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उत्तर प्रदेश में संघ की रणनीति, ओबीसी में अलग किए जाएंगे यादव

 सपा-बसपा गठबंधन से निपटने को योगी अपनाएंगे राजनाथ सिंह का ‘फार्मूला’

हाल ही में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा है। दोनों सीटों पर मिली हार भाजपा के लिए इसलिए भी ज्यादा भारी पड़ रही है कि गोरखपुर सीट योगी आदित्य नाथ द्वारा प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के चलते खाली की गई थी, जबकि फूलपुर सीट केशव प्रसाद मौर्य के उप मुख्यमंत्री बनने के चलते खाली हुई थी। इसमें से गोरखपुर सीट को खासतौर पर पार्टी के लिए झटका माना जाता है। योगी आदित्यनाथ इस सीट पर लंबे समय से भाजपा के सांसद रहे थे और यहां पर वे खुद को अपराजेय समझते रहे हैं। लेकिन, इस बार यहां से भाजपा प्रत्याशी को करारी हार का सामना करना पड़ा।

यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह

दोनों सीटों पर भाजपा की हार के पीछे सपा-बसपा के गठबंधन को मुख्य श्रेय जाता है। दोनों पार्टियों के बीच हुए गठबंधन से बहुजन जातियों के मतों में आमतौर पर होने वाला बिखराव रुक गया और अल्पसंख्यक मतों के भी इसमें शामिल होने से दोनों ही सीटों पर भारी मतों से जीत हासिल हुई। उपचुनाव के इन नतीजों के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा को लेकर आशंका साफ देखी जा रही है। दरअसल, वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश की स्थिति एक बार फिर महत्वपूर्ण साबित होने जा रही है। अगर भाजपा को एक बार फिर से देश की सत्ता पर कब्जा करना है तो उसे उत्तर प्रदेश में अपने प्रभाव को बरकरार रखना होगा। यहां से लोकसभा की 80 में से 73 सीटों पर 2014 के लोकसभा चुनावों में उसे सफलता मिली थी। मगर उपचुनाव के नतीजों से अब सफलता का प्रतिशत कम होता दिख रहा है। अगले कुछ ही दिनों में कैराना में भी उसकी इसी प्रकार की परीक्षा होने वाली है। यह सीट भाजपा सांसद हुकुम सिंह की मृत्यु के चलते खाली हुई है और यहां पर 28 मई को होने वाले उपचुनाव के लिए भी विपक्षी पार्टियों द्वारा संयुक्त उम्मीदवार उतारने की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है।

उपचुनावों में सफलता के बाद सपा और बसपा के बीच आगामी लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन के द्वार भी खुलते दिख रहे हैं। हाल के दिनों में दोनों पार्टियों के नेताओं ने एक-दूसरे के प्रति लगातार सकारात्मक रुख दिखाया है। इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि वर्ष 2019 का चुनाव दोनों पार्टियां साथ मिलकर लड़ सकती हैं। इस संभावित गठबंधन की काट भाजपा खासतौर पर ओबीसी मतों में फूट डालकर निकालने का प्रयास करने जा रही है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के समय भी भाजपा का फोकस गैर-यादव ओबीसी और गैर जाटव दलित के फार्मूले पर रहा था। चुनाव में मिली बड़ी कामयाबी के लिए इसी फार्मूले को कारण भी माना गया था।

