दलित दर्शन की वैचारिकी : दलित विमर्श के विविध आयाम

दलित आंदोलन अपने भीतर समग्र बहुजन-श्रमण परंपरा को समाहित करता है। दलित वैचारिकी का दर्शन क्या है, इससे परिचित कराने की एक गंभीर कोशिश बी. आर. विप्लवी ने अपनी किताब दलित दर्शन की वैचारिकी में किया है। इस किताब की महत्ता पर रोशनी डाल रहे हैं, अलख निरंजन :

आधुनिक भारतीय इतिहास में जिस सामाजिक समूह को महात्मा जोती राव फुले ने ‘अतिशूद्र’ की संज्ञा से सम्बोधित किया, 1911 में ब्रिटिश जनगणना आयुक्त ने गैर हिन्दू के रूप में चिन्हित किया, डॉ. भीमराव आंबेडकर ने ‘आउटकास्ट’ कहा तथा संवैधानिक शब्दावली में जिन्हें ‘अनुसूचित जाति’ कहा जाता है, उनको ही आज के समाज वैज्ञानिक दलित कहते हैं। इनके द्वारा चलाये गये आन्दोलन को ‘दलित आन्दोलन’ कहा जाता है। इस आन्दोलन का अपना स्वयं का ताप और तेवर है, अपनी भाषा-शैली, अपना साहित्य तथा समृद्धशाली वैचारिक परम्परा भी है। बी.आर. विप्लवी की हालिया प्रकाशित पुस्तक ‘दलित दर्शन की वैचारिकी’ इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए, दलित आन्दोलन को वैचारिक मजबूती प्रदान करने का एक सफल प्रयास है।

समीक्षित पुस्तक ‘दलित दर्शन की वैचारिकी’ का मुख पृष्ठ

हिन्दी साहित्य प्रेमियों और दलित आन्दोलन के लिए बी.आर. विप्लवी एक जाने माने शायर व विचारक के साथ-साथ बहुत अच्छे इंसान भी हैं। भारतीय रेल में मुख्य अभियन्ता जैसे महत्वपूर्ण पद पर सेवारत होते हुए सामाजिक सरोकारों से प्रतिबद्ध साहित्य सृजन विप्लवी जी ने किया है। विप्लवी जी मूलतः हिन्दी की ग़ज़ल विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। इस विधा में इनके तीन संग्रह ‘तश्नगी का रास्ता’, ‘सुबह की उम्मीद’ और ‘प्रवंचना’ पहले ही प्रकाशित हो चुके हैं। ‘दलित दर्शन की वैचारिकी’ निबन्ध संग्रह है, जो गद्य शैली में प्रकाशित होने वाली लेखक की पहली रचना है। 275 पृष्ठों की इस पुस्तक का प्रकाशन वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली ने किया है। इसमें कुल 14 लेख संग्रहित हैं जो विभिन्न कालखण्डों में लिखे गये हैं।

इस संग्रह के प्रथम लेख का शीर्षक है ‘बेचत फिरै कपूर’। ‘बेचत फिरै कपूर’ पद्यांश कबीर का दोहा

बिन देखे वहि देस की बात करत है क्रूर,

आपै खारी खात है, बेचत फिरै कपूर।

से लिया गया है। कबीर इस दोहे के माध्यम से ऐसे दर्शन के प्रचारकों पर कड़ा हमला बोलते हैं और उन्हें क्रूर की संज्ञा से विभूषित करते हैं, जो स्वर्ग-नरक, पुनर्जन्म, आदि अनदेखी जगत की सुख-सुविधाओं का लालच दिखाकर साधारण जन को लौकिक सुख-सुविधाओं से विरक्त रहने का सन्देश देते हैं जबकि स्वयं लौकिक जगत की सुख-सुविधाओं में डूबे रहते हैं। लेखक इस दोहे में व्यक्त विचारों से इत्तेफाक रखते हुए ऐसे प्रचारकों को वर्तमान समय में भी चिन्हित करते हैं तथा उनसे सामान्य जन को सावधान रहने की सलाह देते हैं। कबीर जिस दर्शन के भ्रमजाल से बचने की सलाह देते हैं, उसकी जड़े बहुत गहरी हैं। इस दर्शन का मूलतत्त्व है धोखा देना, छल करना तथा छल प्रपंच को महिमामण्डित करना। विष्णु द्वारा राजा बलि का राज्य छल से छीना जाना, द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य का अंगूठा माँग लेना, दशरथ के पुत्र राम द्वारा छुपकर बालि की हत्या जैसे उदाहरणों से ब्राह्मण साहित्य भरा पड़ा है। यह परम्परा आज भी चल रही है लेखक ने अपने लेख में इसका जिक्र किया है। इस संग्रह का दूसरा लेख ‘मिथकीय धुंध में छिपा इतिहास’ लेखक की विश्लेषणात्मक क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण है। मिथकों में से इतिहास को अलग करना, भारतीय इतिहास लेखकों के समक्ष एक गम्भीर चुनौती है। लेखक ने इस निबन्ध में दलितों, वंचितों के इतिहास को खोजने का श्रमसाध्य प्रयास किया है। पौराणिक आख्यानों, शिलालेखों और भाषा-विज्ञान व गम्भीर विश्लेषण के माध्यम से भारत के जन इतिहास पर जमी मिथकों की धुंध को साफ करने का प्रयास इस लेख में किया गया है।

