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रजनी तिलक : हम सोने के लिए नहीं, जागने के लिए बने हैं

रजनी तिलक (27 मई 1958 – 30 मार्च 2018) पर विशेष

रजनी तिलक से मेरा कब परिचय हुआ, इसकी न तारीख याद है और न वर्ष। यह भी पता नहीं कि वह अवसर क्या था? दिमाग पर बहुत जोर डालने के बाद भी मैं वर्ष और तारीख का पता लगाने में कामयाब नहीं हो सका। यादों का अंबार इतना बड़ा है कि उसे समेटना एक किताब में भी संभव नहीं। उसकी चिट्ठियां ही इतनी सारी हैं कि अगर मैं उनका संकलन कर दूँ, तो उसी से उसका जीवन-संघर्ष सामने आ जायेगा। कितनी सारी मुलाकातें हुई हैं, कि गिनती नहीं की जा सकती। दिल्ली में पीतमपुरा, रोहिणी, तीमारपुर, मॉडल टाउन और वजीराबाद के मकानों में, मुलाकतें हुई हैं, वहां ठहरा हूँ। राजघाट में गाँधी दर्शन केंद्र के उसके कार्यालय में, अनीता भारती के शालीमार बाग़ के घर में, दरिया गंज में, कनाट प्लेस में, पैदल टहलते हुए, होटलों में लंच करते हुए, कॉफी पीते हुए. रांची में, नागपुर में, हिंगनघाट में, हैदराबाद के सोशल फोरम में, लखनऊ में, कालका के एचएमटी परिसर में, मेट्रो में, ट्रेनों में, बसों में, और अनगिनत कार्यक्रमों में उसके साथ बोलने-बतियाने, लड़ने-झगड़ने और हास-परिहास के ढेरों किस्से हैं। कितनी ही बार मेरे दिल्ली जाने पर वह मुझे स्टेशन लेने आती और जब मैं वापिस आता, तो वह खुद भी स्टेशन या बस अड्डे तक साथ आती। जितना आत्मीय और पारिवारिक रिश्ता रजनी से मेरा बना, वैसा रिश्ता आज तक किसी व्यक्ति से नहीं बना। हम दोनों ऐसे दोस्त थे कि एक दूसरे से अपना सुख-दुःख साझा करते रहते थे। जब मोबाइल नहीं आया था, तब उसके पास पेजर हुआ करता था। एक बार दिल्ली के किसी टॉकिज में हम कोई पिक्चर देख रहे थे। उसके पेजर पर किसी का मैसेज आया। तब तक मैंने पेजर नाम के यंत्र को नहीं देखा था। संचार के हर आधुनिक माध्यम का वह उपयोग करती थी। पेजर ज्यादा आम नहीं हुआ था। कुछ कामकाजी लोगों के पास ही वह हुआ करता था। अभी तक वह पत्रों का ही युग था। और वह पत्र ही लिखा करती थी। जब मोबाइल युग आया, तो फिर हमारी बातें सामाजिक और व्यक्तिगत विषयों पर फोन पर होती रहती थीं। वह बहुत भावुक इंसान थी, जो अपने मिशन के साथ-साथ अपने परिवार से बहुत प्यार करती थी। उसके जीवन में एक समय ऐसा भी आया था, जब उसके परिवार में दरार पड़ी। उसकी बहिन अनीता भारती से मुकदमेबाजी हुई, सत्या और उसके बीच, जो उसे मां मानकर उसके पैर छूता था, उसे अवैध सम्बन्धों के आरोप झेलने पड़े, जिसमें उसकी बेटी ज्योति तक ने माँ का साथ छोड़ दिया था। इन घटनाओं से वह इतनी विचलित और व्यथित हुई थी कि फोन पर बात करते हुए फफक पड़ती थी। तब मैं उसे कहता था, ‘रजनी, तुम्हारी कद्र ये लोग तुम्हारे बाद करेंगे।’ और सचमुच वह इस दुनिया से जाने के बाद सबको अपना कद बता गयी, परिवार के उन सदस्यों को भी, जो उसके महत्व को समझते ही नहीं थे। उसके परिवार के कई लोग मुझसे वैर रखते थे, शायद उसकी बेटी भी, और इसका कारण यही था कि मैं रजनी के साथ खड़ा था।

रजनी तिलक (27 मई 1958 – 30 मार्च 2018)

रजनी तिलक से मेरे झगड़े बहुत हुए। और इसका कारण यह था कि मैं एनजीओ की संस्कृति के खिलाफ था, जबकि रजनी एनजीओ चलाती थीं। मैं कहता था कि तुम अमेरिका की फोर्ड फाउंडेशन से पैसा लेकर जनता के प्रतिरोध को खत्म कर रही हो। यह समझ मुझमें एशिया फोरम के दौरान ही विकसित हो गयी थी। मैं उससे कहता था कि तुम लोग अमेरिका के पैसे से भूख और गरीबी पर सेमिनार करते हो, पर क्या लोगों की भूख और गरीबी मिटी? वह मुझसे नाराज हो जाती थी। लेकिन एनजीओ का नशा इस कदर हावी था कि उसकी खातिर उसने और उसके भाई अशोक भारती दोनों ने अपनी-अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी थी। पैसा अच्छे-बुरे दोनों परिणाम देता है। इसके बुरे परिणाम से उनके परिवार में भी अशोभनीय घटनाएँ हुई थीं। इस सबसे रजनी तिलक अंदर से टूट-सी गई थी। और शायद एनजीओ से भी उसने दूरी बना ली थी।

