फॉरवर्ड प्रेस

यूजीसी के ख़िलाफ़ बुद्धिजीवियों की तीखी प्रतिक्रिया

फॉरवर्ड प्रेस, ईपीडब्ल्यू (ऑनलाइन) और हंस जैसी पत्रिकाओं को यूजीसी ने अपनी अनुमोदित सूची से निकाल दिया है। अकादमिक जगत, पत्रकारिता और साहित्यिक दुनिया के प्रतिष्ठित लोगों ने इन महत्वपूर्ण पत्रिकाओं और जर्नलों को यूजीसी द्वारा अपनी अनुमोदित सूची से हटाने की कार्रवाई को प्रेस और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बड़ा हमला और समाज को पीछे धकेलने वाली करतूत कहा है।

विश्विविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा चुनिंदा प्रकाशनों को काली सूची में डालने के फैसले को लेकर पत्रकार बिरादरी और पाठकों के बड़े तबके ने कड़ा विरोध जताया है। यह विरोध इसलिए भी तेज हुआ है कि जिन पत्रिकाओं और प्रकाशनों पर यूजीसी का हथौड़ा चला है वे अपने प्रगतिशील तेवरों के लिए जानी जाती हैं और देश में जातिवादी मानसिकता को खत्म करने को लेकर उनकी प्रतिबद्धता हमेशा जगजाहिर रही है। ऐसी पत्रिकाएं जिनमें देशभर के आम पाठकों से लेकर वृहत्तर बौद्धिक तबका अपने गंभीर आलेखों, शोधपत्रों और जनमानस की भावनाओं को वैचारिक अभिव्यक्ति प्रदान करता है। इन पत्रिकाओं और प्रकाशनों में फारवर्ड प्रेस’, ‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली (ईपीडब्लू) का ऑनलाइन संस्करण, ‘मास मीडिया’, ‘हंस’, ‘वागर्थ’, ‘कथाक्रम’, ‘समयांतर’, ‘गांधी मार्ग’ और दलित साहित्य आदि शामिल हैं।

यूजीसी के इस अवांछित दखल को दमनकारी और सीधे-सीधे अभिव्यक्ति की आज़ादी में बाधा डालने के रूप में देखा जा रहा है। हंस के संपादक संजय सहाय ने कहा, “मौजूदा सरकार देश में अभिव्यक्ति की आजादी को ख़त्म करने पर आमादा है, यह स्थिति आपातकाल के दौर से भी भयावह है। इस समय सरकार की मंशा ऐसा माहौल तैयार करने की है जिसमें उसके खिलाफ कोई आवाज उठाने की हिम्मत ना कर सके। यह विचारों और सोच की हत्या करने जैसा है, जिसका कड़ा विरोध किया जाना चाहिए। लघु पत्रिकाओं को मिलकर इसके खिलाफ लामबंद होना चाहिए।”

बहुजन समाज से जुड़े शोध और समाचारों के प्रकाशन में हमेशा अग्रणी और मुखर रहे फारवर्ड प्रेस को अपने शुभचिंतकों और पाठकों का भरपूर समर्थन मिला है। दलित लेखक संजीव खुदशाह ने कहा, “यूजीसी का निर्णय दुर्भाग्यपूर्ण है। यह फारवर्ड प्रेस के साथ-साथ प्रगतिशील पत्र-पत्रिकाओं की राह में सिर्फ रोड़ा डालता है। इस तरह की कार्रवाई फासीवादी ताकतों की समाज को ज्ञान से महरूम करने की प्रवृति को दर्शाती है। मैं इस तरह के कार्रवाई की भर्त्सना करता हूं।”

जिन पत्रिकाओं और प्रकाशन समूहों पर गाज गिरी है उनमें ज्यादातर वो हैं जो सत्ता की पोषक ताकतों की कारगुजारियों की सुचिंतित तरीके से समालोचना करते हैं एवं मूक और दबे-कुचले हाशिये के लोगों की आवाज़ रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज के प्रोफेसर प्रमोद यादव ने कहा, “समाज की घटनाओं और (सरकार के) कामकाज का विचारशील विश्लेषण और आलोचना… इन सबका समय-समय पर मूल्यांकन होना चाहिए। जाहिर है यह सरकार के माकूल नहीं होता है इसलिए वो लोग (सत्ता में बैठे) इस तरह के हर प्रयास को कुचलने की पुरजोर कोशिश में रहते हैं। ख़ासकर अगर आपका प्रकाशन किन्ही मुद्दों पर स्वतंत्र राय रखता है तो ऐसी संभावनाएं ज्यादा होती हैं। मुझे इस बात पर कोई हैरानी नहीं है कि वो ऐसा (ब्लैकलिस्ट करने) करके खुद की ही कलई खोल रहे हैं।”

यूजीसी ने इस मुद्दे पर अपने बचाव में सफाई दी है– “स्थायी समिति एक बार फिर यह कहती है कि किसी प्रकाशन को हटाने/शामिल करने के पीछे जरूरी नहीं है कि वह पत्र-पत्रिका किसी योग्य नहीं है बल्कि उसकी कुछ जानकारियों की अनुपलब्धता भी इसका कारण हो सकता है। साथ ही यह भी हो सकता है कि उस प्रकाशन से संबंधित संपादकीय बोर्ड, सूचीबद्ध करने की जानकारी, प्रकाशन के शुरू होने का वर्ष, छपने की आवृत्ति आदि की जानकारी न दर्शायी गई हो।”

