बहुजन साहित्य की वैचारिकी

दलित, ओबीसी, आदिवासी, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और अन्य वंचित तबकों के साहित्य को अपने में समेटे बहुजन साहित्य की अवधारणा रूपाकार ले रही है। बहुजन साहित्य के वैचारिक स्रोतों की शिनाख्त कर रहे हैं मोहनदास नैमिशराय :

द्विज वर्चस्व को अलग-अलग स्तरों पर दलित, ओबीसी, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय चुनौती देते रहे हैं, लेकिन उनमें सामूहिक बोध नहीं था। वे अलग-अलग स्तर पर अपनी-अपनी लड़ाई लड़ रहे थे जिससे सवर्ण सत्ता पर उतना प्रभाव नहीं हो रहा था। लेकिन अब एकजुटता का स्वर उभर रहा है। लेकिन एक अन्तर्धारा के तौर पर यह स्वर पहले से मौजूद रहा है। इस स्वर को बनाने में बहुजन समाज के अनेक व्यक्तित्वों ने महती भूमिका निभाई है। बहुजन चेतना की नींव रखने वालों में ऐसा ही एक महत्वपूर्ण नाम है चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु का।

बहुजन चेतना के प्रसिद्ध हस्ताक्षर एवं समाजदर्शी चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु साहित्यिक वैभव से परिपूर्ण थे। जिज्ञासु जी पुस्तकें लिखते थे, पुस्तकें पढ़ाते थे और अभियान चलाकर पुस्तकों की बिक्री किया करते थे। जैसे पुस्तकें लिखना उनका मिशन था, वैसे ही पुस्तकें बेचना भी पर यह उनका व्यापार या व्यवसाय नहीं था। किसी व्यक्ति द्वारा पुस्तकें मांगने पर वे पुस्तकें उन्हें पहले भेजा करते, कीमत उनको बाद में मिलती, किसी-किसी से नहीं भी मिलती। वे छोटी-छोटी पुस्तकें इस कारण लिखते कि आम पाठक उसे खरीद सकें और आसानी से पढ़ सकें। उनका प्रयास होता कि लोग बुद्धिवादी बनें। बाबासाहब डॉ. आंबेडकर, पेरियार रामासामी तथा गौतम बुद्ध को जानें और उनके बताये रास्तों पर चलें।

दलित-बहुजन से जुड़े कैलेंडर बेचती एक महिला

जिज्ञासु जी की उपलब्धि यह रही कि उन्होंने बौद्ध धर्म और संबंधित साहित्य का लेखन-प्रकाशन किया। उनका रचना संसार कई श्रृंखलाओं में सामने आया। उनकी पहली और मुख्य पुस्तकआंबेडकर साहित्यथा। जिसके अंतर्गत डॉ. आंबेडकर की जीवनी, उनका जीवन संघर्ष तथा उनकी मूल रचना का हिंदी अनुवाद था। इस कार्य को उन्होंने बड़ी शिद्दत के साथ पूरा किया क्योंकि वे जानते थे कि उन दिनों उत्तर भारत का अधिकांश दलित समाज अशिक्षित था। कुछ लोग हिंदी में पुस्तकें तो पढ़-लिख सकते थे लेकिन वह अंग्रेजी साहित्य से भी परिचित हों, इस हेतु उन्होंने आंबेडकर साहित्य का हिंदी में अनुवाद किया, जिनमें प्रमुख रहे बाबासाहब के ‘पंद्रह व्याख्यान’, ‘जाति भेद का उच्छेद’, ‘बाबासाहब की भविष्यवाणी’,  अछूत कौन और कैसे’,भारत विभाजन और पाकिस्तान’, ‘कास्ट्स इन इंडिया’ (भारत में जातिवाद), ‘अछूतों की विमुक्ति एवं गांधी जी’, ‘हू वेयर शूद्राज’ (शूद्रों की खोज), ‘व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स’ (कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया?) जैसी उनकी पुस्तकों को अधिकांश दलितों ने और पिछड़ों ने भी पढ़ा।

