पांचवीं अनुसूची को लेकर दिल्ली में जुटे देश भर के आदिवासी

बीते रविवार को दिल्ली के संसद मार्ग पर देश भर के आदिवासी बड़ी संख्या में जुटे। उनकी मुख्य मांग अधिसूचित क्षेत्र के तहत चिन्हित दस राज्यों में पांचवीं अनुसूची को शतप्रतिशत लागू करने की थी। जयस के मिशन 2018 के तहत हुए इस आयोजन के बारे में बता रहे हैं राजन कुमार :

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब देश में संविधान बना तब भारत सरकार ने आदिवासियों को भरोसा दिया था कि वह उनकी संस्कृति, आजीविका और जल-जंगल-जमीन पर अधिकार बनाये रखेगी। इसके लिए पांचवीं अनुसूची के तहत प्रावधान किये गये। लेकिन इसे आजतक लागू नहीं किया गया। इसके विरोध में बीते 1 अप्रैल को बड़ी संख्या में आदिवासियों ने जयस (जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन) के बैनर तले संसद का घेराव किया। इस मौके पर राष्ट्रपति को दस मांगों को लेकर ज्ञापन भी सौंपा गया। इनमें से एक मांग एससी/एसटी एक्ट को और सख्त बनाये जाने की मांग भी शामिल है।

जयस के द्वारा आयोजित जनसभा के दौरान (दायें से बायें) जयस के राष्ट्रीय संरक्षक डॉ. हीरालाल  अलावा, मध्यप्रदेश के पूर्व विधायक मनमोहन सिंह बट्टी, गोंडवाणा गणतंत्र पार्टी के संस्थापक हीरा सिंह मरकाम और जयस के झारखंड प्रभारी संजय पहान

इस ऐतिहासिक संसद घेराव में संविधान की पांचवीं अनुसूची द्वारा अधिसूचित दस राज्यों यथा मध्यप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओड़िशा, तेलंगाना, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश और आंध्रप्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम के आदिवासी ‘मिशन 2018’ के तहत दिल्ली पहुंचे थे।

गौरतलब है कि मिशन 2018 का आह्वान जयस द्वारा अादिवासियों के लंबित मांगों को लेकर पूरे देश में उनकी एकजुटता बनाने और सरकार पर दबाव बनाने के लिए किया गया है। बीते रविवार को संसद घेराव कार्यक्रम इसका हिस्सा था। इसके तहत दिल्ली के मंडी हाउस से जंतर-मंतर के निकट संसद मार्ग तक रैली निकाली गई। बाद में एक जनसभा का आयोजन किया गया।

जनसभा को संबोधित करते हुए जयस के राष्ट्रीय संरक्षक डॉ. हीरालाल अलावा ने कहा कि आदिवासियों के सुरक्षा, संरक्षण और विकास के लिए संविधान में पांचवीं अनुसूची का प्रावधान तो किया गया है, लेकिन आज तक उसका कहीं भी सख्ती से अनुपालन नहीं हुआ। इसके अनुपालन की जिम्मेदारी संविधान में राष्ट्रपति और राज्यपाल को दी गई है। उन्होंने कहा कि अनुसूचित क्षेत्र वाले राज्यों के किसी भी राज्यपाल ने आजादी के 70 वर्षों में कभी भी कोई अधिसूचना नहीं जारी की और न ही राष्ट्रपति ने इस बारे में कोई संज्ञान लिया। यही वजह है कि आजादी के बाद से देश के अन्य लोगों का विकास हुआ, लेकिन आदिवासियों की स्थिति बद् से बद्तर होती गई।

उन्होंने कहा कि आदिवासियों को संविधान प्रदत्त आधिकारों से वंचित रखा गया है। असंवैधानिक तरीके से उनकी जमीनों को छीना गया, उनकी भाषा-संस्कृति से छेड़छाड़ की गई, जिससे आदिवासी समाज में असंतोष पनपा है। सरकार द्वारा इसे दूर करने के बजाय उनके क्षेत्रों को नक्सल क्षेत्र घोषित कर वहां के आदिवासियों पर फर्जी मुकदमा दर्ज कर लगभग 10 लाख आदिवासियों को जेल में डाल दिया गया है। इसके अलावा सिकलसेल, एनिमिया, फ्लोरोसिस, सिलीकोसिस और कुपोषण जैसे गम्भीर बीमारियों और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में लाखों लोगों की मौत हो गई। शिक्षा और रोजगार के आभाव में लोग पलायन को विवश हैं। करीब 4 करोड़ आदिवासियों काे विस्थापित किया गया है। इस तरह से आदिवासियों को 70 साल पीछे धकेल दिया गया। डॉ. अलावा ने कहा कि यह बहुत-ही घिनौना अपराध है और यह अपराध राष्ट्रपति, राज्यपाल और सरकार ने किया है। आज इन्हीं समस्याओं से अवगत कराने के लिए देशभर से आदिवासी दिल्ली आये हैं।