योगी आदित्यनाथ, मायावती और अखिलेश यादव

आरक्षण के लाभ को ओबीसी जातियों के बीच सीमित करने के फार्मूले पर वर्ष 2001 में भाजपा सरकार के तत्कालीन मुखिया राजनाथ सिंह के समय में काम शुरू किया गया था। उस समय गठित सोशल जस्टिस कमेटी ने ओबीसी वर्ग को मिलने वाले आरक्षण को तीन स्तरों में बांटने की सिफारिश की थी। इसमें पहली ‘ए’ श्रेणी में यादवों को रखा गया और इसे मिलने वाले आरक्षण को पांच फीसदी पर सीमित करने की बात कही गई थी। इसी प्रकार, दूसरी ‘बी’ श्रेणी में अन्य आठ पिछड़ी जातियों को नौ फीसदी और बाकी तीसरी ‘सी’ श्रेणी में 70 पिछड़ी जातियों को सरकारी सेवाओं, शिक्षा व हालत के आधार पर 14 फीसदी आरक्षण देने की सिफारिश की गई थी। सोशल जस्टिस समिति द्वारा इस बात पर चिंता जताई गई थी कि ओबीसी आरक्षण का ज्यादातर लाभ यादव जाति के लोगों को ही मिल रहा है और उसने यादवों को आरक्षण में मिलने वाले लाभ को सीमित करने की सिफारिश की थी। विधानसभा चुनाव में हार जाने के चलते भाजपा इन सिफारिशों को उस समय लागू नहीं कर सकी थी। उसके बाद भी भाजपा को गठबंधन सरकार चलाने का मौका तो मिला, लेकिन उसमें भाजपा की हैसियत ऐसी नहीं थी कि इसे लागू करवा सके। अब जबकि भाजपा के पास उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार है और सामने सपा-बसपा गठबंधन की संभावना से उसके हाथ-पांव भी फूल रहे हैं, ऐसे समय में उसे ‘आरक्षण में आरक्षण’ का फार्मूला ‘फूट डालो और राज करो’ की तरह कारगर दिख रहा है।

मायावती, कांशीराम और मुलायम सिंह यादव (फाइल फोटो)

उपचुनावों में मिली हार के बाद इस फार्मूले को भाजपा के रणनीतिकार ब्रह्मास्त्र मान रहे हैं। उनका मानना है कि राजनीतिक तौर पर यह एक बड़ा कदम हो सकता है। सपा और बसपा के साथ आने से भाजपा के पास उच्च जातियों का मुट्ठी भर वोट बैंक ही रह जाएगा। ऐसे में उसके लिए चुनावों में सफलता हासिल करना बेहद कठिन रह जाएगा। सोशल जस्टिस समिति ने अपनी सिफारिशों में माना था कि ओबीसी आबादी में यादव जाति का हिस्सा 19.4 फीसदी है। जबकि, दूसरी श्रेणी में रखी गई आठ जातियों जिनमें कुर्मी, लोध, जाट और गुर्जर आदि शामिल थे, उनका हिस्सा 18.9 फीसदी है। वहीं, तीसरी श्रेणी में रखी गई बाकी 70 जातियों का हिस्सा 61.69 फीसदी है। समिति ने इसी आधार पर आरक्षण के अंदर आरक्षण की नीति की सिफारिश भी की थी।

इसी फार्मूले को ध्यान में रखते हुए भाजपा यादवों को अन्य पिछड़ा वर्ग से अलग करने की कोशिश में है। विधानसभा चुनावों के दौरान भर्तियों में यादवों को प्रमुखता दिए जाने संबंधी झूठे-सच्चे आरोपों और व्हाट्सएप्प मैसेज से भी यही संदेश देने की कोशिश की गई थी। अब वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में इसी को ब्रह्मास्त्र बनाने की तैयारी की जा रही है। भाजपा के एक रणनीतिकार का कहना है कि आरक्षण में गैर यादव जातियों को बड़ा हिस्सा दिए जाने से उनमें भाजपा के आधार में बढ़ोतरी हो सकती है। हाल के दिनों में भाजपा नेताओं द्वारा दलितों के घर पर खाना खाने का अभियान जिस तरह से चलाया जा रहा है, उसे भी सपा-बसपा के बीच होने वाले संभावित गठबंधन से निपटने की तैयारी के तौर पर ही देखा जा रहा है।

(कॉपी एडिटर : अनिल)


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