फॉरवर्ड प्रेस

साजिश कर रहा आरएसएस, सत्ता मिली तो कर दूंगा ‘बैन’

बहुजन आजाद पार्टी (बाप) के संस्थापक सदस्यों में एक विक्रांत वत्सल पर आरएसएस से जुड़े होने का आरोप लगा है। फारवर्ड प्रेस के संपादक (हिंदी) नवल किशोर कुमार से साक्षात्कार में उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया और फुले-आंबेडकर के विचारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दुहराई। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि आरएसएस हिंदू आतंकवादियों को पैदा करने वाला संगठन है। प्रस्तुत है साक्षात्कार का संपादित अंश :

आप पर आरएसस से जुड़े होने का आरोप लगाया जा रहा है। आप क्या कहेंगे?

एक बात मैं बताना चाहूंगा। जब मैं आईआईटी में प्रवेश की तैयारी कर रहा था तब मुझे फिजिक्स में बहुत ज्यादा दिलचस्पी थी। फिजिक्स के किसी कॉन्सेप्ट को समझने के लिए मैं तीन-चार लेखकों की किताबें पढ़ा करता था। इनमें एससी वर्मा, डीसी पाण्डेय और एनसीईआरटी की किताबें शामिल थीं। इनके जरिए मैं फिजिक्स के जटिल सवालों को समझता था। राजनीति को समझने के लिए भी मैंने वैसा ही किया। प्रेरणा बाबा साहब आंबेडकर से मिली। जब बाबा साहब को पढ़ा तब यह जाना कि बदलाव के लिए राजनीति एक मास्टर की (चाबी) है। वह कहते थे कि बदलाव राजनीति के बगैर नहीं हो सकती।

मैंने विभिन्न संस्थाओं में जाकर उनके कार्य करने के तरीके को समझने की  कोशिश की, उन संस्थाओं के लोगों से मिलना शुरू किया। उसी संदर्भ में मैं आरएसएस के लोगों से भी मिला था। और कुछ तस्वीरें जो फैलाई जा रही हैं, वे उसी समय की हैं। पुरानी तस्वीरों को लेकर हमारे मित्र हमारे खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे हैं। मैं ऐसे किसी भी संगठन अथवा दल में दो या तीन से अधिक रहा ही नहीं। खासकर आरएसएस को लेकर मेरी यह समझ बनी है कि यह कुछ और नहीं एक आतंकवादी संगठन है, जो प्रतिदिन हिंदू आतंकवादी पैदा करता है! और जिस ढंग से वह एक प्रोपेगेंडा के तहत हिंदुत्व को फैला रहा है, वह हमारे समाज के लिए बहुत ही घातक है। उनकी यह सोच वैज्ञानिक दृष्टिकोण के उलट है। हम व्यक्तिगत तौर पर यह सोचते हैं कि अगर देश की भलाई करनी है, तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण का डेवलपमेंट होना चाहिए। और इसको फैलाना चाहिए।

आप पर जो आरोप लगाए जा रहे हैं, उनमें एक यह है कि जिन अमित सिंह के साथ मिलकर आपने कोचिंग संस्थान चलाया उनका संबंध आरएसएस से था

हमारी एक एजुकेशन बेस्ड कंपनी है। जिनके बारे में आप बता रहे हैं, वे बहुत पहले ही हमारी कंपनी छोड़कर चले गए। कंपनी में उनके अलावा और बहुत सारे लोग काम कर रहे थे। हर व्यक्ति का अपना व्यक्तिगत जीवन होता है। वे किस संस्था से जुड़े रहे हैं,  ह मुझे बहुत ज़्यादा पता नहीं है। और ऐसा नहीं है… एक ऑर्गेनाइजेशन में बहुत लोग काम करते हैं, कौन किस संस्था से जुड़ा है इस पर बहुत ज़्यादा कंट्रोल नहीं हो सकता है। उनका अपना व्यक्तिगत झुकाव हो सकता है। वह किसी भी संगठन के प्रति हो सकता है।  मेरा उनसे कोई लेना-देना नहीं।

जिन दिनों आपने कोचिंग संस्थान शुरू किया था, क्या उन दिनों भी आपके अंदर पॉलिटिक्स में आने की इच्छा थी?

