बहुजन आजाद पार्टी : द्रोणाचार्यों हटो कि एकलव्य आते हैं!

दो दिन पहले चर्चा में आये बहुजन आजाद पार्टी पर वे हमला कर रहे हैं जो खुद को ओबीसी और दलित राजनीति का द्रोणाचार्य समझते हैं। जबकि यह मासूम युवाओं का एक सपना है जिसकी प्रेरणा उन्होंने फुले और आंबेडकर से ली है। आईआईटी के छात्रों से मुलाकात के बाद अनुभव साझा कर रहे हैं नवल किशोर कुमार

हिन्दी के प्रसिद्ध कवि नागार्जुन की रचना है– ‘क्या नहीं है इन घुच्ची आंखों में’। जब नागार्जुन ने यह कविता लिखी थी तब वह संपूर्ण क्रांति का दौर था। अब लंबा समय बीत चुका है। नागार्जुन की कविता में वर्णित आंखें अब घुच्ची नहीं रहीं। वह अब देखने लगी हैं दुनिया। लेकिन कुछ लोग हैं जिन्हें यह अच्छा नहीं लग रहा है कि वे लोग जो पहले आंख उठाकर देखने की हिम्मत भी नहीं करते थे, वे अब आंख मिलाकर बात करने लगे हैं। इनमें वे लोग भी हैं जो खुद को वंचित तबके का द्रोणाचार्य समझते हैं।

हम बात कर रहे हैं आईआईटी के छात्रों के उस समूह का जो देश के बहुसंख्यकों, यानी ओबीसी, दलित और आदिवासी समाज से आते हैं। इन छात्रों ने ‘बहुजन आजाद पार्टी’ (बाप) बनाने के लिए चुनाव आयोग के पास आवेदन भेजा है। दो दिन पहले देश के लगभग सभी बड़े अखबारों में यह खबर छपी। सोशल मीडिया पर भी यह खबर जंगल में लगी आग की तरह फैली। सभी जानने को उत्सुक थे। कौन हैं आईआईटी के वे छात्र जिन्होंने यह साहस किया है?

बहुजन आजाद पार्टी के संस्थापक सदस्य

अभी यह चर्चा का दौर शुरू ही हुआ था  कि एक पूर्व संपादक व चर्चित सोशल मीडिया एक्टिविस्ट ने अपने फेसबुक वाल पर लिखा कि आईआईटी के इन दलित-बहुजन छात्रों को आरएसएस का संरक्षण प्राप्त है। उन्होंने यह भी लिखा कि आरएसएस देश के बहुजन वोटों का बिखराव चाहता है। सोशल मीडिया पर किये गये पोस्ट का असर हुआ।  बहुजन-हितों के पक्षधर माने जाने वाले कुछ पूर्व पत्रकारों ने भी इन छात्रों के साहस का स्वागत करने के बजाय उन्हें आरएसएस एजेंट कहना शुरू कर दिया।

मेरे लिए यह पूरा मसला बिल्कुल अलग था। मेरे मन में सवाल था। जो लोग आज आईआईटी के बहादुर छात्रों का विरोध कर रहे हैं, वे लोग ही थे जिन्होंने रोहित बेमुला को महानायक बनाया!

आईआईटी के इन छात्रों ने संघर्ष का रास्ता अपनाया है। आंबेडकर के मार्ग पर चलते हुए ये पहले शिक्षित बने और देश की प्रमुख तकनीकी ज्ञान संस्थान आईआईटी तक पहुंचे। इसके बाद वे संगठित हुए और पचास लोगों का संगठन खड़ा किया। अब वे संघर्ष करना चाहते हैं? यानी संघर्ष से पीछे हटकर ख़ुदकुशी करने वाला महानायक और संघर्ष करने वाले छात्र खलनायक?

बहुजन आजाद पार्टी के फेसबुक पेज पर कई फोन नंबर मिले। कई बार फोन किया। हर बार निराशा हाथ लगी। कई एसएमएस भी भेजा। लेकिन परिणाम फिर से शून्य। मैं यह साेचने लगा कि आखिर क्या बात है कि वे लोग जिन्होंने दलित और ओबीसी की राजनीति में महज एक दिन में ही इतना कंपन पैदा कर दिया है, वे बात क्यों नहीं करना चाहते हैं। क्या वे डर रहे हैं? अक्सर ऐसा होता है। खासकर आंदोलनों को सतही तरीके से देखें तो। जैसे पटना में लालू प्रसाद के नेतृत्व में छात्र संघर्ष कर रहे थे तब उनके संघर्ष की भी यही स्थिति थी। उस समय की मीडिया भी उनके संघर्ष को खारिज कर रहा था। लेकिन आग लग चुकी थी। छात्र सड़क पर थे। विश्वविद्यालय परिसर में हंगामा चहुंओर था। बाद में जयप्रकाश नारायण ने छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया और परिणाम यह हुआ कि केंद्र में सत्तासीन इंदिरा गांधी सरकार को देश में आपातकाल लागू करना पड़ा और 1977 में जब चुनाव हुए तब उन्हें देश का सिंहासन खाली करना पड़ा था।

खैर, बुधवार को अखिलेश का फोन नंबर मिला। अखिलेश ‘बाप’ के प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक हैं। उनसे और उनके साथियों से साक्षात्कार करने हेतु फोन किया। पहले प्रयास में जवाब नहीं मिला और फोन कट गया। फिर एक एसएमएस भेजा। कुछ देर रूककर मैंने दुबारा यह सोचकर फोन किया कि अखिलेश ने एसएमएस पढ़ लिया होगा। मेरा अनुमान सही निकला। बातचीत हुई। दिल्ली के एक भीड़ वाले इलाके में दोपहर दो बजे हमारा मिलना तय हुआ।

