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फुले : जिन्होंने तोड़ी हिन्दूवादी जड़तायें

11 अप्रैल : जाेती राव फुले जयंती


भारत मे आरम्भ से ही दो तरह की धाराएं चली आ रही थी। एक ब्राह्मणवादी धारा तो दूसरा समतावादी। इतिहास लेखन इन्ही धाराओं पर हुआ। बाद में विश्लेषण भी। वैसे महाराष्ट्र सन्तों और महापुरुषों की जमीन रही है। बावजूद इन सबके ब्राह्मणों, पेशवाओ, मराठो तथा सामन्तो ने सन्तों और महापुरूषों का लिहाज न कर अपनी ही तानाशाही चलाई, जो दलितों, पिछड़ो, और महिलाओं के लिए दुखद अध्याय था। वे पंडितों तथा पुरोहितों से परेशान थे। ऐसे समय जोती राव का जन्म हुआ था। उन्होंने समता और स्वतंत्रता के लिए शोषणकारी व्यवस्था को बदलने का व्यापक आंदोलन चलाया।

जोती राव फुले की एक पेंटिंग

उन्नीसवीं सदी में भारत मे जो समाज सुधारक तथा समाज विचारक हुए उनमें जोती राव का व्यक्तित्व अलग था। उनकी दृष्टि एक क्रांतिकारी चिंतक की थी। वे बहुजन समाज का सिर्फ सुधार नही चाहते थे बल्कि उनमें चेतना भी जगाना चाहते थे। वे आरम्भ से ही शिक्षा को महत्व देते थे। ऐसा इसलिए कि उन्होंने पढे लिखे ब्राह्मणों की काली करतूतों को नजदीक से देखा ही नही बल्कि झेला भी था। स्त्री हो या पुरुष वे सभी के लिए वे समान शिक्षा के हिमायती थे। उन्होंने कहा भी है-

विधा के अभाव से मति नष्ट हुई

मति के अभाव से नीति नष्ट हुई

नीति के अभाव से गति नष्ट हुई

गति के अभाव से वित्त नष्ट हुआ

वित्त के अभाव से शुद्रों का पतन हुआ

इतना अनर्थ अकेले अविधा के कारण हुआ

ऐसी शख्सियत का जन्म 11 अप्रैल, 1827 को पुणे की माली जाति के परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम गोविंद राव तथा माता का चिमनाबाई था। उनके पिता फूलों की खेती करते थे। इसलिए उनका परिवार फुले नाम से प्रसिद्ध हो गया था।

फुलेवाड़ा स्थित जोती राव फुले के आवास को संग्रहालय बना दिया गया है। यहां प्रदर्शित एक तस्वीर जिसमें वह सावित्री बाई फुले के साथ बच्चियों को पढा रहे हैं। (एफपी ऑन द रोड, 2017)


उस समय समाज में हिन्दू वर्चस्ववादी जड़तायें थीं। द्विज मनुवादी मनुस्मृति तथा वेद पुराणों का समर्थन करते थे। स्वयं अपने परिवार की औरतों को भी जानवरों से ज्यादा नही समझते थे। महिलाओं को पढ़ाने के हक में नहीं थे। महिलाओं को पर्दे में रहना पड़ता था। सबसे पहले महिलाओं को पढ़ाने की शुरुआत जोती राव ने अपने घर से ही की। उनका विवाह सावित्री से हुआ, जो अनपढ़ थीं। अपनी पत्नी को ही उन्होंने पढ़ाने की शुरुआत की। हालांकि इस कार्य मे उन्हें बहुत परेशानी भी हुई।।ब्राह्मणों के बहकावे में आकर उनके पिता ने पति-पत्नी दोनों को घर से निकाल दिया। वह समय पति पत्नी के लिए कष्ट से भरा था। लेकिन जोती राव ने हिम्मत नही हारी। वे सतत प्रयास करते रहे और अंत मे सफल हुए। महिलाओं विशेष रूप से लड़कियों को पढ़ाने लिखाने के लिए एक नही लगभग बीस स्कूल उन दोनों ने मिलकर खोले और व्यवस्थित रूप से उन स्कूलों को चलाया भी।

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महिलाओं की मुक्ति की दिशा में जोती राव का यह पहला कदम था। इसके बाद वे इस संघर्ष को घर के बाहर ले गए। पहले अपनी बस्ती फिर दूसरी बस्तियाें,,शहर और राज्य। उस समय ब्राह्मणों को दक्षिणा दी जाती थी। जिसकी शुरुआत शिवाजी ने 1674 की थी। देखा गया कि झूठे और चरित्रहीन ब्राह्मण भी यह धार्मिक खैरात लेते थे। जो विमर्श और संघर्ष का विषय बन गया था। जून 1849 में पुणे के ब्राह्मण गोपाल हरि देशमुख ने इस प्रथा का विरोध किया। जोती राव ने उन्हें सहयोग दिया। और उन्हें सफलता मिली।

