फॉरवर्ड प्रेस

‘हमारा देश, हमारा राज’ का आंदोलन बना पत्थलगड़ी

झारखंड में आदिवासी पत्थलगड़ी आंदोलन के जरिए ‘अबुआ दिशुम, अबुआ राज’ यानी ‘हमारा देश, हमारा राज’ का नारा बुलंद कर रहे हैं। पुरखों के मरने के बाद उनकी स्मृति में पत्थर गाड़ने की यह परंपरा अब राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़ गयी है। लिहाजा इसे कुचलने के सारे प्रयास किये जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर इस आंदोलन का असर अब छत्तीसगढ़ व अन्य आदिवासी बहुल राज्यों में देखा जाने लगा है।

पत्थरगड़ी आंदोलन के दौरान गाड़े गए एक पत्थर के पास तीर-धनुष के साथ एक वृद्ध

झारखंड में इस आंदोलन के दमन के लिए सरकार द्वारा आंदोलन से जुड़े लोगों पर कई धाराओं के तहत केस बनाकर समाज में विद्रोह पैदा करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि इसके बावजूद यह आंदोलन तेज होता जा रहाहै। यही वजह है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास पत्थलगड़ी को लेकर काफी परेशान दिख रहे हैं। वे कहते हैं कि पत्थलगड़ी राष्ट्रद्रोही शक्तियों के इशारे पर हो रहा है जो गैरसंवैधानिक है। उन्होंने यहां 50 से ऊपर जनसंख्या वाले गांवों में विकास समितियों का गठन करने को कहा है। इसमें उल्लेख किया गया है कि समिति की अध्यक्ष महिला ही होगी। संस्था के माध्यम से गांव के लिए पैसा दिया जाएगा। लेकिन इस समुदाय के पैराकार कहते हैं यह सब समुदाय को तोड़ने का षड्यंत्र भर है। यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं सरकार उनकी जमीन को हड़पना चाहती है।

यह भी पढ़ें : पत्थलगड़ी आंदोलनारियों की मांगें जायज, सरकार बंद करे गिरफ्तारी : बाबूलाल मरांडी

उल्लेखनीय है कि पत्थलगड़ी आदिवासियों की रूढ़ी प्रथा के तहत ग्रामसभा के रूप में संविधान में भी शामिल है। पत्थलगड़ी को लेकर मीडिया में पुष्ट और अपुष्ट दोनों तरह की खबरें आ रही हैं। अपनी पारंपरिक संस्कृति को बचाने के लिए इस समुदाय के लोगों पर देशद्रोही तक के आरोप लग रहे हैं। इन खबरों को लेकर आदिवासी समुदाय काफी नाराज है। गांववासी कहते हैं कि मीडिया संस्थान अपुष्ट खबरें छाप रही है। हम अपनी बात लिख कर देते हैं तो भी वे उसे उलट छाप देते हैं।

क्या है पत्थलगड़ी

पत्थलगड़ी आदिवासी समाज की एक पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था है। गांव में किसी बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश प्रतिबंधित है, कारोबार तो दूर की बात है। जब तक ग्रामसभा प्रवेश की इजाजत नहीं देता तब तक यहां कोई व्यक्ति नहीं जा सकता। पत्थलगड़ी एक तरह से आदिवासी समाज की स्वायत शासन व्यवस्था है। इस व्यवस्था को अंग्रेजी हुकूमत ने संवैधानिक मान्यता दी थी।

संग्राम बेसरा, सेवानिवृत्त अधिकारी, झारखंड सरकार

इस बारे में झारखंड के सेवानिवृत प्रशासनिक अधिकारी संग्राम बेसरा कहते हैं कि ‘जब अंग्रेजी हुकूमत आदिवासी क्षेत्रों में अपना वर्चस्व कायम करने में असफल रही तो उसने 1872 में संताल परगना टेन्डेंसी एक्ट (एसपीटी) कानून बनाकर मांझी परगना प्रथा को मान्यता दे दी। इसी समुदाय के कुछ लोगों को जमींदारी देकर लगान की वसूली की। वहीं छोटानागपुर क्षेत्र में 1908 में छोटानागपुर टेन्डेंसी एक्ट बनाकर मांझी परगना प्रथा एवं मानकी मुंडा प्रथा की मान्यता दी। आजादी के बाद भारत सरकार द्वारा एसपीटी में सन् 1949 में संशोधन तो किया गया लेकिन ग्रामसभा के तहत स्वशासन की परंपरा के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं हुई।