यह बात गौर करने वाली है कि इस कार्रवाई से पहले यूजीसी ने पत्रिकाओं और प्रकाशनों को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए कोई सूचना नहीं दी गई। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रूसी अध्ययन केंद्र के सहायक प्रोफेसर विनय कुमार आंबेडकर ने लिखा है– “यह चिंता का विषय है कि पत्रिकाओं को उनका पक्ष रखने के लिए कोई मौका नहीं दिया गया। एक समय सीमा के भीतर पत्रिकाओं को यूजीसी के मानकों के हिसाब से सफाई देने के लिए यथोचित अवसर दिए बिना ही उनको बाहर कर दिया गया। इसमें यूजीसी ने न्याय की मूल प्रकृति का अनुपालन नहीं किया– जो अलोकतांत्रिक तो है ही,  इसकी कड़े-से-कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए।”

देश की प्रगतिशील ताकतों पर यह सबसे ताजा हमला है। मासिक पत्रिका समयांतरके संपादक पंकज बिष्ट ने कहा, “यह कदम वर्तमान सत्ता के पतनशील चरित्र को एक बार फिर से रेखांकित करता है, साथ ही इससे यह भी पता चलता है कि यह प्रगतिशील और वैज्ञानिक सोच के प्रति कितनी असहिष्णु हो चुकी है।” पकंज बिष्ट ने कहा, “इनके खुद के नेताओं को देख लीजिए जो बिना आधार और बहुत ही हास्यास्पद ढंग से बयानबाजी में लगे रहते हैं– अक्सर अपने ही पुराणशास्त्रों और वास्तविकताओं के आईने में घोर अज्ञानी और भ्रमित…. जैसे कि प्राचीन भारत में हवाई यात्रा बड़ी सुगम थी… हाल में त्रिपुरा के सीएम ने तो यहां तक कह दिया कि महाभारत के समय इंटरनेट मौजूद था। वे देश को पीछे धकेलने और शिक्षा से असल तथ्यों को खत्म कर उनकी जगह झूठे मिथकों को रखने के कुत्सित कार्यों में लगे हैं।”

यूएनएसी ब्लॉग एंड द वॉर्स एट होम एंड अबाउटकी एडमिन जूडी बेल्लो कहती हैं कि प्रतिरोध की आवाज को नियंत्रित करना या रोकना किसी भी लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है बल्कि यह सिर्फ उस सत्ता के फासीवादी होने का संकेत देती है। “यह प्रवृत्ति अमेरिका में भी बढ़ रही है। प्रॉप-ऑर-नॉट की फ़ेक न्यूजकी वेबसाइटों की सूची में लेफ्ट और राइट विंग– दोनों तरफ के लोगों की भरमार है। इनमें बहुत नामी-गिरामी समझे जाने वाले लोग भी हैं। वाशिंगटन पोस्ट में इसका पहले उल्लेख किया गया था, बाद में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी ने भी जानकारी पोस्ट की। वह कहती हैं– राजनीतिक चर्चा और ऐतिहासिक जानकारियों को रोकना या उनको नियंंत्रित करना अज्ञानता के लिए एक व्यापक आधार बनाता है और सत्ता को फासीवाद के रास्ते पर ले जाता है।

यूजीसी की कारगुजारी पर जिन लोगों ने फारवर्ड प्रेस के साथ एकजुटता जाहिर की है उनमें अकादमिक और पत्रकारिता क्षेत्र की कई हस्तियां हैं। इनमें हैं– रिटायर आईएस अधिकारी और बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एके विश्वास, लेखिका नूर जहीर, लेखक मुशर्रफ आलम जौकी, एमआईडीएस चेन्नई की पूर्व और वर्तमान फैकल्टी– वीके नटराज, डॉ. के शिवसुब्रमण्यन, कृपा अनंतपुर, सी लक्ष्मण, अजित मेनन; जापान के क्योटो विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर रोहन डिसूजा, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से रि. प्रोफेसर अमित भादुड़ी, पीस फाउंडेशन के प्रोफेसर अनिल चौधरी, हैदराबाद विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. ई हरिबाबू के नाम शामिल हैं।

इनके अलावा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एंड इकोनोमिक चेंज के प्रोफेसर नरसिम्हा रेड्डी, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. सतीश पावडे, एसआरएम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर वी कृष्णा अनंत, नार्दन ईस्टर्न सोशल रिसर्च के सीनियर फेलो डॉ. वाल्टर फर्नांडीस, लेखक एचएस वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया, कवि पवन करण, शिक्षाविद् एन. दिलीप कुमार, पत्रकार अभिमन्यु कुमार, लेखक प्रताप एंटनी और आईआईटी मद्रास के रिसर्च स्कॉलर एसजी वोम्बाटकर भी फारवर्ड प्रेस के पक्ष में यूजीसी के खिलाफ खड़े हुए। इन सभी ने यूजीसी की कार्यशैली और ताजा घटनाक्रम पर चिंता जाहिर की है।

 

लेखक व पत्रकार ज़ैगम मुर्तजा ने एक जगह अर्श सिद्दीकी के गजल की कुछ पंक्तियों का उल्लेख किया है–

हम हद-ए-इंदिमाल से भी गए

अब फ़रेब-ए-ख़याल से भी गए

दिल पे ताला ज़बान पर पहरा

यानी अब अर्ज़-ए-हाल से भी गए

 

(हद-ए-इंदिमाल : जख्म भरने का समय, फरेब-ए-ख्याल : झांसे या धोखे में रखने वाला विचार, अर्द-ए-हाल : हालत बयान करना)

 

(अनुवाद- कमल चंद्रवंशी)


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