किन्तु मैं रजनी से सबसे ज्यादा प्रभावित उसके साधारण रहन-सहन और जमीनी स्तर पर उसके असाधारण कार्य से था। रजनी तिलक दिल्ली की पहली लेखिका थी, जिसने दिल्ली में उस दौर में दलित साहित्य की कार्यशालाएं चलायी थीं, जब हिंदी में दलित विमर्श शुरू ही हुआ था। इनमें से एक-दो में मुझे भी शिरकत करने का मौका मिला था। ये बहुत सार्थक कार्यशालाएं हुआ करती थीं, जिनमें बाबा साहब डा. आंबेडकर के दलित आन्दोलन और दलित साहित्य के इतिहास पर चर्चाएं होती थीं। ये कार्यशालाएं किसी भव्य सभागार में या सेमिनारों के रूप में नहीं होती थीं, बल्कि वे अक्सर किसी के घर में एक बहुत ही छोटे से कमरे में जमीन पर बैठकर होती थीं। एकाध कार्यशाला में मैंने डा. कुसुम वियोगी और हीरालाल राजस्थानी को भी देखा था। ऐसी कार्यशालाएं अब नहीं होतीं, हालांकि इनकी अब भी जरूरत है।

एक वाकया याद आता है। दलित साहित्य पर एक कार्यक्रम अशोक भारती और रजनी तिलक ने कालका के एचएमटी में किया था। उसमें मेरे सिवा मोहनदास नैमिशराय ने भी भाग लिया था। कार्यक्रम काफी अच्छा रहा था। नैमिशराय ने दलित साहित्य के आलोचकों को खूब खरी-खरी सुनाई थीं। वहां छाया खोब्रागड़े भी थी। वहीँ मेरी मुलाकात मार्क्सवादी विचारक कामरेड लश्कर सिंह से हुई थी। वह सरदार थे, और मोहाली में रहते थे। उनकी एक बेटी पेशे से डाक्टर थी, और क्रांतिकारी विचारों की थी। उसका वहां जोरदार भाषण हुआ। लंच टाइम में वह मुझे अपने साथ अपने घर मोहाली ले गये। रास्ते में उनकी बेटी का क्लीनिक पड़ा। दस मिनट के लिए वहां रुके। उसके बाद उनके घर गये। वहाँ मैं उनका विशाल पुस्तकालय देखकर दंग रह गया। वहीं तय किया कि इसका उपयोग करने के लिए एक बार यहाँ जरूर आना है। पर आना तो हुआ, और अपने-उनके परिवार के साथ शिमला का पहला कार्यक्रम भी उन्हीं के साथ बना था, पर उनके पुस्तकालय का उपयोग करने का अवसर कभी नहीं मिला। खैर, लश्कर सिंह के साथ एचएमटी वापिस आये। दूसरे सत्र की समाप्ति के बाद हम कुछ लोग हाईवे के एक खोखे पर चाय पी रहे थे। चाय पीते हुए छाया खोब्रागड़े ने मेरे साथ शिमला जाने का कार्यक्रम बनाया। वह शिमला जाने वाला हाईवे था। छाया ने कहा, सुबह निकलते हैं, और शाम तक वापिस आ जायेंगे। उस समय तक मैंने शिमला नहीं देखा था। इसलिए उत्कंठा भी थी कि अवसर मिल रहा है, तो चलो घूम ही आते हैं। हम दोनों एक ओर भीड़ से अलग हटकर बातें कर रहे थे। उसी वक्त रजनी का प्रवेश हो गया। छाया ने उसे देखकर मुझे कुछ भी न बताने का संकेत किया, पर मैं उसके संकेत को समझ ही नहीं सका, और मैंने रजनी को छाया के साथ शिमला जाने का कार्यक्रम बता दिया। यह सुनकर तो रजनी मुझ पर ऐसे बिगड़ी, जैसे मैं कोई बड़ा पाप करने जा रहा था। मैं हक्का-बक्का, हैरान! वह छाया से लड़ने लगी। पर छाया किसी भी कीमत पर अपना कार्यक्रम निरस्त करने को तैयार नहीं थी। विरोध के बावजूद वह मुझे साथ ले जाने के लिए दबाव बनाने लगी। पर रजनी का भी अल्टीमेटम था कि मैं शिमला नहीं जा सकता। खैर छाया को तो जाना ही था, वह उसी शाम शिमला के लिए निकल गयी। मैंने रजनी का मान रखा, और नहीं गया। इसकी एक वजह यह भी थी कि मेरी दोस्ती रजनी से थी। छाया से तो यह मेरी दूसरी मुलाक़ात थी, और वह भी रजनी के कारण ही थी।

 

दलित लेखकों के साथ रजनी तिलक (दायें से दूसरे स्थान पर) 

हम रात को एचएमटी भवन के हाल में ही जमीन पर बिस्तर लगाकर सोये, मर्द-औरतें सभी उसी हाल में। रात के 12 बजे तक गाते-बतियाते रहे, और सुबह तड़के ही रजनी ने सबको उठाना शुरू कर दिया। सुबह देर से उठने की अपनी आदत से मजबूर मैं यहाँ भी सबके उठने के एक घंटे बाद ही उठा। सब लोग तैयार होकर चण्डीगढ़ पहुंचे, और वहां से हरियाणा रोडवेज की बस से दिल्ली। उसी दिन मुझे आनंद विहार बस अड्डे से अपने शहर के लिए बस पकड़नी थी। जब मैं उसके घर से चलने को तैयार हुआ, तो बोली, ‘मैं भी चल रही हूँ।’

मैंने कहा, ‘कहाँ?’