बिरसा मुंडा की धरती पर एक वर्ष पूर्व से इन क्षेत्रों में पत्थलगड़ी का काम चल रहा है। 21 फरवरी 2018 को ग्रामीणों ने कुरूंगा गांव से कुछ दूर आगे 25 पुलिसकर्मियों की टीम को घेर लिया और 4 घंटे तक बंधक बनाए रखा। पत्थलगड़ी को लेकर कुरूंगा गांव के ग्राम प्रधान सागर मुंडा को पुलिस गिरफ्तार कर अड़की थाना ले जा रही थी। सागर मुंडा पर पुलिस को बंधक बनाने का आरोप है। इनके खिलाफ मामला भी दर्ज है। अपने प्रधान को हिरासत में लिए जाने की खबर के बाद ग्रामीणों ने पुलिसकर्मियों को बंधक बना लिया और तब तक नहीं छोड़ा जब तक खूंटी जिले के जिला मुख्यालय से एसपी व डीसी ने घटनास्थल पर पहुंचकर सागर मुंडा को छोड़ने का आदेश नहीं दिया।

 

सामूहिक एकता इस समुदाय के लोगों में कूट-कूट कर भरी है। मुसीबत के समय सभी एक हो जाते हैं। इससे पूर्व 25 अगस्त 2017 को खूंटी थाना क्षेत्र के कांकी सिलादोन गांव के लोगों ने खूंटी के डीएसपी रणवीर कुमार सहित पुलिस टीम को बंधक बना लिया था। ग्रामीणों और पुलिस के बीच हल्की झड़प भी हुई थी। इस क्रम में पुलिस को फायरिंग भी करनी पड़ी थी। करीब 24 घंटे के बाद बंधक बने पुलिसकर्मियों को मुक्त कराया गया।    

9 मार्च 2018 को पत्थलगड़ी के एक वर्ष पूरे होने पर खूंटी के भंडरा के स्थानीय बाजारटांड़ में एक सभा का आयोजन किया गया था। आदिवासी महासभा के यूसुफ पूर्ति ने कहा कि ‘पारंपरिक पत्थलगड़ी हम आदिवासियों की परंपरा है। इसमें हम संवैधानिक अधिकारों को अंकित कर रहे हैं। इसे गलत बता कर हमें देश विरोधी बताया जा रहा है। जो हमारी पारंपरिक स्वशासन पर हमला है।’  

यह भी पढ़ें : देशद्रोही नहीं हैं पत्थलगड़ी आंदोलनकारी : सोहन पोटाई

पेसा और पत्थलगड़ी

झारखंड के 16022 गांव, 2074 पंचायत, 131 प्रखंड, 13 जिले पूरी तरह एवं 3 जिले आंशिक रूप से पेसा के तहत आते हैं। राज्य में पेसा (प्रॉविजन आफ पंचायत एक्शटेशन टू शिड्यूल एरिया  1996 एक्ट) कानून पूरी तरह से लागू नहीं है। राज्य सरकार ने इसे लागू करने की नियमावली ही नहीं बनाई है। इस कारण ग्रामसभाओं के पास अधिकार ही नहीं हैं। सरकार केवल पंचायती राज कानून में पेसा के प्रावधानों को रखने का दावा कर रही है। ऐसे में ग्राम पंचायतों और पारंपरिक ग्राम सभाओं के अधिकारों को लेकर विरोधाभास उत्पन्न हो रहे हैं।