नहीं। मैं बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के औराई प्रखंड के जिस गाँव से आता हूँ, उस गाँव में 70 प्रतिशत ब्राह्मण हैं। मैंने बचपन में भी बहुत भेदभाव झेला है। जैसे कि मैं एक उदाहरण यह देना चाहता हूँ कि मैं छठी क्लास में था और वह गर्मी का समय था। मॉर्निंग क्लास के बाद लगभग 11 बजे मैं घर लौट रहा था। मुझे रास्ते में प्यास लगी, तो मैं एक ब्राह्मण के घर के सामने (दरवाजे पर) लगे चापाकल पर पानी पीने चला गया। दूर से ही एक बुजुर्ग ब्राह्मण चिल्लाते हैं कि सोल्हकन इस चापाकल पर पानी नहीं पी सकता है। उन्होंने वहाँ से मुझे भगा दिया। मैं इससे काफी आहत हुआ और अपनी माँ को इस बारे में बताया। मुझे लगा था कि समाज में बहुत ज़्यादा अन्याय और भेदभाव है। कहीं न कहीं मैंने उसी समय ठान लिया था कि मैं इसे बदलूँगा। दूसरा प्रकरण यह है कि जिस स्कूल से मैं पढ़ा वह 2006 में बागमती नदी में आई बाढ़ में डूब गया। स्कूल के 768 बच्चों में से केवल चार सवर्ण बच्चे ही मैट्रिक में रजिस्टर्ड थे। मतलब यह कि हमारा स्कूल असल में हम दलितों और पिछड़ों का था। उस स्कूल को आजतक बंद रखा गया है। तो आप समझ सकते हैं कि ब्राह्मणवादी विचारधारा हमारे खिलाफ किस हद तक षड्यंत्र करती है और हमारे बच्चों को पढ़ने से रोका जा रहा है। उस स्कूल के लिए हम बहुजन समाज के लोगों ने चार दिन तक भूख हड़ताल (अनशन) किया तब जाकर गवर्नमेंट के द्वारा जमीन उपलब्ध करायी गयी। उस जमीन पर ब्राह्मण लोग खेती करते हैं और स्कूल भवन को  बनने नहीं दिया जा रहा है। इससे समझ सकते हैं कि शिक्षा व्यवस्था के प्रति ब्राह्मणों की क्या विचारधारा है। वे नहीं चाहते हैं कि बहुजन समाज के बच्चे पढ़ें और आगे बढ़ें। क्योंकि उनको डर है कि कोई दूसरा विक्रांत वत्सल पैदा हो जाएगा।

विक्रांत, दो-तीन तस्वीरें सामने आई हैं। इनमें से एक तस्वीर में आप पूजा कर रहे हैं। दूसरी तस्वीर किसी रक्तदान शिविर का है, जहाँ पर तथाकथित भारत माता की तस्वीर लगी है, आप उसके साथ हैं। यह क्या माजरा है?

मैं खुद ही आप से पूछना चाहता हूं कि अगर कोई आंबेडकरवादी है, तो उन्हें फॉलो करने के लिए क्या क्या गाइडलाइंस हैं। यह कि मैं बाबा साहब को किस-किस ग्राउंड पर फॉलो कर सकता हूँ? मैं पूजा न करूँ? अगर वह चाहते हैं कि बाबा साहब को पढ़ने के बाद मैं पूजा न करूँ तो मैं उस पूजा को आज से बंद कर रहा हूँ। मैं नहीं करूँगा पूजा! अगर वह चाहते हैं कि मैं बाबा साहब और पूजा में से किसी एक को चुनूँ तो मैं बाबा साहब को चुनूँगा। मैं आज से ही पूजा को त्याग दूँगा। मैं हिंदू धर्म के खिलाफ नहीं जा रहा हूँ। लेकिन मैं पूजा करना जरूर बंद कर दूँगा। अगर इस वजह से मुझ पर उंगलियां उठाई जा रही हैं कि बाबा साहब को अगर फॉलो करते हैं, तो पूजा नहीं कर सकते तो मैं बिल्कुल पूजा नहीं करूँगा।

आपका जुड़ाव आम आदमी पार्टी से भी रहा है?