पांचवीं अनुसूची को शतप्रतिशत लागू करने की मांग को लेकर दिल्ली में जुटे देशभर से आदिवासी

डॉ. अलावा ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि तीन महीने के अंदर आदिवासियों की मांगें नहीं मानी गईं तो आदिवासी क्षेत्रों में ‘सरकार हटाओ’ अभियान चलाया जाएगा और कोई भी सरकारी अधिकारी-कर्मचारी या जनप्रतिनिधि को आदिवासी क्षेत्रों में घुसने नहीं दिया जाएगा। साथ ही 2018 में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में होनेवाले विधानसभा चुनाव एवं 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा सरकार को उखाड़ कर फेेंक दिया जाएगा।

वहीं झारखण्ड के जयस प्रभारी संजय पहान ने कहा कि आदिवासियों के परंपरागत स्वशासन व्यवस्था के अनुपालन के लिए संविधान के अनुच्छेद 244(1) में विशेष प्रावधान किया गया है। जबकि आदिवासी क्षेत्रों में परंपरागत स्वशासन व्यवस्था के बजाय सामान्य शासन व्यवस्था लागू कर आदिवासी हितों की अनदेखी की जा रही है। उन्होंने भी केंद्र को चेताते हुए कहा कि यदि पांचवीं अनुसूची और आदिवासियों के परंपरागत स्वशासन व्यवस्था की अब तक की कार्यप्रणाली की संसद में अविलंब समीक्षा कर निर्णय नहीं लिया गया तो झारखण्ड समेत देशभर के आदिवासी उग्र आंदोलन करने को बाध्य होंगे।

सभा को तेलंगाना जयस प्रभारी नरसिम्हाराव कतराम, छत्तीसगढ़ जयस प्रभारी रामनारायण टेकाम, राजस्थान जयस प्रभारी सुरेन्द्र कटारा, गुजरात जयस प्रभारी अर्जुन राठवा, महाराष्ट्र जयस प्रभारी अमित तड़वी, बिहार जयस प्रभारी राजेश कुमार गोंड, गोंडवाना गड़तंत्र पार्टी के संस्थापक हीरासिंह मरकाम, मध्य प्रदेश के पूर्व विधायक मनमोहन शाह वट्टी, गुजरात भिलीस्तान टाइगर सेना के अध्यक्ष प्रफुल्ल वसावा, संथाल परगना झारखण्ड के सरना धर्मगुरु लश्कर सोरेन, मध्य प्रदेश से अजित मार्को, दिनेश सयाम, रितु पेंड्रो, रविराज बघेल, अरविंद मुजालदा, लक्ष्मण कटारा, अंतिम मुझालदा, ध्यानवीर डामोर, कमलेश्वर डोडियार, प्रेम पटेल, राहुल बामनिया, झारखण्ड से हरादर मुर्मू, शयाम लाल मरांडी, मनोज कुमार हेम्ब्रम, शशिकांत उराँव, सुनील हेम्ब्रम ने भी संबोधित किया। सभा का संचालन मदन गोंड ने किया।

सभा के बाद राष्ट्रपति को सौंपा ज्ञापन

सभा की समाप्ति के बाद डॉ. हीरा लाल अलावा के नेतृत्व एक शिष्टमंडल ने राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा गया। इसके जरिए मांग किया गया कि देश के दस अनुसूचित राज्यों में पांचवीं और छठवीं अनुसूची लागू नहीं होने के कारण आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो रही है, इसलिए अविलंब पांचवीं और छठी अनुसूची लागू करने का आदेश केंद्र एवं राज्य सरकार को दें। साथ ही अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 को यथास्थिति बरकरार रखने हेतु संसद से विधेयक पारित करने का आदेश केंद्र सरकार को देने का अनुरोध किया गया।