भारत सरकार ने पांचवीं अनुसूची के तहत आनेवाले आदिवासी बहुल इलाकों में स्वशासन का विशेष प्रावधान करते हुए 1996 में पेसा यानी (पंचायत उपबंध विस्तार अनूसूची क्षेत्र) में अधिनियम को लागू किया तथा इसे राज्य को एक साल के भीतर ऐसा ही कानून विधानसभा से पारित करना था। मगर राज्य सरकार ने पेसा जैसे कानून बनाने की जगह 2001 में पंचायती राज अधिनियम बनाकर अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत की सीटों को आदिवासियों के लिए आरक्षित कर दी। जबकि पेसा में ग्राम पंचायत को हटाकर पारंपरिक ग्राम सभाओं को स्थानीय स्वशासन की संवैधानिक सत्ता के रूप में स्थापित करने की व्यवस्था है। नियमावली नहीं होने से पारंपरिक प्रधानों को अधिकार सम्पन्न नहीं किया जा सका है।

झारखंड मोमेंट्स कार्यक्रम के दौरान रतन टाटा के साथ क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी व मुख्यमंत्री रघुवर दास

गौरतलब है कि पत्थलगड़ी की पारंपरिक रिवाज के अनुसार ग्रामसभा की प्रधानी वंशजों को हस्तांतरित होती है। पिता के बाद पुत्र को ही ग्राम प्रधान के अधिकार मिलते हैं। यह सिलसिला चलता रहता है। मगर पेसा के तहत बनने वाली ग्रामसभा की अध्यक्षता उस गांव के प्रभावशाली आदिवासी समुदाय का प्रधान करता है।

थिंकटैंक को गिरफ्तार कर समुदाय में भय पैदा करना चाहती है सरकार

18 मार्च को झारखंड पुलिस द्वारा आदिवासी महासभा के थिंकटैंक माने जाने वाले तथा पत्थरगड़ी मामले को जोर शोर से उठाने वाले विजय कुजूर को दिल्ली के महिपालपुर से गिरफ्तार कर लिया गया। विजय कुजूर की गिरफ्तारी और अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर से इतना तो स्पष्ट हो चला है कि या तो सरकार संविधान पर ध्यान नहीं दे रही है या किसी बड़ी वजह से पत्थलगड़ी करने वालों के खिलाफ ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है कि आदिवासी समुदाय शासनतंत्र से इतना डर जाय कि सरकार के किसी भी फैसले का विरोध न कर सके।

वहीं अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के स्थानीय अध्यक्ष मुकेश बरुआ का कहना है कि पत्थलगड़ी को सही या गलत साबित करने के लिए सरकार और सिविल सोसाइटी कई तरह की वजह बता रहे हैं। सरकार कह रही है कि आदिवासी अफीम की खेती करते हैं। पुलिस कार्रवाई नहीं करे, इस डर से ये लोग संविधान से मिली कानूनी सुरक्षा का सहारा ले रहे हैं। वहीं सिविल सोसाइटी का कहना है कि सरकार को राज्य के कुछ इलाकों में सोना होने की बात पता चल गई है इसलिए सरकार जमीन लेने के लिए पुरजोर प्रयास कर रही है। सरकार अब तक भूमि बैंक के नाम पर 20 लाख 81 हजार एकड़ से ज्यादा जमीन ले चुकी है। जानकार बताते हैं कि इस कारण भी लोगों में असुरक्षा की भावना घर कर रही है और स्वशासन की मांग जोर पकड़ रही है।

गांववासियों का कहना है कि  25 अगस्त वाली घटना पर कि पुलिस प्रशासन ने यह खबर फैलाई कि इन लोगों का बांधकर बैठा दिया था। दरअसल में 24 अगस्त को कुछ पुलिस वाले बिना नम्बरप्लेट की गाड़ियों में बिना अनुमति आए। हम लोगों ने उन्हें बैठने को कहा और साथ में ग्रामसभा से इजाजत लेने की बात कही। यह सुनकर वे भागने लगे, भागते-भागते उन्होंने छः राउंड फायर किए और कुछ महिलाओं से गलत व्यवहार भी किया। अगले दिन अखबारों में खबर छपी कि गांव वालों ने पुलिसवालों को बंधक बनाकर रखा।