नहीं। एक्चुअली उस समय कांग्रेस की सरकार थी और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कॉमनवेल्थ घोटाला हुआ और अन्ना हजारे का आंदोलन हुआ। भ्रष्टाचार के इन मुद्दों से कहीं न कहीं हम युवा भी प्रभावित हुए। यह पाँच-छह साल पहले की बात है। मेरी उम्र बहुत ज्यादा नहीं है। मैं 26 साल का ही हूँ। तो एक तरह से मैं उस समय 20-21 साल का युवा था। और फिर पूरा देश अन्ना आंदोलन में साथ आ गया था भ्रष्टाचार के खिलाफ। सब एकजुट हो गए थे। तो उस समय मैं आम आदमी पार्टी के तरफ आया था, लेकिन कहीं न कहीं मैंने आम आदमी पार्टी में समय देने के बाद यह पाया कि यहाँ भी बीजेपी और कांग्रेस की तरह ब्राह्मणवादी विचारधारा के लोग ऊपरी पोजीशन पर हैं, जो रेगुलेट करते हैं पूरी पार्टी को। वही पैटर्न आम आदमी पार्टी में आ गया और बहुजनों का वहाँ भी जो प्रतिनिधित्व होना चाहिए, वह बिल्कुल नहीं था। इसलिए मैं आम आदमी पार्टी से बिल्कुल अलग हो गया। तीन साल हो गए। मैंने आम आदमी पार्टी से कोई संबंध नहीं रखा है।

जिस तरीके से आप पर आरोप लगाए जा रहे हैं, क्या यह साजिश है? और अगर यह साजिश है तो वे कौन लोग हैं, जो यह कर रहे हैं? किन लोगों को आपसे खतरा है?

यह साजिश है…  बिल्कुल-बिल्कुल! आप अगर आरएसएस के काम करने के तरीके को देखेंगे तो उनके काम करने का तरीका ही यह रहा है कि वे कभी भी  कंस्ट्रक्टिव (सृजनात्मक) नहीं रहे हैं। वे उत्पादक नहीं रहे हैं। विनाश करना ही उनका काम हमेशा से रहा है। जैसे कि मालेगाँव में वे खुद ही विस्फोट करते हैं और आरोप लगा देते हैं हमारे माइनॉरिटीज भाइयों पर कि ये उन्होंने किया है। और इस प्रकार देश में सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश करते हैं।

कहीं न कहीं 2 अप्रैल के भारत बंद को लेकर जिस तरह से आईआईटी के हम 50 छात्र बिहार में सक्रिय थे, आरएसएस को हम लोगों से एक खौफ लगा कि अगर छह महीने ये आईआईटीयन रह जाते हैं, तो पूरे बिहार में ये हम लोगों को जड़ से उखाड़कर फेंक देंगे। क्योंकि ये वैज्ञानिक दृष्टिकोण फैला देंगे। जबकि हमलोगों का धर्म प्रोपेगेण्डा है, इन लोगों को कैसे काउंटर करेंगे। हम लोगों की दाल नहीं गलेगी। यह आरएसएस की ही एक तरह से पूरी चाल है और वे बहुजनों के बीच संदेह का वातावरण बनाना चाहते हैं। जबकि वे भ्रम में हैं। हम लोगों ने दिल जीत लिया है। भारत बंद में हमलोगों ने दिन-रात मेहनत किया है, लोगों के बीच में जाकर। और फिर उसके बाद आंबेडकर जयंती हुई थी, तब हम लोगों ने जगह-जगह जाकर बाबा साहब के बारे में बताया। सभाएँ की। तो आरएसएस वाले लोग अपने मंसूबों में विफल रहेंगे। उनकी दाल नहीं गलेगी।

आप यह कह रहे हैं कि जितने आरोप लगाए जा रहे हैं उसके पीछे आरएसएस है?

बिल्कुल। इनका इतिहास रहा है। ये गोडसे की पूजा करने वाले लोग हैं। हमेशा से ही देश को तोड़ने का काम इन लोगों ने किया है। देश में सद्भाव बिगाड़ने का आरएसएस का इतिहास रहा है। ये खुद देशद्रोही हैं। लेकिन एक तरह से देश भक्ति का चोला पहनकर देश को बांटने का काम कर रहे हैं। और हम लोग अगर सरकार में आते हैं, तो हम आरएसएस को बैन कर देंगे।

(लिप्यांतर : प्रेम बरेलवी, कॉपी एडिटर : अशोक)

 


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