‘बस अड्डे तक। और कहाँ?’

क्यों? क्या मैं शिमला चला जाऊंगा?’

‘वह तो अब तुम जा ही नहीं सकते। पर मुझे बात करनी है।’

मैंने कहा, ‘चलो’ और हम एक ऑटो में आनंद विहार के लिए बैठ गये। फिर उसने छाया खोब्रागड़े से अपने सम्बन्धों के बनने और बिगड़ने की जो कहानी बतानी शुरू की, तो एक घंटा कब बीत गया, पता ही नहीं चला। आनंद विहार बस अड्डा आ गया, पर उसकी कहानी खत्म नहीं हुई। मैं विदा लेकर बस में बैठ गया, और मैं रास्ते भर सोचते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि यह पेशेवर संघर्ष था।

दरअसल, एनजीओ ही क्या, किसी भी क्षेत्र में काम करते हुए समानधर्मी लोगों के बीच स्पर्धा इतनी बढ़ जाती है कि उनके साथ सम्बन्ध मित्रवत नहीं रहते। रजनी तिलक के साथ भी ऐसा ही हुआ था। कई लोगों, खासकर महिलाओं के साथ काम करते हुए रजनी के सम्बन्ध उनसे खराब हो गये थे। उस दिन छाया खोब्रागड़े के साथ मेरे शिमला जाने के विरोध का असल कारण भी यही था।

इसी तरह का एक और वाकया याद आता है। यह वर्ष 2003 की बात है। झारखंड की पहली वर्षगांठ पर यह देखने के लिए कि जिस उद्देश्य से झारखंड का निर्माण हुआ था, वह पूरा हुआ कि नहीं, एक आदिवासी लेखिका और पत्रकार वासवी ने हम चार लेखक-पत्रकारों को रांची बुलवाया था, जिनमें एक मैं था, अन्य तीन में मोहनदास नैमिशराय, श्योराजसिंह बेचैन और सुभाष गताड़े थे। हालांकि इसके पीछे भी एक एनजीओ था, जो हमें बाद में पता चला था। 14 नवम्बर को इंडियन एयर लाइन्स की उड़ान से हम चारों लोग रांची पहुंचे। यह वह समय था, जब रजनी तिलक से मेरे सम्बन्धों में थोड़ी खटास आ गयी थी, कारण था एनजीओ की संस्कृति में उसके ही परिवार का विकास, किसी भी अन्य व्यक्ति को उसका रत्ती भर लाभ नहीं मिल रहा था। रांची में हमें जहां ठहराया गया था, उस जगह का नाम मुझे याद नहीं है। वह कोई विधायक निवास जैसा भवन था। पर आश्चर्य ! कि रजनी तिलक वहीं हमसे मिलने आ गयी। हम सब और खासकर वासवी उसे वहां देखकर भौंचक्के रह गये। हमारे सामने ही वासवी और उसमें बहुत ज्यादा कहा-सुनी हुई। यह प्रतिस्पर्धात्मक लड़ाई थी, जो हम सबकी समझ से परे थी। रात के आठ बज गये थे। वहीं कैन्टीन में हम सबको खाना खाना था, सो हम कैन्टीन गये। मतभेद के बावजूद मैंने और रजनी ने एक टेबिल पर साथ बैठकर खाना खाया। उसके बाद वह मेरे कमरे में आकर देर तक ‘ऐसा है, वैसा है’ समझाती रही, पर उसकी कोई बात मेरे पल्ले नहीं पड़ी थी। उसके बाद वह चली गयी थी। कहाँ? यह नहीं पता चला। रांची में रहते हुए फिर हमारी मुलाकात रजनी से नहीं हुई। इसके बाद वासवी ने जो कहानी मुझे सुनाई, मैंने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया था और उसे वहीं छोड़ दिया था। उसके बाद वासवी से फिर मेरी कभी भेंट नहीं हुई। वासवी भी लेखिका है, और रजनी भी लेखिका थी, पर दोनों की पृष्ठभूमि समान नहीं है। वासवी में महत्वाकांक्षाएं ज्यादा हैं, जो रजनी में नहीं थीं। रजनी सत्ता के पीछे दौड़ने वालों में नहीं थी, परन्तु वासवी सत्ता के साथ ही रही। जब मैं अश्वनी कुमार पंकज के निमन्त्रण पर दुबारा रांची गया था, तो वासवी झारखंड सरकार में महिला आयोग की सदस्य बन चुकी थी। रजनी ने इस तरह की आकांक्षा कभी नहीं पाली थी। वो बहुत भावुक थी, और व्यवस्था की कटु आलोचक थी। वह कांशीराम और मायावती के साथ उस दौर में काम कर चुकी थी, जब वे ठीक से राजनीति में जमे भी नहीं थे। उसे पता भी नहीं था कि वे दोनों एक दिन भारत की महान हस्तियां बन जायेंगे। वह चाहती, तो लाभ उठा सकती थी। पर ठकुरसुहाती और चापलूसी उसके खून में नहीं थी। उसके साथ तमाम मतभेदों के बावजूद कभी उससे मेरा मनभेद नहीं हुआ था। उसके एनजीओ में रहते हुए भी और न रहते हुए भी उसकी प्रतिबद्धता और सरोकारों में कोई फर्क नहीं आया था। वह जिज्ञासु प्रवृत्ति की, बेतकल्लुफी वाली जिन्दादिल इंसान थी। उसकी यह प्रतिबद्धता और भावुकता मैंने हिंगनघाट में देखी थी।