कौन है विजय कुजूर,  क्या-क्या हैं आरोप

टिस्को में कार्यरत विजय कुजूर आदिवासी इलाके में हाल के दिनों में एक बड़ा नाम बन कर उभरा है। खूंटी के बाद पूर्वी सिंहभूम व सरायकेला के गांवों में भी विजय कुजूर व उसके साथियों ने ग्रामसभा के अधिकार की अपनी संवैधानिक व्याख्या कर रखी है। स्कूल-कॉलेज व सार्वजनिक स्थलों की दीवारों पर लिखा है कि आदिवासी 2019 के चुनावों का बहिष्कार करेंगे। साथ ही यह भी लिखा कि आदिवासियों की परंपरा में चुनाव कराना असंवैधानिक है।

पिछले दिनों विशेष शाखा ने सरकार को एक रिपोर्ट भेजी थी, जिसमें कहा गया था कि सरायकेला जिले के इचागढ़ में सरकार के विरुद्ध भोलेभाले आदिवासियों को भड़काया जा रहा है। विशेष शाखा ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि टिस्को के कोलकाता ब्रांच में कार्यरत विजय कुजूर तथा रांची के डोरंडा थाना क्षेत्र की हुंडरू निवासी बबीता कच्छप के नेतृत्व में सरायकेला में पत्थलगड़ी की योजना बनाई जा रही है तथा इस संदर्भ में प्रत्येक रविवार को जमशेदपुर स्थित आशियाना गेट के पास ट्रायबल कल्चर सेंटर में बैठक कर आवश्यक निर्देश दिया जाता है।

खूंटी के कांकी गांव में 25 अगस्त को एसपी, डीएसपी और तीन दर्जन जवानों को बंधक बना कर घंटों रखा गया था। हरवे हथियार से लैस  होकर सरकारी कामकाज में बाधा डालने की घटना में विजय कुजूर नामजद अभियुक्त है। संविधान की गलत व्याख्या करने, प्रशासन के खिलाफ लोगों को भड़काने, सरकारी पदाधिकारियों व कर्मचारियों का घेराव कर प्रताड़ित करने को लेकर 24 जून 2017 को खूंटी थाने में कांड संख्या 102/17 दर्ज किया गया था। इसमें भी विजय कुजूर नामजद अभियुक्त हैं।

सरायकेला के ईचागढ़ थाने के जामदोहा व काटगोढ़ा गांव में करीब तीन माह पूर्व पत्थलगड़ी की गयी थी। प्राथमिकी में विजय कुजूर, बबीता कच्छप सहित अन्य कई नामजद आरोपी हैं। विजय कुजूर इन दनों शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की कोलकाता शाखा में जीएम के पद पर तैनात हैं।

सरकारी दखल, भूमि पर कब्जा करने की रणनीति

उल्लेखनीय है कि 16 फरवरी 2017 राज्य की राजधानी रांची में ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट मोमेंटम झारखंड का आयोजन हुआ था जिसमें केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली सहित केंद्रीय मंत्री वैंकेया नायडू, नितिन गडकरी, पीयूष गोयल, स्मृति ईरानी एवं देश -दुनिया से कई बड़े उद्योगपति शरीक हुए थे। कार्यक्रम में चीफ सेक्रेटरी राजबाला वर्मा ने अपने भाषण में झारखंड की संभावनाओं पर चर्चा की और कहा था कि ”इज ऑफ डूइंग बिजनेस में झारखंड टॉप पर है तो लेबर रिफॉर्म्स में भी झारखंड नंबर एक पर है और इंवेस्टमेंट के लिए जमीन सबसे अहम होती है, अत: राज्य सरकार ने लैंड बैंक बनाया है, जहां आज निवेश के लिए 2.1 मिलियन एकड़ जमीन उपलब्ध है।”

