यूजीसी का पत्र महज दिखावा, विश्वविद्यालयों में आरक्षण की हकमारी जारी

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को आधार बनाकर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर विश्वविद्यालय सहित अन्य विश्वविद्यालयों में आरक्षित वर्गों की हकमारी कर सवर्णों की नियुक्ति की जा रही है। यह तब किया जा रहा है जबकि बीते 20 अप्रैल 2018 को यूजीसी ने अपने पत्र में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को विवादित बताया। साथ ही कहा कि इसकी समीक्षा के लिए एक याचिका सरकार और उसके द्वारा दायर की गई है। मनोज सिंह की रिपोर्ट :

गोरखपुर और अन्य विश्वविद्यालय में सवर्णों को नियुक्त करने  के लिए आरक्षण के नियमों का खुला उल्लंघन

दलित, ओबीसी और आदिवासी एक बार फिर छले जा रहे हैं। बीते 5 मार्च 2018 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के आधार पर फरमान जारी कर दिया। विश्वविद्यालय को इकाई न मानकर विभागों को इकाई मानते हुए नियोजन हेतु आरक्षण का निर्धारण। पूरे देश में विरोध हुआ और सरकार बैकफुट पर गयी। बीते 20 अप्रैल 2018 को यूजीसी ने पत्र(फरमान नहीं) जारी किया। पत्र में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले की समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की बात कही गयी। सरकार ने भी यह जताने की कोशिश की कि वह आरक्षित वर्गों की हितैषी है लेकिन यह अधूरा सच है। अभी भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के आधार पर नियोजन किये जा रहे हैं। गोरखपुर और अन्य विश्वविद्यालयों में सवर्णों को नियुक्त करने के लिए आरक्षण के नियमों का खुला उल्लंघन किया जा रहा है।

बहुजन समाज के नायकों की तस्वीरों और नारों के साथ आरक्षण के नियमों के उल्लंघन का विरोध करता बहुजन समाज

दलितों के घर भोजन करने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जिले में स्थित पंडित दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में शिक्षकों की नियुक्ति में यूजीसी के 20 अप्रैल 2018 के निर्देशों का उल्लंघन करके विश्वविद्यालय के बजाय विभाग को इकाई मानने से आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का भारी नुकसान हुआ है। हालत यह है कि 22 प्रोफेसरों में से एक भी पद आरक्षित वर्ग को नहीं मिल रहा है जबकि एसोसिएट प्रोफेसर के 44 पदों में से सिर्फ चार आरक्षित वर्ग के हिस्से मेें आ रहा है।

विश्वविद्यालय के पिछड़ा और दलित वर्ग के प्रोफेसरों के संगठन पिछड़ा वर्ग कल्याण परिषद ने इसका तीव्र विरोध किया और ज्ञापन देकर व प्रदर्शन कर विश्वविद्यालय से नियुक्ति प्रक्रिया रोकने की मांग की, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने आनन-फानन में 58 चयनित शिक्षकों के नाम घोषित कर दिए और उनको कार्यभार भी ग्रहण कराया जा रहा है। अन्य शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया भी जारी है। शिक्षकों की नियुक्ति में जमकर भाई-भतीजावाद चला है और भाजपा-संघ से नजदीकी रखने वालों को चयनित किया गया है।

यह गोरखपुर विश्वविद्यालय का इकलौता मामला नहीं है। भाजपा के सत्ता में आने के बाद लखनऊ , फैजाबाद और सिद्धार्थनगर विश्वविद्यालय में शिक्षकों की नियुक्ति में आरक्षण के लिए विश्वविद्यालय के बजाय विभाग को इकाई बनाते हुए दलित और ओबीसी वर्ग के सैकड़ों अभ्यर्थियों को विश्वविद्यालय में शिक्षक बनने के अवसर से वंचित कर दिया गया। दलितों और पिछड़ों को आरक्षण से वंचित करने के लिए टुकड़ो-टुकड़ों में पद विज्ञापित किए गए।

उत्तर प्रदेश सरकार ने 19 फरवरी 2016 को विश्वविद्यालय में शिक्षकों की चयन प्रक्रिया के सम्बन्ध में एक दिशा-निर्देश जारी किया कि आरक्षण की इकाई विभाग या विषय को माना जाय न कि विश्वविद्यालय को।

उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने रिट पिटीशन संख्या 45260 (2016) पर 7 अप्रैल 2017 को दिए गए अपने फैसले में भी कहा कि शैक्षणिक पदों पर नियुक्ति के मामले में आरक्षण संबंधी रोस्टर बनाते समय विश्वविद्यालय को इकाई मानने की बजाय विषय अथवा विभाग को इकाई माना जाए ।

उच्च न्यायालय के इस निर्णय के मद्देनजर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने सभी विश्वविद्यालयों से कहा कि उच्च न्यायालय के इस फैसले तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसकी पुष्टि किए जाने के उपरांत यह निर्णय लिया गया है कि यूजीसी गाइडलाइन 2016 के क्लाज 6(सी) में संशोधन करते हुए सभी विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के सभी पदों की नियुक्ति प्रक्रिया में विभाग या विषय को इकाई मानकर ही रोस्टर बनाया जाए।

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दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय ने 19 सितम्बर 2017 को 23 विभागों में प्रोफेसर के 22, एसोसिएट प्रोफेसर के 44 और असिस्टेंट प्रोफेसर के 142 यानि कुल 208 पदों पर नियुक्तिों के लिए विज्ञापन प्रसारित किया।

इस विज्ञापन में विभाग और विषय को ही आरक्षण की इकाई माना गया। इसके अनुसार प्रोफेसर के सभी 22 पद अनारक्षित है जबकि एसोसिएट प्रोफेसर के 44 पदों में से 3 एससी, एक ओबीसी के लिए आरक्षित है जबकि शेष 40 पद सामान्य वर्ग के लिए हैं। असिस्टेंट प्रोफेसर के 142 पदों में एससी के लिए 31, ओबीसी के लिए 38 पद आरक्षित किए गए जबकि 73 पद सामान्य वर्ग के लिए थे।

इस तरह कुल 208 पदों में से 135 सामान्य, 39 ओबीसी और 34 एससी वर्ग के अभ्यर्थियों की नियुक्ति की जानी है।

नियुक्ति प्रक्रिया के लिए एक माह से इंटरव्यू शुरू हुए जो अभी जारी है।

इसी बीच यूजीसी ने 20 अप्रैल 2018 को विश्वविद्यालयों को भेजे पत्र में जानकारी दी कि इस मामले को केन्द्र सरकार और यूजीसी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में ले जाया गया है।

दरअसल राज्य सरकार के इस आदेश का शुरू में ही विरोध किया जा रहा था। उच्च न्यायायल का निर्णय आने के बाद केन्द्र सरकार इसके विरूद्ध सुप्रीम कोर्ट में नहीं गई क्योंकि उसकी मंशा भी दलितों और पिछड़ों को विश्वविद्यालयों में आने से रोकने की थी और विभाग व विषय को इकाई मानने से यह उद्देश्य ठीक से सिद्ध हो रहा था। इस दौरान लखनउ, फैजाबाद सहित कई अन्य विश्वविद्यालय में जल्दीबाजी में नियुक्तियां की गईं ताकि इसके खिलाफ कोई निर्णय आने तक खाली पदों को भर दिया जाय और दलितों, पिछड़ों को विश्वविद्यालय में शिक्षक बनने के अवसर से वंचित कर दिया जाय।

दो अप्रैल को एससी/एसटी एक्ट के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय के खिलाफ जब भारत बंद जबर्दस्त रूप से सफल रहा तो केन्द्र सरकार को दलितों और पिछड़ों के गुस्से का अहसास हुआ और उच्च न्यायायल के इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया गया और याचिका योजित की गई।

इसी निर्णय की जानकारी यूजीसी ने विश्वविद्यालयों को भेजी। यह जानकारी मिलने पर गोरखपुर विश्वविद्यालय में दलितों और पिछड़ें शिक्षकों के संगठन पिछड़ा वर्ग कल्याण परिषद ने नियुक्ति प्रक्रिया रोकने को कहा। परिषद ने इस सम्बन्ध में कुलपति को ज्ञापन देने का निर्णय लिया। परिषद के अध्यक्ष प्रो. चन्द्रभूषण अंकुर और महासचिव प्रो अनिल कुमार यादव अन्य शिक्षकों के साथ 21 अप्रैल को कुलपति को ज्ञापन देने कुलपति कार्यालय गए। कुलपति कार्यालय में मौजूद नहीं थे लेकिन कार्यालय में उपस्थित अधिकारियों ने ज्ञापन लेने से इंकार कर दिया और कहा कि कुलपति ने यह ज्ञापन लेने से मना किया है। इसके बाद परिषद के पदाधिकारियों व सदस्यों ने रजिस्ट्रार को ज्ञापन दिया।

इस ज्ञापन में कहा गया है कि ‘ विश्वविद्यालय में जारी शिक्षकों की चयन प्रक्रिया उत्तर प्रदेश सरकार के 19 फरवरी 2016 के अन्यायपूर्ण दिशा निर्देश के आधार पर चल रही है जिससे ओबीसी-एससी के लिए आरक्षित पदों की संख्या नगण्य है तथा एसटी दिव्यांग अभ्यर्थियों को आरक्षण मिल पाना असंभव है।

परिषद ने अपने ज्ञापन में कहा है कि यूजीसी के 20 अप्रैल 2018 के पत्र से स्पष्ट है कि यह मामला केन्द्र सरकार और यूजीसी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में ले जाया गया है तब ऐसी दशा में उत्तर प्रदेश सरकार के 19 फरवरी 2016 के आदेश के आधार पर हो रही वर्तमान नियुक्ति प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगानी चाहिए और इस सम्बन्ध में अंतिम निर्णय आने तक समस्त चयन समितियों के सील बंद लिफाफे को खोले जाना स्थगित किया जाना चाहिए। ’

ज्ञापन में कहा गया है कि यूजीसी के पत्र के बाद विभाग को इकाई मानकर की जा रही नियुक्तियां असंगत, अन्याय पूर्ण तथा संविधान की सामाजिक न्याय की भावना के खिलाफ है।

ज्ञापन में चेतावनी दी गई है कि ‘ यदि बहुसंख्यक दलित-पिछड़ा समाज के हितों की अनदेखी की गई तथा उनके संविधान प्रदत्त अधिकारों का हनन किया गया तो हम लोकतांत्रिक तरीकों से धरना-प्रदर्शन, अनशन करने पर बाध्य होंगे। ’

इस मुद्दे पर विरोध होता देख विश्वविद्यालय ने 29 अप्रैल को कार्यपरिषद की बैठक बुला ली और उसमें नियुक्त शिक्षकों के लिफाफे खोलने की घोषणा की।

विरोध प्रदर्शन की अगुवाई करते एससी,एसटी और ओबीसी आरक्षण बचावो संघर्ष मोर्चा के संयोजक डॉ. दुर्गा प्रसाद यादव और प्रोफेसर कमलेश गुप्त

विश्वविद्यालय के एक अन्य प्रोफेसर कमलेश कुमार ने भी इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने अपने फेसबुक वाल पर लिखा है कि ‘ केवल शिक्षा जगत में ही नहीं, दूसरे क्षेत्रों की नौकरियों में भी विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. हमारे यहाँ जिन 10 विषयों के लिफाफे 29 अप्रैल को खुलने वाले हैं, उनमें प्रोफेसर के कुल 14 पद हैं। यदि यूजीसी के पत्र दिनांक 20 अप्रैल,2018 के अनुसार नियुक्ति हो तो आरक्षित संवर्ग के हिस्से में 07 पद आएंगे। चूँकि विभाग को इकाई मानकर नियुक्ति की जा रही है, इसलिए आरक्षित संवर्ग के हिस्से में एक भी सीट नहीं आ रही है. एससी एसटी और ओबीसी के लोग न्याय के लिए कहाँ जाएँ ? क्या करें ?

प्रो कमलेश कुमार ने कहा कि अपने को दलितो और पिछड़ों की हितैषी उत्तर प्रदेश की भाजपा की सरकार को केंद्र की अपनी ही सरकार की मंशा का सम्मान करते हुए गोरखपुर विश्वविद्यालय में चयन संबंधी लिफाफा खोलना स्थगित करवा देना चाहिए।

प्रो कमलेश लगातार इस मुद्दे को उठा रहे हैं। उन्होंने 28 मार्च को फेसबुक पर लिखा-जब तक विश्वविद्यालय को इकाई मानकर आरक्षण और रोस्टर को लागू नहीं किया जाएगा, तब तक आरक्षण का वास्तविक लाभ मिल नहीं पाएगा। चाहे जो भी नियम और व्यवस्था हो, यदि उससे एससी को 21, एसटी को 02 और ओबीसी को 27 फीसदी संवैधानिक प्रतिनिधित्व मिलना सुनिश्चित हो, तभी उसे न्यायपूर्ण कहा जाएगा, अन्यथा नहीं। यदि ओबीसी और एससी के आरक्षण को कई भागों में बाँटना हो, तो वह प्रक्रिया या तरीका बताया जाना चाहिए, जिसके तहत आरक्षण का लाभ मिल पाना सुनिश्चित हो। ’