स्मृति शेष : बीते 3 मार्च 2018 को अन्य महिला साहित्यकारों के साथ के साथ रजनी तिलक (उपरोक्त सभी तस्वीरें रजनी तिलक के फेसबुक वॉल से साभार)

महाराष्ट्र के हिंगनघाट में प्रतिवर्ष दलित साहित्य का एक ऐतिहासिक और भव्य उत्सव होता है। इस उत्सव में सब कुछ होता है – खेल, तमाशे, नाटक, लोक रंग, साहित्य की विभिन्न विधाओं पर भाषण, किताबों, मूर्तियों और तस्वीरों के स्टाॅल, खाने-पीने के स्टाॅल और मनोरंजन की चीजें। इस उत्सव की खासियत यह थी कि यह रात  भर चलता है। ऐसे ही एक आयोजन में मुझे भी भाग लेने का अवसर मिला। मैं उसमें उद्घाटक की हैसियत से निमंत्रित था। उदघाटन सत्र में मेरे साथ मंच पर योगेन्द्र कबाड़े भी थे। वह गाजे-बाजे और नारों के साथ आये थे। उन्होंने मराठी में जोशीला भाषण दिया था, जिसे पहली बार मुझे सुनने का अवसर मिला था। रात के आठ बजे तक सारे कामों से निपटकर मैं सोने चला आया था। ठहरने की व्यवस्था दुरुस्त नहीं थी। कमरे कम और लोग ज्यादा थे। सो जिसको जहां जगह मिली वह वहीं पसरा पड़ा था। बड़ी मुश्किल से आयोजन समिति के एक सदस्य ने एक कमरे की व्यवस्था की। वह कमरा भी अंदर से बंद था। उसे खुलवाया, तो देखा कि अंदर डा. तेज सिंह विराजमान हैं। उन्हें देखकर अच्छा लगा, कुछ औपचारिक बातचीत के बाद मैं भी दूसरे खाली बेड पर सो गया। चूंकि मैं थका हुआ था, इसलिए नींद ने भी तुरंत ही आगोश में ले लिया था। अचानक कुछ समय बाद जोर-जोर से दरवाजा पीटने की आवाजें आने लगीं। मेरी आँख जरा सी आहट पर भी खुल जाती है। आंख तेज सिंह की भी खुल गयी थी। वह मुझसे बोले, ‘यार, दरवाजा मत खोलना, कोई सोने के लिए धप-धप कर रहा है।’

मैंने कहा, ‘यार, ज़्यादती होगी। हो सकता है, कोई अपने साथी को ढूंढ रहा हो।’

वह बोले, ‘हाँ, यह हो सकता है। चलो देखता हूं।’

तेज सिंह ने जाकर दरवाजा खोला, तो देखा, रजनी तिलक खड़ी हैं। उन्हें तेज सिंह के होने का अनुमान नहीं था। मैंने घडी देखी, रात के बारह बज रहे थे। वह जब अंदर आई तो मैंने कहा, ‘हम एक बेड खाली कर देते हैं, तुम सो जाओ।’

उसने कड़क आवाज में कहा, ‘कंवल भारती जी, मैं यहां सोने के लिए नहीं आई हूँ, तुम्हें ले जाने के लिए आई हूँ।’

‘कहाँ?’

‘प्रोग्राम में.’

‘अरे कौन से प्रोग्राम में? इतनी रात गये कौन सा प्रोग्राम है?’

‘जाकर देखोगे, तभी न पता चलेगा’, उसने कहा।

खैर तेज सिंह तो नहीं गये, पर उसने मेरी नींद हराम कर दी थी। मैं तैयार होकर उसके साथ गया। जब प्रोग्राम देखा, तो वास्तव में लगा कि मैं एक बड़े अनुभव से वंचित हो रहा था। स्त्री-संवेदना का वह अद्भुत कार्यक्रम था। मेरे मन में तुरंत दो विचार पैदा हुए। एक, औरतों के कार्यक्रम अंत में ही क्यों होते हैं, जब पुरुष सोने चले जाते हैं? और दो, मैंने रजनी से कहा, ‘तुम ग्रेट हो। मन करता है, तुम्हें दंडवत प्रणाम कर लूं। क्यों तुम मेरी प्रेरणा बन रही हो?’

उसने उत्तर में जो कहा, वह मेरे दिल पर हमेशा के लिए लिख गया– ‘कंवल भारती जी, भावुक मत बनो। हम लोग सोने के लिए नहीं बने हैं, जागने के लिए बने हैं।’

सचमुच उसी रात मैंने रजनी को अपनी प्रेरणा के रूप में महसूस किया था। वह साधारण स्त्री नहीं थी, असाधारण थी। उसकी सोच असाधारण थी, उसकी एप्रोच असाधारण थी और सच कहूँ तो वह महिला ही असाधारण थी।

उसके अनगिनत पत्र मेरे पास हैं। जाहिर है कि यह उस दौर की बात है, जब पत्र-लेखन  ही संवाद का सशक्त माध्यम हुआ करता था। हालांकि लैंडलाइन फोन हम दोनों के ही घर में थे। पर मोबाइल क्रान्ति नहीं आई थी, इसलिए पत्राचार की संस्कृति बची हुई थी। मैंने उसे पत्र लिखा कि ‘मैं बिहारीलाल हरित से मिलने आना चाहता हूं। यह हमारे लिए ख़ुशी की बात है कि वे हमारे समय में मौजूद हैं। क्यों न उनके साथ एक अंतिम इंटरव्यू हो जाए? जिसमें आप भी शामिल रहें। क्या आप सहमत हैं?’ यह 1998 की बात है। 28 अक्टूबर को उसने पत्र लिखा, ‘उत्तर प्रदेश के बारे में ठोस बातें अभी हमारे बीच हो नहीं पायी हैं। आप बिहारीलाल हरित जी के दर्शन करने जितनी जल्दी आ सके, आइये, ताकि हम आपके दर्शन कर सकें। तभी बैठकर विस्तार से बातें करेंगे।’ रजनी ने एक पंथ दो काज को ध्यान में रखकर योजना बना ली। उसने 21 नवम्बर 1998 को दलित साहित्य, शिक्षा और राजनीति’ पर एक कार्यशाला का आयोजन तय कर लिया, और उसके दूसरे दिन बिहारीलाल हरित से मिलने का कार्यक्रम बना लिया था। कार्यशाला में ओमप्रकाश वाल्मीकि को भी आना था, परन्तु वह नहीं आ सके थे। योजना के अनुसार दूसरे दिन हम लोग—मैं, रजनी तिलक और कुसुम वियोगी, हरित जी से मिलने के लिए शाहदरा के लिए रवाना हो गये। आज यह बात शायद ही कोई जानता होगा कि जिस बिहारी कॉलोनी में हरित जी का मकान है, वह कॉलोनी उन्हीं के नाम से उन्हीं के द्वारा बनाई और बसाई गई थी। मैं 1980-81 में दिल्ली में रहने के दौरान अक्सर हरित जी से मिलने बिहारी कॉलोनी जाया करता था। अब तो उसका चौतरफा विकास हो गया है और वे गलियां भी पहिचान में नहीं आतीं, जिनसे मैं कभी गुजरा करता था। खैर, मैं दिल्ली छोड़ने के लगभग 17 साल बाद बिहारी कॉलोनी में हरित जी से मिलने जा रहा था। अगर वियोगी जी साथ न होते, तो शायद उनका घर ढूंढ़ना भी मुश्किल होता। जब हम उनके घर पर पहुंचे, तो हरित जी लिहाफ ओढ़े हुए खाट पर बैठे हुए थे। हुक्का पास में रखा था। बीमार वे चल ही रहे थे, इसलिए शरीर भी काफी कमजोर हो गया था। उस समय वह बवासीर से ज्यादा पीड़ित थे। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसके बारे में, पता नहीं क्यों, लोग सबके सामने बोलने में संकोच करते हैं। हरित जी ने भी मुझे पास बुलाकर धीरे से कान में बताया कि ‘मैं बवासीर से बहुत दुखी हूँ।’ रजनी उनके पास ही खाट पर बैठी हुई थी, वह उसके सामने भी बोल सकते थे, पर उन्होंने इस बीमारी को सार्वजनिक नहीं किया। यह बीमारी कितनी पीड़ा देती है, आज मैं स्वयं उसका भुक्तभोगी हूँ। हरित जी से मुलाक़ात काफी अच्छी और ऐतिहासिक रूप से यादगार रही थी, क्योंकि उसके छह महीने बाद ही वह संसार से चले गये थे। हम तीनों ने ही अलग-अलग तरह से उनसे सवाल पूछे थे, और उनके उत्तरों ने हमें दलित वैचारिकी की पूरी इतिहास-परम्परा की यात्रा करा दी थी। रजनी तिलक ने उस पूरे इंटरव्यू को अपने अखबार ‘अभिमूकनायक’ के जुलाई 1999 के अंक में छापा था। मैंने रजनी के आग्रह पर उनके जीवन और काव्य पर अपना आलेख ‘राष्ट्रीय सहारा’ के लिए लिखा था। उस लेख को हरित जी के जन्मदिन पर छापने के लिए रजनी तिलक और मैं राष्ट्रीय सहारा के दफ्तर जाकर सम्पादक विभांशु दिव्याल से मिले थे। वहां मोर्चा रजनी ने ही संभाला था। अनुनय-विनय अनुरोध कुछ नहीं, सीधे चेतावनी दी थी—‘हरित जी दलित कविता के इतिहास-पुरुष हैं। 13 दिसम्बर 1998 को उनका जन्मदिन है, कंवल भारती जी का यह लेख उसी दिन छपना चाहिए।’ और सचमुच वह लेख उसी दिन छपा था। रजनी का फोन आया, ‘कंवल भारती जी आपका लेख छप गया।’ सबसे बड़ी बात तो यह कि रजनी तिलक ने मेरे उस लेख को चार पेज के एक फोल्डर में छपवाकर ‘सेंटर फॉर अल्टरनेटिव दलित मीडिया’ की ओर से आयोजित उनके जन्मदिन पर वितरित कराया। इतनी प्रतिबद्धता आज किस दलित लेखक में मिलती है?