पुस्तक के लेखक बी. आर. विप्लवी

कबीर, लेखक के पसंदीदा नायक हैं। इस पुस्तक में संग्रहित सभी लेखों  पर कबीर की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है तथा चार लेख कबीर के इर्द-गिर्द लिखे गये हैं। ‘दलित प्रतिरोध और कबीर की कविता’ के अन्तर्गत शोषित जनता के प्रतिरोधी स्वरों को कबीर की बानियों में खोजने का प्रयास किया गया है। ‘निर्गुण सन्तों की दलित वैचारिकी’ नामक लेख में सन्त रैदास, भीखा साहेब, पल्टू साहेब, दादू दयाल, मलूकदास के साथ सन्त कबीर को भी प्रमुखता से चिन्हित किया गया है। ‘बुद्ध-कबीर-आंबेडकर: वैचारिक शंकायें एवं समाधान’ नामक लेख में कबीर को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। लेखक का मत है कि बुद्ध-कबीर-आंबेडकर की वैचारिक कड़ियाँ आपस में इस तरह गुँथी हुई हैं कि किसी एक के बारे में किसी रूप में भी किसी बिन्दु पर भी बातचीत की जाए तो अन्य दोनों का सन्दर्भ आना अपरिहार्य है। ईसा के छः सौ साल पहले बुद्ध द्वारा जिन आर्थिक-सामाजिक-राजनैतिक मूल्यों की समाजवादी सोच को धार्मिक ताने-बाने के जरिए स्थापित किया गया, उन्हीं मूल्यों को मध्यकाल में कबीर ने स्थापित करने का प्रयास किया। आगे चलकर डॉ. भीमराव आंबेडकर ने उन मूल्यों को संवैधानिक प्रावधानों में अन्तनिर्दिष्ट किया। इतने लम्बे समयान्तराल में विशेष वैचारिक मूल्यों को समझने में कई तरह की भ्रान्तियाँ और शंकायें लाजिमी हैं। इस लेख में इन्हीं शंकाओं और भ्रान्तियों को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। कबीर पर लिखे गये चौथे लेख का शीर्षक है ‘कबीर-साहित्य के सामाजिक सरोकार।’ इस लेख में भारतीय दर्शन की आध्यात्मिक परम्परा का विवेचन विश्लेषण किया गया है।

‘बहुजन का सर्वनाम’ नामक लेख में बुद्ध के दर्शन को व्याख्यायित किया गया है तथा दलित राजनेताओं की ‘बहुजन से सर्वजन’ की वैचारिक यात्रा पर सवाल उठाया गया है। ‘आंबेडकरी मिशन का सामाजिक रूपान्तरण: मा. कांशीराम’ नामक लेख में कांशीराम के कार्यों और विचारों पर प्रकाश डाला गया है। दलित आन्दोलन के समक्ष उपस्थित वर्तमान चुनौतियों का जिक्र ‘समाज शिक्षा के जरिए सामाजिक न्याय’ एवं ‘शोषण-मुक्ति का धार्मिक विकल्प’ नामक लेखों में किया गया है। स्त्री और दलित प्रश्न पर हिन्दी कविता को कठघरे खड़ा करते हुए लेखक ने दलित नजरिए से ‘मेरिट’ को नये सिरे से परिभाषित करने वाले लेखों को इस पुस्तक में स्थान दिया है।

दलित आन्दोलन के वैचारिक पक्ष को मजबूत करने वाली यह पुस्तक तमाम खूबियों से भरी पड़ी है। विषय-वस्तु गूढ़ होते हुए भी भाषा की सहजता एवं सरलता इस पुस्तक को पठनीय बना देती है। सभी तथ्य सन्दर्भ सहित दिये गये हैं। कबीर के दोहों का प्रयोग प्रचुर मात्रा में किया गया है। यह पुस्तक दलित आन्दोलन की वर्तमान स्थिति और इसकी वैचारिक विरासत को समझने के लिए महत्वपूर्ण पुस्तक के रूप में रेखांकित किये जाने योग्य है।

(कापी एडिटिंग- इमामुद्दीन)

पुस्तक : दलित दर्शन की वैचारिकी

लेखक : बी.आर. विप्लवी

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन

मूल्य : 275 रुपए


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