मेरे भीतर यह सवाल बार-बार उठता है कि पिछड़ी जाति के कितने ऐसे साहित्यकार, चिंतक, शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता तथा राजनीतिज्ञ होंगे, जिन्होंने कहा होगा कि हम तुम्हारा हिंदू धर्म छोड़ते हैं तथा तुम्हारी वर्ण-व्यवस्था, परंपराओं, संस्कृति, प्रथाओं से मुक्त होना चाहते हैं? हालांकि कुछ ने ऐसा कहने/लिखने की हिम्मत जुटाई थी। आरंभ से देखें तो दक्षिण में पेरियार रामासामी, बिहार में  से शहीद जगदेव प्रसाद जिन्होंने शोषित समाज दल का गठन करते समय नारा दिया था सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है। दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा। लखनऊ से छेदीलाल साथी (पिछड़ा आयोग के सदस्य), कानपुर से रामस्वरूप वर्मा (अर्जक संघ), कानपुर से ही ललई सिंह यादव जिन्होंने पेरियार की क्रांतिकारी किताबरामायण : ए ट्रू रीडिंगका सच्ची रामायण के नाम से अनुवाद किया था।

जब 1968 में यह किताब छपी तो हिंदी क्षेत्र में जैसे तहलका मच गया। 1969 में उ.प्र. सरकार ने इस पुस्तक को जब्त कर लिया, लेकिन एटा-मैनपुरी के दलित लेखक और पत्रकार सुंदरलाल सागर एडवोकेट के प्रयासों से 1971 में हाई कोर्ट द्वारा सच्ची रामायण की जब्ती की आज्ञा निरस्त हुई।

लखनऊ के चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु, कलवार जाति से थे और बाबासाहब डॉ. आंबेडकर के साहित्य के प्रचार-प्रसार में उनकी अहम भूमिका रही। लखनऊ से ही पिछड़ी जातियों के नेता शिवदयाल सिंह चौरसिया थे, उनके माध्यम से 1928 में यूपी बैकवर्ड क्लासेस लीग की स्थापना हुई। वे कांशीराम के गुरु के रूप में भी जाने जाते हैं।

बिहार से आर.एल. चंदापुरी, 1948 के मार्च माह में चंदापुरी से नई दिल्ली जाकर प्रतिनिधिमंडल के साथ बाबासाहब डॉ. आंबेडकर से मिले थे और उनको पटना आने का न्योता दिया। नवंबर 1951 में बाबासाहब जब बिहार के दौरे पर (पटना) आए तो उन्होंने उनके कार्यक्रमों की व्यवस्था में विशेष भूमिका निभाई थी। इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में बहुजन साहित्य का अंकुर मौजूद है, जिसे बाद में प्रमोद रंजन जैसे युवा चिन्तकों ने परिभाषित करने की कोशिश की।

प्रमोद रंजन के शब्दों में हम कहें तो, बहुजन साहित्य की अवधारणा अपने आप में एकदम सीधी है – अभिजन के विपरीत बहुजनों का साहित्य। जैसा कि ढाई हजार साल पहले बुद्ध ने कहा था – बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय। लेकिन इस संबंध में कुछ महत्वपूर्ण चीजों को भी ध्यान में रखना चाहिए। बहुजन साहित्य बहुसंख्यकों का साहित्य जरूर है, लेकिन यह बहुसंख्यकवाद का साहित्य नहीं है। इसका आधार संख्याबल नहीं, बल्कि इसके विपरीत सामाजिक और सांस्कृतिक वंचना के पक्ष में जिस सामूहिक-सामुदायिक-सांप्रदायिक चेतना का निर्माण मनुवाद करता है, बहुजन साहित्य उसके विरुद्ध विभिन्न सामाजिक तबकों की प्रतिनिधि आवाज है। यह साहित्य समाज के उस अंतिम आदमी का साहित्य है, जो किसी भी प्रकार की वंचना झेल रहा है। यह न सिर्फ आर्थिक वंचना और अस्पृश्यता के सवाल को उठाता है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक शोषण के विविध रूपों को भी चिह्नित करता है।