ऐसे में पत्थलगड़ी हो या पेसा कानून, रघुवर सरकार की कारपोरेट परस्त नीतियों के खिलाफ है और उसके पालन कर्ता सरकार की नजर में राष्ट्रविरोधी हैं।

दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के सलवा जुडुम के तर्ज पर इलाके के कतिपय आदिवासियों को पैसों का लालच देकर तोड़ने का काम किया जा रहा है। पत्थलगड़ी को विकास विरोधी बताया जा रहा है। इस काम में संघ का घटक वनवासी केन्द्र सक्रिय है।  

पत्थलगड़ी: महापाषाण युग से आज तक का सजीव इतिहास

पत्रकार, लेखक व आदिवासी मामलों के जानकार अश्विनी पंकज कहते हैं कि पत्थलगड़ी आदिम जातियों का हजारों वर्षों की परंपरा है और यह केवल झारखंड में नहीं है बल्कि पूरे विश्व के आदिवासी समुदायों में है। सरकार इनकी इस परंपरा को प्रतिबंधित करना चाह रही है। झारखंड की पत्थलगड़ी पर सबसे पहले टी. एफ. पेपे (1871 में) का ध्यान गया था जिसकी सूचना पर कर्नल डॉल्टन ने 1873 में लेख लिखा। पत्थलगड़ी की परंपरा पर दूसरा महत्वपूर्ण लेख रांची के प्रख्यात मानवशास्त्री सरत चंद्र राय का है जो 1915 में प्रकाशित हुआ। दुनिया भर के पुरातात्विक और इतिहासकार मानते हैं कि पत्थलगड़ी के निर्माता आदिवासी लोग हैं। एशिया क्षेत्र में पाए जाने वाले पत्थलगड़ी के निर्माता मुंडा समूह के आदिवासी हैं।

पत्थलगड़ी नदी घाटी सभ्यताओं के उदय से हजारों साल पहले की सभ्यताओं की सूचना देते हैं। जिसे महापाषाण सभ्यता या पाषाण काल के नाम से जाना जाता है। उत्तर-पूर्व के खासी, दक्षिण के नीलगीरी के आदिवासी और झारखंड के मुंडा लोग आज भी पत्थलगड़ी करते हैं।

झारखंड का विस्तृत संदर्भ देते हुए पत्थलगड़ी पर भाई सुभाशिष दास ने तीन महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं। इनमें एक ‘मेगालिथिक साइट्स ऑफ झारखंड’ है। परंतु बुलु इमाम पहले लेखक हैं जिन्होंने बड़कागांव के इस्को रॉक पेंटिंग की खोज के बाद इस ओर दुनिया का ध्यान खींचा।

पत्थलगड़ी 1997 से ही शुरू हो गयी थी

झारखंड के गांवों में पत्थलगड़ी 1997 से ही शुरू हो गयी थी। भारत जन आंदोलन के तत्वावधान में डॉ बीडी शर्मा, बंदी उरांव सहित अन्य लोगों के नेतृत्व में खूंटी, कर्रा सहित कई जिलों के  दर्जनों गांवों में पत्थलगड़ी की गयी थी। इसके बाद झारखंड (एकीकृत बिहार) के गांवों में एक अभियान की तरह शिलालेख (पत्थलगड़ी) की स्थापना की जाने लगी। डॉ बीडी शर्मा, बंदी उरांव, पीएनएस सुरीन सहित अन्य लोग इस काम में जुटे। गांवों में जागरूकता अभियान चलाया गया। पत्थलगड़ी पूरे विधि विधान के साथ की जाने लगी। पत्थलगड़ी समारोह चोरी छिपे नहीं, बल्कि समारोह आयोजित करके किया जाता था। इसकी सूचना प्रशासन को दी जाती थी। खूंटी सहित अन्य जिलों में आज भी उस समय की पत्थलगड़ी को देखा जा सकता है।

बस्तर के भूतपूर्व जिलाधिकारी व प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता बी. डी. शर्मा के प्रयासों से बना था पेसा कानून

