्रित इतिहास दृष्टि, यानी बहुजन केन्द्रित इतिहास दृष्टि का भी नमूना है।

सुभाष कुशवाहा मूलतः विज्ञान के विद्यार्थी हैं, बावजूद इसके चौरी- चौरा: विद्रोह और स्वाधीनता आन्दोलननामक अपनी पुस्तक के माध्यम से उन्होंने भारतीय इतिहास के बहुजन नजरियेसे पुनर्पाठ के महत्व को रेखांकित किया था, उनकी यह पुस्तक भी उसी नजरिये का परिणाम है, लिहाजा महत्त्वपूर्ण है।

पुस्तक के लेखक सुभाष चंद्र कुशवाहा

पुस्तक में 11 अध्याय और परिशिष्ट हैं। जिनके माध्यम से लेखक ने अपनी बात कही है। पहला अध्याय: ब्रिटिश कालीन भू-कर व्यवस्थामें उन्होंने अंग्रेजों के भारत में भू-कर व्यवस्था के सन्दर्भ में किए गए महत्त्वपूर्ण प्रयोगों एवं कैसे अंग्रेजों ने सदियों से चले आ रहे भू-संबंधों को बदल दिया; इसका उल्लेख है। भू-संबंधों में उनके द्वारा किए गए परिवर्तनों का भारतीय समाज व्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव पड़ा।

अध्याय-2 ‘ब्रिटिशकालीन भारत के किसान और मजदूर विद्रोहमें लेखक ने अंग्रेजों के भारत में सत्ता सम्भालने के बाद हुए किसान और मजदूर विद्रोहों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है, जिससे हमें पता चलता है कि अंग्रेजों के शासन के विरुद्ध भारत में संघर्ष उनके शासन सम्भालने के तुरन्त बाद ही प्रारम्भ हो गया था। चुआड़ विद्रोह, चेरो व्रिदेाह, भोगता विद्रोह, पहाड़िया विद्रोह, तमाण विद्रोह, मुण्डा विद्रोह से लेकर मोपला विद्रोह एक लम्बी श्रृंखला है जो तेभागा व तेलंगाना तक जारी रहती है।

अध्याय तीन में उत्तर प्रदेश में किसान विद्रोह की पृष्ठभूमि और अध्याय चार में किसान सभा, संयुक्त प्रान्त किसान सभा और अवध किसान सभा के गठन की पूरी कहानी का विवरण लिखित में दिया गया है।

अध्याय पांच से अध्याय आठ तक क्रमशः प्रतापगढ़, रायबरेली, फैजाबाद और सुल्तानपुर जनपदों में किसान-विद्रोहों का विवरण लेखक ने विस्तार से दिया है।

अध्याय नौ में एका आन्दोलन और मदारी पासी: हरदोई का किसान विद्रोहशीर्षक अध्याय में लेखक ने हरदोई जिले में हुए किसान विद्रोह और एका आन्दोलन और मदारी पासी की भूमिका का विस्तृत वर्णन किया है।

अध्याय दस में अवध के किसान विद्रोह में महात्मा गांधी की भूमिका का विवेचन किया गया है, जबकि अध्याय ग्यारह में जो अन्तिम अध्याय है बाबा रामचन्द्र और किसान विद्रोह का अवसान विषय पर चर्चा की गई है।

पुस्तक में दिये गये परिशिष्ट पाठकों के लिए खास महत्व के हैं और इनसे बहुत सारी नई जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। जैसे इस पुस्तक में पहली बार कुछ भूले-बिसरे किसान नायकों पर विशेष ध्यान दिया गया है। मदारी पासी और छोटा रामचन्द्र जैसे किसान नेताओं पर इस पुस्तक में पर्याप्त सामग्री दी गई है। पुस्तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ढुलमुल राजनीति की पड़ताल करती है और बताती है कि एक ओर कांग्रेस स्वयं को किसानों से जोड़ना चाहती थी तो दूसरी ओर वह किसानों के विद्रोही तेवर पर लगाम भी लगाना चाहती थी, ताकि जमींदारों के हितों की रक्षा की जा सके।

कुल मिलाकर यह पुस्तक भारत में किसान विद्रोहों पर पर्याप्त प्रकाश डालती है और अपने पाठक के लिए जनपक्षधर इतिहास लेखन का एक नमूना प्रस्तुत करती है। जिसमें जाति और वर्ग को एक साथ हमेशा याद रखने की जरूरत है।

 

पुस्तक का नाम : अवध का किसान विद्रोह (1920 से 1922 ई.)

लेखक : सुभाष चन्द्र कुशवाहा

प्रकाशक : राजकमल पेपरबैक्स, 2018

मूल्य : 299 रुपये, पृ. 328


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