जैसा स्वयं प्रमोद रंजन इस किताब में  बहुजन साहित्य : एक बडी छतरी” शीर्षक लेखक के तहत लिखते हैं, “‘बहुजन साहित्यकी अवधारणा का जन्म फारवर्ड प्रेस के संपादकीय विभाग में हुआ तथा इसका श्रेय हमारे मुख्य संपादक आयवन कोस्का, आलोचक व भाषाविज्ञानी राजेंद्र प्रसाद सिंह तथा लेखक प्रेमकुमार मणि को है। यह पिछले लगभग डेढ़ वर्षों में हमारे बीच चले वाद-विवाद और संवाद का नतीजा था। सबसे पहले श्री कोस्का ने, जब मैं फारवर्ड प्रेस में मई, 2011 में संपादक (हिंदी) नियुक्त हुआ, मुझे अपनेओबीसी साहित्यसंबंधी विचार से परिचित करवाया, बाद में राजेंद्र प्रसाद सिंह भीओबीसी साहित्यकी अवधारणा लेकर सामने आए थे, लेकिन प्रेमकुमार मणि ने इस शब्दावली का घनघोर विरोध किया था। मैं भी इस शब्दावली से सहमत नहीं था। मैंने उस समयओबीसी साहित्यकी जगहशूद्र साहित्यकहने का प्रस्ताव रखा था।शूद्रशब्द संस्कृत और हिंदू धर्म द्वारा प्रदत्त है तथा शूद्रों तथा अतिशूद्रों की एक लंबी साहित्यिक परंपरा भी हिंदी पट्टी में मौजूद रही है। अंतत: हमबहुजन साहित्यनाम की एक बड़ी छतरी के नाम पर सहमत हुए और अप्रैल, 2012 में फारवर्ड प्रेस ने पहलीबहुजन साहित्य वार्षिकीप्रकाशित की। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उस वार्षिकी की चर्चा हुई।

अपने इसी आलेख में प्रमोद रंजन कबीर और रैदास के साहित्य तथा जोतीराव फुले और आंबेडकर के चिंतन में समानताओं का उल्लेख भी करते हैं। वे आगे यह भी लिखते हैं कि अतिशूद्रों, शूद्रों और आदिवासियों तथा स्त्रियों के बीच मुख्य समानता उन्हें मनुवादी व्यवस्था द्वारा प्रताड़ित किए जाने तथा उसके विरुद्ध उनका संघर्ष है। यह समानता ही इसके साहित्य कोबहुजन साहित्यके खाते में रखती है।

अपने तीसरे आलेख, “एक अवधारणा का निर्माणकालमें वे लिखते हैं, “जोतीराव फुले और आंबेडकर दोनों ने मुख्य रूप से अलग-अलग शब्दावली में शूद्रों-अतिशूद्रों तथा स्त्री की गुलामी और इससे मुक्ति के लिए इनकी एकता की बात की है। हिंदी मेंबहुजन साहित्यका जन्म प्रकारांतर से इसी विचार के सांस्कृतिक-सामाजिक आधार की खोज की जरूरत पर बल देने के लिए हुआ है। वर्ष 2012 में जब हमने पहली बार बहुजन साहित्य वार्षिकी प्रकाशित की थी, उस समय यह विचार बहुत नया था, इसलिए कुछ हिंदी लेखकों को इस बारे में समझाना कठिन साबित हुआ था, लेकिन पिछले दो सालों में स्थितियां काफी बदली हैं तथा अनेक पत्रिकाओं ने इस विषय पर चर्चा की है। इस विचार के लिए हमारी प्रशंसा और निंदा दोनों खूब हुई। साहित्य की दुनिया में निंदा भी चुप्पी से भली होती है।

बुद्ध की एक पेंटिंग

पिछले लगभग 2500 सालों के ज्ञात इतिहास के नायकों को देखें बुद्ध, कौत्स, मक्खली गोशाल, अजित केशकंबली, कबीर, रैदास, शाहूजी महाराज, जोतीराव फुले, डॉ. आंबेडकर, राम मनोहर लोहिया, कांशीराम। दक्षिण भारत के नायकों को छोड़ भी दिया जाए तो भी यह सूची बहुत लंबी हो सकती है। वैसे इनमें से अधिसंख्य मध्यवर्ती सामाजिक समुदायों में पैदा हुए हैं। दूसरी बात यह स्पष्ट दिखती है कि ये नायक चाहे मध्यवर्ती जातियों में पैदा हुए हों या दलित जातियों में, सबने इन दोनों समुदायों तथा स्त्रियों की साझी गुलामी से मुक्ति की बात की। आज की परिस्थितियों में वर्तमान व्यवस्था की सबसे अधिक मार खा रहे आदिवासी भी इस अवधारणा के अंतर्गत आएंगे।

