पेरियार ललई सिंह यादव और रामस्वरूप वर्मा के नाम पर पुरस्कार

रामजी यादव मानते हैं कि बहुजन विमर्श ही आज के दौर में मौजूं है। जबतक दलित, ओबीसी, आदिवासी और महिलाओं को केंद्र में रखकर विमर्श नहीं किया जाएगा तब तक समाज में जड़ता बनी रहेगी। पेरियार ललई सिंह यादव और रामस्वरूप वर्मा सभी समाज में गतिशीलता के समर्थक थे, जड़ता के नहीं। बता रहे हैं नवल किशोर कुमार

भारत में पुरस्कारों का अपना समाज शास्त्र है। फिर चाहे वह साहित्य के क्षेत्र में दिया जाने वाला ज्ञानपीठ पुरस्कार हो या फिर खेल के क्षेत्र में द्रोणाचार्य और अर्जुन पुरस्कार। इन सभी पुरस्कारों का सामाजिक चरित्र मनुवादी व्यवस्था को संपोषित करने वाला ही है। वहीं उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एक अलग तरह के पुरस्कार शुरू किये गये हैं जिनका मकसद बहुजन नायकों को याद करना है। यह प्रयास गांव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट द्वारा शुरू किया गया है। इसके तहत शिक्षा , पत्रकारिता, लेखन और समाज तथा लोकसंस्कृति के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान करने वाले लोगों के लिए तीन सम्मान दिये जाते हैं। इनमें पेरियार ललई स्मृति सम्मान, हीरू राम स्मृति सम्मान और राम प्रताप दास स्मृति सम्मान शामिल हैं। पुरस्कारों की इस श्रृंखला में एक पुरस्कार और शामिल किया जाएगा। यह पुरस्कार अर्जक संघ के संस्थापक रामस्वरूप वर्मा के नाम पर शुरू होगा।

पेरियार ललई सिंह यादव स्मृति सम्मान से प्रो. चौथी राम यादव को सम्मानित करते मुख्य अतिथि

गांव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट के अध्यक्ष रामजी यादव के अनुसार इन सभी पुरस्कारों के तहत दस-दस हजार रुपए दिये जाते हैं। वे गांव के लोग नामक एक पत्रिका का प्रकाशन भी करते हैं। रामजी यादव बताते हैं कि ‘गांव के लोग’ को शुरू करने का विचार उनके जेहन में तब आया जब वे मुंबई में बतौर लेखक संघर्ष कर रहे थे। हालांकि इसके पहले उन्होंने करीब 14-15 वर्षों तक दिल्ली में कई पत्र-पत्रिकाओं में बतौर पत्रकार कार्य किया था। मुंबई में एक फिल्म की कहानी लिखने के क्रम में रामजी यादव ने पूरे भारत की यात्रायें की। इस क्रम में वे गांवों में गए और वहीं से ‘गांव के लोग’ का विचार आया।

गांव के लोग पत्रिका के विभिन्न अंकों के कवर पृष्ठ

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2016 में रामजी यादव ने गांव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट की स्थापना की। इसके उद्देश्य के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि गांव के लोग ही बहुजन हैं। जिस तरह से बहुजन हाशिए पर कर दिए गए हैं, वैसे ही गांव हाशिए पर दरकिनार कर दिए गए हैं। मुख्य धारा की मीडिया के लिए गांव बिकाऊ नहीं है। गांव और गांव के लोग उनकी प्राथमिकता में नहीं होते हैं। भारत यात्रा के दौरान यह बात सामने आयी कि मीडिया में गांवों को प्रतिनिधित्व कैसे मिले। हालांकि कोई नया अखबार निकालना और फिर उसे चलाना आज के दौर में आसान काम नहीं रह गया है। इसके लिए बहुत पूंजी चाहिए। रामजी यादव के अनुसार गांव के लोग ट्रस्ट के पीछे यही सोच रही कि गांव के लोगों जिनमें सबसे अधिक ओबीसी, दलित, आदिवासी और महिलाएं हैं, उनके लिए बौद्धिक हस्तक्षेप किया जाय।

गांव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट के अध्यक्ष रामजी यादव

पुरस्कारों के संबंध में उन्होंने बताया कि पेरियार ललई स्मृति गांव के लोग सम्मान का एक मकसद हिंदी क्षेत्र के बहुजनों के नायक ललई सिंह यादव और दक्षिण भारत में सामाजिक न्याय के पुरोधा पेरियार के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। वर्ष 2017 और वर्ष 2018 में क्रमश: आनंद स्वरूप वर्मा और चौथी राम यादव को इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। वहीं हीरू राम स्मृति गांव के लोग सम्मान से क्रमश: 2017 और 2018 में  भाषा वैज्ञानिक प्रोफेसर राजेन्द्र प्रसाद सिंह और आंबेडकरवादी आलोचक मूलचन्द सोनकर को दिया गया है। जबकि राम प्रताप दास स्मृति गांव के लोग सम्मान वर्ष 2017 और 2018 में क्रमश: पत्रकार उर्मिलेश और कथाकार पंकज बिष्ट को दिया गया है।

रामजी यादव के मुताबिक हीरू राम बनारस के ही एक लोक मर्मज्ञ किस्सागो और समाज चेता व्यक्ति थे। वहीं राम प्रताप दास महाराज गंज के एक छोटे किसान थे। वे कबीर के अनुयायी थे और शिक्षा को लेकर जागरूकता फैलाते थे। उन्होंने अंधविश्वास और पोंगापंथ के खिलाफ भी अभियान चलाया था। रामजी यादव बताते हैं कि राम स्वरूप वर्मा स्मृति गांव के लोग सम्मान अगले वर्ष शुरू होगा।

बहरहाल रामजी यादव मानते हैं कि बहुजन विमर्श ही आज के दौर में मौजूं है। जबतक दलित, ओबीसी, आदिवासी और महिलाओं को केंद्र में रखकर विमर्श नहीं किया जाएगा तबतक समाज में जड़ता बनी रहेगी। पेरियार ललई सिंह यादव और  रामस्वरूप वर्मा समाज में गतिशीलता के समर्थक थे, जड़ता के नहीं।

(कॉपी एडिटर : सिद्धार्थ)


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