डॉ बीडी शर्मा ने अपनी पुस्तिका ‘गांव गणराज्य का स्थापना महापर्व’ में लिखा है कि ”26 जनवरी से दो अक्तूबर 1997 तक गांव गणराज्य स्थापना महापर्व के दौर में हर गांव में शिलालेख की स्थापना और गांव गणराज्य का संकल्प लिया जायेगा। उन्होंने लिखा है कि हमारे गांव को 50 साल के बाद असली आजादी मिली है। यह साफ है कि आजादी का अर्थ मनमाना व्यवहार नहीं हो सकता है। जब हमारा समाज हमारे गांव में व्यवस्था की बागडोर अपने हाथ में ले लेता है, तो उसके बाद हर भली-बुरी बात के लिए वह स्वयं जिम्मेदार होगा और उसी की जवाबदेही होगी।”

आंदोलन को निष्प्रभावी करने का सरकारी शिगूफा

झारखंड सरकार ने हाल ही में एक नया शिगूफा छोड़ा है जिसमें राज्य के प्रत्येक गांव में सरकार ने विकास समिति गठित करने की घोषणा की गई है। जिन गांवों में आदिवासियों की संख्या पचास प्रतिशत या उससे अधिक है वहां आदिवासी विकास समिति बनाई जाएगी। मुख्यमंत्री रघुवर दास की घोषणा के अनुसार इस विकास समिति की अध्यक्ष महिला ही बनेगी और उसके सदस्य युवा होंगे। मुख्यमंत्री ने चन्दनकियारी में स्वर्गीय पार्वती चरण महथा की जयंती पर आयोजित विकास मेले में 26 फरवरी को बोलते हुए कहा कि अप्रैल से गांव के विकास का पैसा सीधे गांव समिति को दिया जाएगा।  

क्या हो सकते हैं संस्था के मायने

बहरहाल, यह एक तरह से पंचायती राज संस्था के समानांतर एक और संस्था खड़ा करने जैसा है। ऐसे प्रयास कई राज्यों में पहले भी हो चुके हैं। जिसके तहत राज्यों ने गांवों में कई तरह की अलग समिति बनाने के प्रयास किए जो कानूनन पंचायत के निगरानी में किया जाना चाहिए था। 2001 में खुद एनडीए के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने 27 अप्रैल, 2001 को पत्र लिखकर ऐसा करने से किया था। उन्होंने पत्र में लिखा, “कानून पास होने के बाद पंचायती राज और ग्रामसभा को संवैधानिक वैधता मिल गई है… पंचायती राज के समानांतर ऐसी संस्था नहीं बनाई जानी चाहिए जो संवैधानिक संस्था के लिए ही खतरा बन जाए।”

रांची के गैर सरकारी संगठन जल-जंगल-जमीन से जुड़े संजय बासु मलिक कहते हैं कि ऐसे प्रयास बहुत सालों से हो रहे हैं। पिछले दो सालों में इस दिशा में हो रहे प्रयास तेज हुए हैं। सरकार येन केन प्रकारेण आदिवासियों की जमीन लेने के प्रयास में है। सरकार ने पहले पुलिस बल का इस्तेमाल कर आदिवासियों को डराना चाहा पर सफल नहीं हुए तो अब आपसी मतभेद कराकर इन आदिवासियों को नियंत्रित करना चाहती हैं। अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के स्थानीय अध्यक्ष मुकेश बरुआ का कहना है कि सरकार ने यह प्रयास पहले ही शुरू कर दिया है। गांवों में कमल क्लब बनाया जा रहा है जो वैसे तो युवाओं के उज्ज्वल भविष्य की बात करता है लेकिन उसका उद्देश्य लोगों को बांटना ही है। इस क्लब के माध्यम से सरकार कुछ लोगों को फायदा पहुंचाकर अपने खेमे में करना चाहती है।

 

(कॉपी एडिटर – ब्रह्मदेव)


 

फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +919968527911, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें :

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार