बली-वामन की कहानी, जोती राव फुले की जुबानी

‘फुले द्वारा मिथकों के पुनर्पाठ का प्रयास’ श्रृंखला के तहत दूसरी किस्त में पढ़ें राजा बली और वामन की कहानी

इस लेख की प्रथम किस्त में हमने वर्ष 1873 ई. में महात्मा जोती राव फुले द्वारा लिखित पुस्तक ‘गुलामगिरी’ के प्रथम पांच परिच्छेदों पर बात की थी और यह दिखाया था कि 19वीं सदी में जब शिक्षा का स्तर बहुत कम था, महात्मा फुले ने बहुजन समाज को पौराणिक कथाओं और उनमें वर्णित मिथकों का एक तार्किक विवेचन कर ब्राह्मणी व्यवस्था के षडयन्त्रों के प्रति सचेत करने का प्रयास किया था।

राजस्थान के बिलारा इलाके में ब्राह्मणीकृत मंदिर को बली का मंदिर कहा जाता है। इस मंदिर में एक विष्णु को वामन अवतार के रूप में राजा बली के सिर पर लात रखने की मुद्रा में दिखाया गया है। ऐसा बहुजन नायकों को अपमानित करने के लिए गढ़ा गया है। जोती राव फुले ने जब गुलामगिरी लिखा तब राजा बली और वामन की यह कहानी नहीं थी

इस किस्त में हम ‘गुलामगिरी’ के छठे परिच्छेद की चर्चा करेंगे। इसमें जोती राव फुले ने बलिराजा, ज्योतिबा, मराठे, खण्डोवा, महासुबा, नवखण्डों का न्यायी, मैरोबा, सात आश्रित, डेरा डालना, रविवार को पवित्र मानना, वामन, श्राद्ध करना, विन्ध्यावली लोग, शिलंगण, भ्रात का बलि राजा बनाना, दूसरे बलिराजा के आने की भविष्यवाणी, बाणासुर, कुजागरी, वामन की मृत्यु, उपाध्ये, होली, बीर पुरखों की भक्ति, बलि प्रतिपदा, भाई-दूज आदि के संबंध में बात की है।

इस परिच्छेद की शुरूआत की पृष्ठभूमि यह है कि विप्रों का मुखिया वामन, एक बड़ी सेना संगठित कर बली से युद्ध करने पहुंच जाता है ताकि युद्ध में हारकर बली राजा का राज्य छिन ले।

बली ने भी, जिसका राज्य काफी बड़ा था, तत्काल युद्ध की तैयारी की। ज्योति राव बताते है कि बड़े राज्य को सुशासन प्रदान करने के लिए, राजा ने इसे नौ प्रदेशों में बांट दिया था। इसलिए हर प्रदेश के मुखिया को खण्डोबा कहते थे यानि खण्ड का मुखिया। खण्डोबा के अधीन एक या दो प्रधान होते थे। हर खण्डोबा के पास कानून व्यवस्था बनाने के लिए बहुत से मल्ल(पहलवान) होते थे। इसलिए उसे मलखान भी कहते थे।

 

बली राजा द्वारा अपने राज्य को जिन नौ खण्डों में बांटा गया था उसमें एक खण्ड जेजोरी भी था। जेजोरी महाराष्ट्र का एक प्रसिद्ध देव स्थान है। यह स्थान पूना से करीब 30 मील की दूरी पर स्थित है। यहां का खण्डोबा काफी प्रभावशाली था। वह आस-पास के क्षेत्रो में रहने वाले मल्लों को नियुक्ति कर पूरे इलाके में और आस-पास के क्षेत्रों में अपना वर्चस्व बनाये रखता था। इसलिए इसका दूसरा नाम मल्लअरी पड़ गया था। इसी का अपभ्रंश मल्लहारी है। यह खण्डोबा गाने का बड़ा शौकीन था और कहा जाता है कि इसी ने मल्लहार राग बनाया था जिसे बाद में तानसेन ने और समृद्ध किया। बली राजा के राज्य को महाराष्ट्र में महासूबा भी कहते थे। इसी महासूबा का अपभ्रंश म्हसोबा है। हुआ यह था कि बली राजा ने महाराष्ट्र में महासूबा और नौखण्डों के न्यायी के रूप में दो अधिकारी नियुक्त किए थे जो वसूली और न्याय करने का कार्य करते थे। ये लोग समय-समय पर खेती-बाड़ी की जांच करते थे और मौके पर हालात देखकर करों में छूट-सहूलियत प्रदान कर देते थे। इसलिए मराठों में एक भी किसान ऐसा नहीं मिलेगा जो अपने खेती-बाड़ी के समय किसी भी पत्थर को महसूबे के नाम पर सिंदूर की लीपा-पोती कर, उसे घूप जलाकर उसका नाम लिए बगैर खेत जोतेगा। खेती किसानी से संबंधित सभी कार्य म्हसोबा की अराधना के उपरान्त ही शुरू किए जाते हैं।