उनका मानना है कि दलितों के साथ-साथ सिद्ध साहित्य में कई ओबीसी रचनाकार हैं। मीनपा मछुआरे हैं। कमरिपा लोहार हैं। तंतिया तंतवा जाति से आते हैं। चर्पटीपा और कंतालीया क्रमश: कहार और दर्जी हैं। मेकोपा, मलिपा, उधलिया आदि वैश्य वणिक हैं। तिलोपा तेली हैं। जाहिर सी बात है कि मछुआरा, लोहार, तंतवा, कहार, दर्जी, बनिया, तेली आदि जातियां ओबीसी में आती हैं।

संत साहित्य और ओबीसी

इस पुस्तक में शामिल राजेन्द्र प्रसाद सिंह कहते हैं कि, संत काव्यधारा में दलितों की संख्या सर्वाधिक है, परंतु यह स्थापना देते वक्त हम ओबीसी रचनाकारों को भूल-सा जाते हैं, वरना संत साहित्य ऐसे रचनाकारों से भरा पड़ा है। सिर्फ महाराष्ट्र में ही नामदेव (दर्जी) के अतिरिक्त गोरा (कुम्हार), सावता (माली), नरहरि (सोनार), सेना (नाई), राका (कुम्हार) जैसे कई ओबीसी रचनाकार हुए हैं। हिंदी में त्रिलोचन (वैश्य), अखा (सोनार), सदन (कसाई), चरणदास (वैश्य), पलटूसाहब (बनिया), बुलासाहब (कुर्मी), धर्मदास (वैश्य), सिंगाजी (ग्वाल), सुंदरदास (खंडेलवाल वैश्य) आदि जैसे संत ओबीसी रचनाकार हैं। महिलाओं में भी वैश्य होने के नाते सहजोबाई और दयाबाई जैसी कवयित्रियां ओबीसी हैं। संत काव्यधारा में दो दरियादास हुए। बिहारवाले दरियादास दर्जी परिवार से आते हैं और मारवाड़वाले धुनिया हैं। दर्जी और धुनिया- ये दोनों जातियां ओबीसी की सूची में हैं। दादूदयाल भी मुस्लिम धुनिया हैं। मुस्लिम धुनिया भी ओबीसी में उसी तरह शामिल हैं, जैसे मुस्लिम धोबी, चीक, पमरिया आदि जातियां शामिल हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हिंदी का संत साहित्य मुख्यत: ओबीसी और दलित रचनाकारों द्वारा लिखित साहित्य है।

इस बारे में वे जोतीराव फुले, साहूजी महाराज, पेरियार, ललई सिंह यादव तथा रामस्वरूप वर्मा का संदर्भ देना नहीं भूलते। इसी आलेख में वे बताते हैं कि कोल्हापुर के राजा शाहूजी महाराज ने कैसे अपने राज्य में सबसे पहले दलितों-पिछड़ों के लिए 51 प्रतिशत आरक्षण देकर हर क्षेत्र में समतामूलक समाज की स्थापना की शुरुआत की। इसी तरह से हरिनारायण ठाकुर अपने आलेख में ओबीसी साहित्य का स्वागत करते हुए इसके अच्छे भविष्य की संभावना व्यक्त करते हैं। वहीं जयप्रकाश कर्दम लिखते हैं, “इससे अच्छी कोई बात नहीं हो सकती कि असमानता, अन्याय, अस्पृश्यता और शोषण के विरुद्ध दलित और ओबीसी सबकी एक सामूहिक आवाज हो। महत्वपूर्ण होगा कि ओबीसी लेखक ब्राह्मणवादी-सामंतवादी साहित्य और साहित्यकारों के प्रभाव और छाया से बाहर निकलें।