उनका कहना था कि अति पिछड़े और अति दलित तक आरक्षण का लाभ पहुँचाने की बात सैद्धांतिक तौर पर बहुत अच्छी है, लेकिन उसके लिए पारदर्शी और मुकम्मल व्यवस्था करनी होगी, जिससे आरक्षण का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँच सके.अन्यथा इसे पिछड़ों और दलितों में फूट डालने और आरक्षण को निष्प्रभावी बनाने की राजनीतिक चाल ही समझा जाएगा।’

नियुक्ति प्रक्रिया जारी को रोकने नहीं जाने पर गोरखपुर विश्वविद्यालय के पिछड़ा वर्ग कल्याण परिषद की अगुवाई में शिक्षकों, छात्रों, कर्मचारियों ने 29 अप्रैल को विश्वविद्यालय गेट पर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में गोरखपुर के सांसद प्रवीण निषाद ने भी भाग लिया। प्रदर्शन के दौरान विश्वविद्यालय में चल रही नियुक्ति प्रक्रिया को रोकने तथा हो चुकी चयन समितियों के लिफाफों को खोलने से रोकने की मांग की गई।

कुलसचिव शत्रोहन वैश्य ने धरना-प्रदर्शन स्थल पर आकर सांसद प्रवीण निषाद से ज्ञापन लिया। धरना-प्रदर्शन में परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो चन्द्रभूषण अंकुर, महामंत्री प्रो अनिल यादव, प्रो कमलेश गुप्ता, डॉ. दुर्गा प्रसाद यादव, डॉ. राजेश यादव, डॉ. आदित्य कुमार, पवन कुमार सिंह आदि शामिल थे।

विरोध प्रदर्शन में हिस्सेदारी करते गोरखपुर के सांसद प्रवीण निषाद

सांसद प्रवीण निषाद ने कुलसचिव से कहा कि 29 अप्रैल को होने वाली कार्यपरिषद की बैठक मेें नियुक्तियों के लिफाफे नहीं खोले जाने चाहिए क्योंकि केन्द्र सरकार एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आरक्षण के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की है तथा यूजीसी ने देश के सभी विश्वविद्यालयों को 20 अप्रैल 2018 को पत्र जारी करके इस बात की हिदायत दी है कि उच्च शिक्षण संस्थाओं में विश्वविद्यालय को इकाई मानकार आरक्षण लागू किया जाय। ऐसे में गोरखपुर विश्वविद्यालय  में विभाग का इकाई मानकर आरक्षण लागू करने के उपरान्त की जा रही नियुक्तियां समाज के बहुजनों के हितों के विरूद्ध है। अतः लिफाफे नहीं खोले जाने चाहिए।

उन्होंने कुलसचिव से कहा कि हम नियुक्तियों का विरोध नहीं करते बल्कि हम चाहते हैं कि विश्वविद्यालय संविधान की भावना के अनुरूप विश्वविद्यालय को इकाई मानकर आरक्षण को लागू करे और तत्पश्चात नियुक्तियां करे ताकि एससी एसटी ओबीसी और दिव्यांगों के साथ न्याय हो सके।

उन्होंने जोर देकर कहा कि विश्वविद्यालय समय रहते अपने द्वारा की जा रही इस भारी भूल को लिफाफे न खोलकर सुधार सकता है और समाज को अच्छा संदेश दे सकता है। उन्होंने इस सम्बन्ध में कुलाधिपति को भी फैक्स भेज कर लिफाफे न खोलने की मांग की।  

इस विरोध प्रदर्शन के बाद दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो विजय कृष्ण सिंह ने 28 अप्रैल की शाम अपनी चुप्पी तोड़ी और नियुक्ति प्रक्रिया के विषय में लगाये गए आरोपों को गलत बताया। उन्होंने कहा है कि विश्वविद्यालय में शिक्षकों के विभिन्न पदों पर नियुक्ति के लिए लिए विज्ञापन तथा नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह विधिसम्मत तथा माननीय न्यायालय एवं यूजीसी के निर्देशों के अनुरुप पूरी की गई है।

