फॉरवर्ड प्रेस

पत्रिकाओं को सूची से बाहर निकाले जाने के मामले में यूजीसी ने दिया स्पष्टीकरण

बीते दो मई को यूजीसी ने एक अधिसूचना जारी कर 4305 पत्र-पत्रिकाओं को अपनी सूची से बाहर कर दिया। जिन पत्रिकाओं को यूजीसी ने बाहर किया उनमें हंस, फारवर्ड प्रेस, इकोनामिक एंड पॉलिटिकल वीकली, वागर्थ आदि पत्रिकायें भी शामिल हैं। इस खबर को फारवर्ड प्रेस ने बीते 7 मई को एक खबर प्रकाशित की। खबर का शीर्षक था – ‘यूजीसी ने फारवर्ड प्रेस समेत प्रगतिशील व जातिवाद विरोधी कई पत्रिकाओं की मान्यता रद्द की’। बीते 9 मई को ‘द हिन्दू’ में प्रकाशित एक खबर के अनुसार यूजीसी ने पत्रिकाओं को सूची से बाहर करने के संबंध में स्प्ष्टीकरण दिया है। इस खबर का हिंदी में अनुवाद हम साभार प्रकाशित कर रहे हैं।

अनुमोदित सूची में से कुछ पत्रिकाओं के नाम हटाने पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का स्पष्टीकरण[1]

-विकास पाठक

नयी दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अपनी अनुमोदित सूची में से कुछ पत्रिकाओं का नाम हटाने के बाद उत्पन्न विवाद को देखते हुए स्पष्ट किया है कि नाम हटाने का मतलब जरूरी नहीं कि वे पत्रिकाएं निम्न स्तर की थीं। अनुमोदित सूची में दर्ज पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख नियुक्ति, पदोन्नति तथा शैक्षणिक समुदाय में प्रगति की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। यूजीसी का कहना है कि हो सकता है कि जिन पत्रिकाओं के नाम हटाए गए हैं उनमें से कुछ बुनियादी मानकों को न पूरा करती हों और जब वे इन्हें पूरा कर लें तो उन्हें फिर इस सूची में शामिल किया जा सकता है। एक विज्ञप्ति के जरिए यूजीसी ने कहा है कि 2 मई से पहले अर्थात जब इन पत्रिकाओं का नाम हटाया गया, अगर कोई लेख इन पत्रिकाओं में प्रकाशित है अथवा प्रकाशन के लिए स्वीकृत है तो उसे एपीआई (एकेडमिक परफारमेंस इंडिकेटर) संबंधी अंक प्राप्त होगा।

सूची से पत्रिकाओं के हटाने का काम दस सदस्यों की एक स्थायी समिति ने किया था जिनमें प्रोफेसर वी.एस.चौहान, (यूजीसी), सुरंजन दास (वाइसचांसलर, जादवपुर विश्वविद्यालय), राम सिंह (दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनामिक्स), जी.जे.वी. प्रसाद (जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय) तथा अन्य लोग शामिल थे।

विज्ञप्ति में बताया गया है कि ‘‘स्थायी समिति एक बार फिर यह कहती है कि किसी पत्रिका को इस सूची से हटाए जाने का अर्थ जरूरी नहीं कि उसका स्तर कम हो बल्कि उसे इसलिए भी हटाया गया होगा क्योंकि कुछ जानकारियां नहीं उपलब्ध होंगी। इन जानकारियों में संपादक मंडल का ब्यौरा, इंडेक्सिंग से संबंधित सूचना,पत्रिका शुरू होने का वर्ष, प्रकाशन की आवृत्ति और प्रकाशन की नियमितता आदि शामिल हैं।’’

इसमें यह भी कहा गया है कि ‘‘ध्यान देने की बात है कि पत्रिकाओं को इस सूची में शामिल रखने का एक बुनियादी मानक यह भी है कि इसकी कोई अपनी खुद की वेबसाइट है या नहीं। उपलब्ध वेबसाइट में पत्रिका का डाक का पूर्ण पता, प्रधान संपादक और संपादकों के ईमेल पते होने चाहिए और इन पतों में से कुछ ऐसे होने चाहिए जिनकी आधिकारिक तौर पर पुष्टि की जा सके। हो सकता है कि विश्वविद्यालयों द्वारा अनुशंसा प्राप्त कुछ पत्रिकाओं की अपनी वेबसाइट न हों या वेबसाइट हों भी तो उन्हें अपडेट न किया गया हो और इसलिए उन्हें अनुमोदित सूची से बाहर कर दिया गया हो। बावजूद इसके अगर वे बुनियादी मानकों को पूरा कर लेती हैं और विश्वविद्यालयों द्वारा फिर से अनुशंसा प्राप्त कर लेती हैं तो उन्हें दोबारा सूची में शामिल करने पर विचार किया जा सकता है।’’

अनुमोदित सूची में प्रारंभ में उन पत्रिकाओं को शामिल किया गया था जो स्कोपस, वेब ऑफ साइंस और इंडियन साइटेशन इंडेक्स में शामिल हैं। बाद में उन पत्रिकाओं को भी इस सूची में डाल दिया गया जिन्हें विद्वत समुदाय की अनुशंसा प्राप्त थी।

(अनुवाद : आनंदस्वरूप वर्मा)

[1] http://www.thehindu.com/news/national/ugc-justifies-removal-of-journals-from-approved-list/article23828327.ece


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