जनकवि बिहारीलाल हरित के साथ रजनी तिलक (दाएं), कंवल भारती (बाएं) और कुसुम वियोगी (पीछे) (फोटो साभार : कंवल भारती)

1995 तक मुझे यह मालूम नहीं था कि रजनी कविता भी लिखती है। अचानक किसी पत्रिका या पत्र में मैंने उसकी कोई एक कविता पढ़ी, तो मैंने उसे पत्र लिखा कि एक कवियत्री के रूप में देखकर बहुत अच्छा लगा। मैं आपकी और भी कविताएं पढ़ना चाहूँगा।’ 22 नवंबर 1995 को उसने मुझे लिखा, ‘मेरी कविता आपने कहाँ पढ़ी? अच्छी लगी, धन्यवाद। काफी सालों बाद फिर से लिखने की प्रेरणा मिल रही है।’ उसके बाद तो उसकी और भी कविताएं पढ़ने को मिलीं। एक दिन उसके घर पर बैठकर उसकी कविताओं को देखकर मैंने उनका संग्रह छपवाने का सुझाव दिया। उस समय आज की तरह प्रकाशन की सुविधा नहीं थी। कोई भी तथाकथित मुख्य धारा का प्रकाशक दलित साहित्य नहीं छापता था, इसलिए दलित लेखक अपने पैसे से ही अपनी किताबें छपवाते थे। यह एक बड़ी समस्या थी, जिसके कारण हिंदी में दलित साहित्य काफी देर से प्रकाश में आया। 1998 में उसने अपनी कविताओं को छपवाने का मन बनाया और संग्रह की भूमिका लिखने के लिए कुछ कविताओं को मुझे भेज दिया। पत्र में लिखा, ‘अभी मैं अपनी कुछ कविताएं पड़ताल व भूमिका के लिए भेज रही हूँ। मेरी कविताएं दलित चेतना की कम, नारीवादी शायद ज्यादा हों। महिलाओं में भी दलित महिलाओं का सवाल अलग परिप्रेक्ष्य में है बेशक, परन्तु मेरी कविताएं मेरा निजी अनुभव, संघर्ष और संकल्प है और आज की औरतों के संघर्ष से जुड़ा है। जानती हूँ, आप स्पष्टवादी और बेबाक टिप्पणी करते हैं, इसलिए आपके पास सुझाव के लिए भेज रही हूँ। कुछ कविताएं रमणिका को, कुछ जयप्रकाश (कर्दम) को दिखाई, उन्हें खराब नहीं लगीं।’

28 फरवरी ‘98 के इस पत्र में उसने जल्दी भूमिका लिखकर भेजने का आग्रह करते हुए यह भी लिखा कि ‘8-10 मार्च के बीच रिलीज करने का विचार है।’ अंत में उसने लिखा, ‘कविता-संग्रह के तीन टाइटल सूझे हैं, बताइएगा, कौन सा सही रहेगा?’ लेकिन ये टाइटल तीन नहीं, चार थे—(1) पिंजरा तोड़के आई हूँ, (2) करोड़ों पदचाप हूँ, (3) मत सता और (4) नए युग की सूत्रपात हूँ। उसने दूसरे नाम को पसंद किया था, क्योंकि उस पर उसने सही का निशान लगाया हुआ था। मैंने एक और नाम सुझाया था—‘तोड़ दूंगी बेड़ियाँ’।

दो वर्ष बाद सन 2000 में ‘पदचाप’ नाम से उसका कविता संग्रह प्रकाशित हुआ, जिसमें मेरी टिप्पणी ब्लर्ब के रूप में छापी गई थी।

मैंने उसकी कविताओं पर अपनी टिप्पणी भेजते हुए लिखा था कि बेहतर होगा कि अगर आप किसी महिला साहित्यकार से इसकी भूमिका लिखवायें। इसका उत्तर उसने 27 मार्च 1998 को इलाहाबाद से अपने पत्र में दिया, जो बहुत ही महत्वपूर्ण पत्र है। यहाँ मैं उस पत्र के अधिकांश अंश सम्पादित कर साझा कर रहा हूँ– ‘..आभारी हूँ कि आपने मेरी कविताओं को ध्यान से पढ़ा, और भूमिका लिखी…..आपका सुझाव कि मुझे अपनी कविताओं की भूमिका किसी महिला साहित्यकार से लिखानी चाहिए, बेशक सही है। लेकिन रमणिका गुप्ता को छोड़ कौन है? अत: महाराष्ट्र कुमुद पावड़े के पास भेज रही हूँ।’ इसके बाद उसने लिखा, ‘कंवल जी, मैं कविता लिखती नहीं हूँ, न ही शौक है, ये स्वयं चली आती हैं, आपको विश्वास नहीं हुआ होगा सुनकर। बचपन से ही कविताएं मेरी कॉपी, डायरी में….बिखरी रहीं। एक बार एक पुस्तक के रूप में एकत्रित कीं। एक साथी (ने) फेयर करने में मदद की। दूसरे साथी ने पढ़ने के लिए मांगी। उसके घर की छत गिर जाने पर 80-85 कविताएं लोप हो गईं। वो पुस्तक मलबे में दब गई। 30-35 कविताएं मेरे पति के घर में रह गईं। अब बची-खुची संवेदनाएं समेट संकलन निकालने की हिम्मत जमीन में पांव जमाने की मात्र कोशिश ही समझिए।’