उन्होंने चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाले और विरोध करने वालों को आरक्षण विरोधी करार दिया।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग आयोग के संयुक्त सचिव द्वारा दिनांक 20 अप्रैल 2018 को प्रेषित जिस पत्र का उल्लेख किया जा रहा है उसमें मात्र यह ‘सूचित’ किया गया है की माननीय उच्च न्यायालय के संदर्भित निर्णय पर पुनर्विचार के लिए याचिकाएं योजित की गई है। यह पत्र किसी भी रुप में में रुप में में यह ध्वनित नहीं करता की इन पुनर्विचार याचिकाओं के निर्णय आने तक सभी चयन प्रक्रिया और उसके परिणाम स्थगित कर दिये जाएं। इस संबंध में विधिक परामर्श के आधार पर विश्वविद्यालय का स्पष्ट मानना है की जब तक माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस संबंध में कोई नया आदेश पारित नहीं किया जाता अथवा यूजीसी द्वारा कोई स्पष्ट प्रतिबंधात्मक निर्देश नहीं दिया जाता तब तक कोई कारण नहीं है कि माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय तथा यूजीसी के वर्तमान में प्रवृत्त निर्देशों का अनुपालन न किया जाए।

विश्वविद्यालय ने 29 अप्रैल की शाम प्रोफेसर पद के तीन, एसोसिएट पद के 6 और असिस्टेंट प्रोफेसर के 49 पदों पर नियुक्ति के लिफाफे कार्यपरिषद में खोल दिए और चयनित शिक्षकों की सूची जारी कर दी। इस सूची के अनुसार मध्यकालीन व आधुनिक इतिहास, अर्थशास्त्र, गणित एवं सांख्यिकी, प्राचीन इतिहास, वनस्पति विज्ञान, दर्शन शास्त्र, कानून विभाग, अंग्रेजी, जूलोजी और डिफेंस एंड स्टेटजिक स्टडीज विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के 49 पदों में 22 पर सामान्य, 12 पर एससी और 15 पर ओबीसी सवंर्ग के अभ्यर्थियों का चयन किया गया है। एसोसिएट प्रोफेसर के 6 पदों में से चार पर सामान्य, एक पर ओबीसी और एक पर एससी अभ्यर्थी का चयन किया गया है। प्रोफेसर के तीन पदों में से सभी तीन पदों पर सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी चयनित किए गए हैं।

पिछड़ा वर्ग कल्याण परिषद का कहना है कि यदि विश्वविद्यालय को इकाई मानकर चयन किया गया होता तो 10 विभागों के 12 प्रोफेसर पदों में से 6 आरक्षित संवर्ग के हिस्से में आते जबकि विभाग को इकाई मानने से एक भी आरक्षित वर्ग का अभ्यर्थी प्रोफेसर नहीं हो सका है। इसी तरह एसोसिएट प्रोफेसर पद पर विश्वविद्यालय को इकाई मानने से 20 में से 10 आरक्षित संवर्ग के हिस्से में आते जबकि विभाग को इकाई मानने से सिर्फ दो पद ही आरक्षित वर्ग के हिस्से में आए हैं।

परिषद का कहना है कि असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर आरक्षित वर्ग के चयनित अभ्यर्थियों की संख्या थोड़ी इसलिए बढ़ गई है कि सभी आरक्षित पर भरे नहीं गए थे. जो पद आरक्षित हैं , वे विज्ञापित पद के हिसाब से आरक्षित नहीं हैं बल्कि उन विभागों में पदों की कुल स्वीकृत संख्या और आरक्षित संवर्ग के रिक्त पदों के हिसाब से आरक्षित है.    

तमाम विरोध के बावजूद गोरखपुर विश्वविद्यालय प्रशासन ने सिर्फ नियुक्तियों को जारी रखे हुए हैं बल्कि विरोध करने वाले शिक्षकोें पर कार्रवाई की धमकी भी दी जा रही है। कार्यपरिषद में जब एक प्रोफेसर ने लिफाफे खोलने के वक्त अपनी बात रखनी चाही तो उन्हेें बोलने नहीं दिया गया। यहां तक उन्हें बैठक से जबरन बाहर भेजने की बात कही गई। उन्होंने किसी तरह लिखित रूप से अपना अभिमत दर्ज कराया।

(कॉपी एडिटर – अशोक)


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