फुलेवाड़ा में जोती राव फुले के घर के अंदर एक पेंटिंग (एफपी ऑन द रोड, 2017)

अब तक ब्रिटिश सरकार को भी जोती राव की प्रतिभा और उनके द्वारा किये जा रहे समाज सुधार कार्यो के बारे में जानकारी मिल चुकी थी। अतः ब्रिटिश सरकार ने उनके द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किये जा रहे कार्यो के लिए उन्हें  सार्वजनिक रूप से सम्मानित करने का निर्णय लिया। इस तरह 16 नवम्बर,1852 को पुणे के विश्राम बाग वड़ा में एक विशेष समारोह का आयोजन हुआ। जिसमें उन्हें शाॅल के साथ पुष्पमाला देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर उनके मित्रों, प्रशंसकों का आना हुआ। जिन्हें अच्छा लगा। पर ब्राह्मणों को बुरा लगा। वजह यह कि तब तक संस्कृत पंडितों को ही शाल देकर सम्मानित किया जाता था।

बहुजन समाज के बच्चों में शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से जोती राव ने 16 दिसम्बर 1853 को बम्बई के गवर्नर सर विस्काउंट फाकलैंड को प्राथना पत्र भेज कर विद्यालय निर्माण के लिए पुणे में भूखण्ड तथा धनराशि की मांग की। कुछ माह बाद ही उनकी यह मांग मान जी गयी और विद्यालय का निर्माण किया गया। जोती राव एक शिक्षक और समाज सुधारक ही नही थे। वे एक साहित्यकार आैर नाटककार भी थे। 1855 में उन्होंने तृतीय रत्न नाम से नाटक भी लिखा। इसके माध्यम से उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा भगवान के नाम पर समाज में फैलायी जा रही झूठी धारणाओं तथा अंधविश्वास का पर्दाफाश किया।

एक महत्वपूर्ण प्रसंग के अनुसार पुणे नगरपालिका की स्थापना 1 जून, 1857 हुई। सभी सदस्य सरकार द्वारा नियुक्त किये जाते थे। इनमें बहुजन समाज का कोई सदस्य न था। फुले ने इस बारे में आवाज उठाई । बाद में जोती राव फुले की नियुक्ति नगरपालिका सदस्य के रूप में हुई। वे 1876 से 1882 तक पुणे नगरपालिका के सदस्य रहे। इसके सदस्य के रूप में उन्होंने बहुत से सुधार कार्य करवाये।

1885 के आरभ में उन्होंने एक दो पुस्तिकाओं का लेखन किया। उनमें से एक ‘अछूतो की कैफियत’ थी। यह पुस्तिका एक तरह से  अछूतों की शोचनीय स्थिति पर केंद्रित थी। बड़ोदा के नरेश सयाजीराव गायकवाड़ ने उनके बारे में कहा था,”बहुजन समाज का अज्ञान दूर करके उन्हें नया जीवन दान देने वाले ज्योति राव प्रथम व्यक्ति है। उनका कार्य विशाल है। जिस मार्ग पर वे चले, उसका अनुसरण कर राष्ट्र का कल्याण होगा।”

1885 में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। जाेती राव ने कहा कि जब तक कांग्रेस बहुजन जातियों के कल्याण के लिए ईमानदारी से कोई कार्य नही करती है तब तक कांग्रेस को राष्ट्रीय मानना गलत है।

27 नवम्बर,1890 को उनका स्वास्थ्य अत्यधिक बिगड़ गया। जोती राव ने ऐसे समय परिवार के लोगों को पास बुलाया और हर एक को नि:स्वार्थ भावना से अपने कर्तव्य पालन का उपदेश दिया। 28 नवम्बर, को प्रातः उन्होंने प्राण त्याग दिए। लेकिन उन्होंने जो महान कार्य किये, उन सब के कारण वे अमर हो गए। कहना न होगा कि वे इतिहास में दर्ज हो गए। उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक गुलामगिरी तो साहित्य ही नही बल्कि आंदोलन के इतिहास में बहुजन दस्तावेज के रूप में याद की जाएगी। जहाँ उन दिनों हिन्दुओं के अनेक संगठन चल रहे थे और वे सिर्फ दिखावे के लिए ही थे। जोती राव ने सत्यशोधक समाज की स्थापना कर बहुजन समाज को एकता के सूत्र में बांधा।


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