जयस के संसद घेराव कार्यक्रम में महिलाओं की रही उल्लेखनीय भागीदारी

शिष्टमंडल ने अपने ज्ञापन में अधिसूचित जनजाति समुदाय के अतिरिक्त अन्य गैर-आदिवासी जातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का प्रस्ताव रद्द करने का आदेश केंद्र एवं राज्य सरकार को देने का अनुरोध किया। साथ ही संविधान में दर्ज अनुसूचित जनजाति शब्द को हटाकर आदिवासी शब्द लिखे जाने का अनुरोध किया गया ताकि आदिवासी पहचान, आदिवासी संस्कृति और आदिवासी परंपरागत स्वशासन व्यवस्था बचा रहे। इसके अलावा वन अधिकार अधिनियम 2006 को पूर्ण रुप से लागू करने, विश्व आदिवासी दिवस 9 अगस्त को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने, खनिज संपदा और उद्योग कारखानों के नाम पर 5वीं अनुसूची कानून का उल्लंघन कर अपनी ही जमीन से बेदखल कर विस्थापित किये गये 4 करोड़ से अधिक आदिवासी परिवारों को चिन्हित कर उनके लिए संसद में श्वेत पत्र लाकर उन्हें पुनर्वास, मुआवजा देने संबंधी अनुरोध किया गया। ज्ञापन में यह भी कहा गया कि राष्ट्रपति अनुसूचित बहुल क्षेत्रों में फैली गंभीर बीमारियों की रोकथाम और जनजाति छात्रों को उनकी मातृभाषा में संपूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने का आदेश केंद्र एवं राज्य सरकार को दें।

सम्मेलन पर रहा आपसी मतभेद व भारत-बंद का असर

गौरतलब है कि ‘मिशन 2018 : आदिवासी अधिकार महाआंदोलन’ की शुरुआत तीन साल पहले ही हो गई थी। महाआंदोलन के शुरुआत से ही इसके नेताओं ने एक करोड़ आदिवासियों द्वारा संसद घेरने का दावा किया, जो सुनने में भी अतिश्योक्तिपूर्ण लग रहा था, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में पूरी दुनिया में भी आज तक कहीं कोई आंदोलन या प्रदर्शन नहीं हुआ है। उस समय नेताओं ने तर्क दिया था कि वे प्रत्येक आदिवासी इलाकों में जाकर आदिवासियों को इस आंदोलन से जोड़ेंगे।

नेताओं के दावे और तर्क चाहे जो भी हों, लेकिन इस महाआंदोलन ने देश के आदिवासियों सहित दूसरे वर्गों का भी ध्यान आकर्षित किया। इसके पूर्व में झारखण्ड के रांची, तेलंगाना के हैदराबाद और मध्य प्रदेश के धार जिले में आयोजित रैली व कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में उमड़े आदिवासियों के सैलाब ने प्रशासन को भी सकते में डाल दिया था।

बहरहाल, एक करोड़ आदिवासी दिल्ली के इस महाआंदोलन में नहीं आ सके, लेकिन यह एक सफल आयोजन था। प्रशासन के दबाव और दिल्ली पुलिस द्वारा अनुमति नहीं दिये जाने के बावजूद यह आयोजन हुआ और पूरे देशभर से बड़ी संख्या में आदिवासियों ने हिस्सा लिया।

इस आयोजन में एक करोड़ लोगों के नहीं आने पर इसके नेताओं ने एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट को दंत-नखविहीन बनाने के विरोध में 2 अप्रैल को ‘भारत बंद’ का आह्वान करने वाले लोगों पर अपना ठीकरा फोड़ा है और महाआंदोलन में सहयोग करने के बजाय साजिश करना बताया है। इस संबंध में अपनी सफाई में जयस के राष्ट्रीय संरक्षक डॉ. हीरालाल अलावा ने बताया कि ‘भारत बंद’ का आयोजन इस आंदोलन के एक सप्ताह पहले या बाद में भी की जा सकती थी, लेकिन ‘मिशन 2018 : आदिवासी अधिकार महाआंदोलन’ की तारीख सभी को पहले से पता होने के बावजूद साजिश के तहत आदिवासियों के इस महाआंदोलन को नाकाम करने के लिए भारत बंद का आह्वान इसके एक दिन बाद किया गया। चूंकि दोनों आयोजनों के मुद्दे आदिवासियों से जुड़े थे। इस कारण एक करोड़ की संख्या में आदिवासी इस आयोजन का हिस्सा नहीं बन पाये।


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