अखिलेश के बताये स्थान पर पहुंचा। दिल्ली आये अभी बहुत अधिक समय नहीं गुजरा है, इसलिए मेरे लिए हर जगह नयी साबित होती है। आसपास का माहौल देख मैं समझ गया था कि मैं ऐसे इलाके में हूं जहां बहुत सारे छात्र रहते हैं। आसपास की दुकानें भी इसी ओर इशारा कर रही थीं। दुकानों पर लगे साइन-बोर्ड बता रहे हैं कि मैं कटवरिया सराय में हूं। जेएनयू और आईआईटी, दिल्ली के बीच स्थित छोटे से, अस्तव्यस्त मुहल्ले में।

अखिलेश को मैंने फोन पर अपने पहुंचने की सूचना दी। उन्होंने कहा कि उनके पास एक छोटा-सा कमरा है और कुछ मित्र उनसे मिलने आये हैं। इसलिए मैं पन्द्रह मिनट इंतजार करूं। मैं इंतजार कर रहा था। करीब दो मिनट के बाद अखिलेश ने फिर फोन किया और इस बार उनके दो सवालों ने चौंका दिया। सर, आपके पास कोई कैमरा तो नहीं है न? आप कितने लोग हैं?

जेहन में सोशल मीडिया पर उन्हें खलनायक साबित किये जाने की मुहिम चलने लगी। बेचारे ये छात्र इतने दहशत में हैं कि ये सीधे-सीधे मुझसे मिलने में भी संकोच कर रहे हैं। मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि मैं अकेला ही हूं और कोई कैमरा नहीं है मेरे पास। मैंने एक वाक्य और जोड़ा कि मैं आपके पक्ष को जानने आया हूं ताकि लिख सकूं।

मैं जहां खड़ा था। वहां एक विशाल बरगद का पेड़ नजर आया। अप्रैल में ही दिल्ली में गर्मी बहुत अधिक पड़ने लगी है। छांव का लोभ संवरन नहीं कर पाया। बैठ गया बुढ़े बरगद के नीचे।

शायद मेरे अंतिम वाक्य का असर हुआ। दो नौजवान आये। एक ने अपना नाम अखिलेश और दूसरे ने विक्रांत बताया। उन दोनों ने मेरा स्वागत किया। हम चल पड़े। पहले मुझे लगा कि वे अपने साथ मुझे अपने कमरे में ले जायेंगे और वहीं साक्षात्कार कर सकूंगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वे मुझे लेकर एक पार्क में गये। आठ-दस युवा अलग-अलग टीम बनाकर बैठे थे। सबके चेहरे पर तनाव था।

अखिलेश ने कहा, ‘सर यही हमारी टीम है। हम सभी यही बैठकर रणनीति बना रहे हैं।”

हम पार्क में एक पेड़ के नीचे सीमेंट की बनी एक बेंच पर बैठे। मेरे लिए सुखद आश्चर्य था। सभी युवाओं की औसत आयु 25-26 वर्ष थी। दो-तीन तो ऐसे मिले जिनकी मूंछें अभी आ रही हैं। आंखों में भय और चेहरे पर भय को छिपाने की असफल कोशिश।

खैर साक्षात्कार शुरू हुआ। मेरे साथ नवीन थे। माथे पर चे गवेरा की टोपी लगाये। मेरे एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि वे लोग भी राजनीति को समझते हैं। मायावती हों या बहुजन की राजनीति करने वाले कोई और, सभी ने केवल अपनी कुर्सी के लिए बहुजनों की भावनाओं का उपयोग किया है। हम उनका विकास चाहते हैं। ऐसा विकास जो उन्हें सम्मान और समान अधिकार सुनिश्चित करे। वहीं एक सवाल के जवाब में नवीन ने यह भी कहा कि उन्हें सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले दलों से कोई परहेज नहीं है। वे अपना काम कर रहे हैं और हम अपना काम करेंगे। यदि वे हमारे विचारों को समझेंगे तो हम उनका सम्मान करेंगे। लेकिन हम भाजपा के साथ तो बिल्कुल भी नहीं जाएंगे।ऐसा करना हमारे अपने सिद्धांतों के खिलाफ होगा। ब्राह्मणवाद के प्रति उनके मन में गहरी घृणा है। मैंने उनसे राम मंदिर और गौ-मांस के मुद्दों पर भी बात की। (देखें, साक्षात्कार का वीडियो)

 

हम बात कर रहे थे। हर सवाल का जवाब आत्मविश्वास की मांग करता हुआ। लेकिन मुझे निराशा नहीं हुई। वे अपनी रणनीतियों के बारे में बता रहे थे और मुझसे अपेक्षा कर रहे थे कि मैं उनका मार्गदर्शन करूं। जब वे ऐसा कह रहे थे, मुझे बाबा नागार्जुन की पंक्तियां याद आयीं–

“क्या नहीं है

इन घुच्ची आँखों में

इन शातिर निगाहों में

मुझे तो बहुत कुछ

प्रतिफलित लग रहा है!

नफरत की धधकती भट्टियाँ…

प्यार का अनूठा रसायन…

अपूर्व विक्षोभ…

जिज्ञासा की बाल-सुलभ ताजगी…

ठगे जाने की प्रायोगिक सिधाई…

प्रवंचितों के प्रति अथाह ममता…

क्या नहीं झलक रही

इन घुच्ची आँखों से?

हाय, हमें कोई बतलाए तो!

क्या नहीं है

इन घुच्ची आँखों में!”


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