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बली राजा के अधिकार में काशी के इर्द-गिर्द का कुछ क्षेत्र था। उस प्रदेश को दसवां खण्ड कहा जाता था। काशी वाले प्रान्त का मुखिया काल भैरी था जिसने भैरव राग बनाया। जोती राव बताते हैं कि बली राजा का राज्य राजा दशरथ के पिता के राज्य से भी बड़ा था। उस समय के क्षेत्रपतियों में से सात क्षेत्रपति राजा बली को लगान देकर उसी के आश्रय में रहते थे। इसीलिए बली राजा का एक नाम सात-आश्रित पड़ गया था। ’जिसकी लाठी उसकी भैंस कहावत का मराठी संस्करण बली राजा के काल में ही प्रचलित हुआ था जिसका मतलब है जो बलवान है, उसी का राज ’। बली राजा के राज्य के महावीरों में भैरोबा, ज्योतिबा तथा नव खण्डोबा अपनी रैय्यत की सभी प्रकार की सुख-सुविधाओं का शर्तियां प्रयास करते थे। इसलिए कालान्तर में मराठी लोक ने इन्हें देवताओं का दर्जा दे दिया। युद्ध के पहले मराठे हर-हर महादेव, बहिरोबाचा अथवा ज्योतिबाचा का उद्घोष करते थे। बली राजा अपनी सारी प्रजा के साथ महादेव के नाम से रविवार के दिन को पवित्र दिन के रूप में मनाते थे। इसीलिए आज के मराठे यानि मातंग, महार, कुन्बी और माली आदि लोग हर रविवार के दिन अपने-अपने घर में कुल स्वामी की प्रतिमा को जल स्नान करवाकर, उसको भोजन अर्पण किए बगैर कुछ भी नहीं खाते हैं।[1]

महाराष्ट्र के औरंगाबाद में फुलांबरी में म्हसोबा का मंदिर (फोटो – एफपी ऑन द रोड, 2017)

संवाद के क्रम में धोंडीराव प्रश्न करता है कि बली राजा के राज्य की सरहद पर आने के बाद वामन ने क्या किया ? जोती राव जवाब देते हैं कि वामन वगैर किसी चेतावनी के अपनी सारी फौज लेकर बली राजा के प्रजा को मारते पीटते, खदेड़ते हुए उसकी राजधानी तक आ पहुंचा। बली राजा को देश भर में फैली अपनी फौज को इकट्ठा करने का मौका ही नही मिला। लिहाजा उसने राजधानी में मौजूद अपनी निजी सेना के साथ वामन के आक्रमण का मुकाबला करने के लिए युद्ध भूमि में उतर पड़ा। राजा बली युद्ध में मारा गया। यह समाचार सुनकर उनकी रानी विंघ्यावली जो पिछले आठ दिनों से बिना कुछ खाये पीये अग्निकुण्ड के समक्ष अपने पति के विजयी होने की प्रार्थना कर रही थी। वह अवसाद ग्रस्त होकर अग्निकुण्ड में कूद कर मर गयी। सम्भवतः इसी दिन से सती होने की रूढ़ि चल पड़ी होगी। ब्राह्मण ग्रन्थकारों ने इस घटना को महिमामंडित कर अपने ग्रन्थों में गलत-सलत कहानियों में गूथकर प्रस्तुत किया।[2]

इस युद्ध में विजय के पश्चात वामन ने बली राजा की राजधानी को लूटा और लूट में प्राप्त ढेर सारा सोना लेकर अपने घर लौट गया। वामन जब अपने घर पहुंचा तो उसकी स्त्री ने जिसे युद्ध में वामन की विजय का समाचार पहले ही मिल गया था, मजाक करने के लिए चावल से बली राजा की एक आकृति बनाकर अपने दरवाजे के बाहर रखा था। वामन के घर पहुंचने पर उसने वामन से कहा कि यह देखो, बली राजा आपके साथ पुनः युद्ध करने के लिए आया है। यह सुनते ही वामन ने चावल से बनी बली राजा की उस आकृति को लात मारकर फेंक दिया और अपने घर के अन्दर प्रवेश कर गया। उस दिन से आज तक ब्राह्मणों के घर में हर साल दशहरा को औरतें भात का बली राजा बनाकर अपने-अपने दरवाजे की दहलीज पर रखती हैं बाद में अपने दायां पांव चावल से बने बली राजा के पेट पर पांव रखकर कचनार की लकड़ी से उसका पेट फाड़ती हैं। यह सदियों से चली आ रही परिपाटी है ( ब्राह्मण -पण्डा-पुरोहितो के घर में यह त्योहार बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है, इस लिए इस त्योहार को ब्राह्मणों का त्योहार कहते है।)।[3]