सोचिए, सौ से भी अधिक ये कविताएं अगर नष्ट न हुई होतीं, तो रजनी तिलक का काव्य-संसार आज कितना समृद्ध होता!

रजनी तिलक इलाहबाद में कुछ महिला सरपंचों से संवाद करने गयी थी। उसने अपने अनुभवों को साझा करते हुए इसी पत्र में लिखा था- ‘दरअसल हमारी वैचारिक स्वावलंबन की सोच दलित आन्दोलन की समझ है। उत्तर प्रदेश के नाम पर मेरठ, अनूप शहर, गाजियाबाद के अलावा इलाहाबाद, वो भी एक छोटा-सा हिस्सा देखा। यहाँ मैं दलित सरपंच औरतों से बात कर रही थी तो लगा कि उन्हें कुछ नहीं पता, जानकारी शून्य है। ताकतहीन औरतें सरपंच मात्र कठपुतली हैं। यहाँ आज ही एक कांड हो गया। उसे ‘मूकनायक’ में डालूंगी। इनके अनुभवों से पूर्णत: मैं अनभिज्ञ नहीं थी। लेकिन समस्याएं, जलालत की कोई सीमा नहीं, पार नहीं, इनकी विवशताएं, अज्ञानता को देख मैं और मजबूत हो कमर कस ली हूँ। राजनीति के नाम पर कांशीराम-मायावती को जानती हैं। ‘हरिजन’ (शब्द) धड़ल्ले से बोलती हैं। अपने अत्याचार निवारण अधिनियम को नहीं जानतीं, तो हैरान नहीं हूँ। मायावती के नाम पर ख़ुशी के आंसू बहाने वाली मेरी दीन-दुखी बहिनें शिक्षा से कोसों दूर, अब संगठन का मतलब समझना चाहती हैं, इनमें सूझबूझ समझ की कमी बिल्कुल नहीं है। मैंने इन्हें ‘हरिजन’ शब्द का अर्थ बताया, दलित की परिभाषा समझाई, ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, बाबासाहेब के बारे में बताया, तो बहुत खुश हुईं। इनमें जीवन जागा, ज्ञान की पिपासा इनकी आँखों में झलकी है। आशा की किरण मुझे दीखी है।’

इस पत्र में तारीख के नीचे ‘रात्रि 10 बजे’ लिखा है। और अंत में लिखा है, ‘मैं लिखने की आलसी, फिर से लिखने का अभ्यास शुरू कर रही हूँ। इस प्रयास का पहला पत्र आपको लिखा है।’ इस पत्र के आखिरी पन्ने पर एक स्त्री के स्पष्ट रेखा चित्र के साथ एक कविता लिखी है। लिखा है—‘सुबह सुबह एक कविता फिर मानस पटल पर उभरी—

पढ़ महाभारत

न बन कुंती, न बन द्रौपदी

पढ़ रामायण

न बन सीता, न बन कैकेयी

पढ़ मनुस्मृति

उलट महाभारत, पलट रामायण

पढ़ कानून

मिटा अन्धकार लगा ह्लकार

पढ़ समाज

बन सावित्री बाई फुले.

फहरा शिक्षा का परचम.

–रजनी’

निस्संदेह, रजनी तिलक का आदर्श सावित्री बाई फुले थीं। वह उन्हें अपने जीवन में आत्मसात किये हुए थी। और जैसे रंगमंच का कलाकार किसी किरदार में डूब जाता है, वह जीवन भर सावित्री बाई के किरदार में डूबी हुई थी। यह उन्ही के बस की बात थी कि वह हिंदी में सावित्री बाई फुले की समग्र कविताओं का अनुवाद और सम्पादन करके उसे प्रकाशित कराने का एक बड़ा और जरूरी काम कर गई थीं, जो उन्हें हमेशा उल्लेखनीय बनाये रखेगा।

इलाहाबाद के एक गांव में महिला सरपंचों की सभा को संबोधित करतीं रजनी तिलक(तस्वीर रजनी तिलक के फेसबुक वॉल से साभार)