बहुजन साहित्य के संदर्भ में हम अश्विनी कुमार पंकज, कंवल भारती, मुसाफिर बैठा, अरविंद कुमार, संजीव चंदन, अनिता भारती, संदीप मील, वामन मेश्राम, अरुंधति राय आदि को शामिल कर सकते हैं जिन्होंने इस अवधारणा के पक्ष में अपने तर्क दिये हैं। इनके अलावा शरण कुमार लिंबाले तथा दिवंगत राजेन्द्र यादव ने भी अपने-अपने साक्षात्कार में इसका समर्थन करने का संकेत दिया है।

कांशीराम की याद

इस किताब से गुजरते हुए मुझे कांशीराम की याद आती रही। मैं स्वयं उनके साथ 1976-77 में रहा। उनसे बहुत कुछ सीखा। आजादी के बाद राष्ट्रीय स्तर पर अगर बहुजन समाज को किसी ने गंभीरता से एक मंच पर लाने की जद्दोजहद की, तो वे कांशीराम जी ही थे। न सिर्फ राजनैतिक रूप से बल्कि साहित्यिक स्तर पर भी बहुजन समाज के विभिन्न भाषाभाषी साथियों को भी एक साथ लाने का अभियान आरंभ हुआ। गुजराती, मराठी, पंजाबी, हिंदी, अंग्रेजी आदि भाषाओं में पत्र-पत्रिकाएं आरंभ की गईं। पूरे देश में उसका प्रभाव हुआ। बहुजन समाज के नये लेखक, कवि, नाट्यकारों के भीतर लिखने की भूख कांशीराम जी ने जगाई। कहना न होगा कि बहुजन साहित्य के माध्यम से सामाजिक बदलाव का सैलाब आया। साहित्य और सांस्कृतिक प्रयासों से इतिहास के वे बंद अध्याय खुले, जिनमें ब्राह्मणवादी इतिहासकारों से लेकर चिंतकों और आलोचकों ने हमारे नायकों को बंद कर रखा था। काश सत्ता पर आसीन मायावती उस सैलाब को महसूस करतीं और राजनीति के इतर कांशीराम जी के सपनों को पूरा करने का प्रयास करतीं तो आज तस्वीर कुछ और होती।

ऐसा बहुजन समाज के कुछ अन्य राजनीतिज्ञों (जो कभी सत्ता में रहे) के बारे में भी कहा जा सकता है जिनमें से अधिकांश ने सिर्फ राजनीति के मंचों से सवर्ण नेताओं को गालियां दी। लेकिन साहित्यिक और सांस्कृतिक मोर्चे पर वे असफल रहे। असफलता की बात ही क्या उन्होंने इस बारे में कभी कुछ सोचा ही नहीं। कुछ करते भी कैसे? हिंदुत्व से छुटकारा ही नहीं ले सके।

खैर राजनीतिज्ञ दलित या बहुजन इतिहास, साहित्य और अस्मिता के लिए कुछ करें या न करें, इधर दो-तीन वर्षों से देखा गया है कि बहुजन समाज के बुद्धिजीवियों ने अपने ऐतिहासिक नायकों, महापुरुषों के जन्मदिन से लेकर उनके परिनिर्वाण दिवस के अवसर पर उन्हें याद करने और पत्र-पत्रिकाओं के साथ फेसबुक पर आलेख के बहाने उस महत्त्वपूर्णटर्निंग प्वाइंटको आगे बढ़ाया है, जिससे नई पीढ़ी को भरपूर प्रेरणा मिली है। उम्मीद की जाती है कि जैसे-जैसे बहुजन समाज की नई पीढ़ी अपने नायकों तथा महापुरुषों के बारे में पढ़ेगी-लिखेगी वैसे-वैसे हिंदुत्व की कोख से उभरती अन्यायी परंपराओं तथा प्रथाओं को ध्वस्त करने की ताकत उनमें आएगी। बहुजन समाज के बीच जद्दोजहद का यह पहला चरण होगा। दूसरा चरण होगा, हिंदू धर्म को छोड़ कर बौद्ध धर्म स्वीकार करना। अगर ऐसा हुआ तो पिछड़ी जातियों और ओबीसी के लिए यह मुक्ति दिवस होगा। तभी बहुजन साहित्य की सार्थकता होगी।

 

(कॉपी एडिटर : अशोक/नवल)            


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  2. फारवर्ड प्रेस Reply
  3. Krishan kant Reply

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