कर्नाटक-महाराष्ट्र की सीमा हिटनी में म्हसोबा मंदिर में म्हसोबा की पिंडी (फोटो – एफपी ऑन द रोड, 2017)

इसी तरह राजा बली के पुत्र बाणासुर व उसके सहयोगी जो इस युद्ध में हार गये थे और युद्ध के मैदान से प्राण रक्षा के लिए भाग गये थे उन लोगों ने भी दशमी की रात में ही अपने-अपने घर वापसी की। जब ये हारे हुए योद्धा अपने घरों को पहुंचे तो उनकी स्त्रियों ने भी अपने पुरूषों का मनोबल बनाये रखने के लिए राजा की प्रतिमा रखकर यह भविष्यवाणी जान-बूझकर किया कि बली राजा फिर से जन्म लेगा और वह ईश्वर के राज्य की स्थापना करेगा, अपने घर की दहलीज पे खड़े होकर स्त्रियों ने अपने पतियों की आरती उतारी होगी और यह कहा होगा कि  ‘अल्ला-वल्लाजावे’ और बली का राज आवे ’। उस दिन से लेकर आज तक सैंकड़ों साल बीत गये फिर भी, बली के राज्य के कई क्षेत्रों में क्षत्रिय वंश की औरतों ने दशहरे के दिन शाम को अपने-अपने पति और पुत्र की आरती उतार कर, आगे बली का राज्य आवे इस इच्छा का त्याग नहीं किया। इससे पता चलता है कि बली राजा का राज्य कितना अच्छा रहा होगा। जोती राव इसी क्रम में 19वीं शताब्दी के हिन्दू लोगों के कोसते भी हैं। वे अग्रेज शासकों की मेहरबानी पाने के लिए एक तरफ तो रानी के जन्मदिन पर उनके लम्बे जीवन की कामना करते है जबकि दूसरे तरफ यही लोग समाचार पत्रों में या आपसी बात-चीत में अंग्रेजों के खिलाफ रोष व्यक्त करने का दिखावा करते है।[4]

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धोंडीराव फिर प्रश्न करता है कि उस समय बली राजा द्वारा बुलाये गये सरदार क्या उसकी मदद के लिए आये ही नहीं ? जोती राव जवाब में कहते हैं कि बाद में छोटे-मोटे सरदार अपनी-अपनी फौज के साथ आकर बाणासुर से मिले। फौज के आने और बाणासुर से उसकी मुलाकात का समचार सुनकर बली राजा के राज्य में रहने वाले ब्राह्मण भयभीत हो गये और सब वामन के राज्य की ओर भाग गये। उन्हें इस तरह से आता देख वामन भी बहुत घबरा गया। उसने सभी ब्राह्मणों को इकठ्ठा किया और यह विचार करने लगा कि बाणासुर से रक्षा किस प्रकार की जाय ? दूसरी तरफ बाणासुर ने वामन पर हमला बोल दिया और उसे पराजित कर दिया तथा उसके पास जो कुछ था उसे लूट लिया। फिर उसने वामन और उसके अनुयायियों को खदेड़ कर हिमालय की पहाड़ी पर भगा दिया। पहाड़ी के नीचे बाणासुर ने अपना घेरा डाले रखा इससे वामन और उसके अनुयायी दाने-दाने के मोहताज हो गये और वामन भी मर गया। बड़ी संख्या मे जो ब्राह्मण भूख से मरे उनके परिजनों ने अपने-अपने घरों में युद्ध में मरे सभी रिश्तेदारों के नाम से चिता जलाकर उनकी सांकेतिक दाह क्रिया की क्योंकि उनमें मृत आदमी को जलाने का रिवाज था। जबकि क्षत्रियों में मृत आदमी को जमीन में दफनाने की प्रथा थी। इसी संवाद में जोती राव बताते हैं कि आदिनारायण द्वारा वामन अवतार लेने कि कथा पूरी तरह से अतार्किक और झूठ का पुलिंदा है क्योंकि ऐसा कोई पुरूष नहीं हो सकता जो एक कदम में धरती और दूसरे कदम में आकाश नाप ले। यह सब ब्राह्मणों की किस्सागोई है।

 संदर्भ :

[1] महात्मा जोतिबाफुले रचनावली खण्ड -एक , सम्पादक- एल.जीमेंश्राम ’विमलकीर्ति ’ राधाकृष्ण प्रकाशन दिल्ली, 1996 पृष्ठ 168

[2] महात्मा जोतिबाफुले रचनावली खण्ड-एक पूर्वोद्धत पृष्ठ 169

[3] महात्मा जोतिबाफुले रचनावली खण्ड-एक पूर्वोद्धत पृष्ठ 170

[4] महात्मा जोतिबाफुले रचनावली खण्ड-एक पूर्वोद्धत पृष्ठ 170


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