उसका एक और पत्र यहां साझा करना मुझे प्रासंगिक लग रहा है। सितम्बर 2001 में डरबन में नस्ल और रंग भेद के विरुद्ध होने वाले विश्व सम्मेलन में जातिभेद को भी शामिल करने के लिए दलित मंचों ने आवाज उठाई थी। भारत में इसका विरोध हुआ था, सरकार ने तो यहां तक कह दिया था कि भारत में कोई जातिभेद ही नहीं है। उसी समय राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार संगठन ने भारत में जातिभेद पर ‘काला-पत्र’ जारी किया था। भारत से अनेक दलित संगठन विश्व सम्मेलन के एजेंडे में जातिभेद को भी शामिल कराने के लिए प्रदर्शन करने के लिए डरबन गये थे। रजनी तिलक भी अपने संगठन की ओर से डरबन गई थी। यह पत्र उसने डरबन से ही 6 सितम्बर 2001 को मुझे लिखा था। इस पत्र का यह हिस्सा महत्वपूर्ण है–

Dear Kanwal Bharti Ji,

Jai Bheem, यहाँ डरबन में मेरा 9वां दिन है। पिछले दो दिनों से हम (मैं और छाया) NRI Friends- Keder Yogesh Vanade के साथ Impala Hotel में ठहरे हैं।

यहाँ पूरे भारत के करीब 300 दलित कार्यकर्ता, लेखक, नेता व पत्रकार आये हैं। यु.एन डिक्लेरेशन पैरा 73 में ‘decent on work’ शब्दों का इस्तेमाल है, जिस पर काफी बहस है। हमारे लिए यह बात ही काफी है कि वो इस पैरे को ज्यों का त्यों रखें, जबकि कुछ देशों का दबाव है कि पैर 73 से ‘decent on work’ शब्द हटायें जाएँ, क्योंकि पेशेगत शोषण में हमारे पुश्तैनी धंधे, जो जन्म के आधार पर आधारित हैं, ही संघर्ष और U.N. घोषणा-पत्र में अपना स्थान बनाते हुए हमारे मानवीय हक विश्व-बिरादरी को आकर्षित करते हैं, भारतीय जातीय व्यवस्था का खुलासा करते हैं।

हम लोग यू.एन. कांफ्रेंस के बाहर रोज सुबह नारे, प्लेकार्ड प्रदर्शित करते हैं। साथी दलजीत (UK) की पहल कदमी पर यह कदम उठाया गया और अब सभी साथी रोज सुबह इकट्ठे होकर Caste kill dignity, Peace! Peace! We want para 73, do not walk without para 73. Jai Bheem, Jai Bheem. Outroot castism, Justice….Justice as is para 73 now, Down….. Down Castism, Racism. Dalit want para 73….etc. नारे लगाकर अनेक हॉलों में चल रही मीटिंग्स में चले जाते हैं।

विदेशी मीडिया काफी कवरेज कर रही है। South Africa के TV के माध्यम से वहां के NRI Indian Dalits से मिलते हैं और Castism के बारे में जिज्ञासापूर्ण सवाल पूछते हैं। इनके पूर्वज यहाँ आए, धीरे-धीरे जातियां खत्म हो गयीं। कुछ यूथ भारत की दयनीय स्थिति पर हैरान थे। हिंदी फिल्मों ने यहाँ के गाँव, लोगों की भिन्न तस्वीर खींची है, वे उस दुनिया और दलितों की स्थिति में तालमेल बैठने में हैरान दिखे। यहाँ औरतें काफी Active, Self dependent दिखीं। ज्यादातर Business करती हैं।’

पत्र में इन पंक्तियों के नीचे 08/9/01, तारीख और समय 3 AM लिखकर आगे लिखा है— ‘हम लोग दो दिन से घोषणापत्र का इंतजार कर रहे हैं। एनजीओ फोरम और सरकारी फोरम दोनों मिलकर घोषणा पत्र पर ठीक से काम नहीं कर सके। पैरा 73 को छोड़ दिया था, तब कुछ लोग भूख हड़ताल पर बैठ गये। दो दिन तक भूख हड़ताल की। हमारी भूख हड़ताल British High Commissioner ने आकर खुलवाई। यहाँ NRI दोस्त एजेंडे में इतने व्यस्त हुए कि हम साउथ अफ्रीका नहीं घूम पाए।’ उसके बाद 10 सितम्बर को वाया मुंबई, दिल्ली आने की सूचना के साथ लिखा है, ‘यहाँ चंदर भान (चन्द्रभान प्रसाद) ने जो कमाल दिखाया, वह मैं कभी मिलने पर बताऊँगी।’ उसने मिलाकर बताया भी, पर वह उससे अलग नहीं था, जो मैं जानता था।

रजनी तिलक वर्तमान में दो मुख्य काम करना चाहती थी। एक, दलित महिला लेखन की सीरीज, जिसके कहानी और कविता पर दो खंड वह निकाल चुकी थी, और तीसरे पर उसका काम सम्भवत: पूरा हो चुका था, और प्रेस में जाने वाला था। उसका दूसरा महत्वपूर्ण महत्वाकांक्षी काम था, दलित आन्दोलन का जीवंत इतिहास, जिसे हम दोनों को मिलकर लिखना था। इसके लिए जिलों में जाकर सामग्री जुटानी थी। हमारी फोन पर बातचीत हो चुकी थी, पूरी रूपरेखा बन चुकी थी और उत्तर प्रदेश के किन-किन जिलों में हमें जाना था, यह तय हो चुका था। पर न उसे मालूम था और न मुझे कि उसका कारवां बस 30 मार्च 2018 तक ही था। यह वह अनहोनी थी, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी—उसने भी नहीं।


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